श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-75
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
पचहत्तरवाँ अध्याय
गङ्गाजी का अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र तथा उसका माहात्म्य
अथः पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः
श्रीमहादेवनारदसंवादे श्रीगङ्गादेव्या अष्टोत्तरशतनामपूर्वकमाहात्म्यवर्णनं

श्रीनारदजी बोले — परमेश्वर ! आपने बताया कि ‘गङ्गा’ नाम परम पुण्यदायी है । गङ्गा के और भी कितने श्रेष्ठ नाम हैं, उन्हें मुझे बताइये ॥ १ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! गङ्गा के एक हजार नामों में एक सौ आठ नाम अत्युत्तम हैं । आप मुझसे उन नामों को तत्त्वतः सुन लीजिये — ॥ २ ॥

१. [ओङ्कारस्वरूपिणी] गङ्गा, २. त्रिपथगा देवी, ३. शम्भुमौलिविहारिणी, ४. जाह्नवी, ५. पापहन्त्री, ६. महापातकनाशिनी, ७. पतितोद्धारिणी, ८. स्रोतस्वती, ९. परमवेगिनी, १०. विष्णुपादाब्जसम्भूता, ११. विष्णुदेहकृतालया, १२. स्वर्गाब्धिनिलया, १३. साध्वी, १४. स्वर्णदी, १५. सुरनिम्नगा, १६. मन्दाकिनी, १७. महावेगा, १८. स्वर्णशृङ्गप्रभेदिनी, १९. देवपूज्यतमा, २०. दिव्या, २१. दिव्यस्थान-निवासिनी, २२. सुचारुनीररुचिरा, २३. महापर्वतभेदिनी, २४. भागीरथी, २५. भगवती, २६. महामोक्षप्रदायिनी, २७. सिन्धुसङ्गगता, २८. शुद्धा, २९. रसातल-निवासिनी ॥ ३-७ ॥

३०. महाभोगा, ३१. भोगवती, ३२. सुभगानन्ददायिनी, ३३. महापापहरा, ३४. पुण्या, ३५. परमाह्लाददायिनी, ३६. पार्वती, ३७. शिवपत्नी, ३८. शिवशीर्षगतालया, ३९. शम्भोर्जटामध्यगता, ४०. निर्मला, ४१. निर्मलानना, ४२. महाकलुषहन्त्री, ४३. जह्नुपुत्री, ४४. जगत्प्रिया, ४५. त्रैलोक्यपावनी, ४६. पूर्णा, ४७. पूर्णब्रह्मस्वरूपिणी, ४८. जगत्पूज्यतमा, ४९. चारुरूपिणी, ५०. जगदम्बिका, ५१. लोकानुग्रहकर्त्री, ५२. सर्वलोकदयापरा, ५३. याम्यभीतिहरा, ५४. तारा, ५५. पारा, ५६. संसारतारिणी, ५७. ब्रह्माण्डभेदिनी, ५८. ब्रह्मकमण्डलुकृतालया ॥ ८-१२ ॥

५९. सौभाग्यदायिनी, ६०. पुंसां निर्वाणपददायिनी, ६१. अचिन्त्यचरिता, ६२. चारुरुचिरातिमनोहरा, ६३. मर्त्यस्था, ६४. मृत्युभयहा, ६५. स्वर्गमोक्षप्रदायिनी, ६६. पापापहारिणी, ६७. दूरचारिणी, ६८. वीचिधारिणी, ६९. कारुण्यपूर्णा, ७०. करुणामयी, ७१. दुरितनाशिनी, ७२. गिरिराजसुता, ७३. गौरीभगिनी, ७४. गिरिशप्रिया ७५. मेनकागर्भसम्भूता, ७६. मैनाकभगिनीप्रिया, ७७. आद्या, ७८. त्रिलोकजननी, ७९. त्रैलोक्यपरिपालिनी, ८०. तीर्थश्रेष्ठतमा, ८१. श्रेष्ठा, ८२. सर्वतीर्थमयी, ८३. शुभा, ८४. चतुर्वेदमयी, ८५. सर्वा, ८६. पितृसंतृप्तिदायिनी ॥ १३–१७ ॥

८७. शिवदा, ८८. शिवसायुज्यदायिनी, ८९. शिववल्लभा, ९०. तेजस्विनी, ९१. त्रिनयना, ९२. त्रिलोचनमनोरमा, ९३. सप्तधारा, ९४. शतमुखी, ९५. सगरान्वयतारिणी, ९६. मुनिसेव्या, ९७. मुनिसुता, ९८. जह्रुजानुप्रभेदिनी, ९९. मकरस्था, १००. सर्वगता, १०१. सर्वाशुभनिवारिणी, १०२. सुदृश्या, १०३. चाक्षुषीतृप्तिदायिनी, १०४. मकरालया, १०५. सदानन्दमयी, १०६. नित्यानन्ददा, १०७. नगपूजिता, १०८. सर्वदेवाधिदेवैः परिपूज्यपदाम्बुजा ॥ १८-२१ ॥

मुनिश्रेष्ठ ! मैंने आपसे भगवती गङ्गा के ये श्रेष्ठ नाम बता दिये। ये नाम समस्त पापों का विनाश करने वाले हैं ॥ २२ ॥ नारद! जो व्यक्ति प्रात:काल उठकर गङ्गा के इन परम पुण्य देनेवाले एक सौ आठ नामों को भक्तिपूर्वक पढ़ता है, उसके ब्रह्महत्या आदि पाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा वह अतुलनीय आरोग्य एवं सुख प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ २३-२४ ॥ जहाँ-कहीं भी स्नान करके मनुष्य यदि इस उत्तम स्तोत्र का पाठ करे, तो उसे वहीं पर गङ्गास्नान का फल निश्चितरूप से प्राप्त हो जाता है ॥ २५ ॥

जो मनुष्य गङ्गा के एक सौ आठ नामों वाले स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करता है, वह अन्त में गङ्गा को प्राप्त होकर परमपद प्राप्त कर लेता है ॥ २६ ॥ जो मनुष्य गङ्गा स्नान के समय भक्तिपरायण होकर इसका पाठ करता है, वह हजारों अश्वमेधयज्ञों का फल प्राप्त करता है ॥ २७ ॥ पञ्चमी तिथि को इसका पाठ करने वाला मनुष्य वह फल प्राप्त करता है जो फल दस हजार गायों के दान का कहा गया है ॥ २८ ॥ कार्तिक पूर्णिमा को गङ्गासागरसङ्गम में स्नान करके जो मनुष्य इसका पाठ करता है, वह शिवत्व को प्राप्त हो जाता है, यह सच है, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ २९ ॥ स्वयं सर्वतीर्थमयी गङ्गा ने जहाँ समुद्र तथा तीर्थराज के साथ सङ्गम किया है, उससे बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है ॥ ३० ॥ दूसरे स्थान के गङ्गातीर्थ में ज्ञान से मुक्ति होती है, किंतु मुनिश्रेष्ठ ! वाराणसी में भूमि पर अथवा जल में कहीं भी ज्ञान या अज्ञानपूर्वक विज्ञान की प्राप्ति कही गयी है। यहाँ स्थल पर, गङ्गाजल में अथवा आकाश में ज्ञान या अज्ञान किसी भी तरह से शरीर का त्याग करके मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर लेता है । मुने! वहाँ पर जो मनुष्य किसी अन्य (पुरुषार्थ) – की इच्छा से भी देहत्याग करता है, वह भी महातीर्थ की कृपा से मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ३१–३३ ॥

मृत्यु ने मेरे केशों को पकड़ रखा है – ऐसा सोचकर मनुष्य को तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ, मनुष्यों के सभी कार्यों को सिद्ध करने वाली, शक्तिस्वरूपिणी, जलमयी मूर्ति, लोकों का उद्धार करने वाली, अविद्या का नाश करने वाली तथा ब्रह्मविद्या प्रदान करने वाली भगवती गङ्गा का आश्रय ग्रहण करना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार मैंने आपसे उत्तम, परम पवित्र, गुप्त तथा महापातकों का नाश करने वाले गङ्गामाहात्म्य का वर्णन कर दिया ॥ ३६ ॥ मुने! जो मनुष्य भक्ति से युक्त होकर इस उत्तम आख्यान को पढ़ता है, वह भगवती गङ्गा के दिव्य धाम को प्राप्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है ॥ ३७ ॥

जिस स्थान पर इस पवित्र गङ्गामाहात्म्य का पाठ किया जाता है, वहाँ पर गङ्गा सभी तीर्थों के साथ प्रत्यक्षरूप से निवास करती हैं। यहाँ मनुष्य जो भी देवकार्य या पितृकार्य करता है, वह कर्म इस लोक में अक्षय फल देने वाला कहा गया है ॥ ३८-३९ ॥ मुने! यह पावन आख्यान जहाँ लिखा हुआ स्थित रहता है, पाप उस स्थान को भय के मारे स्पर्श तक नहीं करता है, यह बात सत्य है, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ४० ॥ मरणासन्न -स्थिति में पड़ा हुआ जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करता है, वह मृत्यु के अधीन नहीं होता और परम गति को प्राप्त होता है ॥ ४१ ॥ एकादशी तिथि को स्नान करके जो व्यक्ति उपवासपूर्वक तुलसी या बिल्ववृक्ष के समीप बैठकर इसे ध्यानपूर्वक पढ़ता है, वह परम गति प्राप्त करता है ॥ ४२ ॥ मुने ! जो मनुष्य पितरों के श्राद्ध के दिन ब्राह्मण के सांनिध्य में इसका पाठ करता है, उसके पितर शाश्वत तृप्ति प्राप्त करते हैं ॥ ४३ ॥ जो श्रेष्ठ मानव महाष्टमी की अर्धरात्रि में इसे ध्यानपूर्वक पढ़ता है, वह महादेवी गङ्गा की कृपा से परम आनन्द को प्राप्त हो जाता है ॥ ४४ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! इस आख्यान के पाठ का अनन्त फल कहा गया है । संसार में इसके समान पुण्य प्रदान करने वाला कोई भी आख्यान नहीं बताया जाता है ॥ ४५ ॥ यह आख्यान महापापों का हरण करने वाला तथा पुण्यतम से भी अधिक पुण्यदायी कहा गया है। इस आख्यान का श्रवण करके मनुष्य स्वर्गलोक [परम गति] प्राप्त कर लेता है ॥ ४६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘श्रीगङ्गादेवी का अष्टोत्तरशतनामपूर्वकमाहात्म्यवर्णन’ नामक पचहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७५ ॥

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