श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-69
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उनहत्तरवाँ अध्याय
भगवान् शंकर के जटाजूट से निकलकर गङ्गा का भूतल पर आगमन, मेना और हिमालय द्वारा उनका पूजन
अथः एकोनसप्ततितमोऽध्यायः
शम्भोर्जटाजूटं निर्भिद्य मेनाहिमाचलदर्शनपूजनानन्तरं भूपृष्ठागमनं

श्रीमहादेवजी बोले — ज्येष्ठमास के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि को महापापी जनों के भी उद्धार के लिये भगवती गङ्गा प्रकट हुईं ॥ १ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! उस तिथि में गङ्गा में स्नान, दान और तप करने से महान् पुण्यफल की प्राप्ति होती है; और उसी तरह महापातकों का नाश होता है ॥ २ ॥ मुने! उस दिन गङ्गा दस जन्मों में अर्जित पापों का नाश करती हैं । इसीलिये वह दशमी दशहरा तिथि कही जाती है ॥ ३ ॥ हस्त नक्षत्र तथा मङ्गलवार का दशमी तिथि के साथ योग होने पर स्नान तथा अवगाहन करने वाले मनुष्यों के दस जन्मों में सञ्चित दस प्रकार के पापों का 1  भागीरथी स्वयं नाश कर देती हैं। इसलिये महापापों से मुक्ति चाहने वाले सभी देहधारियों को प्रयत्नपूर्वक गङ्गा में स्नान करना चाहिये ॥ ४-५ ॥

तदनन्तर महावेगवती भगवती गङ्गा स्वर्ग से निकलकर राजा रथ का अनुगमन करती हुई दक्षिण दिशा में आयीं ॥ ६ ॥ मार्ग में देवर्षि, गन्धर्वों तथा द्वारा विभिन्न प्रकार के पुष्पसमूहों, बिल्वपत्रों, अक्षत तथा सुन्दर दूर्वादलों आदि से परम भक्तिपूर्वक भगवती गङ्गा की पूजा की गयी। उन पुष्पों से शोभायमान, शुद्ध स्फटिक के समान कान्तिवाली, सुरतरङ्गिणी, वेगवती, भीषण ध्वनि करने वाली तथा फेनों से सुशोभित भगवती गङ्गा दुर्भेद्य दुर्गम पर्वतों को पारकर हाथी-सिंहों को भगाती हुई, विशाल निषध नामक तथा हेमकूट पर्वत को पारकर हिमालय की संनिधि में आ गयीं ॥ ७–१० ॥ वहाँ आकर फेनराशि से अद्भुत प्रतीत होने वाली महावेगवती गङ्गा भगवान् शंकर के मस्तकप र आसीन होने के लिये सुशोभित होने लगीं ॥ ११ ॥

मुने! इस प्रकार भगवती गङ्गा को निकट आया हुआ जानकर भगवान् शंकर मस्तक पर विस्तृत जटाओं का सेतु बाँधकर उन्हें सिर पर धारण करने के लिये हिमालय शिखर पर इधर-उधर विराजमान हो गये ॥ १२ ॥ महामते ! ज्येष्ठमास की पूर्णिमा तिथि को मध्याह्न में गङ्गा भगवान् शम्भु के मस्तक पर वेगपूर्वक पहुँच गयीं ॥ १३ ॥ गङ्गा को अपने मस्तक पर आयी हुई जानकर पूर्णात्मा, जगदीश्वर परमानन्दस्वरूप गङ्गाधर आनन्दपूर्वक नृत्य करने लगे। भगवान् शंकर का नृत्य देखकर उनके पार्श्वस्थ करोड़ों-करोड़ प्रमथगण भी प्रसन्न होकर नाचने लगे ॥ १४-१५ ॥ भगवती गङ्गा भगवान् शंकर के मस्तक को प्राप्त कर परमानन्दित होकर फेन और पुष्पसमूहों से सुशोभित हो नाना तरंगों से युक्त होकर विचरण करने लगीं ॥ १६ ॥

तदनन्तर राजा भगीरथ पीछे की ओर भगवती गङ्गा से रहित दिशा को देखकर तथा देवाधिदेव भगवान् शंकर को नाचते हुए देखकर अत्यन्त चिन्तातुर हो गये ॥ १७ ॥ तब राजा भगीरथ ने भगवान् शंकर के मस्तक पर भगवती गङ्गा के महानाद को सुनकर यह माना कि वे अत्यन्त कोपवती गङ्गा भगवान् शिव के मस्तक पर पहुँच गयी हैं ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् राजा भगीरथ ने महाध्वनिवाला शङ्ख बजाया, जिसे सुनकर गङ्गा बाहर निकलने का मार्ग खोजती हुई विचरण करने लगीं ॥ १९ ॥ मुने! राजा भगीरथ की वशवर्तिनी महावेगवती महानदी भगवती गङ्गा ने शङ्ख की ध्वनि से आकर्षित होकर बाहर निकलने का मार्ग न प्राप्तकर भगवान् शिव के मस्तक पर एक वर्ष का समय बिता दिया ॥ २० ॥ सूर्यवंशदीपक, धर्मात्मा राजा भगीरथ ने नाचते हुए भगवान् सदाशिव को साष्टाङ्ग प्रणाम कर हाथ जोड़कर कहा — ॥ २१ ॥

राजा बोले — शरणागतों पर कृपा करने वाले जगद्वन्द्य, देवाधिदेव ! मेरे पितरों का उद्धार करने के लिये अपने मस्तक से भगवती गङ्गा को मुझे प्रदान कर दीजिये। आपने ही मुझे वरदान दिया था और कहा था कि त्रिपथगा गङ्गा स्वयं विवरस्थान पर पहुँचकर तुम्हारे पूर्वजों का उद्धार करेंगी। भगवान् विष्णु के विग्रह से मेरे द्वारा लायी गयी उन्हीं गङ्गा का आपने हरण कर लिया तो देव! मेरे पितरों का उद्धार कैसे होगा । इसलिये परमेश्वर ! आप उनको अपने सिर से निकालकर मुझे दे दें और शंकर! आप अपने दिये हुए वरदान को सफल करें ॥ २२-२५ ॥

श्रीशिवजी बोले — राजन्! पूर्व में स्वीकृत वचन के अनुसार आपके पूर्वजों की मुक्ति के लिये सरिताओं में श्रेष्ठ गङ्गा आपको दे दूँगा, इसमें संदेह नहीं है ॥ २६ ॥ किंतु ये ज्येष्ठमास के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि के दिन हस्त नक्षत्र और मङ्गलवार का योग होने पर मेरे मस्तक से निकलेंगी। महीपाल ! महामते ! तबतक आप इस पर्वतशिखर पर ठहरे रहें ॥ २७ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! राजा भगीरथ ने ऐसी बात सुनकर उस तिथि और समय की प्रतीक्षा में कुछ काल वहाँ व्यतीत किया ॥ २८ ॥ तत्पश्चात् उस तिथि के आ जाने पर राजा भगीरथ ने दिव्य तुषार की आभा तथा महाध्वनि वाले महाशङ्ख को ‘गङ्गे-गङ्गे’ कहते हुए बजाया ॥ २९ ॥ इसे सुनकर सरिताओं में श्रेष्ठ वे महावेगवती गङ्गा भगवान् शंकर की जटा के मध्य कल-कल ध्वनि करती हुई घूमने लगीं ॥ ३० ॥ निकलने का द्वार न प्राप्त होने पर शङ्ख की ध्वनि से व्याकुल भगवती गङ्गा ने भगवान् शङ्कर के शरणागत होकर उनसे कहा — ॥ ३१ ॥

गङ्गाजी बोलीं — प्रभो, देव, जगन्नाथ, महेश्वर! मैं आपकी शरणागत तथा राजा भगीरथ की वशवर्तिनी हूँ। अतः आप मुझे मार्ग दीजिये, जिससे मैं पृथ्वी पर स्थित सभी प्राणियों के उद्धार के लिये बाहर निकल सकूँ। राजा भगीरथ की शङ्ख की ध्वनि से आकर्षित मैं अत्यन्त पीड़ित हूँ ॥ ३२-३३ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — इस प्रकार भगवती गङ्गा की बात सुनकर भगवान् शंकर ने उसी क्षण बायें हाथ से दक्षिण दिशा की तरफ अपने जटाबन्ध को खोल दिया, तदनन्तर वे भगवती गङ्गा घोर गर्जना करती हुई भगवान् शम्भु के सिर से निकलकर अत्यधिक तीव्र गति से दक्षिण दिशा में राजा भगीरथ के रथ की ओर चल पड़ीं ॥ ३४-३५ ॥

श्रेष्ठ ! राजा भगीरथ भी महाशब्दवाले शङ्ख को बजाते हुए स्वर्णपरिष्कृत रथ को वेगपूर्वक चलाने लगे ॥ ३६ ॥ नदियों में श्रेष्ठ सुरनदी ‘गङ्गा’ पर्वतराज हिमालय के पृष्ठभाग पर विहार करती हुई गजों, सिंहों आदि जन्तुओं को दसों दिशाओं में भगाती हुई जा रही हैं, ऐसा सुनकर मेना तथा पर्वतराज हिमालय उनको देखने के लिये उनके समीप आ गये ॥ ३७-३८ ॥ माता-पिता दोनों को देखकर सुरश्रेष्ठ भगवती गङ्गा साष्टाङ्ग प्रणाम कर उन दोनों से पूजित होकर शीघ्रता से पृथ्वीतल पर गिरीं ॥ ३९ ॥ तदनन्तर दिग्-दिगन्तरों में पुष्प की वर्षा होने लगी और चारों तरफ लोगों की जयध्वनि गूँजने लगी ॥ ४० ॥ तब भागीरथी गङ्गा पृथ्वीतल को प्राप्त कर तपाये हुए सोने की आभा के समान अपने तेज से दीप्तिमान् होने लगीं ॥ ४१ ॥ उनका वेग चौगुना बढ़ गया तथा स्वर भी अधिक तीव्र हो गया, फिर भी पृथ्वी भगवती गङ्गा के लाभ से आनन्दित हुईं ॥ ४२ ॥ मुने! वेगवती गङ्गा रथ से बने हुए मार्ग को खोजती हुई अपनी कल-कल ध्वनि के साथ दक्षिण दिशा की ओर चल पड़ीं ॥ ४३ ॥

शाल, चिरौंजी आदि समस्त वृक्षों तथा द्रोणपुष्पके वनों और नगर, ग्राम तथा गृह आदि को चारों तरफ से आप्लावित करके देवर्षियों के द्वारा स्तुत होती हुई राजा भगीरथ की वशवर्तिनी महादेवी भगवती गङ्गा उनके पीछे-पीछे तीव्र गति से बहने लगीं ॥ ४४-४५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत ‘भगवान् शंकर के जटाजूट का भेदन करके मेना एवं हिमाचल के दर्शन और पूजन के बाद भूपृष्ठागमन’ नामक उनहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६९ ॥

1. अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः ।
परदारोपसेवा च शारीरं त्रिविधं स्मृतम् ॥
पारुष्यमनृतं चैव पैशून्यं चापि सर्वशः ।
असम्बद्धप्रलापश्च वाङ्मयं स्याच्चतुर्विधम् ॥
परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम् ।
वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम् ॥
(मनु० १२ । ७, ६, ५)
पाप हैं, कटु बोलना, झूठ बोलना, परोक्ष में किसी का दोष कहना तथा निष्प्रयोजन बातें करना — चार प्रकार के वाचिक पाप हैं और अर्थात् बिना दिये हुए दूसरे की वस्तु लेना, शास्त्रवर्जित हिंसा करना तथा परस्त्रीगमन करना — तीन प्रकार के शारीरिक (कायिक) दूसरे के द्रव्य को अन्याय से लेने का विचार करना, मन से दूसरे का अनिष्ट चिन्तन करना तथा नास्तिक बुद्धि रखना — तीन प्रकार के मानसिक पाप हैं ।

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