श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-56
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
छप्पनवाँ अध्याय
पाण्डवों द्वारा भगवती की स्तुति, भगवती द्वारा प्रसन्न होकर विजय का आशीर्वाद देना, पाण्डवों का अज्ञातवास के लिये राजा विराट के नगर में जाना, भीम द्वारा कीचक और उपकीचकों का वध, अभिमन्यु-विवाह
अथः षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
कीचकवधोपाख्या
नं

श्रीमहादेवजी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! बहुत काल तक भ्रमण करने के बाद वे महात्मा पाण्डव प्रत्यक्ष फल देनेवाली भगवती कामाख्या के दर्शन के लिये योनिपीठ में आये, जहाँ पूर्वकाल में देवाधिदेव भगवान् शंकर ने तप किया था ॥ १-२ ॥ वहाँ उन धर्मपरायण पाण्डवों ने विधानपूर्वक देवी भगवती का पूजन करके राज्य प्राप्त करने तथा अत्यन्त घोर युद्ध में पापबुद्धि दुष्ट कौरव शत्रुओं का उनके मन्त्रियोंसहित संहार करने की उनसे प्रार्थना की। उन महात्मा पाण्डवों के इस प्रकार प्रार्थना करने पर भगवती उनके समक्ष प्रकट होकर इस प्रकार बोलीं— ॥ ३-५ ॥

देवी बोलीं — कुरुवंश के यश को बढ़ानेवाले महान् भाग्यशाली धर्मपुत्र [ युधिष्ठिर ] ! तुम वनवास-सम्बन्धी प्रतिज्ञा को पार करके तथा धृतराष्ट्र के सभी दुरात्मा एवं दुर्धर्ष पुत्रों को मारकर राज्य अवश्य ही प्राप्त करोगे। तुम्हारे ये अजेय तथा पराक्रमी चारों भाई युद्ध में धृतराष्ट्र-पुत्रों को सेनासहित मार गिरायेंगे । मैं तुम्हारी सहायता के लिये देवताओं के द्वारा पृथ्वी के भार का हरण करने के लिये प्रार्थना करने पर पुरुषरूप में वसुदेव के घर में देवकी द्वारा अपनी मायामयी लीला से प्रकट हुई हूँ ॥ ६-९ ॥ मेरी आज्ञा से विष्णु भी पृथ्वी के भार का हरण करने के लिये तुम्हारे महाबली भाई अर्जुन के नाम से उत्पन्न हुए हैं। मैं कृष्ण के रूप में तुम्हारी उत्तम प्रकार से सहायता करके अर्जुन को आगे करके भीष्म, द्रोण तथा कुरुजाङ्गल आदि अनेक देश-देशान्तरों से आये हुए श्रेष्ठ क्षत्रिय महारथियों को मार गिराऊँगी ॥ १०–१२ ॥ तुम्हारा महाबली भाई वायुपुत्र भीम युद्ध में समस्त धृतराष्ट्र-पुत्रों को मार डालेगा। पृथ्वी के लिये भारस्वरूप अन्य सैकड़ों-हजारों राजाओं को तुम्हारे पक्ष के दूसरे श्रेष्ठ क्षत्रियगण मार डालेंगे। इस प्रकार महाभारत के युद्ध में क्षत्रियों के मारे जाने पर मेरी कृपा से तुम पुनः राज्य प्राप्त करोगे, इसमें संदेह नहीं है ॥ १३-१५ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — इस प्रकार देवी से वरदान प्राप्तकर प्रसन्नमन वाले धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने महादेवी परमेश्वरी की स्तुति की — ॥ १६ ॥

॥ युधिष्ठिर कृत कामेश्वरी देवी स्तुति ॥
॥ युधिष्ठिर उवाच ॥
नमस्ते परमेशानि ब्रह्मरूपे सनातनि ।
सुरासुरजगद्वन्द्ये कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ १७ ॥
न ते प्रभावं जानन्ति ब्रह्माद्यास्त्रिदशेश्वराः ।
प्रसीद जगतामाद्ये कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ १८ ॥
अनादिपरमा विद्या देहिनां देहधारिणी ।
त्वमेवासि जगद्वन्द्ये कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ १९ ॥
त्वं बीजं सर्वभूतानां त्वं बुद्धिश्चेतना धृतिः ।
त्वं प्रबोधश्च निद्रा च कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ २० ॥
त्वामाराध्य महेशोऽपि कृतकृत्यं हि मन्यते ।
आत्मानं परमात्माऽपि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ २१ ॥
दुर्वृत्तवृत्तसंहर्त्रि पापपुण्यफलप्रदे ।
लोकानां तापसंहर्त्रि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ २२ ॥
त्वमेका सर्वलोकानां सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी ।
करालवदने कालि कामेश्वरि नमोऽस्तु ॥ २३ ॥
प्रपन्नार्तिहरे मातः सुप्रसन्नमुखाम्बुजे ।
प्रसीद परमे पूर्णे कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ २४ ॥
त्वामाश्रयन्ति ये भक्त्या यान्ति चाश्रयतां तु ते ।
जगतां त्रिजगद्धात्रि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ २५ ॥
शुद्धज्ञानमये पूर्णे प्रकृतिः सृष्टिभाविनी ।
त्वमेव भातविश्वेशि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ २६ ॥

युधिष्ठिर बोले — ब्रह्मरूपा सनातनी परमेश्वरी ! आपको नमस्कार है। देवताओं, असुरों और सम्पूर्ण विश्व द्वारा वन्दित कामेश्वरी! आपको नमस्कार है। जगत् की आदिकारणभूता कामेश्वरी ! आपके प्रभाव को ब्रह्मा आदि देवेश्वर भी नहीं जानते हैं; आप प्रसन्न हों, आपको नमस्कार है। जगद्वन्द्य! आप अनादि, परमा, विद्या और देहधारियों की देह को धारण करने वाली हैं, कामेश्वरी! आपको नमस्कार है । आप सभी प्राणियों की बीजस्वरूपा हैं, आप ही बुद्धि, चेतना और धृति हैं, आप ही जागृति और निद्रा हैं । कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है ॥ १७–२०॥

आपकी आराधना करके परमात्मा शिव भी अपने-आपको कृतकृत्य मानते हैं, कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है। दुराचारियों के दुराचरण का संहार करने वाली, पाप-पुण्य के फल को देनेवाली तथा सम्पूर्ण लोकों के ताप का नाश करने वाली कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है । आप ही एकमात्र समस्त लोकों की सृष्टि, स्थिति और विनाश करने वाली हैं। विकराल मुखवाली काली कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है। शरणागतों की पीड़ा का नाश करने वाली, कमल के समान सुन्दर और प्रसन्न मुखवाली माता ! आप प्रसन्न हों। परमे ! पूर्णे! कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है। जो भक्तिपूर्वक आपके शरणागत हैं, वे संसार को शरण देने योग्य हो जाते हैं। तीनों लोकों का पालन करने वाली देवी कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है। आप शुद्धज्ञानमयी, सृष्टि को उत्पन्न करने वाली पूर्ण प्रकृति हैं। आप ही विश्व की माता हैं, कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है ॥ २१–२६ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — धर्मात्मा धर्मपुत्र [ युधिष्ठिर] – द्वारा इस प्रकार स्तुति करने पर भगवती ने प्रकट होकर कहा कि राजन्! अपनी इच्छा के अनुसार वर माँगो ॥ २७ ॥ राजा [ युधिष्ठिर ने कहा — आपकी कृपा से पूर्व प्रतिज्ञाके अनुसार मेरा बारह वर्ष का परम दुःखमय वनवास बीत गया। तेरहवें वर्ष में भी हम लोगों को अज्ञातवास करना है, जैसा कि मेरे द्वारा पहले द्यूतक्रीड़ा के समय निर्णय लिया गया था । [ इसलिये हम लोगों को दूसरों के द्वारा अविदितरूप से रहना चाहिये ।] इस प्रकार वह अत्यन्त कष्टदायक कठिन संकटकाल आ गया है, जिस प्रकार हम इसे पार कर सकें, वैसा आप करें ॥ २८-३० ॥

देवी बोलीं — मत्स्य देश के राजा [विराट]-के नगर में द्रौपदी और भाइयों के साथ रहकर प्रतिज्ञा का पालन करके [तुम] पुनः राज्य प्राप्त करोगे ॥ ३१ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — ऐसा कहकर धर्मपुत्र के देखते-देखते आकाश में विद्युत् की भाँति भगवती क्षणभर में अन्तर्धान हो गयीं ॥ ३२ ॥ मुने! उसके बाद समस्त धर्मात्माओं में श्रेष्ठ तथा सर्वतत्त्वज्ञ [ युधिष्ठिर ]-ने अपने सभी भाइयों को बुलाकर निवास-सम्बन्धी मन्त्रणा की । महामते ! इस प्रकार निश्चय करके उन्होंने अपने अन्य सहवासियों को छोड़कर विराट-राज के नगर के लिये गुप्तरूप से प्रस्थान किया ॥ ३३-३४ ॥ नगर के समीप पहुँचने पर धनुष, प्रत्यञ्चा तथा अस्त्र-शस्त्रों को उन्होंने शमीवृक्ष के कोटर में रख दिया ॥ ३५ ॥ उसके बाद महानुभाव राजा युधिष्ठिर देवी को साष्टाङ्ग प्रणाम करके सुवर्णरचित पाशों को लेकर शीघ्रतापूर्वक मत्स्यराज विराट के सम्मुख ब्राह्मणवेश में गये ॥ ३६ ॥ उन महानुभाव राजेन्द्र [ युधिष्ठिर] – को सभा में
आया देखकर मत्स्यराज ने पूछा कि आप कौन हैं ? यहाँ क्यों और कहाँ से आये हैं ? मुझे प्रतीत होता है कि आप निश्चित ही चक्रवर्ती सम्राट् हैं ॥ ३७ ॥

उन्होंने [युधिष्ठिर ने] कहा — राजन् ! मैं सब कुछ नष्ट हो जाने पर उपस्थित हुआ शरणार्थी हूँ। मुझे धर्मपुत्र [राजा युधिष्ठिर]- द्वारा संरक्षित, द्यूतक्रीड़ा में कुशल ‘कङ्क’ नामक ब्राह्मण समझिये ॥ ३८ ॥

ऐसा सुनकर मत्स्यराज ने उन महाबुद्धिमान् धर्मात्मा को स्वयं आदरपूर्वक सभा में संरक्षण दिया। भगवती की कृपा से उस तेरहवें वर्ष में राजा की सभा में आये हुए उन्हें कोई जान नहीं सका ॥ ३९-४० ॥ इसी प्रकार भीमसेन भी उन राजा [विराट]- के पास आये और राजा की सम्मति से पाकशाला में नियुक्त हो गये । स्त्रीवेशधारी अर्जुन मत्स्यराज की अनुमति से उनकी नृत्यशाला में कन्याओं के नृत्यशिक्षक हुए। सर्वाङ्गसुन्दरी द्रौपदी भी राजा की पत्नी सुदेष्णा की सैरन्ध्री नामवाली प्रसाधन-सेविका होकर राजा के अन्तःपुर में रहने लगी। माद्री के दोनों पराक्रमी पुत्र भी उन राजा [विराट] -के पास आये और अश्वशाला तथा गोशाला में नियुक्त होकर रहने लगे ॥ ४१–४४ ॥ महादेवी की कृपा से उस तेरहवें वर्ष में इन सभी राजपुत्रों को किसी ने भी नहीं पहचाना ॥ ४५ ॥

[उस वर्ष के] ग्यारहवें माह में सुदेष्णा के महल में उसके बलवान् भाई कीचक ने सैरन्ध्री को देखा ॥ ४६ ॥ वही वृद्ध मत्स्यराज के राज्य का संरक्षक था। अतः उसके प्रस्ताव का उल्लंघन करने का उसमें साहस नहीं था ॥ ४७ ॥ सुन्दर अङ्गों और दिव्य लक्षणोंवाली उस सैरन्ध्री को देखकर उस [कीचक]-ने अपनी बहन से पूछा कि यह सर्वाङ्गसुन्दरी कौन है ? क्या ये देवराज इन्द्र की पत्नी शची हैं या भगवान् विष्णु की पत्नी स्वयं लक्ष्मी हैं? मैंने ऐसी सर्वाङ्गसुन्दरी कोई नहीं देखी ॥ ४८-४९ ॥

सुदेष्णा बोली — भाई ! सुनो, यह सैरन्ध्री है, जो महाराजाधिराज धर्मपुत्र [युधिष्ठिर]-के महल से अचानक ही आ गयी है ॥ ५० ॥

कीचक बोला — यह जैसे भी मुझे शीघ्र स्वीकार करे वैसा करो, नहीं तो मैं अपना प्राण त्यागकर यमलोक चला जाऊँगा ॥ ५१ ॥

सुदेष्णा बोली — भाई ! मैं तुमसे कुछ अद्भुत और रहस्यमय बात बताती हूँ, उसे सुनकर विचार करके बोलो तो मैं तुम्हारा प्रिय कार्य करूँगी। यह रूपवती सैरन्ध्री जब यहाँ रहने की इच्छा से आयी तब मैंने इससे कहा था — सैरन्ध्री ! तुम मुझसे सौगुना सौन्दर्यशालिनी हो । तुम मेरी सेवाके योग्य नहीं हो, मेरे लिये भी यह उचित नहीं है । कमल के समान नेत्रों तथा सुन्दर अङ्गों वाली तुम्हें यदि राजा देख लेंगे तो सब प्रकार से तुम्हारे हो जायँगे। तुम्हारे रूप-सौन्दर्य पर मोहित राजा तुम्हारी आज्ञा के वश में हो जायँगे । सैरन्ध्री ! वे मेरे पास नहीं आयेंगे, इससे बढ़कर मेरा दुर्भाग्य क्या होगा? इसलिये यहाँ तुम नहीं रह सकती, जहाँ इच्छा हो वहाँ जाओ ॥ ५२-५६१/२

उसे सुनकर सैरन्ध्री ने कहा कि कल्याणी ! जबतक मैं आपके भवन में रहूँ तबतक कोई पुरुष वहाँ न जाय । पाँच महापराक्रमी गन्धर्व मेरे पति हैं, वे ही रात-दिन मेरी रक्षा करते रहते हैं। इस पृथ्वी पर कोई भी अन्य पुरुष मुझ पर बलप्रयोग करने में समर्थ नहीं है । इसलिये रानी ! मुझे अपने समीप रखने में आपको भय नहीं है। ऐसा सुनकर मैंने अपने महल में सैरन्ध्री को रख लिया। यदि ऐसा नहीं होता तो मेरे सुख का नाश करने वाली इसे अपने घर में क्यों रखती ? अतः तुम यदि इस सुन्दरी सैरन्ध्री के पीछे पड़ रहे हो तो वे पाँचों गन्धर्व तुम्हें निश्चित ही मार डालेंगे ॥ ५७–६११/२

कीचक बोला — मैं सत्य कहता हूँ कि मुझे गन्धर्वों से भय नहीं है, अपने बाहुबल का आश्रय लेकर मैं उन आये गन्धर्वों को मार डालूँगा। तुम गन्धर्वों से भय न करो और अपनी मधुर वाणी से
सुन्दर अङ्गों वाली सैरन्ध्री को प्रसन्न कर मेरी शय्या पर भेजो ॥ ६२-६३१/२

श्रीमहादेवजी बोले — तब सुदेष्णा ने सैरन्ध्री को बुलाकर मुसकराते हुए कहा – सैरन्ध्री ! कीचक के महल में जाओ। कल्याणी! वह तुम्हें चाहता है, तुम उस सुन्दर रूपवाले कीचक को अङ्गीकार करो ॥ ६४-६५ ॥

सैरन्ध्री बोली — अपने पाँच पतियों के अतिरिक्त मैं किसी दूसरे पुरुष को अङ्गीकार नहीं करती। वह अत्यन्त पापी और अत्यन्त मन्द बुद्धिवाला मुझपर  बल प्रयोग करने में समर्थ नहीं हो सकता । यदि वह दुष्टात्मा मुझे देखकर कामान्ध होकर मेरे पास आयेगा तो उन गन्धर्वों के द्वारा निश्चितरूप से उसकी मृत्यु हो जायगी ॥ ६६-६७ ॥

उसकी ऐसी बात सुनकर सुदेष्णा ने भाई से कहा कि सैरन्ध्री अपनी इच्छा से तुम्हारे पास नहीं आयेगी ॥ ६८ ॥ उसकी उस बात को सुनकर पापी दुष्टबुद्धि कीचक ने बलपूर्वक शीलहरण की चेष्टा की । उसकी उस कुचेष्टा को जानकर द्रौपदी भयभीत होकर जगत् का पालन करने वाली देवी शिवा की शरण में गयी ॥ ६९-७० ॥

॥ द्रोपदी कृत दुर्गा स्तुति ॥
॥ द्रौपद्युवाच ॥
देवि दुर्गे जगन्मातः सर्वरक्षरणकारिणि ।
प्रसीद त्वत्प्रपन्नानां दुःखदारियद्रनाशिनि ॥ ७१ ॥
दुष्टस्तम्भनि विश्वेशि कात्यायनि महेश्वरि ।
विश्वमोहिनि विश्वेशे चितिरूपे नमोऽस्तु ते ॥ ७२ ॥
महामोहस्वरूपा त्वं शुद्धज्ञानस्वरूपिणी ।
ये त्वां स्मरन्ति संसारे ते दुर्गान्निस्तरन्ति हि ॥ ७३ ॥
पातिव्रत्यस्वरूपा त्वं साध्वीनां जगदम्बिके ।
निस्तारय भयाद्धोराच्छङ्करप्राणवल्लभे ॥ ७४ ॥
त्वमेव देवि दीनानां सदासि परमा गतिः ।
त्वामहं शरणं प्राप्ता त्राहि मां घोरसङ्कटात् ॥ ७५ ॥

द्रौपदी बोली — शरणागतों के दुःख-दारिद्र्य का नाश करने वाली, सबकी रक्षा करने वाली जगज्जननी देवी दुर्गा! आप प्रसन्न हों । दुष्टों को स्तम्भित करने वाली, विश्व को मोहित करने वाली, चैतन्यरूपिणी, विश्व की अधिष्ठात्री विश्वेश्वरी! कात्यायनी ! महेश्वरी ! आपको नमस्कार है ॥ ७१-७२ ॥ दुर्गा ! आप मोहस्वरूपा और शुद्धज्ञानस्वरूपा हैं, इस संसार में जो आपका स्मरण करते हैं वे संकटों से पार जाते हैं । जगदम्बिका! आप सती स्त्रियों की पातिव्रत्यस्वरूपा हैं, भगवान् शंकर की प्राणप्रिया ! दारुण भय से मेरा उद्धार कीजिये । देवी! आप दीनजनों की सदैव परमगति हैं। मैं आपकी शरण में हूँ, भयानक संकट से मेरी रक्षा कीजिये ॥ ७३–७५ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — पाञ्चाली द्वारा इस प्रकार स्तुति करने पर दुःसह दुःखों का नाश करने वाली देवी दुर्गा ने अन्तरिक्ष में स्थित होकर कहा — ‘सैरन्ध्री ! भय मत करो। जो कोई अन्य पुरुष कामलोलुप होकर तुम्हें चाहेगा, वह शीघ्र ही मृत्यु के वशवर्ती होगा; इसमें संशय नहीं है’ ॥ ७६-७७ ॥ इस प्रकार देवी से वरदान प्राप्त कर प्रसन्न मुखवाली सैरन्ध्री निर्भय होकर मत्स्यराज के भवन में विचरण करने लगी ॥ ७८ ॥

महामुने ! वह सुन्दर अपाङ्गवाली एक बार किसी महत्त्वपूर्ण कार्य से रात्रि में उस दुष्ट कीचक के घर गयी। तब उस पापी ने पास में आयी हुई उस रूपवती द्रौपदी को देखकर तत्क्षण उठकर उसका कमलसदृश हाथ पकड़ लिया, परंतु वह उसे ढकेलकर घर से बाहर भाग आयी ॥ ७९-८० ॥ वह पापी क्रोधपूर्वक आँखें नचाते हुए द्रौपदी के पीछे दौड़ा। उसके भय से अत्यन्त विक्षुब्ध मनवाली वह [द्रौपदी] मत्स्यराज की सभा में चली गयी, जहाँ धर्मपुत्र युधिष्ठिर और भीमसेन वृद्ध राजा [विराट]- के साथ द्यूतक्रीड़ा में संलग्न थे। उस सूतपुत्र कीचक ने वहाँ आयी हुई द्रौपदी के बाल पकड़कर सहसा पैर से प्रहार किया। तब रुदन करती हुई द्रौपदी ने क्रोधपूर्वक मत्स्यराज की निन्दा की और दीन हृदयवाले धर्मपुत्र युधिष्ठिर तथा भीमसेन की ओर लाल नेत्रों से देखकर आँखें मीचकर उचित समय की प्रतीक्षा करती हुई वह अचानक मत्स्यराज के भवन में चली गयी। यह देखकर भीम ने कीचक के विनाश का मन-ही-मन विचार किया ॥ ८१-८४ ॥

उसके बाद एक बार उन बलवान् पाण्डुपुत्र भीम ने सैरन्ध्री [द्रौपदी]-से कहा कि कीचक को आमन्त्रण देकर रात्रि में राजभवन में ले आओ। वहाँ मैं तुम्हारा प्रिय करने के लिये उसे मार डालूँगा और तुम कहना कि यह पापी गन्धर्वों के द्वारा मार डाला गया ॥ ८५-८६ ॥ भीमसेन की इस बात को मानकर उस पतिव्रता ने वैसा ही किया और भीमसेन ने अर्धरात्रि में उस पापी कीचक को मार डाला। सैरन्ध्री ने नगरवासियों से कह दिया कि कीचक गन्धर्वों द्वारा मार डाला गया ॥ ८७-८८ ॥ ऐसा सुनकर और दूसरे भी उपकीचक उसे देखने के लिये एकत्र हो गये। वे उसका दाह करने के लिये भवन से ले आये। रात्रि का बहुत समय उन सबके रोने में ही बीता और इसके बाद उन्होंने सैरन्ध्री का भी कीचक के साथ ही दाह करने का आपस में निर्णय किया ॥ ८९-९०१/२

तदनन्तर वे उपकीचक जाकर उसे बलपूर्वक पकड़ लाये । तब सैरन्ध्री ने उच्च स्वर में विलाप किया, जिसे भीम जान गये । उसके बाद दीवाल लाँघकर वे महाबली भीम बाहर निकल गये और उन्होंने उपकीचकों का वध कर सैरन्ध्री को छुड़ा लिया। लोगों में चर्चा रही कि इन सबको गन्धर्व ने मार डाला ॥ ९१–९३ ॥ तब भयभीत होकर राजा [विराट]- ने विनयपूर्वक सैरन्ध्री से कहा कि तुम्हारे कारण ही मेरे राज्य के इतने रक्षक मारे गये। तुम मेरे नगर को छोड़कर अपनी रुचि के अनुसार अन्यत्र निवास करो ॥ ९४१/२

सैरन्ध्री ने उनसे कहा कि राजन् ! मुझे कुछ समय के लिये क्षमा कीजिये, मैं शीघ्र ही आपके राजप्रासाद को छोड़कर चली जाऊँगी। तत्पश्चात् उन सबका तेरहवाँ वर्ष व्यतीत हो गया और राजा दुर्योधन गुप्तचरों के द्वारा खोजवाकर तथा भीष्म, द्रोण आदि प्रमुखों से देर तक मन्त्रणा करके भी उनका पता नहीं पा सका ॥ ९५-९७ ॥ कीचकों का वध सुनकर ‘वहाँ पाण्डव होंगे’– ऐसा निश्चित कर राजा दुर्योधन सेनासहित मत्स्यराज के देश में आ गया। वहाँ गौओं के ले जाने के सम्बन्ध में धनुर्धर अर्जुन के साथ उसका युद्ध हुआ, जिसमें भीष्म, द्रोण आदि सभी उनसे पराजित हुए ॥ ९८-९९ ॥

तत्पश्चात् अपने यहाँ रहनेवाले पाण्डवों को राजा विराट ने भी जान लिया और विनयावनत होकर राजा ने उनकी विधिवत् पूजा की ॥ १०० ॥ वहाँ अर्जुनपुत्र [अभिमन्यु]- – का विराटपुत्री [ उत्तरा ] – के साथ विवाह का सभी के आनन्द को बढ़ानेवाला मङ्गलमय उत्सव हुआ ॥ १०१ ॥

महामते! तत्पश्चात् [महाभारत] युद्ध की तैयारी प्रारम्भ हुई। पाञ्चालदेश के राजा अपनी समस्त सेना के साथ वहाँ आये। काशिराज तथा अन्य प्रमुख राजागण भी उनकी सहायता के लिये आये । उनके और मत्स्यदेश के अन्य राजाओं के साथ पाण्डव भीषण संग्राम की इच्छा से कुरुक्षेत्र में आ गये ॥ १०२-१०४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत ‘कीचकवधोपाख्यान’ नामक छप्पनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५६ ॥

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