August 12, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-79 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उन्यासीवाँ अध्याय तुलसी, बिल्व और आँवलावृक्षका माहात्म्य अथः ऊनाशीतितमोऽध्यायः श्रीमहादेवनारदसंवादे तुलसीमाहात्म्यवर्णने आमलकबिल्वसंयोगकथनं श्रीनारदजी बोले — परमेश्वर ! महान् पातकों का नाश करने वाले योनिपीठतीर्थ का माहात्म्य आपके मुखकमल से मैंने सुना । ईश्वर ! आपने जो सर्वश्रेष्ठ, महापुण्यदायक बिल्वपत्र का माहात्म्य संक्षेप में वहाँ पर बताया; वह भी मैंने सुना । अब मैं तुलसीपत्र का परम अद्भुत माहात्म्य सुनना चाहता हूँ तथा महादेव ! संक्षेप में रुद्राक्ष और भगवान् शिव की पूजा के विषय में भी संक्षेप में मुझे उपदेश दें ॥ १-३ ॥ श्रीमहादेवजी बोले — महामते ! तुलसी का माहात्म्य संक्षेप में सुनिये, जिसे सुनकर मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ४ ॥ सभी लोगों के रक्षक, विश्वात्मा, विश्वपालक भगवान् पुरुषोत्तम ही तुलसीवृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित हैं ॥ ५ ॥ दर्शन, स्पर्श, नाम संकीर्तन, धारण तथा प्रदान करने से भी तुलसी मनुष्यों के सभी पापों का सर्वदा नाश करती हैं ॥ ६ ॥ प्रातः उठकर स्नान करके जो व्यक्ति तुलसीवृक्ष का दर्शन करता है, उसे सभी तीर्थों के संसर्ग का फल निःसंदेह प्राप्त हो जाता है ॥ ७ ॥ श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्र में भगवान् गदाधर के दर्शन करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही तुलसीवृक्ष के दर्शन करने से प्राप्त होता है ॥ ८ ॥ मुने ! वही दिन शुभ कहा गया है, जिस दिन तुलसीवृक्ष का दर्शन होता है और तुलसीवृक्ष का दर्शन करने वाले व्यक्ति को कहीं से भी विपत्ति नहीं आती ॥ ९ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! जन्म- जन्मान्तर का किया अत्यन्त निन्दित पाप भी तुलसीवृक्ष के दर्शनमात्र से नष्ट हो जाता है ॥ १० ॥ पवित्र अथवा अपवित्र स्थिति में जो व्यक्ति तुलसीपत्र का स्पर्श कर लेता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर उसी क्षण शुद्ध हो जाता है तथा अन्त में देवों के लिये भी दुर्लभ विष्णुपद को प्राप्त करता है। तुलसी का स्पर्श करना ही मुक्ति है और वही परम व्रत है ॥ ११-१२ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! जिस व्यक्ति ने तुलसीवृक्ष की प्रदक्षिणा कर ली, उसने साक्षात् भगवान् विष्णु की प्रदक्षिणा कर ली, इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ १३ ॥ जो मानवश्रेष्ठ भक्तिपूर्वक तुलसी को प्रणाम करता है, वह भगवान् विष्णु के सायुज्य को प्राप्त करता है और पुनः पृथ्वी पर उसका जन्म नहीं होता ॥ १४ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! जहाँ तुलसी-कानन है, वहाँ लक्ष्मी और सरस्वती के साथ साक्षात् भगवान् जनार्दन प्रसन्नतापूर्वक विराजमान रहते हैं ॥ १५ ॥ जहाँ सर्वदेवमय जगन्नाथ भगवान् विष्णु रहते हैं, वहीं रुद्राक्ष के सहित मैं तथा पितामह ब्रह्मा सावित्री के साथ रहते हैं । मुने! इसलिये वह उत्तम स्थान देवताओं के लिये भी दुर्लभ है, उस [तुलसी के] श्रेष्ठ स्थान में जो जाता है, वह भगवान् विष्णु के वैकुण्ठधाम को प्राप्त करता है। जो व्यक्ति स्नान करके उस पापनाशक क्षेत्र का मार्जन करता है, वह भी पाप से मुक्त होकर स्वर्गलोक जाता है ॥ १६-१८ ॥ मुनिश्रेष्ठ! जो व्यक्ति तुलसीवृक्ष के मूल की मिट्टी से ललाट, कण्ठ, दोनों कान, दोनों हाथ, स्तन, मस्तक, पीठ, दोनों बगल तथा नाभि पर उत्तम तिलक लगाता है, उस पुण्यात्मा को श्रेष्ठ वैष्णव समझना चाहिये ॥ १९-२० ॥ जो व्यक्ति तुलसीमञ्जरी से भगवान् विष्णु का पूजन करता है, उसे भी सभी पापों से रहित श्रेष्ठ वैष्णव कहा गया है ॥ २१ ॥ जो व्यक्ति वैशाख, कार्तिक तथा माघमास में प्रात:काल स्नानकर परमात्मा सुरेश्वर भगवान् विष्णु को विधि-विधान से तुलसीपत्र अर्पित करता है, उसका पुण्यफल अनन्त कहा गया है ॥ २२१/२ ॥ दस हजार गायें दान करने तथा सैकड़ों वाजपेययज्ञ करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल कार्तिकमास में तुलसी के पत्तों तथा तुलसी- मञ्जरी से भगवान् विष्णु का पूजन करने से प्राप्त होता है ॥ २३-२४ ॥ जो तुलसी- कानन में भगवान् विष्णु की पूजा करता है, वह महाक्षेत्र [भगवती कामाख्या के शक्तिपीठ ] में की गयी पूजा का फल प्राप्त करता है ॥ २५ ॥ बुद्धिमान् व्यक्ति को तुलसीपत्ररहित कोई पुण्यकार्य नहीं करना चाहिये । यदि कोई करता है तो उस कर्म का सम्पूर्ण फल उसे नहीं प्राप्त होता । तुलसीपत्र से रहित संध्या-वन्दन कालातीत संध्या की तरह निष्फल हो जाता है ॥ २६-२७ ॥ तुलसी – कानन के मध्य में तृणों अथवा वल्कलवृन्दों से भी भगवान् विष्णु के मन्दिर का निर्माण कर जो उसमें भगवान् विष्णु को स्थापित करता है तथा उनकी भक्ति में निरन्तर लगा रहता है; वह भगवान् विष्णु के साम्य ( सारूप्यमुक्ति ) – को प्राप्त करता है ॥ २८ ॥ जो व्यक्ति तुलसीवृक्ष को भगवान् विष्णु के रूप में समझकर तीन प्रकार 1 (शरीर, मन और वाणी)-से उन्हें प्रणाम करता है, वह भगवान् विष्णु के साम्य (सारूप्यमुक्ति) – को प्राप्त करता है ॥ २९ ॥ नमस्ते देवदेवेश सुरासुरजगद्गुरो । त्राहि मां घोरसंसारान्नमस्तेऽस्तु तवानघ ॥ सुरासुरजगद्गुरो ! देवदेवेश ! आपको नमस्कार है। अनघ! इस भयावह संसार से मेरी रक्षा कीजिये, आपको नमस्कार है ॥ ३० ॥ महामते! जो व्यक्ति बुद्धिपूर्वक तीन बार अथवा सात बार प्रदक्षिणा करके संसार से उद्धार करने वाली भगवती तुलसी को इस मन्त्र से भक्तिपूर्वक प्रणाम करता है वह घोर संकट से मुक्त हो जाता है ॥ ३१ ॥ त्रैलोक्यनिस्तारपरायणे शिवे यथैव गङ्गा सरितां वरा स्वयम् । तथैव लोकत्रयपावनार्थ द्रुमेषु साक्षात्तुलसीस्वरूपिणी ॥ त्वं ब्रह्मविष्णुप्रमुखेः सुरोत्तमैः पुराऽर्चिता विश्वपपित्रहेतवे । जाता धरण्यां जगवेकवन्द्ये नमामि भक्त्या तुलसि प्रसीद ॥ तीनों लोकों के उद्धार में तत्पर शिवे! जिस तरह साक्षात् गङ्गा सभी नदियों में श्रेष्ठ हैं, उसी तरह तीनों लोकों को पवित्र करने के लिये वृक्षों में साक्षात् तुलसीस्वरूपिणी (आप) श्रेष्ठ हैं ॥ ३२ ॥ तुलसी ! आप ब्रह्मा, विष्णु आदि प्रमुख देवताओं के द्वारा पूर्व में पूजित हुई हैं, आप विश्व को पवित्र करने के हेतु पृथ्वी पर उत्पन्न हुई हैं, विश्व की एकमात्र वन्दनीया आपको मैं नमस्कार करता हूँ, आप प्रसन्न हों ॥ ३३ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार जो व्यक्ति तुलसी को प्रतिदिन प्रणाम करता है, वह जहाँ कहीं भी स्थित है, भगवती तुलसी उसकी सभी कामनाओं को पूर्ण करती हैं। भगवती तुलसी सभी देवताओं की परम प्रसन्नता को बढ़ाने वाली हैं ॥ ३४-३५ ॥ जहाँ तुलसीवन होता है वहाँ देवताओं का वास होता है और पितृगण परम प्रीतिपूर्वक तुलसीवन में निवास करते हैं ॥ ३६ ॥ पितृ-देवार्चन आदि कार्यों में तुलसीपत्र अवश्य प्रदान करना चाहिये। इन कार्यों में तुलसीपत्र न देने पर मनुष्य उस कर्म का सम्यक् फल प्राप्त नहीं करते ॥ ३७ ॥ महामते! लोकमुक्तिदा भगवती तुलसी को त्रिलोकीनाथ भगवान् विष्णु, सभी देवी- देवताओं और विशेषरूप से पितृगणों के लिये परम प्रसन्नता देने वाली समझना चाहिये। इसलिये देव तथा पितृकार्यों में तुलसी-पत्र अवश्य समर्पित करना चाहिये ॥ ३८-३९ ॥ जहाँ तुलसीवृक्ष स्थित है, वहाँ सभी तीर्थों के साथ साक्षात् भगवती गङ्गा सदा निवास करती हैं। मुनिश्रेष्ठ ! इसलिये तुलसीवृक्ष के निकट देहत्याग करने वाले मनुष्यों को वही फल प्राप्त होता है, जो गङ्गा में देहत्याग करनेका होता है ॥ ४०-४१ ॥ यदि अत्यन्त भाग्यवशात् आँवले का वृक्ष भी वहाँ पर स्थित हो तो वह स्थान बहुत अधिक पुण्य प्रदान करने वाला समझना चाहिये । महामते ! देहधारियों का यदि उस स्थल पर अज्ञान से भी देहत्याग हो जाता है तो उनकी मुक्ति हो जाती है, यह बात सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४२-४३ ॥ जहाँ इन दोनों (तुलसी और आँवला)-के निकट बिल्ववृक्ष भी है, वह स्थान साक्षात् वाराणसी के समान महातीर्थस्वरूप है। उस स्थान पर भगवान् शंकर, देवी भगवती तथा भगवान् विष्णु का भक्तिभाव से किया गया पूजन महापातकों का नाश करने वाला तथा बहुपुण्यप्रदायक जानना चाहिये। जो व्यक्ति वहाँ एक बिल्वपत्र भी भगवान् शंकर को अर्पण कर देता है; वह साक्षात् भगवान् शिव के दिव्य लोक को प्राप्त करता है ॥ ४४–४६ ॥ महामते ! उसी प्रकार तुलसीपत्र तथा धात्रीपत्र (आँवले के पत्तों)- द्वारा भगवान् विष्णु की पूजा करने से वह व्यक्ति भगवान् विष्णु की सायुज्यमुक्ति को प्राप्त कर लेता है, यह सत्य है ॥ ४७ ॥ जो व्यक्ति वहाँ भगवान् विष्णु, भगवान् शिव अथवा देवी भगवती को एक बिल्वपत्र अर्पण करता है, वह भी पाप से मुक्त हो जाता है ॥ ४८ ॥ मनुष्य वहाँ प्राण त्यागकर उस क्षेत्र के प्रभाव से मोक्ष प्राप्त करता है तथा उसका पुनर्जन्म नहीं होता ॥ ४९ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार मैंने इनका माहात्म्य संक्षेप में आपसे कहा । जो मनुष्य इस माहात्म्य को सुनता है, वह भी स्वर्गलोक प्राप्त करता है ॥ ५० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव – नारद-संवाद में तुलसीमाहात्म्यवर्णन में ‘आमलकबिल्वसंयोगकथन’ नामक उन्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७९ ॥ 1. तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम् । हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधनमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक् ॥ जो पुरुष क्षण-क्षण पर बड़ी उत्सुकता से आपकी कृपा का ही भलीभाँति अनुभव करता रहता है और प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ सुख या दुःख प्राप्त होता है उसे निर्विकार मन से भोग लेता है, एवं जो प्रेमपूर्ण हृदय, गद्गद वाणी और पुलकित शरीर से अपने को आपके चरणों में समर्पित करता रहता है – इस प्रकार जीवन व्यतीत करने वाला पुरुष ठीक वैसे ही आपके परम पद का अधिकारी हो जाता है, जैसे अपने पिता की सम्पत्ति का पुत्र ! ( श्रीमद्भागवत १० । १४ । ८) Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe