श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-57
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
सत्तावनवाँ अध्याय
महाभारतयुद्ध का वर्णन
अथः सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय
महाभारतयुद्धवर्णनं

श्रीमहादेवजी बोले — तब पृथ्वी के भार का हरण करने के लिये महाकाली कृष्णरूप से अपनी सेना को धृतराष्ट्रपुत्रों की सहायता में नियोजित कर स्वयं पूर्णरूप से सात्यकिसहित पाण्डवों के पास चली आयी । महामते ! अनेक देशों के निवासी राजागण पाण्डवों और कौरवों की सहायता के लिये आये । महामुने ! क्षत्रियों का वैसा एकत्री-करण न कभी कहीं हुआ था, न होगा ॥ १-३ ॥ उस समय वह धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र अनेक देशों के गज, अश्व, रथ और पैदल सैनिकों से व्याप्त हो गया था ॥ ४ ॥ संसार का सर्वथा विनाश कर देने वाली उस युद्ध-सम्बन्धी तैयारी को देखकर भीष्म आदि महात्माओं ने दुर्योधन को रोका ॥ ५ ॥

श्रेष्ठ, तत्त्वज्ञ भगवान् वेदव्यास ने स्वयं आकर पुत्रसहित धृतराष्ट्र को बार-बार रोका, लेकिन कालपाश से जकड़े हुए राजा धृतराष्ट्र ने व्यासजी की बात नहीं मानी और कर्ण के परामर्शानुसार युद्ध के लिये निश्चय किया ॥ ६-७ ॥ इसके पश्चात् धृतराष्ट्र के पुत्र अपने मन्त्रियों के साथ युद्ध के लिये शङ्खों, नगाड़ों और दुन्दुभियों की ध्वनि तथा रथों के धुरों की घरघराहट से पृथ्वीतल को कँपाते हुए निकल पड़े ॥ ८ ॥ उन्हें आया देखकर पाण्डवपक्ष के महारथियों ने बार-बार शङ्खध्वनि के साथ सिंहनाद किया। उस ध्वनि ने पृथ्वी और आकाश को गुञ्जायमान करते हुए धृतराष्ट्रपुत्रों के मन तथा तेज को सब प्रकार से खींच लिया ॥ ९-१० ॥

तब धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर युद्ध में मोर्चा बाँधकर डटे हुए भीष्म, द्रोण आदि प्रमुख गुरुजनों को पृथक्-पृथक् प्रणाम कर और उनसे युद्ध के लिये आज्ञा लेकर पुनः अपने रथ पर आ गये। उसके बाद उन सभी पाण्डवों ने उत्तम रथों से नीचे कूदकर युद्ध में विजयप्राप्ति के लिये भगवती जगदम्बिका की स्तुति की ॥ ११-१२ ॥

॥ पाण्डवकृत कात्यायनी स्तुति ॥शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिये नित्य पाठ करना चाहिये
॥ पाण्डवा ऊचुः ॥
कात्यायनि त्रिदशवन्दितपादपद्में
विश्वोद्भवस्थितिलयैकनिदानरूपे ।
देवि प्रचण्डदलिनि त्रिपुरारिपत्नि दुर्गे
प्रसीद जगतां परमार्तिहन्त्रि ॥ १३ ॥
त्वं दुष्टदैत्यविनिपातकरी सदैव
दुष्टप्रमोहनकरी किल दुःखहन्त्री ।
त्वां यो भजेदिह जगन्मयि तं कदापि
नो बाधते भवसु दुःखमचिन्त्यरूपे ॥ १४ ॥
त्वामेव विश्वजननीं प्रणिपत्य विश्वं
ब्रह्मा सृजत्यवति विष्णुरहोत्ति शम्भुः ।
काले च तान्सृजसि पासि विहंसि
मातस्त्वल्लीलयैव नहि तेऽस्ति जनैर्विनाशः ॥ १५ ॥
त्वं यैः स्मृता समरमूर्धनि दुःखहन्त्रि
तेषां तनून्नहि विशन्ति विपक्षबाणाः ।
तेषां शरास्तु परगात्रनिभग्नपुङ्खाः
प्राणान्प्रसन्ति दनुजेन्द्रनिपातकर्त्रि ॥ १६ ॥
यस्त्वन्मनुं जपति घोररणे सुदुर्गे
पश्यन्ति कालसदृशं किल तं विपक्षाः ।
त्वं यस्य वै जयकरी खलु तस्य
वक्त्राद्ब्रह्माक्षरात्मकमनुस्तव निःसरेच्च ॥ १७ ॥
त्वामाश्रयन्ति परमेश्वरि ये भयेषु
तेषां भयं नहि भवेदिह वा परत्र ।
तेभ्यो भयादिह सुदूरत एव
दुष्टास्त्रस्ताः पलायनपराश्च दिशो द्रवन्ति ॥ १८ ॥
पूर्वे सुरासुररणे सुरनायकस्त्वां
सम्प्रार्थयन्नसुरवृन्दमुपाजघान ।
रामोऽपि राक्षसकुलं निजघान
तद्वत्वत्सेवनादृत इहास्ति जयो न चैव ॥ १९ ॥
तत्त्वां भजामि जयदां जगदेकवन्द्यां
विश्वाश्रयां हरिविरञ्चिसुसेव्यपादाम् ।
त्वं नो विधेहि विजयं त्वदनुग्रहेण
शत्रून्निपात्य समरे विजयं लभामः ॥ २० ॥

पाण्डव बोले — देवताओं के द्वारा पूजित चरणकमलों वाली तथा जगत् के उद्भव – पालन-संहार की कारणस्वरूपिणी कात्यायनी ! भीषण दुष्टों का नाश करने वाली देवी! त्रिपुरारिपत्नी ! संसार के महान् कष्टों को दूर करने वाली दुर्गा ! हमपर प्रसन्न होइये ॥ १३ ॥ आप सर्वदा दुष्ट दैत्यों का संहार करती हैं, दुष्टों को विमोहित करती हैं और भक्तों के दुःख का हरण करती हैं। जगद्व्यापिनी! अचिन्त्यरूपा ! जो प्राणी त्रिलोकी में आपकी आराधना करता है उसे कोई कष्ट कभी भी पीड़ित नहीं करता ॥ १४ ॥

जगज्जननी आप भगवती को प्रणाम करके ही ब्रह्मा जगत् का सृजन करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शम्भु संहार करते हैं। माता ! आप समय- समय पर अपनी लीला से उनका (त्रिदेवों का) भी सृजन, पालन तथा विनाश करती हैं, किंतु आपका नाश किसी से कभी नहीं होता ॥ १५ ॥ दुःखों का हरण करने वाली भगवती ! जो लोग युद्धक्षेत्र में आपका स्मरण करते हैं, उनके शरीर में शत्रुओं के बाण प्रवेश नहीं कर पाते। अपितु श्रेष्ठ राक्षसों का संहार करने वाली देवि! शत्रुओं के शरीर में पूँछ तक प्रविष्ट होने वाले उनके बाण उन शत्रुओं के प्राण हर लेते हैं ॥ १६ ॥ जो मनुष्य अत्यन्त दुर्गम तथा भीषण संग्राम में आपके मन्त्र का जप करता है, शत्रुगणों को वह साक्षात् काल के समान दिखायी देता है। जिसके मुख से आपका ब्रह्माक्षरस्वरूप मन्त्र उच्चरित होता है, आप निश्चितरूप से उसे विजय प्रदान करती हैं ॥ १७ ॥

परमेश्वरी! जो लोग भय की स्थितियों में आपका आश्रय ग्रहण करते हैं, उन्हें इस लोक में तथा परलोक में कहीं भी भय नहीं होता और दूर से ही उनसे भयभीत होकर दुष्टजन त्रस्त होते हुए सभी दिशाओं में भाग खड़े होते हैं ॥ १८ ॥

पूर्वकाल में देवासुर संग्राम में देवराज इन्द्र ने आपकी आराधना करके ही राक्षससमुदाय का संहार किया था और उसी तरह श्रीरामचन्द्र ने भी आपकी उपासना करके राक्षसकुल का वध किया था। देवी! आपकी आराधना के बिना यहाँ विजय सम्भव नहीं है ॥ १९ ॥ अतः हम विजय प्रदान करने वाली, जगत् के प्राणियों द्वारा एकमात्र वन्दनीया, विश्व की आश्रयस्वरूपिणी तथा ब्रह्मा, विष्णु के द्वारा भली-भाँति पूजित चरणों वाली आप भगवती की आराधना करते हैं । आप हमलोगों को विजय प्रदान करें; आपकी कृपा से ही हमलोग संग्राम में शत्रुओं का संहार करके विजय प्राप्त करें ॥ २० ॥

श्रीमहादेवजी बोले — इस प्रकार महात्मा पाण्डवों के स्तुति करने से भगवती अत्यन्त प्रसन्न हो गयीं और अन्तरिक्ष में साक्षात् विराजमान होकर उन्होंने वर प्रदान किया ॥ २१ ॥

देवी बोलीं — आपलोग मेरी कृपा से रणक्षेत्र में शत्रुओं को बार-बार मारकर इस राज्य को निष्कण्टक- रूप में प्राप्त करेंगे। पृथ्वी का भार मिटाने और आपलोगों की विजय के लिये मैं अपनी लीला से वासुदेव श्रीकृष्ण के रूप में उत्पन्न हुई हूँ। अर्जुन के विशाल कपिध्वज रथ में वासुदेवस्वरूप से सदा स्थित रहकर मैं निश्चितरूप से आपलोगों की रक्षा करूँगी । संसार में जो लोग इस स्तोत्र से भक्तिपूर्वक मेरा स्तवन करेंगे, उन्हें मैं सदा विजय प्रदान करूँगी; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २२–२५ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — इस प्रकार यह वर प्राप्त कर महारथी पाण्डुपुत्रों का मुखकमल प्रसन्नता से खिल उठा और उन्होंने युद्ध में अपनी विजय का निश्चय कर लिया ॥ २६ ॥ तत्पश्चात् उन पाण्डवों ने कवच धारण करके स्वर्णमण्डित रथों पर आरूढ़ होकर अलग-अलग शङ्खध्वनि की ॥ २७ ॥ अर्जुन के रथ पर विराजमान बलवान् श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक महान् शङ्ख बार-बार तीव्र ध्वनि के साथ बजाया ॥ २८ ॥

उस शङ्खध्वनि से पृथ्वी काँप गयी और यह जगत् विक्षुब्ध हो उठा। सैनिकों सहित धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों के मन में विषाद व्याप्त हो गया। लोक में महारथी के रूप में प्रसिद्ध भीष्म कौरवों के सेनाध्यक्ष बने । भीष्म के विद्वेष के कारण कर्ण शस्त्र का त्याग करके युद्ध से विरत रहा ॥ २९-३० ॥ उसी तरह दस हजार हाथियों के बलवाले वीर भीम पाण्डवों सेनापति बने। वे साक्षात् दूसरे काल की भाँति प्रतीत हो रहे थे ॥ ३१ ॥ महामुने ! भीष्म के साथ दस रातों तक युद्ध होता रहा । नारद! भीष्म ने अकेले ही पाण्डवसेना के दस करोड़ सैनिकों का संहार किया ॥ ३२ ॥ उसी प्रकार दुर्योधन के भी बहुत-से सैनिक मारे गये। महान् बल तथा पराक्रमवाले पाण्डवों ने उससे भी अधिक संख्या में दुर्योधन के सैनिकों का संहार किया ॥ ३३ ॥ संग्राम के दसवें दिन जब सूर्यास्त होने में कुछ समय शेष था, तब अर्जुन ने शिखण्डी को आगे करके महास्त्र से भीष्म को मार गिराया ॥ ३४ ॥ सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करते हुए तथा अपने पिता के वर को सत्य प्रदर्शित करते हुए वे धर्मात्मा महारथी भीष्म शरशय्या पर स्थित रहे ॥ ३५ ॥

तदनन्तर द्रोणाचार्य को सेनापति बनाकर कर्ण आदि प्रमुख योद्धाओं ने पाँच दिन तक पुनः भीषण संग्राम किया ॥ ३६ ॥ दुर्योधन के सैनिकों ने अन्यायपूर्ण युद्ध का आश्रय लेकर सुभद्रापुत्र महारथी अभिमन्यु को उस संग्राम में मार डाला। तब महान् बल तथा पराक्रमवाले अर्जुन ने जयद्रथ को सूर्यास्त तक मार डालने की प्रतिज्ञा करके अपनी बाण-वर्षा से उसे मार डाला ॥ ३७-३८ ॥ इसी प्रकार दोनों ओर की सेनाओं के अन्य लोग भी मारे गये। पाँचवें दिन द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न के द्वारा द्रोणाचार्य मारे गये ॥ ३९ ॥

तत्पश्चात् कर्ण के साथ दो दिनों तक उन लोगों का युद्ध हुआ। उसमें कर्ण ने राक्षसेन्द्र वीर घटोत्कच का वध कर दिया और उस कर्ण को भी पाण्डुपुत्र कपिध्वज अर्जुन ने युद्ध में मार गिराया ॥ ४०-४१ ॥ दोनों सेनाओं के और भी दूसरे राजागण परस्पर युद्ध करके यमपुरी चले गये ॥ ४२ ॥ तदनन्तर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने क्रोधित होकर झुके हुए पर्वोंवाले बाणों के द्वारा रण में शल्य को
मार गिराया ॥ ४३ ॥ तत्पश्चात् परस्पर विजय की अभिलाषा रखने वाले राजा दुर्योधन और भीमसेन का गदायुद्ध होने लगा। भीम ने अपनी गदा से दुर्योधन का संहार कर दिया और उन महात्मा द्वारा धृतराष्ट्रपुत्र दुःशासन आदि प्रधान योद्धा रणक्षेत्र में पहले ही मार डाले गये थे ॥ ४४-४५ ॥

तत्पश्चात् अश्वत्थामा ने रात में सोते समय द्रौपदी के पाँच पुत्रों तथा अत्यन्त पराक्रमी धृष्टद्युम्न का संहार कर दिया ॥ ४६ ॥ अर्जुन ने झुके हुए पर्वोंवाले बाणों का प्रयोग करके चिरंजीवी अश्वत्थामा तथा कृपाचार्य का वध न करके उन्हें संग्राम से पराङ्मुख कर दिया ॥ ४७ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार अठारहवें दिन दोनों ही पक्षों की अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ युद्ध में मारी गयीं । तदनन्तर महारथी पाण्डवों ने वासुदेव श्रीकृष्ण को साथ में लेकर युद्ध में मारे गये सभी राजाओं की और्ध्वदैहिक क्रिया भी सम्पन्न की ॥ ४८-४९ ॥ भीष्म पितामह ने माघ महीने में शुक्लपक्ष की अष्टमीतिथि को प्राण त्याग किया और महादेवी की कृपा से पाण्डव राज्य का भोग करने लगे ॥ ५० ॥

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराणके अन्तर्गत ‘महाभारतयुद्धवर्णन’ नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५७ ॥

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