August 12, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-76 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ छिहत्तरवाँ अध्याय कामरूपतीर्थ (कामाख्या शक्तिपीठ) के माहात्म्य का वर्णन अथः षट्सप्ततितमोऽध्यायः श्रीमहादेवनारदसंवादे कामाख्यामाहात्म्यवर्णनं श्रीनारदजी बोले — प्रभो ! देव ! जगन्नाथ ! आपके मुखकमल से भगवती गङ्गा के अतुलनीय माहात्म्य को सुनकर मैं पवित्र हो गया हूँ, इसमें कोई संदेह नहीं है । पुनः आपसे कामरूपतीर्थ का माहात्म्य अत्यन्त विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। अब आप उसे सुनायें ॥ १-२ ॥ श्रीमहादेवजी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! आप सावधान होकर सुनिये। मैं कामरूपतीर्थ का माहात्म्य बताता हूँ जहाँ प्रत्यक्ष फल देने वाली साक्षात् भगवती शिवा स्वयं विराजमान हैं। मृत्युलोक में इससे उत्तम कोई तीर्थ नहीं है जहाँ गन्धर्वोंसहित देवगण तथा ब्रह्मादि श्रेष्ठ देवता प्रतिदिन आकर भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं और जहाँ पृथ्वी पर लोगों के कल्याण के लिये योनिरूप में महामाया पूर्णा आदिशक्ति परमेश्वरी लीलापूर्वक विराजती हैं ॥ ३-५ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! पूर्व में भगवती के प्रत्यक्ष दर्शन की इच्छा रखने वाले पितामह ब्रह्मा, विष्णु तथा भगवान् शंकर ने उस कामाक्ष्य-क्षेत्र में तप किया था ॥ ६ ॥ पूर्व काल में जहाँ मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी ने पुरश्चरण करके मन्त्र की सिद्धि प्राप्त कर ली और वे दूसरे सृष्टिकर्ता की भाँति हो गये। मुनिश्रेष्ठ ! जो अन्य देवता, ऋषिगण तथा सिद्धगण अव्याहत आज्ञावाले हुए हैं वे सभी भगवती कामाख्या की कृपा से ही हुए हैं। वे भगवती कामाख्या के महामन्त्र का जप करके मन्त्रसिद्ध हुए, उन्होंने आकाश में विचरण करने की शक्ति प्राप्त की तथा देवताओं के द्वारा पूज्य हो गये ॥ ७–९ ॥ मुनिश्रेष्ठ! मनुष्य योनिरूपा, अतिगोपनीय भगवती कामाख्या का दर्शन, स्पर्श और पूजन करके जीवन्मुक्त हो जाता है और दूसरे शंकर की तरह पृथ्वीतल पर विचरण करता है। नारद! वह देवताओं को भी दण्डित तथा पुरस्कृत करने में समर्थ हो जाता है। मुने! इन्द्र आदि सभी प्रमुख देवगण उसकी आज्ञा के अधीन हो जाते हैं। उसके लिये तीनों लोकों में कुछ भी असाध्य नहीं है ॥ १०–१२ ॥ जो मनुष्य योनिमण्डल में जाकर परम देवी त्रिपुरभैरवी [कामाख्या]-को भक्तिपूर्वक प्रणाम करता है, उसका ही जन्म सफल होता है ॥ १३ ॥ ब्रह्महत्या करने वाला मनुष्य भी भगवती कामाख्या के पुण्यक्षेत्र का स्पर्श करने मात्र से उनकी कृपा से क्षणभर में पाप से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ १४ ॥ वत्स ! भगवती कामाख्या का दर्शन देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। जो व्यक्ति उनका दर्शन करता है, वह देवताओं के द्वारा विशेषरूप से पूजित होता है ॥ १५ ॥ हजारों जन्म-जन्मान्तर में किये हुए सञ्चित पापसमूह भगवती कामाख्या के दर्शनमात्र से क्षणभर में ही भस्मीभूत हो जाते हैं ॥ १६ ॥ वत्स ! इस पृथ्वीतल पर देवी भगवती कामाख्या शक्तिपीठ के समान कोई तीर्थ नहीं है। यह गोपनीय रहस्य आपको अन्यत्र प्रकाशित नहीं करना चाहिये ॥ १७ ॥ मुने! इस भारतवर्ष में भगवती सती के अङ्ग- प्रत्यङ्ग के गिरने से यह देश मनुष्यों के पापों का नाश करने वाला तथा पुण्यमय है ॥ १८ ॥ भगवती के सभी अङ्गों में योनि-अङ्ग सर्वश्रेष्ठ है; क्योंकि वे देवी योनिरूप में सभी स्त्रियों में अवस्थित हैं ॥ १९ ॥ वह योनि जिस स्थान पर गिरी, वहाँ साक्षात् स्वयं भगवती सती प्रतिष्ठित हैं। इस पृथ्वी पर उसके समान पुण्यदायक कोई स्थान नहीं है ॥ २० ॥ सिद्धों, गन्धर्वों, देवताओं, किन्नरों और राक्षसों के आराध्य भगवान् शंकर वाराणसी (काशी) – क्षेत्र में प्राणियों को मुक्ति देने वाले हैं, वे भगवान् शंकर भी जहाँ महेश्वरी कामाख्या के पास प्रतिदिन आकर मुक्ति प्रदान करने की सामर्थ्य प्राप्त करने की आकाङ्क्षा करते हैं, उससे बढ़कर पवित्र स्थान अन्य कोई नहीं है ॥ २१-२२ ॥ जिसने श्रीयोनिमण्डल तीर्थ की प्रदक्षिणा कर ली, उसने तीनों लोकों की पूर्णरूप से प्रदक्षिणा कर ली ॥ २३ ॥ जो भगवती कामाख्या का निर्माल्य सिर पर धारण करता है वह देवताओं के द्वारा पूजित होकर भैरव के समान विचरण करता है । इस पृथ्वीतल पर कहीं भी उसको भय नहीं है। उसके भय से भय प्रदान करने वाले बहुत दूर भाग जाते हैं ॥ २४-२५ ॥ महामुने ! जिस किसी के द्वारा देवी भगवती का दिया गया प्रसाद प्राप्त होते ही ग्रहण कर लेना चाहिये, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं है ॥ २६ ॥ मुने ! उत्तम वर्ण का व्यक्ति भी निम्न वर्ण के व्यक्ति से प्राप्त भगवती के प्रसाद को भक्तिपूर्वक सिर से प्रणाम करके उसे ग्रहण कर लेता है तो वह भगवती की कृपा से तत्क्षण ऐश्वर्य और मुक्ति प्राप्त कर लेता है ॥ २७ ॥ अपने पितरों की तृप्ति की इच्छा से जिसने उस शक्तिपीठ में श्राद्ध किया, उसने मानो हजार वर्षों तक गया श्राद्ध कर लिया, इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ २८ ॥ जो जितेन्द्रिय उत्तम साधक ब्रह्मपुत्र नद में स्नान करके भगवती के मन्त्र का पुरश्चरण करता है, उसका मन्त्र निश्चित ही सिद्ध हो जाता है, वह अमोघ आज्ञावाला होकर दूसरे भगवान् शंकर के समान हो जाता है और उनके अनुग्रह से पृथ्वी पर चलने वाला आकाशचारी हो जाता है ॥ २९-३० ॥ भगवती कामाख्या के शक्तिपीठ में मन्त्र जपने वाले व्यक्ति को अज्ञानवश भी पुरश्चरण की विधि में काल आदि मुहूर्त का विचार नहीं करना चाहिये । यदि वह ऐसा विचार करता है तो नरक में जाता है ॥ ३१ ॥ शक्तिपीठ में भगवती भैरवी का मन्त्र जपनेवालों को सुरत्व, इन्द्रत्व, ब्रह्मत्व, शिवत्व अथवा विष्णुत्व सुलभता से प्राप्त हो जाता है ॥ ३२ ॥ कार्तवीर्य को मारने की इच्छा से जमदग्नि ऋषि के पुत्र परशुराम ने उन्हीं भगवती कामाख्या के शक्तिपीठ में पुरश्चरण करके साक्षात् विष्णुरूपता को प्राप्त किया था ॥ ३३ ॥ उसी प्रकार पुरश्चरणविधि से जो अन्य लोग पृथ्वी पर भगवती कामाख्या के शक्तिपीठ में मन्त्र जपते हैं, वे अन्त में देवी भगवती की सारूप्य मुक्ति प्राप्त करते हैं ॥ ३४ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! कामाख्या सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है, कामाख्या सर्वश्रेष्ठ तपस्या है, कामाख्या सर्वश्रेष्ठ धर्म है, कामाख्या परम गति है, कामाख्या सर्वश्रेष्ठ धन है तथा कामाख्या परम पद है – इस प्रकार की भावना करने वाले (मनुष्य)- का पुनर्जन्म नहीं होता ॥ ३५- ३६ ॥ जिस मनुष्य के अनेक सहस्रजन्मों के संचित महान् पुण्य होते हैं, उसीको भगवती का दर्शन होता है ॥ ३७ ॥ मुने! जिस प्रकार देवीलोक अन्य लोगों के लिये दुर्लभ कहा गया है, उसी प्रकार भगवती कामाख्या का श्रीकामरूप नामक [ शक्तिपीठ] तीर्थ देवताओं के लिये भी दुर्लभ है ॥ ३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘कामाख्यामाहात्म्यवर्णन’ नामक छिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७६ ॥ Content is available only for registered users. 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