August 11, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-74 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ चौहत्तरवाँ अध्याय गङ्गामाहात्म्य-कथन के प्रसंग में धनाधिप वैश्य की कथा अथः चतुःसप्ततितमोऽध्यायः गङ्गामाहात्म्ये शृगालकवलितस्यारण्यमृतधनाधिपमांसस्य गङ्गाजलस्पर्शेन धनाधिपमुक्तिपदगमनं श्रीमहादेवजी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! ज्ञानपूर्वक गङ्गा में देहत्याग करने वाला मनुष्य पाप से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ १ ॥ महापातकी मनुष्य अज्ञानतापूर्वक भी उसमें शरीर त्यागकर गङ्गाजी की कृपा से शिवसायुज्य प्राप्त करता है ॥ २ ॥ नारद! जहाँ-कहीं भी मृत्यु को प्राप्त प्राणी का मांस अथवा अस्थि आदि गङ्गा के जल में पड़ जाता है, वह प्राणी भी स्वर्ग प्राप्त करता है, चाहे उसने ब्रह्महत्या आदि हजारों निन्दित पाप किये हों । मरे हुए प्राणी के जहाँ- कहीं भी पड़े हुए मांस अथवा अस्थि आदि को यदि गङ्गाजल की प्राप्ति हो जाती है तो वह भी निर्विकार स्वर्गलोक को प्राप्त हो जाता है ॥ ३-४ ॥ गङ्गा के जल में मरने से मुक्ति मिल जाती है, वाराणसीक्षेत्र में कहीं भी जल अथवा स्थल में मरने से मुक्ति प्राप्त हो जाती है और गङ्गासागरसङ्गम पर जल, स्थल और अन्तरिक्ष — इन तीनों में कहीं भी मरने पर मुक्ति प्राप्त हो जाती है ॥ ५ ॥ मुने ! अब मैं इस संदर्भ में एक कथा का वर्णन करूँगा, आप सावधान होकर सुनिये। मुने! यह आख्यान अत्यन्त आश्चर्यजनक तथा श्रोता को सुख प्रदान करने वाला है ॥ ६ ॥ धनाधिप नामक एक महापापी वैश्य था । वह प्रतिदिन चोरी के काम में लगा रहता और सदा परायी स्त्रियों में आसक्त रहता था। वह पापात्मा देह त्याग कर यमराज के पास पहुँचा और यमराज ने उसे असिपत्र नामक नरक में डाल दिया ॥ ७-८ ॥ उसका बिना जला शरीर जंगल के बीच में पड़ा रहा। मुनिश्रेष्ठ ! भूख से पीड़ित एक सियार उस मृतदेह को खाने लगा ॥ ९ ॥ मुनिश्रेष्ठ! इसी बीच उस जंगल में रहनेवाला एक गीधराज वहाँ आकर सियार की ओर दौड़ा [ और स्वयं उसे खाने लगा] ॥ १० ॥ मुनिश्रेष्ठ ! अत्यन्त थका हुआ वह गीध आकाश में उड़ गया और गङ्गातट पर आकर उसने जल पीया। उसकी चोंच पर लगा हुआ मांस गङ्गाजल में गिर गया। उस जल के स्पर्शमात्र से वह पापी [वैश्य] घोर पाप से मुक्त हो गया और शिवरूप होकर स्वर्ग चला गया ॥ ११-१२ ॥ असिपत्र नरक के रक्षक वहाँ स्थित उस पापी को वहाँ से जाते हुए देखकर धर्मराज के पास आकर यह वचन कहने लगे — ॥ १३ ॥ रक्षकगण बोले — प्रभो ! आपने जिस पापी को असिपत्र नरक में रखा था, वह तो साक्षात् शिवदेह प्राप्त कर स्वर्ग चला गया। यह सुनकर तपोधन यमराज को महान् आश्चर्य हुआ। पुनः अपनी ज्ञानदृष्टि से उसका कारण जानकर वे अपने रक्षकों से कहने लगे — ॥ १४-१५ ॥ यमराज बोले — दूतो ! [मृत्यूपरान्त ] जिसका मांस सियार के द्वारा खा लिया गया, ऐसा यह पापी भी अपने मांस के गङ्गाजल के स्पर्श से सहसा मुक्त हो गया ॥ १६ ॥ श्रीमहादेवजी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! ऐसा सुनकर यमदूतों को बड़ा आश्चर्य हुआ और वे गङ्गाजल की महिमा का स्मरण करते हुए अपने स्थान पर आ गये ॥ १७ ॥ महामते ! मुने! स्वर्गलोक में देवताओं के द्वारा स्तुत होते हुए वह शिवसायुज्य प्राप्त करके सदा के लिये आनन्दित हो गया ॥ १८ ॥ इस प्रकार महापातकों का नाश करने वाली भगवती गङ्गा जिस किसी भी प्रकार से दर्शन या स्पर्श हो जाने पर मोक्ष प्रदान कर देती हैं ॥ १९ ॥ मनुष्य को सभी प्रकार से भक्तिपूर्वक गङ्गा का आश्रय ग्रहण करना चाहिये । मृत्यु आज अथवा सौ वर्षों के अन्त में नियत और अवश्यम्भावी है। अतः उससे पहले ही मोक्ष चाहने वाले को भगवती गङ्गा का आश्रय ले लेना चाहिये ॥ २० ॥ अति दुर्धर्ष यम जब तक अप्रत्याशित रूप से आकर केशों को पकड़ नहीं लेता, उससे पहले ही गङ्गा का आश्रय ग्रहण कर लेना चाहिये ॥ २१ ॥ मुने ! पुत्र, मित्र तथा स्त्री आदि कोई भी [यथार्थ] बन्धु नहीं कहे जा सकते हैं। इस संसार से मुक्त करने वाली भगवती गङ्गा ही परम बन्धु हैं ॥ २२ ॥ दर्शन, स्पर्श, नाम-कीर्तन अथवा ध्यान करने से भी सुख और मोक्ष प्रदान करने वाली भगवती गङ्गा परम बन्धु कही गयी हैं ॥ २३ ॥ अत्यन्त घोर यम यातना के भय से अभय प्रदान करने वाली गङ्गा का जो आश्रय नहीं लेते, उन्हें आत्मघाती समझना चाहिये ॥ २४ ॥ मोहबन्धन की ओर प्रवृत्त करने वाले पुत्र आदि सभी व्यर्थ हैं। गङ्गा ही शाश्वत मुक्ति देने वाली हैं — ऐसा मानकर गङ्गा का आश्रय ग्रहण करना चाहिये ॥ २५ ॥ निर्वाणपद देने वाली गङ्गा तक मरणासन्न व्यक्ति को पहुँचा देना चाहिये। इससे वह पहुँचाने वाला भी भगवती गङ्गा की कृपा से मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ २६ ॥ ‘गङ्गा ही परम बन्धु हैं, गङ्गा ही परम सुख हैं, गङ्गा ही परम धन हैं, गङ्गा ही परम गति हैं, गङ्गा ही परम मुक्ति हैं और गङ्गा ही परम तत्त्व हैं’, जो लोग ऐसी भावना रखते हैं, गङ्गा उनसे कभी भी दूर नहीं रहती हैं ॥ २७-२८ ॥ ‘गङ्गा’ – ऐसा उच्चारण करने वाले के पीछे-पीछे गङ्गा उसी प्रकार दौड़ती हैं, जैसे पूर्वकाल में भगीरथ की शङ्ख- ध्वनि से गङ्गा उनके पीछे-पीछे चली थीं ॥ २९ ॥ जो मनुष्य गङ्गा का तट छोड़कर अन्यत्र निवास करता है, वह मानो अपने हाथ में स्थित मुक्ति का त्याग करके नरक की खोज करता है ॥ ३० ॥ वह देश धन्य है, जहाँ तीनों लोकों को पवित्र कर देने वाली गङ्गा रहती हैं। जो देश गङ्गा से रहित है, उसे प्रशस्त देश नहीं कहा जा सकता ॥ ३१ ॥ गङ्गा के तट पर रहते हुए भिक्षा माँगना भी श्रेष्ठ है तथा वहाँ प्राणान्त हो जाना भी श्रेयस्कर है। किंतु गङ्गा को छोड़कर मनुष्य को अन्य स्थान पर राज्य प्राप्त करने की भी कामना नहीं करनी चाहिये ॥ ३२ ॥ गङ्गा की भक्ति में तत्पर रहने वाला एक भी मनुष्य जिस देश में रहता है, वह देश भी परम पुण्यशाली है और वहाँ पर दिया गया दान महान् फल देने वाला होता है। वहाँ पर किया गया श्राद्ध तथा तर्पण पितरों को तृप्त करने वाला होता है। वहाँ पर किये गये जप- होम आदि को अनन्त फल देने वाला समझना चाहिये ॥ ३३-३४ ॥ गङ्गा का नाम ही परम सुख है तथा गङ्गा का नाम परम तप है। जो मनुष्य ‘गङ्गा’ – इस नाम का नित्य स्मरण करता है, उसे यमराज का भय नहीं रहता ॥ ३५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में गङ्गामाहात्म्य में ‘सियार के द्वारा खाये गये जंगल में मृत धनाधिप के मांस का गङ्गाजलस्पर्श से धनाधिप-मुक्तिपदगमन’ नामक चौहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७४ ॥ Content is available only for registered users. 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