July 28, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमहाभागवत [देवीपुराण] – सिंहावलोकन यामाराध्य विरिञ्चिरस्य जगतः स्रष्टा हरिः पालकः संहर्ता गिरिशः स्वयं समभवद्धयेया च या योगिभिः । यामाद्यां प्रकृतिं वदन्ति मुनयस्तत्त्वार्थविज्ञाः परां तां देवीं प्रणमामि विश्वजननीं स्वर्गापवर्गप्रदाम् ॥ जिनकी आराधना करके स्वयं ब्रह्माजी इस जगत् के सृजनकर्ता हुए, भगवान् विष्णु पालनकर्ता हुए तथा भगवान् शिव संहार करनेवाले हुए, योगिजन जिनका ध्यान करते हैं और तत्त्वार्थ जानने वाले मुनिगण जिन्हें मूल प्रकृति कहते हैं — स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली उन जगज्जननी भगवती को मैं प्रणाम करता हूँ। पुराणों की परम्परा में अठारह महापुराणों के साथ- साथ अठारह उपपुराण भी प्राप्त हैं । उपपुराणों में महाभागवत [देवीपुराण] – का महत्त्वपूर्ण स्थान है। “महाभागवत (देवीपुराण) वेदव्यास की रचनाओं में उपपुराण होते हुए भी पूर्णरूप से महिमामण्डित है, इसमें ८१ अध्याय और प्रायः ४५०० श्लोक हैं। वस्तुतः इस उपपुराण का नाम ‘महाभागवत’ ही है, परंतु भगवती महादेवी के चारुचरितों का ही इसमें मुख्यतः प्रतिपादन होने के कारण इसे देवीपुराण भी कहा गया है। वैसे ‘देवीपुराण’ नामक अन्य प्राचीन उपपुराण भी मिलता है, जिसमें १२८ अध्याय हैं। उसके वचन भी धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में मिलते हैं। ‘बृहद्विवेक’ प्रभृति ग्रन्थों में ‘महाभागवत’ तथा ‘देवीपुराण’ दोनों को ही पृथक्-पृथक् उपपुराण मानकर गणना की गयी है। दोनों ही पुराणों का अपना विशिष्ट महत्त्व है, जिज्ञासु पाठकों को नाम सादृश्य से भ्रमित नहीं होना चाहिये।” यह पुराण धर्मसारयुक्त, भक्तिभाव तथा सभी काव्यगुणों से समलंकृत है। इसके उपदेश भी हृदयग्राही तथा नीतिपूर्ण होने से स्मरणीय एवं आचरणीय हैं। इसमें मुख्यरूप से भगवती पराम्बा देवी की महिमा, उनके विविध स्वरूपों, लीलाओं के आख्यान और उपासना- पद्धतियों का विस्तृत वर्णन है । इस पुराण के आदिवक्ता भगवान् सदाशिव तथा श्रोता देवर्षि नारदजी हैं। एक बार नैमिषारण्य में शौनक आदि महर्षियों ने मुनिवर सूतजी से स्वर्ग तथा मोक्ष का सुख प्रदान करने वाले और भगवती की उत्तम महिमा का वर्णन करने वाले पुराण को सुनने की इच्छा प्रकट की, इसपर श्रीसूतजी ने इस पुराण के उद्भव का एक रोचक आख्यान सुनाते हुए कहा — देवीपुराण के प्रादुर्भाव का आख्यान — जब भगवान् वेदव्यासजी अठारह पुराणों की रचना करने पर भी सन्तुष्ट नहीं हुए, तब उनके मन में यह विचार आया कि इस पवित्र पुराण में भगवती का परमतत्त्व और विस्तृत माहात्म्य विद्यमान है, परंतु महाज्ञानी महेश्वर शिव भी जिस देवीतत्त्व को भलीभाँति नहीं जानते हैं, उसका वर्णन मैं अनभिज्ञ होकर भला कैसे कर सकता हूँ? यह विचार कर देवी-भक्तिपरायण व्यासजी ने हिमालय पर्वत पर जाकर कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती ने बिना प्रकट हुए आकाशवाणी में कहा — ‘महर्षे! आप ब्रह्मलोक जायँ, जहाँ समस्त श्रुतियाँ विद्यमान हैं, वहीं आपको मेरा दर्शन होगा और सारे रहस्यों का भी पता चल जायगा।’ इस पर व्यासजी ब्रह्मलोक गये, वहाँ उन्होंने मूर्तिमान् चारों वेदों को प्रणाम कर उनसे अविनाशी ब्रह्मपद की जिज्ञासा की । तब चारों वेदों ने क्रम-क्रम से देवी भगवती को ही साक्षात् परमतत्त्व (परब्रह्म) बतलाते हुए कहा कि आप अभी हमारे प्रयत्न से इस तत्त्व का प्रत्यक्षरूप से दर्शन कर सकेंगे। ऐसा कहकर सभी श्रुतियाँ सच्चिदानन्दस्वरूपा, सर्वदेवमयी परमेश्वरी का स्तवन करने लगीं। परिणामस्वरूप ज्योतिस्वरूपा सनातनी जगदम्बा प्रकट हो गयीं। उनमें सहस्रों सूर्यों की आभा एवं करोड़ों चन्द्रों की शीतल चन्द्रिका व्याप्त थी और वे सहस्रों भुजाओं में विविध आयुधों को धारण किये हुए दिव्य अलंकरणों से अलंकृत थीं । वे विविध रूप धारण करती हुई कभी विष्णुरूप में होकर उनके वामभाग में लक्ष्मी का रूप धारण करके विराजमान दिखायी पड़ती थीं, कभी राधासहित कृष्ण के रूप में हो जाती थीं, कभी ब्रह्मा का रूप धारण करके उनके वामभाग में सावित्री के रूप में दृष्टिगत होती थीं और कभी शिव का रूप धारण कर उनके वामभाग में गौरीरूप से स्थित हो जाती थीं। इस प्रकार उन सर्वव्यापिनी ब्रह्मस्वरूपिणी भगवती ने अनेक प्रकार के रूप धारण कर व्यासजी का संशय दूर कर दिया । देवी का प्रत्यक्ष दर्शन करके उन्हें परब्रह्म के रूप में जानकर व्यासजी तत्क्षण जीवन्मुक्त हो गये । तत्पश्चात् भगवती ने उनकी मानसिक अभिलाषा जानकर उन्हें अपने चरणतल में स्थित सहस्रदलकमल का दर्शन कराया, जिसके सहस्रों पत्रों पर महाभागवत [देवीपुराण] दिव्याक्षरों में अङ्कित था । भगवान् व्यासदेव ने भगवती के चरण में स्थित कमल में जिस रूप में परमाक्षरस्वरूप पवित्र पुराण का दर्शन किया था, उसी रूप में उसे प्रकाशित किया । पुराणमहिमा — महामुनि सूतजी इस पुराण की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि हजारों अश्वमेधयज्ञ तथा सैकड़ों वाजपेययज्ञ इस देवीपुराण की सोलहवीं कला के भी तुल्य नहीं हैं। इस प्रकार महापातकी प्राणियों की भी रक्षा के लिये इस भूलोक में यह पवित्र पुराण प्रकाशित हुआ । सूतजी बोले — एक बार की बात है — मुनिश्रेष्ठ जैमिनि व्यासजी को प्रणाम करके देवीमाहात्म्य के श्रवण की इच्छा व्यक्त करते हुए उनसे बोले — प्रभो ! यह मनुष्यशरीर अत्यन्त दुर्लभ है, सैकड़ों जन्मों के बाद इसे प्राप्तकर जिसने भगवती-माहात्म्य का श्रवण नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ है । अतः आप भगवती के उत्तम चरित्र को सुनाने की कृपा करें । यह सुनकर व्यासजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले — वत्स ! आपने इस समय बड़ी ही कल्याणप्रद बात पूछी है, जिसका श्रवण करके भक्ति और धर्म से शून्य महान् पापी मनुष्यों का भी इस लोक में पुनर्जन्म नहीं होता और जिसे सुनकर पापी मनुष्य ब्रह्महत्यादि पापों से छूट जाता है, उस कथा को आप सुनना चाहते हैं, अतः आप परम भाग्यशाली हैं । मुने! उन भगवती के अतुलनीय माहात्म्य को बता सकने में भला कौन समर्थ है ? जिस माहात्म्य का वर्णन अपने पाँच मुखों से भगवान् शंकर भी नहीं कर सके हैं। मोक्ष तथा निर्वाणपद प्रदान करनेवाली वे भगवती सभी मन्त्रों की एकमात्र बीजस्वरूपिणी हैं। वाराणसीपुरी में भगवान् शिव स्वयं उन भगवती का ही ब्रह्मसंज्ञक तारक महामन्त्र ‘दुर्गा’ कान में कहते हुए मोक्षपद प्रदान करते हैं?, जिसके फलस्वरूप मनुष्य के साथ-साथ पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि तुच्छ प्राणी भी जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। भगवान् व्यास मुनिश्रेष्ठ जैमिनिको एकाग्रचित्त होकर सुननेकी प्रेरणा करते हुए इस पवित्र देवीपुराणकी कथाका आरम्भ करते हैं — एक समयकी बात है — मन्दराचल पर्वत पर सभी देवगणों तथा भगवान् विष्णु की उपस्थिति में महर्षि नारद ने नम्रतापूर्वक प्रार्थना करते हुए भगवान् शिव से पूछा कि भगवान् विष्णु, ब्रह्मा तथा आपकी भक्तिपूर्वक उपासना करने से जीव को परमपद की प्राप्ति हो जाती है । यहाँतक कि इन्द्र आदि समस्त लोकपालों ने भी आप तीनों की उपासना करके ही श्रेष्ठ पद प्राप्त किया है, परंतु देवेश ! आप मुझे यह बताने की कृपा करें कि आप सबका उपास्य देवता कौन है ? आप किस अविनाशी देवता की आराधना करते हैं ? यह कहते हुए नारदमुनि भगवान् विष्णु तथा शिव का स्तवन करने लगे। उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर निर्मलमति भगवान् शंकर ने सतत समाधिस्थ होकर पराम्बा भगवती का पूर्ण परात्पर ब्रह्म के रूप में दर्शन किया तथा बोले — शुद्ध शाश्वत प्रकृतिस्वरूपिणी भगवती जगदम्बा ही साक्षात् परब्रह्म हैं और वे ही हमारी देवता भी हैं । निराकार रहते हुए भी वे महादेवी अपनी लीला से देह धारण करती हैं, उन्हीं के द्वारा इस विश्व का सृजन, पालन तथा अन्त में संहार किया जाता है, उनके द्वारा ही यह जगत् मोहग्रस्त होता है । प्राचीन काल में वे पूर्णा भगवती ही अपनी लीला से दक्षकन्या सती के रूप में, हिमवान् की पुत्री पार्वती के रूप में तथा अपने ही अंश से विष्णुभार्या लक्ष्मी के रूप में एवं ब्रह्मा की भार्या सरस्वती तथा सावित्री के रूप में प्रकट हुईं। उन पूर्णाप्रकृति ने ही सृष्टि कार्य में त्रिदेवों को नियुक्त करते हुए कहा — मैंने सृष्टि के निमित्त ही आप तीनों को अपनी इच्छा से उत्पन्न किया है। अतः आप मेरे इच्छानुसार सृष्टि का कार्य करें। मैं सावित्री, सरस्वती, लक्ष्मी, गङ्गा तथा सती — पाँच श्रेष्ठ देवियों के रूप में विभक्त होकर आपलोगों की पत्नियाँ बनकर स्वेच्छापूर्वक विहार करूँगी और सभी प्राणियों में नारीरूप धारण कर शम्भु के सहयोग से सभी को जन्म दूँगी । ब्रह्मा आदि से ऐसा कहकर पराप्रकृति भगवती महाविद्या उनके देखते-देखते अन्तर्धान हो गयीं । भगवती द्वारा महेश्वर को अपने आविर्भाव की बात बताना — भगवान् महेश्वर उन पूर्णाप्रकृति को पत्नीरूप में प्राप्त करने के लिये संयतचित्त होकर तप के द्वारा आराधना करने लगे। महेश्वर को ऐसा करते देखकर विष्णु और ब्रह्मा भी तप में बैठ गये । इन तीनों के तप की परीक्षा करने के लिये स्वयं भगवती विराट् रूप धारण कर उनके पास आयीं, जिसे देखकर ब्रह्मा तथा विष्णु तो डर गये, परंतु भगवान् सदाशिव इस परीक्षा के रहस्य को जानकर समाधि में ही बैठे रहे । तपस्या में रत भगवान् शिव पर पराम्बा भगवती ने प्रसन्न होकर उन्हें यह आश्वासन दिया कि दक्षप्रजापति के यहाँ अपनी माया से उत्पन्न होकर पूर्णाप्रकृति मैं ही आपकी भार्या बनूँगी। साथ ही भगवती ने यह भी कहा कि जब दक्ष के यहाँ उनके देहाभिमान से मेरा तथा आपका अनादर होगा, तब मैं उन्हें विमोहित कर अपने स्थान को चली जाऊँगी । उस समय आपसे मेरा वियोग हो जायगा और तब आप भी मेरे बिना कहीं ठहर नहीं सकेंगे। इस प्रकार हम दोनों के बीच प्रीति बनी रहेगी । यह कहकर परमेश्वरी प्रकृति अन्तर्धान हो गयीं और भगवान् शिव के मन में प्रसन्नता व्याप्त हो गयी। इस प्रकार तीसरा अध्याय पूरा हुआ । दक्षप्रजापति के घर में भगवती का सतीरूप में जन्म तथा सती-स्वयंवर — कुछ ही दिनों बाद दक्षपत्नी ने शुभ दिन में एक कन्या को जन्म दिया। वह कन्या प्रकृतिस्वरूपिणी भगवती पूर्णा ही थीं । उस समय आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी, सैकड़ों दुन्दुभियाँ बज उठीं, उल्लास का वातावरण बन गया। दसवें दिन उस कन्या का ‘सती’ नामकरण किया गया। कुछ समय बाद जब सती विवाहयोग्य हुईं तो दक्षप्रजापति ने सती के पाणिग्रहण की दृष्टि से देवताओं तथा असुरों को आमन्त्रित कर एक स्वयंवर का आयोजन किया। इस स्वयंवर में भगवान् शिव को आमन्त्रित नहीं किया गया था । देवता, असुर, ऋषि तथा महात्मालोग सभा में उपस्थित थे। दक्षप्रजापति ने स्वयंवर में देवीस्वरूपा अपनी कन्या सती को बुलाया और कहा कि आपको जो भी सुन्दर, गुणवान् और श्रेष्ठ प्रतीत हो, उसे माला पहनाकर वरण कर लें । इसी बीच सर्वश्रेष्ठ महेश्वर भी नन्दी पर सवार होकर वहाँ आ गये और अन्तरिक्ष में स्थित हो गये । प्रकृतिस्वरूपिणी देवी भगवती सती ने ‘शिवाय नमः ‘ – ऐसा कहकर वह माला भूमि को समर्पित कर दी और वहाँ पर प्रकट होकर भगवान् शिव ने उस माला को अपने सिर पर धारण कर लिया । यह सब देखकर दक्षप्रजापति खिन्न हो गये, परंतु ब्रह्माजी के कहने पर उन्होंने महेश्वर को बुलाकर सती उन्हें सौंप दी। भगवान् शंकर ने भी प्रसन्नतापूर्वक विधि-विधान से उनका पाणिग्रहण कर लिया तथा भगवती सती को साथ में लेकर महेश कैलास के लिये प्रस्थान कर गये। चौथे अध्याय में यह कथा पूर्ण होती है। नन्दी को भगवान् शिव का वरदान — कैलास पर्वत पर देवता, गन्धर्व, महर्षिगण, देवपत्त्रियाँ तथा किन्नरियाँ और मुनिपत्नियाँ – सभी पधार गये और नृत्यगान करते हुए विवाहोत्सव मनाने लगे। कुछ समय बाद ज्ञानी और शिवभक्त नन्दी जो दक्ष की सेवामें थे, वहाँ आये और भगवान् शंकर को भूमि पर दण्डवत् प्रणाम कर उनकी स्तुति करते हुए प्रार्थना करने लगे — भगवन्! मैं आपका नित्य निकट रहने वाला दास बना रहूँ और निरन्तर आपका दर्शन करता रहूँ । भगवान् शंकर ने नन्दी की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और उन्हें अपने प्रमथगणों का अधिपति बना दिया । दक्ष द्वारा यज्ञ का आयोजन तथा शिव को आहूत न करना — दक्ष का भगवान् शंकर के प्रति द्वेषभाव बना ही रहा। एक बार उन्होंने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया जिसमें इन्द्र आदि प्रधान देवताओं, ब्रह्मा, देवर्षियों, ब्रह्मर्षियों, यक्षों, गन्धर्वों, पितरों, दैत्यों, किन्नरों तथा पर्वतों को तो निमन्त्रित किया, किंतु विद्वेष के कारण शिव तथा उनकी पत्नी सती को नहीं बुलाया। इस यज्ञ की रक्षा के लिये भगवान् विष्णु से प्रार्थना कर उन्हें भी आवाहित कर लिया । महर्षि दधीचि द्वारा दक्ष को शिवमहिमा बताना — उस यज्ञ में महामति दधीचि भी उपस्थित थे, उन्होंने यज्ञ में शिव का भाग न देखकर दक्षप्रजापति को समझाने का प्रयास करते हुए कहा कि शिवविहीन किया गया यज्ञ उसी प्रकार फलदायक नहीं होता है, जिस प्रकार अर्थ से रहित वाक्य, वेदज्ञान से शून्य ब्राह्मण तथा गङ्गा से रहित देश । जैसे पति के बिना स्त्री का तथा पुत्र के बिना गृहस्थ का जीवन व्यर्थ है, जैसे निर्धन व्यक्ति की आकाङ्क्षा व्यर्थ होती है, जिस प्रकार कुशविहीन संध्या-वन्दन, तिलविहीन तर्पण, हवि से रहित होम निष्फल रहता है, उसी प्रकार शम्भुविहीन यज्ञ भी निष्फल होता है। दधीचि की इन बातों को सुनकर दक्ष और भी क्रुद्ध हो गये और अपने अनुचरों से बोले —‘इस ब्राह्मण को यहाँ से दूर ले जाओ।’ मुनिश्रेष्ठ दधीचि भी उनकी सभा से चले गये। देवी सती का पिता के यज्ञ में जाना — इधर नारदजी भगवान् शंकर के पास पधारे तथा उन्हें दक्षप्रजापति के यज्ञ में जाने के लिये प्रेरित करने लगे । भगवान् शंकर ने स्वयं तथा अपनी प्राणप्रिया सती दोनों के लिये जाना अस्वीकार कर दिया। तब नारदजी ने देवी सती को जाने के लिये प्रोत्साहित किया। सती ने नारद की बात सुनकर पिता के यज्ञ में जाने का मन बना लिया । यद्यपि शिव ने यज्ञ में न जाने के लिये समझाने का प्रयास किया, परंतु सती का जाने का निश्चय दृढ़ था। भगवान् शंकर को अपना प्रभाव दिखाने की दृष्टि से सती ने अपना भयंकर रूप प्रदर्शित किया, जिसे देखकर शिव घबरा गये। वे भयभीत होकर चारों दिशाओं में आश्रय ग्रहण करना चाहते थे । उसी क्षण भगवती जगदम्बा के द्वारा दसों दिशाओं में दस महाविद्याओं का प्राकट्य हुआ । भगवती ने इन दस महाविद्याओं की महिमा तथा उपासना आदि का भी वर्णन सुनाया। कुछ ही देर में दस महाविद्याएँ अन्तर्धान हो गयीं। भगवान् शिव ने सती से प्रभावित होकर उन्हें जाने की अनुज्ञा प्रदान कर दी । सती अपने पिता दक्ष के यज्ञ में पहुँच गयीं। सर्वप्रथम वे अपनी माता प्रसूति से मिलीं । माता ने सती का सम्मान किया और स्नेहभरी बातें कीं । माता से मिलकर सती अपने पिता दक्षप्रजापति की ओर उन्मुख हुईं। उनके द्वारा अपने पति भगवान् शिव की निन्दा सुनकर तथा उनका यज्ञ में भाग न देखकर वे अत्यन्त क्रोधित हो गयीं और उन्होंने भयंकर रूप धारण कर लिया। वहाँ उपस्थित सभी देवता और ऋषि भी अत्यन्त भयभीत हो गये । छायासती का प्राकट्य तथा यज्ञाग्नि प्रवेश — भगवती सती ने तत्क्षण एक छायासती का प्रादुर्भाव किया। छायासती को अपना मन्तव्य बताकर वे अन्तर्धान होकर आकाश में स्थित हो गयीं। इधर छायासती दक्षप्रजापति से कुपित होकर कहने लगीं कि तुम सनातन शिव और मुझ सती की निन्दा क्यों कर रहे हो ? दक्ष ने भी छायासती को भला-बुरा कहा । इस प्रकार वाद-विवाद बढ़ जाने पर क्रोध से प्रदीप्त नेत्रोंवाली छायासती देवताओं के देखते-देखते यज्ञाग्नि में प्रवेश कर गयीं। उसी क्षण यज्ञकुण्ड की अग्नि बुझ गयी । यज्ञमण्डप मात्र आधे ही क्षण में श्मशानके रूप में परिणत हो गया। वीरभद्र द्वारा यज्ञ-विध्वंस — इधर नारदजी ने सदाशिव भगवान् शंकर को सारे समाचारों से अवगत कराया। वे यह समाचार सुनकर शोकाकुल हो उठे । कुछ ही क्षणों के अनन्तर उनके ऊर्ध्व नेत्र से अत्यन्त तेजस्वी अग्नि प्रादुर्भूत हुई और उस अग्नि से एक परम पुरुष उत्पन्न हुआ। जिसका नाम वीरभद्र रखा गया। भगवान् शिव ने वीरभद्र को दक्ष के यज्ञ में जाकर उसे विध्वंस करने की आज्ञा प्रदान की। वीरभद्र प्रमथगणों के साथ दक्षपुरी में पहुँच गये और यज्ञ का विध्वंस कर डाला तथा दक्ष का भी सिर काट डाला। इस प्रकार यज्ञ के विनष्ट हो जाने पर ब्रह्माजी कैलास पर्वत पर गये और उन्होंने भगवान् सदाशिव को प्रणाम कर दक्ष को जीवित करने और यज्ञ को पूर्ण करने की प्रार्थना की। ब्रह्मा की प्रार्थना से द्रवीभूत होकर भगवान् शिव ने वीरभद्र को दक्ष को जीवित करने तथा यज्ञ को पूर्ण करने का आदेश दिया। वीरभद्र ने एक बकरे का सिर जोड़कर दक्षप्रजापति को जीवित कर दिया। चूँकि दक्ष ने भगवान् शिव की निन्दा की थी, इसलिये गूँगे पशु का सिर जोड़ा गया। इसके साथ ही यज्ञ को भी विधि-विधान से पूर्ण कराया गया । अन्त में दक्षप्रजापति ने भी भगवान् शंकर का स्तवन किया । ब्रह्माजी ने कहा कि जो नराधम यज्ञ में शिव के बिना अन्य देवताओं का यजन करेंगे, उनका यज्ञकार्य नष्ट हो जायगा और वे महान् पा के भागी होंगे। शोकसंतप्त भगवान् शिव को देवी के दिव्य दर्शन, शक्तिपीठों के आविर्भाव का रहस्य — सती के वियोग में भगवान् शंकर के दुःखी होने पर ब्रह्मा और विष्णु ने उन्हें समझाने का प्रयास किया और कहा कि वे देवी जगदम्बा तो सनातन पूर्ण ब्रह्मस्वरूपा हैं । उनकी मृत्यु तो वास्तविक नहीं, केवल कल्पनामात्र है। इसके अनन्तर ब्रह्मा, विष्णु और महेश – तीनों ने भगवती का स्तवन किया । उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर महादेवी ने आकाश में स्थित होकर उन्हें दर्शन दिया तथा भगवान् शिव को आश्वस्त करते हुए कहा कि आप स्थिरचित्त हों, मैं स्वयं हिमालय की पुत्री बनकर तथा मेनका के गर्भ से जन्म लेकर पुनः आपको प्राप्त करूँगी। उन्होंने शिव से यह भी कहा कि दक्ष की यज्ञाग्नि में मेरे जिस छायाशरीर ने प्रवेश किया था, उसे सिर पर लेकर मेरी प्रार्थना करके आप इस पृथ्वी पर भ्रमण करें। वह मेरा छायाशरीर अनेक खण्डों में विभक्त होकर इस पृथ्वी पर गिरेगा और उन-उन स्थानों पर पापों का नाश करने वाले महान् शक्तिपीठ उदित होंगे। जहाँ योनिभाग गिरेगा, वह सर्वोत्तम शक्तिपीठ होगा। वहाँ रहकर तपस्या करके आप मुझे प्राप्त करेंगे। तदनन्तर शिवजी ने यज्ञशाला में प्रवेश करके सती के छायाशरीर का आलिंगन करते हुए उसे सिर पर उठा लिया और अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक धरती पर नाचने लगे। ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवगण इस अपूर्व दृश्य को देखने के लिये आकाश में आ गये। दसों दिशाओं से पुष्पवृष्टि होने लगी। प्रमथगण मुखवाद्य (गाल) बजाने और गाने लगे। चारों ओर नाचते हुए शिवजी सती के छायाशरीर को कभी सिर पर, कभी दाहिने हाथ में, कभी बायें हाथ में, कभी कन्धे पर तो कभी प्रेमपूर्वक वक्ष:स्थल पर धारण कर अपने चरण- प्रहार से पृथ्वी को कम्पित करते हुए नृत्य करने लगे । देवताओं को चिन्ता हुई कि ये जगत्संहारक रुद्र कैसे शान्त होंगे? जगत् की रक्षा के लिये भगवान् विष्णु ने सुदर्शनचक्र से सती के छायाशरीर के टुकड़े करके गिरा दिये । शरीर के वे सारे अङ्ग धरातल पर अनेक स्थानों पर गिरे, पृथ्वी पर वे ही स्थान महातीर्थ और सिद्धपीठ के रूप में विख्यात हुए । भगवान् विष्णु के कहने पर नारद ने शिव से शान्तचित्त होने की प्रार्थना की। नारद की प्रार्थना सुनकर भगवान् सदाशिव ने नृत्य त्यागकर बार-बार निःश्वास छोड़ते हुए विष्णु को शाप दे दिया कि त्रेतायुग में विष्णु को पृथ्वी पर सूर्यवंश में जन्म लेना पड़ेगा। जिस प्रकार मुझे छायापत्नी का वियोगी बनना पड़ा, उसी प्रकार राक्षसराज रावण विष्णु की छायापत्नी का हरण करके उन्हें भी वियोगी बनायेगा । विष्णु मेरी ही भाँति शोक से व्याकुलचित्त होंगे। भगवान् शिव का कामरूप में तपस्या करना — इस प्रकार विष्णु को शाप देकर शिवजी स्वस्थचित्त हो गये और उन्होंने जगदम्बा के बताये हुए पूर्व वृत्तान्त को याद करके गुह्यपीठ ‘कामरूप’ में तपस्या की। भगवती ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया तथा उनके इच्छानुसार यह वरदान दिया कि मैं अपने अंश से जलमयी गङ्गा का रूप धारण करके आपको पतिरूप में प्राप्त करूँगी। इसके साथ ही मैं पूर्णावतार लेकर पार्वती के रूप में भी आपकी पत्नी बनूँगी। देवी गङ्गा तथा पार्वती का प्राकट्य — महादेवी दुर्गा ने हिमालय के यहाँ मेनका के गर्भ से गङ्गा तथा पार्वती के रूप में अवतार लिया । ब्रह्माजी हिमालय से गङ्गा को माँगकर देवताओं के साथ उन्हें स्वर्गलोक ले गये तथा उन्हें शिवजी को समारोहपूर्वक पत्नीरूप में प्रदान किया। जो जगदम्बा ब्रह्माजी के कमण्डलु में रही थीं, उन्होंने ही भगवान् शिव को प्राप्त करने के बाद जलरूप में अवतीर्ण होकर ब्रह्मद्रव के रूप में पृथ्वीलोक में आकर सगरपुत्रों का उद्धार किया तथा अन्य सभी प्राणियों का वे कल्याण करती रहती हैं । इस प्रकार सती ने अपने अंशरूप से गङ्गा के रूप में हिमालय की पुत्री होकर तथा पूर्णांश से पार्वती रूप में जन्म लेकर भगवान् शंकर को पतिरूप में प्राप्त किया। नारदजी के द्वारा पार्वतीजी के जन्म की कथा सुनने की जिज्ञासा करने पर महादेवजी ने कहा कि देवी मेना ने शुभ दिन में जगन्माता भगवती को पुत्रीरूप से जन्म दिया। उस समय गिरिराज हिमालय ने भगवती जगदम्बा के रूप में कन्या का दर्शन करते हुए प्रणाम किया तथा उनसे अपना वृत्तान्त सुनाने की प्रार्थना की। महादेवजी कहते हैं कि हिमालय ने विभिन्न प्रकार से भगवती की प्रार्थना करते हुए ब्रह्मविद्या प्रदान करने का उनसे अनुरोध किया । देवी द्वारा हिमालय को देवीगीता का उपदेश — पार्वतीजी ने योग के साररूप में ब्रह्मविद्या का यहाँ वर्णन किया है, जिसे ‘देवीगीता’, ‘पार्वतीगीता’ या ‘भगवतीगीता’ भी कहा जाता है। इसके जानने मात्र से प्राणी ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। भगवती पार्वती कहती हैं कि मुमुक्षु साधक को चाहिये कि मेरे में चित्त और प्राण को लगाकर तत्परतापूर्वक मेरे नाम का जप करता रहे। मेरे गुण और लीला- कथाओं का श्रवण करते हुए अपने वर्णाश्रमधर्म के अनुसार विधि-विधान से मेरी पूजा और यज्ञ आदि सम्पन्न करना चाहिये। सभी यज्ञ, तप और दान से मेरी ही अर्चना करनी चाहिये । जब इस आत्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है, उसी क्षण मुक्ति हो जाती है, परंतु मेरी भक्ति से विमुख प्राणियों के लिये यह प्रत्यक्षानुभूति अत्यन्त दुर्लभ है । इसलिये मुमुक्षु साधकों को यत्नपूर्वक मेरी भक्ति में ही संलग्न रहना चाहिये । राग-द्वेष आदि दोषों से प्राणी जन्म-मरण की प्रक्रिया से निरन्तर बँधा रहता है । अतः शरीर आदि अनात्म पदार्थों में उस आत्मबुद्धि का परित्याग कर देना चाहिये । वास्तव में सच्चिदानन्दस्वरूप यह आत्मा न उत्पन्न होता है, न मरता है, न सुख- दुःख आदि द्वन्द्वों में लिप्त होता है और न कष्ट ही भोगता है। जैसे घर के अंदर अवस्थित आकाश पर घर के जलने का कोई प्रभाव नहीं होता, उसी प्रकार शरीर में स्थित आत्मा पर शरीर में होने वाले छेदन आदि का कोई प्रभाव नहीं होता। शरीर के मारे जाने पर जो आत्मा को मारा गया समझता है, ऐसा व्यक्ति भ्रमित चित्तवाला है; क्योंकि आत्मा न मरता है, न मारा जाता है। सृष्टि के समय यह जीव पूर्वजन्म की वासनाओं से युक्त अन्तःकरण के साथ उत्पन्न होता है और जगत् में निवास करता है। विद्वान् को चाहिये कि ज्ञान, विवेक के द्वारा इच्छित पदार्थों में आसक्ति तथा अनिच्छित पदार्थों की प्राप्ति में द्वेष का परित्याग कर सुखी हो जाय । पाप-पुण्य के अनुसार जीव को सुख तथा दुःख की प्राप्ति होती है। पुण्यकर्मों से स्वर्ग की प्राप्ति होने के बाद पुण्य के क्षीण होने पर जीव पुनः मृत्युलोक में गिरता है । अतएव विद्वान् पुरुष को आसक्ति का त्याग करते हुए विद्याभ्यास में तत्पर रहना चाहिये तथा सत्संग करते हुए परम सुख को प्राप्त करना चाहिये । वास्तव में विषयभोगों का सेवन करने वालों का आत्यन्तिक कल्याण नहीं होता, अतः आत्मतत्त्व का विचार करके वासनात्मक सुख का परित्याग कर शाश्वत सुख की प्राप्ति करनी चाहिये। भगवती पार्वती गिरिराज हिमालय से कहती हैं कि अत्यन्त दुराचारी मनुष्य भी यदि अनन्यभाव से मेरी उपासना करता है तो वह भी पापरहित होकर भवबन्धन से छूट जाता है। निरन्तर एकनिष्ठ चित्तवाला होकर जो नित्य मेरा स्मरण रखता है, उस भक्तिपरायण योगी को मैं मुक्ति प्रदान करती हूँ। अतः महामते ! आप पराभक्ति से युक्त होकर मेरी आराधना कीजिये । इस प्रकार पार्वतीजी के मुख से देवीगीता सुनकर पर्वतश्रेष्ठ हिमालय जीवन्मुक्त हो गये । श्रीमहादेवजी श्रीनारदजी से कहते हैं – इस पार्वतीगीताका जो मनुष्य पाठ करता है, उसके लिये मुक्ति सुलभ हो जाती है । शिव-पार्वती का विवाहोत्सव — भगवती पार्वती हिमवान् के घर में रहकर बालोचित क्रीड़ा करती हुई विभिन्न लीलाओं से हिमालय और मेनका को आनन्दित करने लगीं। धीरे-धीरे वे बढ़ने लगीं तथा विवाह के योग्य भी हो गयीं। एक दिन नारदमुनि हिमालय के पास आये। उन्होंने भगवान् शंकर की महिमा का वर्णन करते हुए सती का पूर्व इतिहास हिमवान् से बताया तथा भगवान् शंकर से पार्वती का पाणिग्रहण करने की प्रेरणा की । भगवान् शंकर हिमालय पर्वत पर तपस्या में संलग्न थे। भगवती पार्वती भी भगवान् सदाशिव को पतिरूप में प्राप्त करने के लिये हिमालय के शिखर पर तपस्या के लिये पहुँच गयीं । उन दिनों तारकासुर नामक एक राक्षस से सभी देवता पीड़ित हो रहे थे, जिसके वध के लिये सभी देवता चिन्तित थे । उस राक्षस को ब्रह्मा, विष्णु, महेश- तीनों में से कोई नहीं मार सकता था । ब्रह्माजी ने बताया कि शंकरजी का पुत्र ही उसे मार सकता है, अतः भगवान् शंकर का विवाह किसी प्रकार भगवती पार्वती से हो जाय – इसका उपाय करना चाहिये । अतः देवराज इन्द्र ने तपस्या में संलग्न भगवान् शंकर को मोहित करने के लिये कामदेव को आदेश दिया । कामदेव वसन्त ऋतु और अपनी पत्नी रति के साथ भगवान् शिव के आश्रम में प्रवेश कर गये, जिससे उस आश्रम के सभी प्राणी कामवासना से मोहित हो गये, परंतु भगवान् शंकर का ध्यान किञ्चित् भी विचलित नहीं हुआ। कामदेव के विशेष प्रयास करने पर भगवान् शंकर के तीसरे नेत्र से निकली अग्नि ने सहसा कामदेव को भस्मसात् कर दिया । तदनन्तर पराम्बा भगवती से सदाशिव का साक्षात्कार हुआ। शिव के निवेदन करने पर भगवती ने अपने उस भयंकर स्वरूप का दर्शन कराया, जो प्रजापति दक्ष यज्ञ के नाश के लिये उन्होंने धारण किया था। उस स्वरूप का दर्शन कर भगवान् सदाशिव अभिभूत होकर भूमि पर लेट गये और भगवती के चरणकमल को अपने हृदय पर धारण कर उन्होंने सहस्रनाम के द्वारा भगवती का स्तवन किया । भगवती ने भी प्रसन्न होकर सदाशिव से कहा कि मैं आपको पतिरूप में प्राप्त करने के लिये ही गिरिराज के यहाँ पुत्रीरूप में प्रादुर्भूत हुई हूँ। इसके बाद महादेव तथा पार्वती दोनों ही एक-दूसरे को पति-पत्नीरूप में प्राप्त करने के लिये तीन हजार वर्षों तक तपस्या में संलग्न हो गये। तदनन्तर भगवान् शंकर ने मरीचि आदि सप्तर्षियों को विवाह का प्रस्ताव लेकर हिमवान् के पास भेजा। हिमवान् सप्तर्षियों से मिलकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और भगवान् सदाशिव को अपनी पुत्री पार्वती को पत्नीरूप में प्रदान करने के लिये सहर्ष सहमत हो गये । कुछ ही समय बाद गिरिराज के घर में संसार का आनन्दवर्धन करने वाला पार्वती – विवाह – महोत्सव प्रारम्भ हो गया। विवाहोत्सव में देवताओं, गन्धर्वों और किन्नरों को साथ लिये देवराज इन्द्र, लोकपितामह ब्रह्मा, महर्षि वसिष्ठ, भगवान् विष्णु, सरस्वती और लक्ष्मी के साथ वहाँ पहुँच गये । इस अवसर पर अपने पति के वियोग से व्यथित रति के द्वारा अपने पति कामदेव को पुनर्जीवन प्राप्त कराने की प्रार्थना करने पर देवताओं तथा ब्रह्मा ने भगवान् शंकर से कामदेव को पुनर्जीवित करने का मार्मिक अनुरोध किया। प्रणतजनों पर कृपा करने वाले भगवान शंकर ने कामदेव को फिर से शरीर की प्राप्ति करा दी। विवाह की तैयारी पूर्ण हो जाने पर सुन्दर चन्द्रमा को अपने मस्तक पर धारण करने वाले वृषभध्वज भगवान शिव ने सभी देवताओं, मुनीश्वरों और किन्नरों के साथ गिरिराज हिमालय के पुर के लिये प्रस्थान किया । सुन्दर मुहूर्त में गिरिराज हिमालय ने पार्वती का करके पूजन वैवाहिक विधि से उन्हें सदाशिव को प्रदान कर दिया और प्रसन्नमन शम्भु ने जगत् का सृजन, पालन तथा संहार करने वाली उन हिमालयपुत्री पार्वती का पत्नीरूप मे पाणिग्रहण किया। इस प्रकार महादेव के साथ पार्वती के विवाह सम्पन्न होने पर देवताओं का मनोरथ पूर्ण हो गया और ब्रह्मादि सभी देवता अपने-अपने स्थान को चले गये। हिमालय की प्रार्थना पर भगवान् शंकर हिमालय पर्वत पर सुरम्य नगर का निर्माण कर भगवती पार्वती के साथ रहने लगे । कार्तिकेय का प्रादुर्भाव — तारकासुर के अत्याचार से पीड़ित पृथ्वी गाय का रूप धारण करके देवताओं के साथ ब्रह्माजी के पास आयी और उसने अपनी व्यथा सुनायी । ब्रह्माजी ने देवताओं को बताया कि शिव के तेज से उत्पन्न बालक से ही तारकासुर का वध हो सकेगा, किंतु यदि पार्वती के गर्भ से पुत्र उत्पन्न होगा तो वह देवता तथा असुर दोनों का विनाश कर देगा, अतः किसी अन्य स्थान में शिव के तेज से पुत्र उत्पन्न हो, यह चेष्टा करनी चाहिये । वायुदेव के प्रयास से शिव का तेज कृत्तिकाओं में स्थापित हुआ, परंतु वे उसे सहन नहीं कर सकीं। कृत्तिकाओं ने उस तेज को काष्ठकोश में रखकर गङ्गाजी में प्रवाहित कर दिया । उस काष्ठकोश को ब्रह्माजी निकालकर अपने स्थान पर ले गये। इसी काष्ठकोश से आश्विनमास की पूर्णिमा तिथि को ब्रह्मलोक में बारह भुजाओं, बारह नेत्रों और छः मुखों से युक्त तारकासुर के शत्रु महाबली शिवपुत्र का जन्म हुआ। ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि शिवजी का यह पुत्र कृत्तिकाओं से उत्पन्न होने के कारण ‘कार्तिकेय’ नाम से विख्यात होगा । चूँकि वे कृत्तिकाएँ संख्या में छः कही गयी हैं, अतः इसका नाम ‘ षाण्मातुर’ भी होगा। लोक में यह ‘स्कन्द’ नाम से भी विख्यात होगा। तारकासुर का संहार करने के कारण इसका नाम ‘तारकवैरी’ भी प्रसिद्ध होगा। इस प्रकार तीसवें अध्याय में कार्तिकेय के जन्मकी कथा सम्पन्न हुई । इकतीसवें अध्याय से चौंतीसवें अध्याय तक तारकासुर के वध की कथा है। तारकासुरवध — देवताओं के विशेष आग्रह करने पर ब्रह्माजी ने कार्तिकेय को तारकासुरवध की प्रेरणा की । कार्तिकेय तथा तारकासुर में भीषण संग्राम हुआ और अन्त में कार्तिकेयजी के शक्ति प्रहार से तारकासुर का वध हो गया। उस भयंकर दैत्य के मारे जाने से देवता-गन्धर्व और किन्नरगणों में महान् हर्ष व्याप्त हुआ । सभी प्रसन्न हो गये और भगवान् कार्तिकेय की वन्दना करने लगे। इसके बाद ही ब्रह्माजी ने भगवान् शिव तथा जगन्माता पार्वती से कार्तिकेय का परिचय कराया तथा कार्तिकेय को बताया कि तुम शिव-पार्वती के ही पुत्र हो। भगवान् शंकर तथा माता पार्वती ने भी बड़े हर्षोल्लास से पुत्रोत्सव मनाया। गणेशजन्मोत्सव की कथा — अध्याय पैंतीस में गणेशजी के जन्म का वृत्तान्त है । भगवान् विष्णु ही गजानन के रूप में पार्वतीपुत्र हुए। एक बार भगवान् महेश्वर उमा को घर में छोड़कर अपने प्रमथगणों के साथ वन में पुष्प लाने गये। इधर भगवती गौरी अपने शरीर में हल्दी का उबटन लगाकर स्नान को जाने के लिये उद्यत हुईं। भगवान् विष्णु की पूर्व प्रार्थना का स्मरण करके अपने शरीर पर लगे हरिद्रा – उबटन का कुछ अंश लेकर उन्होंने एक पुत्र का निर्माण किया । प्रसन्नतापूर्वक उसे अपना दूध पिलाते हुए भगवती ने कहा — पुत्र ! जबतक मैं नहाकर न लौटूँ, तबतक तुम मेरे इस नगर की रक्षा करना । इसी बीच भगवान् शंकर वन से लौटकर नगरद्वार पर आ गये । बालक के रोकने पर शूलपाणि भगवान् शिव ने त्रिशूल से उस बालक का मस्तक छिन्न कर दिया। उसी समय पार्वती स्नान से लौट आयीं। उन्होंने गणेश को जीवित, किंतु सिरविहीन देखकर महादेव से पूछा कि मेरे इस द्वाररक्षक पुत्र की ऐसी दशा किसने की ? भगवान् शंकर ने कहा कि मुझे ज्ञात नहीं था कि यह तुम्हारा पुत्र है । फिर उन्होंने पूरा वृत्तान्त बता दिया । तदनन्तर सिर का पता लगाने के लिये भगवान् शंकर जंगल में गये और वहाँ उत्तर की ओर सिर करके सोये हुए एक हाथी का मस्तक काटकर बालक की ग्रीवा पर स्थापित कर दिया। तब से बालक का नाम ‘गजानन’ हो गया । इस प्रकार दो पुत्रों के संनिधान से शिव-पार्वती स्वेच्छा से कैलास तथा काशीपुरी में विहार करने लगे । अध्याय छत्तीस से लेकर अध्याय अड़तालीस तक विस्तार से ‘ श्रीरामोपाख्यान’ या रामायण की कथा का सार निरूपित है, जिसके सार अंश में देवी की आराधना के द्वारा श्रीराम के सर्वत्र विजयी होने एवं भगवान् श्रीराम की सहायता के लिये भगवान् शंकर के द्वारा पवनपुत्र हनुमान् के रूप में प्रकट होकर निरन्तर सहयोग करने का वर्णन है। श्रीरामोपाख्यान — महामुनि नारद तथा भगवान् महादेव का संवाद चल रहा है । नारदजी ने महादेवजी से पूछा कि भगवान् विष्णु ने पृथ्वी पर मनुष्यरूप में अवतार लेकर असमय में पराम्बा भगवती की आराधना किस रूप में की ? इसका उत्तर देते हुए महादेवजी कहते हैं कि प्राचीन काल में त्रैलोक्यजननी भगवती की प्रार्थना करके दशकन्धर रावण उनकी कृपा से त्रैलोक्यविजयी हो गया । रावण के भक्तिभाव से प्रसन्न होकर भगवती जगदम्बा उसकी राजधानी लङ्का में उसे विजय प्रदान करते हुए निवास करने लगीं। इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी तथा इन्द्र आदि सभी देवता अत्यन्त त्रस्त हो गये। उन सभी ने ब्रह्माजी के साथ विष्णुभगवान् से प्रार्थना की। तब भगवान् विष्णु ने राजा दशरथ के यहाँ पुत्ररूप में जन्म लेने का आश्वासन दिया । तदनन्तर ब्रह्मा और विष्णु कैलास गये और वहाँ भगवान् शंकर के साथ तीनों ने भवानी जगदम्बा का स्तवन किया । भगवती ने प्रसन्न होकर विष्णु के द्वारा मनुष्यरूप में रावण के विनाश का आश्वासन दिया तथा रावण पर विजय प्राप्त करने के उपायरूप में अपनी उपासना की प्रक्रिया भी बतायी तथा यह भी कहा कि जब वे अपनी योगिनियों के साथ लङ्का का त्याग कर देंगी, तभी रावण का वध हो सकेगा। इस प्रकार भगवती जगदम्बा की कृपा से भगवान् विष्णु ने रामावतार लेकर वानरों की सहायता से भीषण युद्ध करते हुए रावण का संहार किया । श्रीकृष्णोपाख्यान का रहस्य [ देवी का श्रीकृष्णरूप में तथा महादेवजी का राधारूप में प्राकट्य ] — अध्याय उनचास में श्रीकृष्णजन्म की कथा का उपक्रम प्रस्तुत है । एक समय की बात है — परम कौतुकी भगवान् शिव कैलास शिखर पर सुरम्य मन्दिर के एकान्त में पार्वतीजी के साथ विहार कर रहे थे । उन्होंने भगवती से अपनी एक अभिलाषा व्यक्त करते हुए कहा कि यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो पृथ्वीतल पर कहीं भी पुरुषरूप से अवतीर्ण हों और मैं स्त्रीरूप से अवतीर्ण होऊँगा। इस समय जिस प्रकार मैं आपका प्रिय पति हूँ और आप मेरी प्राणप्रिया पत्नी हैं, उसी प्रकार का दाम्पत्य-प्रेम हम दोनों का उस समय भी हो । भगवान् शंकर ने जोर देकर अपनी इस अभिलाषा को पूर्ण करने की याचना की । देवी ने भी इसे स्वीकार करते हुए महादेवजी से कहा — प्रभो ! आपकी प्रसन्नता के लिये मैं पृथ्वीतल पर वसुदेव के घर पुरुषरूप में श्रीकृष्ण होकर अवश्य ही जन्म लूँगी, मेरी प्रसन्नता के लिये आप भी स्त्रीरूप में जन्म लीजिये । भगवती की बात सुनकर भगवान् शिव ने भी वृषभानु की पुत्री राधा के रूप में जन्म लेने का वचन दिया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मेरी आठ मूर्तियाँ भी रुक्मिणी, सत्यभामादि पटरानियों के रूप में मृत्युलोक में अवतरित होंगी। इस प्रकार इस देवीपुराण के अनुसार भगवती जगदम्बा ही भगवान् कृष्ण के रूप में तथा भगवान् सदाशिव राधारानी के रूप में पृथ्वीलोक में अवतरित हुए। आगे की कथा में ब्रह्माजी के अनुरोध करने पर भगवान् विष्णु ने भी कृष्ण के बड़े भाई बलदेव के रूप में तथा पाण्डवों में अर्जुन के रूप में जन्म लिया । इसी प्रकार पवनदेव ने भीम के रूप में, धर्मराज ने युधिष्ठिर के रूप में तथा अश्विनीकुमारों ने नकुल-सहदेव के रूप में जन्म लिया । आगे के अध्यायों में पचास से बावन तक भगवान् श्रीकृष्ण का बालचरित, तिरपनवें में रासलीला, चौवनवें में अक्रूर के व्रज जाकर श्रीकृष्ण को मथुरा लाने तथा उनके द्वारा सपरिकर कंस का वध कर वसुदेव-देवकी को बन्दीगृह से मुक्त कर उनके दर्शन प्राप्ति का वर्णन है । पचपनवें में युधिष्ठिर के राजसूययज्ञ की कथा, शिशुपालवध, श्रीकृष्ण का रुक्मिणी से पाणिग्रहण तथा पाण्डवों की द्यूत में पराजय के पश्चात् वनवास की कथा है। छप्पनवें अध्याय में पाण्डवों के अज्ञातवास का विशद वर्णन है । बारह वर्ष का वनवास पूर्ण करने के अनन्तर पाण्डव द्रौपदी के साथ कामाख्यादेवी पहुँचते हैं, वहाँ उन्होंने भगवती की उपासना कर उन्हें प्रसन्न किया तथा एक वर्ष का अज्ञातवास कुशलपूर्वक सम्पन्न होने का वरदान माँगा। भगवती कामाख्यादेवी ने धर्मराज युधिष्ठिर को मत्स्यदेश के राजा विराट के यहाँ अज्ञातवास के रूप में एक वर्ष का समय व्यतीत करने का निर्देश दिया । तदनुसार युधिष्ठिर ने अपने भाइयों और पत्नीसहित राजा विराट के यहाँ अज्ञातवास के रूप में एक वर्ष बिताया। वहाँ की कुछ घटनाओं का वर्णन इस अध्याय में प्राप्त होता है । महाभारतयुद्ध का संक्षिप्त वर्णन — सत्तावनवें अध्याय में महाभारत के युद्ध का वर्णन है, कौरवों के पक्ष में कृष्ण की सेना और पाण्डवों के पक्ष में स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ के सारथि के रूप में तत्पर हैं। सर्वप्रथम पाण्डवों ने भगवती की आराधना कर कौरवों पर विजयप्राप्ति का वरदान प्राप्त किया । अठारह दिन के महाभारत के संग्राम में अगणित क्षत्रिय योद्धा कालकवलित हो गये, कौरव भी मारे गये और अन्त में पाण्डवों की विजय हो गयी । भगवान् श्रीकृष्ण का परमधामगमन — अट्ठावनवें अध्याय में भगवान् कृष्ण के द्वारा अपनी लीला का संवरणकर परमधामगमन का वर्णन है । भगवान् कृष्ण विप्रों को धन देकर अपने परिकरों के साथ समुद्र किनारे आ जाते हैं । नन्दी के द्वारा रत्नजटित रथ अन्तरिक्ष में आ जाता है। कृष्ण अपने मूलरूप में अचानक महाकाली का रूप धारण कर सिंह के द्वारा खींचे जाने वाले रथ पर आरूढ़ हो कैलास के लिये प्रस्थान कर जाते हैं। धर्मराज युधिष्ठिर भी रथारूढ़ होकर स्वर्गलोक चले जाते हैं तथा पाण्डव आदि सभी लोग समुद्रजल का स्पर्श करते हुए अपने शरीर का त्याग कर वैकुण्ठलोक को प्राप्त होते हैं । श्रीमहादेवजी नारदजी से कहते हैं कि इस प्रकार जगन्माता भगवती पृथ्वी का भार मिटाने के लिये शम्भु की इच्छा के वशीभूत होकर पृथ्वीतल पर लीलापूर्वक पुरुषरूप में आविर्भूत हुईं और पृथ्वी के भारस्वरूप राक्षसों का संहार करके पुनः अपना वास्तविक रूप धारण कर अपने स्थान को चली गयीं। इस तरह श्रीमद्भागवत आदि पुराणों की कथा से यहाँ की कथा में कुछ भिन्नता होने के कारण इसे कल्पान्तर की कथा माननी चाहिये तथा इसकी प्रामाणिकता में कोई संशय नहीं रखना चाहिये। यहाँ भी श्रीमहादेवजी नारदजी से कहते हैं कि महामुने! जगत्प्रभु श्रीविष्णुभगवान् दूसरे कल्प में द्वापर के अन्त में पृथ्वीतल पर अपने पूर्ण अंश से श्रीकृष्ण के रूप में अवतीर्ण होंगे और अपनी लीला से इसी तरह से पृथ्वी के भार का हरण करेंगे। भगवती के दिव्यलोक का वर्णन — उनसठवें अध्याय में भगवती के परमधाम में स्थित अत्यन्त गुप्त, परम रम्य, अति सुन्दर तथा ब्रह्मा आदि देवेश्वरों द्वारा अत्यन्त कठिनाई से पहुँचा जा सकने वाले दिव्यलोक का वर्णन है। यह स्थान चारों ओर से आकर्षक तथा अमृतमय महासागर से घिरा है, बहुमूल्य रत्न – सम्पदाओं से सम्पन्न है तथा अग्नि के समान प्रभा वाला है। उसके मध्य में रत्ननिर्मित विशाल परकोटे (चहारदीवारी ) – से आवृत, चार द्वारों वाला, चारों दिशाओं में मोतियों की जालियों से अत्यन्त सुशोभित और चित्रमय ध्वजा- पताकाओं से अलंकृत एक सुरम्य पुर है । यह एक ऐसा स्थान है जहाँ जगदम्बा की आज्ञा के बिना देवता, राक्षस तथा ब्रह्मादि देवेश्वर भी प्रवेश नहीं पा सकते । इस पुर में विजया आदि चौंसठ योगिनियाँ परिचारिका के रूप में सदा कार्यरत रहती हैं । यहाँ दाहिने भाग में महाकाल सदाशिव विराजमान हैं, भगवती महाकाली उन सदाशिव के साथ प्रसन्न होकर सदा विहार करती रहती हैं। साठवें अध्याय में वृत्रासुर के संहार की कथा है। नारदजी के पूछने पर महादेवजी के द्वारा यह कथा कही गयी है। वृत्रासुरवधोपाख्यान — पूर्वकाल में ब्रह्माजी से वर प्राप्त कर वृत्रासुर सभी देवताओं को जीतकर स्वयं इन्द्र बन बैठा था तथा उसने तीनों लोकों को अपने अधिकार में कर लिया था। ब्रह्माजी ने दधीचि की हड्डी से बनाये गये महास्त्र से देवराज इन्द्र के द्वारा उसकी मृत्यु सुनिश्चित की थी । देवराज इन्द्र दधीचि के पास जाते हैं और उनसे सब समाचार बताकर वृत्रासुर के वध के लिये उनकी अस्थियों की याचना करते हैं । महर्षि दधीचि इन्द्र की प्रार्थना सहर्ष स्वीकार करते हुए योगबल से अपने शरीर का त्याग कर उन्हें अस्थियाँ प्रदान करते हैं। तत्पश्चात् देवेन्द्र उन हड्डियों से निर्मित अस्त्रों द्वारा वृत्रासुर को मार डालते हैं। महामुनि दधीचि अस्थियों (हड्डियों)- ) – का दान लेने के कारण उनका शरीर छूट जाने से इन्द्र को ब्रह्महत्या का दोष लगा, इससे वे विचलित हो जाते हैं तथा ब्रह्महत्या के दोष से मुक्त होने के लिये विविध उपाय करते हैं । सर्वप्रथम उन्होंने अश्वमेधयज्ञ किया, पर इससे भी ब्रह्महत्या से पूरी तरह निवृत्त न होने के कारण वे अपने गुरु महर्षि गौतम से उपाय पूछते हैं। महर्षि गौतम ने कहा कि यदि तुम इस ब्रह्महत्या से निवृत्त होना चाहते हो तो तुम्हें महापातकनाशिनी भगवती महाकाली के दर्शन करने चाहिये । ब्रह्मा, विष्णु, महेश – तीनों बहुत प्रयासपूर्वक इन्द्र को साथ लेकर भगवती के परमधाम में पहुँचते हैं, स्तवन करने पर उन्हें भगवती जगदम्बा का दर्शन प्राप्त होता है तथा भगवती के दर्शन के प्रभाव से इन्द्र ब्रह्महत्या के दोष से मुक्त हो जाते हैं । श्रीगङ्गाजी के प्रादुर्भाव का रहस्य — चौंसठवें अध्याय में गङ्गाजी के प्रादुर्भूत होने की कथा है। नारदजी के द्वारा जिज्ञासा करने पर महादेवजी कहते हैं कि पूर्वकाल में गङ्गा के विवाहमहोत्सव की बात सुनकर भगवान् विष्णु ने गङ्गासहित प्रसन्नचित्त भगवान् शंकर को देखने की इच्छा से अपनी वैकुण्ठपुरी में उन्हें सत्कारपूर्वक आमन्त्रित किया । एक सुन्दर रत्नसिंहासन पर महेश्वर शिव को विराजमान कर भगवान् विष्णु उनसे संगीत सुनाने का आग्रह करते हैं । विष्णु के आग्रह पर भगवान् शंकर ने अत्यन्त अद्भुत और मनोहर गायन प्रस्तुत किया। भगवान् शंकर के गीतों को सुनकर परमेश्वर भगवान् विष्णु तत्काल द्रवीभूत हो जाते हैं, वही ब्रह्मद्रव गङ्गाजी के रूप में ब्रह्माजी के कमण्डलु में आ जाता है। ब्रह्माजी गङ्गा की इस जलमयी मूर्ति को कमण्डलु में लेकर अपने धाम चले जाते हैं। आगे चलकर ये ही गङ्गा विष्णुपदी होकर लोक-कल्याण के लिये पृथ्वी पर अवतरित होती हैं । वामनावतार की कथा — पैंसठवें अध्याय में वामनावतार की कथा है। भगवान् विष्णु वामनरूप में अवतार लेते हैं तथा राजा बलि से तीन पग भूमि का दान माँगते हैं । शुक्राचार्य के मना करने पर भी राजा बलि तीन पग भूमि वामनभगवान् को देने का संकल्प कर लेते हैं। वामनभगवान् अपना विराट् स्वरूप बनाकर दो पग में समस्त लोकों को नाप लेते हैं। तीसरे पग से स्वयं बलि को नापकर उसे पाताललोक में जाने का आदेश देते हैं। उसी क्षण गङ्गाजी ब्रह्मा के कमण्डलु से निकलकर भगवान् के पादपद्मों में स्थित हो जाती हैं। इसी कारण गङ्गामाता ‘विष्णुपादाब्जसम्भूता’ कहलाती हैं। भगवान् विष्णु के चरणकमलों से निःसृत गङ्गाजी पुनः ब्रह्मा के कमण्डलु में आ गयीं । छाछठवें अध्याय में ब्रह्माजी ने भगवती गङ्गा की प्रार्थना की और गङ्गा माता ने राजा भगीरथ के पूर्वजों तथा अन्य प्राणियों के उद्धार के निमित्त तीनों लोकों में पधारने का आश्वासन दिया। इसके अनन्तर महाराज भगीरथ द्वारा गङ्गाजी को लाने के लिये भगवान् विष्णु, भगवती गङ्गा और भगवान् शिव की आराधना का वर्णन है । सड़सठवें अध्याय में राजा भगीरथ ने भगवान् सदाशिव की प्रसन्नता के लिये स्तवन करते हुए शिवसहस्रनामस्तोत्र का पाठ किया है । तदनन्तर महाराज भगीरथ को मनोभिलषित वर की प्राप्ति होती है । इस अध्याय के अन्त में शिवसहस्रनामस्तोत्र के पाठ का विशेष महत्त्व वर्णित है । गङ्गावतरण की कथा — अड़सठवें अध्याय में पुण्यात्मा राजा भगीरथ एक सुन्दर रथ में आरूढ़ होते हैं और शङ्ख बजाते हैं। उनकी शङ्खध्वनि वैकुण्ठधाम में सुनायी देने लगी, तब भगवती गङ्गा प्राकृतिक जलरूप में परिणत होकर भगवान् विष्णु के पदकमल से निकलकर कल-कल ध्वनि करती हुई स्वयं धारारूप में मेरु पर्वत शिखर पर गिरने लगीं । जलधारारूपी गङ्गा का दर्शन कर राजा कृतकृत्य हो गये और शङ्ख बजाना छोड़कर नाचने लगे। शङ्ख की ध्वनि शान्त हो जाने पर भगवती गङ्गा भी अपनी धारा को छोड़कर मेरु पर्वत के शिखर पर विश्राम करने लगीं। उसी समय पृथ्वीमाता त्रैलोक्यपावनी गङ्गा के समीप आकर भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति करते हुए कहने लगीं — ‘ देवि गङ्गे ! आप जगत् का पालन करनेवाली, ब्रह्मस्वरूपिणी, देवताओं की स्वामिनी और द्रवरूपिणी हैं। लोगों के उद्धार के लिये मुझ पर प्रसन्न होइये। जिनकी आपमें भक्ति है, प्रीति है — वे लोग कभी भी मृत्यु के वश में नहीं होते । देवि ! आपकी कृपा से उनको न अधःपतन का भय रहता है, न दुःखका ।’ इस प्रकार स्तुति करती हुई पृथ्वीमाता ने गङ्गाजी से यह प्रार्थना की कि समुद्रपर्यन्त चारों दिशाओं से चार धाराओं में प्रवाहित होकर मेरे इस बृहत् शरीर को पवित्र कीजिये । तदनन्तर सुरनदी गङ्गा की धारा स्वर्गलोक को आप्लावित करती हुई दक्षिणाभिमुखी होकर तीव्र वेग से कुछ दूर तक चली गयी। आगे-आगे मध्याह्न- सूर्य की भाँति कान्तिमान् राजा भगीरथ अद्वितीय रथपर शङ्ख बजाते हुए चल रहे थे। इसी बीच देवराज इन्द्र ने राजा भगीरथ से प्रार्थना करते हुए कहा कि ब्रह्मादि देवताओं के लिये दुर्लभ गङ्गा आपके द्वारा लायी जा रही हैं। आप उन सम्पूर्ण गङ्गाजी को पृथ्वी पर ही क्यों ले जा रहे हैं ? गङ्गा की एक निर्मल जलधारा स्वर्ग में भी स्थापित कीजिये । देवराज इन्द्र की इस बातको सुनकर राजा भगीरथ ने भी भगवती गङ्गा से अपनी एक निर्मल धारा के द्वारा देवताओं को पवित्र करने के लिये स्वर्ग में प्रतिष्ठित होने की प्रार्थना की। राजा की प्रार्थना सुनकर भगवती गङ्गा की एक पुण्य धारा ‘मन्दाकिनी’ के नाम से स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित हो गयी । इसके बाद राजा भगीरथ ने रथ पर सवार होकर शङ्ख बजाते हुए भगवती गङ्गा के आगे-आगे चलते हुए दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया । ज्येष्ठमास के शुक्लपक्ष में दशमी के दिन पतितपावनी भगवती गङ्गा का प्राकट्य पृथ्वीलोक में हुआ । श्रीमहादेवजी नारदजी से कहते हैं — गङ्गादशहरा की इस पुण्य तिथिपर जो गङ्गा में स्नान करता है, तप और दान करता है, उसके दस जन्मों में अर्जित पापों का नाश होता है तथा अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। इसलिये सभी पापों से मुक्ति चाहने वाले मनुष्यों को प्रयत्नपूर्वक गङ्गा में स्नान करना चाहिये । इस प्रकार उनहत्तरवें अध्याय में भगवती गङ्गा के प्राकट्य की कथा विस्तार से वर्णित है । सत्तरवें अध्याय में भगवती गङ्गा की धारा के विस्तार का वर्णन हुआ है। भगवती गङ्गा बहुत योजनों तक प्रवाहित होती हुई राजा भगीरथ के साथ हरिद्वार पहुँच गयीं। वहाँ सप्तर्षियों ने सातों दिशाओं में महाशङ्ख बजाया। उन शङ्ख-ध्वनियों को सुनकर गङ्गा का यह प्रवाह सात धाराओं में परिणत हो गया । इसीलिये हरिद्वार में सप्तधारा में स्नान की महिमा है। वहाँ से गङ्गाजी प्रयागराज आती हैं। वहाँ यमुना और सरस्वती के साथ संगम होता है । यह देवताओं के लिये भी दुर्लभ त्रिवेणीसङ्गम है, जहाँ स्नान-दान और तप करने का विशेष महत्त्व है । तत्पश्चात् भगवती गङ्गा कुछ दूर चलकर भगवान् शंकर के दर्शन के लिये काशी में उत्तराभिमुखी हो गयीं। काशी में जाने या अनजाने जो शरीर त्याग करता है, उसे भगवती गङ्गा शान्ति और मोक्ष प्रदान करती हैं। गङ्गाजी का काशी में आगमन — श्रीमहादेवजी नारदजी से कहते हैं — परम वेगवती गङ्गा जब काशी में पहुँच गयीं तब काशी की रक्षा में तत्पर कालभैरव हाथ में दण्ड उठाकर पूछने लगे — ‘तुम जलरूप में कौन हो ? और कहाँ से आकर काशी को जलप्लावित कर रही हो?” भगवती गङ्गाने कहा कि मैं भगवान् शंकर की अनुगामिनी द्रवमयी गङ्गा हूँ तथा भगवान् शंकर के मस्तक पर प्रतिष्ठित हूँ । यहाँ काशी में भगवान् विश्वेश्वर के दर्शन के लिये चली आयी हूँ। कालभैरव ! आप सुस्थिर रहें, मैं काशी को जलप्लावित नहीं करूँगी। यह सुनकर कालभैरव ने शान्तभाव से भगवती गङ्गा को नमस्कार किया । तदनन्तर भगवती गङ्गा कामाख्यादेवी के दर्शन के लिये पूर्वाभिमुखी हो गयीं। उसी समय ऋषि जह्नु ने शङ्ख बजाया, शङ्ख की ध्वनि सुनकर गङ्गाजी उनके आश्रम में आ गयीं । मुनिश्रेष्ठ जह्नु ने हठात् हाथ की अञ्जलि में भरकर सम्पूर्ण गङ्गा का पान कर लिया। इससे स्वर्गलोक में तथा पृथ्वीलोक में सभी देवताओं और मनुष्यों में हाहाकार मच गया। राजा भगीरथ भी अत्यन्त दुःखी हो गये । भगवती गङ्गा संकेत से राजा ने पुनः महाशङ्ख की ध्वनि की । महाशङ्ख की आवाज सुनकर महादेवी गङ्गा तीव्रधारा के साथ जह्नुमुनि की जङ्घा का भेदन कर बाहर निकल गयीं। यह देखकर जह्नुमुनि भी भगवती गङ्गा को नमस्कार कर उनकी स्तुति करने लगे । गङ्गाजी को ‘जाह्नवी’ नाम की प्राप्ति — जह्नुमुनि के द्वारा प्रार्थना करने पर भगवती गङ्गा ने मुनि से कहा — तात! मैं आपके शरीर से निकली हूँ, इसलिये आपकी पुत्री हूँ। आज से मैं ‘जाह्नवी’ के नाम से विख्यात होऊँगी। इस संसार में जो लोग मुझे जाह्नवी के नाम से एक बार भी स्मरण करेंगे, उनको न पाप लगेगा और न वे दुःखी होंगे। भगीरथ के पितरों का उद्धार — तत्पश्चात् भगवती गङ्गा दक्षिणदिशा की ओर प्रस्थान कर सगर के पुत्रों का अन्वेषण करती हुई समुद्र के निकट पहुँचकर सहस्रधाराओं में विस्तीर्ण हो गयीं तथा समुद्र के साथ संयुक्त होकर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक पाताल में कपिलमुनि के निकट पहुँच गयीं । कपिलमुनि ने भगवती गङ्गा का पदार्पण जानकर उनकी पूजा की। इसके बाद गङ्गाजी के पूछने पर कपिलमुनि ने भस्मरूपी सगरपुत्रों को दिखाया। भस्मसात् किये गये उन सगरपुत्रों को त्रिलोकगामिनी गङ्गा वेगपूर्वक बहाकर ले गयीं। उसी क्षण वे सगरपुत्र दिव्यरूपधारी होकर अलौकिक रथ में आरूढ़ हो ब्रह्मलोक को चले गये । पितरों के उद्धार को देखकर महाराज भगीरथ परम प्रसन्न होकर रथ में नृत्य करते हुए गङ्गाजी की जय-जयकार कर स्तुति करने लगे । गङ्गा-माहात्म्य — ७२ वें अध्याय में श्रीमहादेवजी मुनिश्रेष्ठ नारद को सावधान करते हुए द्रवरूपिणी गङ्गा के माहात्म्य का वर्णन करते हैं और कहते हैं कि जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर अवहेलनापूर्वक भी गङ्गा का स्मरण कर लेता है, तीनों लोकों में उसे किसी से भी अमङ्गल का भय नहीं रहता । उसके घर में सम्पदा विद्यमान रहती है, क्षणभर में उसकी सभी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं, जन्म-जन्मान्तर में किये गये पाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा उसे अक्षयपुण्यों की प्राप्ति होती है । जो पुण्य सभी तीर्थों में किये गये स्नान, सभी देवताओं के पूजन, सब प्रकार के यज्ञ, तप, दान, समस्त तीर्थों के दर्शन तथा परमेश्वर के वन्दन और स्तवन से नहीं होता है, वह पुण्य गङ्गा के स्मरणमात्र से हो जाता है — सर्वतीर्थकृतस्नानैः सर्वदेवाभिपूजनैः । सर्वयज्ञतपोदानैः सर्वतीर्थाभिदर्शनैः ॥ सर्वाभिवन्द्यपादाब्जवन्दनैः स्तवनैरपि । यथा न जायते पुण्यं तथा गङ्गास्मृतेर्भवेत् ॥ ( महाभागवत ७२ । ११-१२) जो विशुद्धात्मा मनुष्य गङ्गास्नानको उद्देश्य करके यात्रा करता है, उसे पग-पगपर अश्वमेध तथा वाजपेययज्ञका फल प्राप्त होता है । इस अध्यायके अन्तमें सर्वान्तक नामक एक अत्यन्त क्रूर व्याध की कथा श्रीमहादेवजी ने नारदजी को सुनायी है। इस कथा के अनुसार महान् पापी सर्वान्तक को मृत्यु के पूर्व गङ्गा दर्शन प्राप्त हो गये, जिसके कारण यमदूत उसे यमलोक नहीं ले जा सके, बल्कि शिवदूत उसे शिवलोक ले गये । इस सम्बन्ध में धर्मराज के पूछने पर चित्रगुप्त ने बताया कि भगवती गङ्गा के दर्शन के पुण्य से इस व्याध को शिवलोक की प्राप्ति हुई। यह सुनकर धर्मराज अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए और भगवती गङ्गा को प्रणामकर उन्होंने यमदूतों से कहा — जो लोग पतितपावनी भगवती गङ्गा का सांनिध्य प्राप्त कर उनका दर्शन प्राप्त करते हैं, वे मेरे द्वारा कभी दण्डित नहीं किये जाते हैं। यमदूत यह सुनकर अत्यन्त विस्मित हुए। ७३वें अध्याय में श्रीमहादेवजी गङ्गा की महिमा का वर्णन करते हुए नारदजी से कहते हैं कि मुनिश्रेष्ठ ! ब्रह्महत्या करने वाला, गो का वध करने वाला, सुरापान करने वाला तथा गुरुपत्नी के साथ व्यभिचार करनेवाला महापापी भी गङ्गा में स्नान कर लेने पर महादेवी गङ्गा की कृपा से घोर पापों से मुक्त हो जाता है । जो लोग एकाग्रचित्त होकर गङ्गा में पितरों का तर्पण करते हैं,उनके पितर निर्विकार ब्रह्मलोक पहुँच जाते हैं। गङ्गा के जल में पकाया हुआ अन्न देवताओं को भी दुर्लभ है। उस अन्न से श्राद्ध किये जाने पर पितरों को भी मुक्ति प्राप्त हो जाती है — संतर्पयन्ति गङ्गायां पितृन्ये तु समाहिताः । तेषां तु पितरो यान्ति ब्रह्मलोकमनामयम् ॥ गङ्गासलिलपक्वान्नं देवानामपि दुर्लभम् । तदन्नेन कृते श्राद्धे पितरो यान्ति निर्वृतिम् ॥ ( महाभागवत ७३ । १७, २३) इस अध्याय में कुछ विशेष तिथियों पर गङ्गास्नान का विशेष महत्त्व वर्णित है । जो मनुष्य तुला, मकर और मेष की संक्रान्तियों, माघमास के शुक्लपक्ष की सप्तमी, कार्तिक पूर्णिमा तथा चैत्रकृष्ण त्रयोदशी को अरुणोदयकाल में गङ्गास्नान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर जन्म-मरण के बन्धन से छूट जाता है । चन्द्र अथवा सूर्यग्रहण के अवसर पर यदि भाग्य से गङ्गा का सांनिध्य प्राप्त हो जाय तो उस समय गङ्गा में स्नान कर विधिपूर्वक पितृश्राद्ध करना चाहिये । वह श्राद्ध अक्षय, पितरों के लिये तृप्तिकारक, गया में किये गये सौ श्राद्धों से श्रेष्ठ तथा मुक्ति प्रदान करने वाला होता है । ग्रहण के पूरे काल में मन्त्र का जप करने से एक पुरश्चरण सम्पन्न हो जाता है, जो असाध्य कार्यों को भी सिद्ध कर देता है और वह साधक स्वयं भी शिवतुल्य हो जाता है । भूलकर भी मनुष्य को गङ्गा में मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिये । गङ्गा में मल-मूत्र का विसर्जन करने वाला जबतक चौदहों इन्द्रों की स्थिति (एक कल्पपर्यन्त) बनी रहती है, तबतक नरक में निवास करता है । गङ्गा सभी स्थानों पर सुलभ हैं, किंतु हरिद्वार, प्रयाग और गङ्गासागरसङ्गम — इन तीन स्थानों पर दुर्लभ हैं। अतः बुद्धिमान् व्यक्ति को वहाँ पर विशेष प्रयत्न के साथ स्नान, दान आदि कृत्यों को करना चाहिये। जो मनुष्य काशी में भक्तिभाव से विधिपूर्वक उत्तरवाहिनी गङ्गा में स्नान करता है, वह साक्षात् शिवत्व को प्राप्त हो जाता है। काशी में मणिकर्णिकार स्नान करने वाला व्यक्ति बिल्वपत्र आदि से भगवान् विश्वेश्वर का पूजन करके शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता है। मरे हुए प्राणी का मांस तथा हड्डियाँ किसी भी प्रकार गङ्गाजी में पड़ जायँ तो वह प्राणी स्वर्गलोक को प्राप्त हो जाता है। इस संदर्भ में धनाधिप नामक एक वैश्य की कथा भी यहाँ प्रस्तुत की गयी है । श्रीमहादेवजी कहते हैं कि वास्तव में गङ्गा ही परम बन्धु हैं, गङ्गा ही परम सुख हैं, गङ्गा ही परम धन हैं, गङ्गा ही परम गति हैं, गङ्गा ही परम मुक्ति हैं और गङ्गा ही परम तत्त्व हैं- जो लोग ऐसी भावना करते हैं, गङ्गाजी उनसे कभी भी दूर नहीं रहतीं। वह देश धन्य है जहाँ तीनों लोकों को पवित्र करने वाली गङ्गाजी बहती हैं, जिस देश में वे नहीं बहतीं वह प्रकृष्ट देश नहीं है — धन्यः स देशो यत्रास्ति गङ्गा त्रैलोक्यपावनी। गङ्गाहीनस्तु यो देशो न प्रदेशः स भण्यते ॥ गङ्गा नाम का स्मरण ही परम आनन्द है तथा गङ्गा के नाम का स्मरण ही परम तप है। जो मनुष्य ‘गङ्गा’ – इस नाम का नित्य स्मरण करता है, उसे यमराज का भय नहीं रहता । गङ्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र — ७५ वें अध्याय में भगवती गङ्गा के १०८ नामों का वर्णन करते हुए श्रीमहादेवजी नारदजी से कहते हैं — मुनिश्रेष्ठ! मैंने आपसे भगवती गङ्गा के नाम बता दिये। ये नाम समस्त पापों का विनाश करने वाले हैं । जो व्यक्ति प्रात:काल उठकर गङ्गा के इन परम पुण्य देनेवाले १०८ नामों को भक्तिपूर्वक पढ़ता है, उसके ब्रह्महत्या आदि पाप भी नष्ट हो जाते हैं। वह व्यक्ति आरोग्य तथा अतुलनीय सुख प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। आगे चलकर भगवान् शंकर नारदजी से कहते हैं कि दूसरे स्थान के गङ्गातीर्थ में निर्वाण ज्ञानपूर्वक होता है; किंतु मुनिश्रेष्ठ ! वाराणसी में भूमि पर अथवा जल में-कहीं भी ज्ञान या अज्ञानपूर्वक विज्ञान की प्राप्ति कही गयी है। यहाँ स्थल पर, गङ्गाजल में अथवा आकाश में ज्ञान या अज्ञान किसी भी तरह से शरीर का त्याग करके मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर लेता है । अतः ‘मृत्यु ने मेरे केशों को पकड़ रखा है’- ऐसा सोचकर मनुष्य को तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ, मनुष्यों के सभी कार्यों को सिद्ध करनेवाली, शक्तिस्वरूपिणी, मूर्तिमयी, जलमयी, लोगोंका उद्धार करने वाली, अविद्या का नाश करने वाली तथा ब्रह्मविद्या प्रदान करने वाली भगवती गङ्गा का आश्रय ग्रहण करना चाहिये — तीर्थश्रेष्ठतमां गङ्गां नृणां सर्वार्थसाधिनीम् । शक्तीं नीरमयीं मूर्तिं लोकनिस्तारकारिणीम् ॥ अविद्याछेदिनीं देवीं ब्रह्मविद्याप्रदायिनीम् । गृहीत इव केशेषु मृत्युना समुपाश्रयेत् ॥ (देवीपुराण ७५ । ३४-३५) कामरूपतीर्थ [कामाख्या ] – की महिमा — ७६ वें अध्याय में श्रीमहादेवजी नारदजी को कामरूपतीर्थ का माहात्म्य बताते हुए कहते हैं कि मृत्युलोक में प्रत्यक्ष फल देने वाला इससे उत्तम कोई तीर्थ नहीं है । यहाँ ‘पृथ्वी पर लोगों के कल्याण के लिये योनिरूप में महामाया आदिशक्ति परमेश्वरी अपनी इच्छा से विराजती हैं । मनुष्य योनिरूपा अतिगोपनीय भगवती कामाख्या का दर्शन — पूजन करके जीवन्मुक्त हो जाता है। कामाख्यादेवी की महिमा का विशेषरूप से वर्णन करते हुए इस अध्याय के अन्त में श्रीमहादेवजी कहते हैं — कामाख्या परमं तीर्थं कामाख्या परमं तपः । कामाख्या परमो धर्मः कामाख्या परमा गतिः ॥ कामाख्या परमं वित्तं कामाख्या परमं पदम् । विभाव्यैवं मुनिश्रेष्ठ न पुनर्जन्मभाग्भवेत् ॥ भगवती कामाख्या सर्वश्रेष्ठ तीर्थ हैं, वे सर्वश्रेष्ठ तपस्या हैं। उनका चिन्तन सर्वश्रेष्ठ धर्म है तथा वे भगवती कामाख्या परम गति हैं । भगवती कामाख्या सर्वश्रेष्ठ धन हैं, वे ही सर्वश्रेष्ठ पद हैं । मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार की भावना करने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता । ७७वें अध्याय में श्रीनारदजी जिज्ञासा करते हैं कि कामरूप महाक्षेत्र में दस महाविद्याओं की अधिष्ठात्री देवी महेश्वरी कौन हैं ? श्रीमहादेवजी कहते हैं — कामाख्या कालिका देवी स्वयं आदिशक्ति हैं। उन्हींके पास दस महाविद्याएँ भी स्थित हैं । कामाख्यापीठमें महाविद्याओं की स्थिति — श्रीमहादेवजी कहते हैं — नारद! जगन्माता भगवती के वामभाग में देवी तारा, दक्षिणभाग में भुवनेश्वरी, अग्निकोण में षोडशीविद्या, नैर्ऋत्यकोण में स्वयं भैरवी, वायव्यकोण में छिन्नमस्ता, पीठ की ओर बगलामुखी, ईशानकोण में सुन्दरी विद्या, ऊर्ध्वभाग में मातङ्गी तथा दक्षिणभाग में धूमावती विद्या प्रतिष्ठित हैं । इस प्रकार कामाख्या शक्तिपीठ की सभी दिशाओं में महाविद्याएँ प्रतिष्ठित हैं । उनके नीचे भस्माचल विग्रहरूप में स्वयं भगवान् शंकर विराजमान हैं । कामाख्याकवचकी महिमा — महादेवजी कहते हैं — आत्मरक्षा के लिये और मन्त्रसिद्धि के लिये जो व्यक्ति देवी भगवती के कवच का पाठ करता है, उसको कभी भय नहीं होता। यह कहते हुए भगवान् शंकर भगवती कामाख्या का परम गोपनीय तथा महाभय को दूर करने वाला सर्वमङ्गलदायक कवच सुनाते हैं। ७८वें अध्याय में वैशाखमास की तृतीया, शिवरात्रि तथा चैत्रशुक्लपक्ष की अष्टमी आदि प्रमुख तिथियों पर भगवती कामाख्यादेवी तथा सदाशिव भगवान् शंकर की उपासना की महिमा का विशेषरूप से वर्णन हुआ है। बिल्ववृक्ष की महिमा — बिल्वपत्र के महत्त्व का वर्णन करते हुए श्रीमहादेवजी कहते हैं कि हजारों स्वर्णपुष्पों के अर्पण करने से तथा मणि- माणिक्य एवं मूल्यवान् रत्नों के द्वारा मेरी पूजा करने से मुझे वैसी प्रसन्नता नहीं होती, जैसी बिल्वपत्र चढ़ाने से होती है ( महाभागवत ७८ । ८११/२) । इसी प्रकार बिल्ववृक्ष एवं इसके मूल की महिमा का वर्णन करते हुए महादेवजी कहते हैं कि बिल्ववृक्ष के नीचे सर्वश्रेष्ठ तीर्थों का निवास है । वहाँ भगवान् शंकर की पूजा करने से महापातकों का नाश हो जाता है — बिल्वमूले वसेत्तीर्थं सर्वश्रेष्ठतमं परम् । तत्र सम्पूजनं शम्भोर्महापातकनाशनम्॥ ( महाभागवत ७८ । १० ) गङ्गा, काशी, गया, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा तथा अन्य उत्तम तीर्थ बिल्ववृक्ष मूल में ही सदा संनिहित जानने चाहिये । वहाँ जो भी देवता तथा पितरोंसे सम्बन्धित कर्म विधिपूर्वक किये जाते हैं, वे निश्चित ही करोड़ों जन्मों तक अक्षय पुण्य के रूप में विद्यमान रहते हैं । ( महाभागवत) ७८ । १३ – १५ ) अन्त में श्रीमहादेवजी कहते हैं कि भगवती कामाख्या के शक्तिपीठ से बढ़कर महापुण्यफलप्रदायक कोई दूसरा स्थान नहीं है। चैत्रमास के शुक्लपक्ष में अष्टमी तिथि के दिन सर्वतीर्थस्वरूप ब्रह्मपुत्र नद में विधिवत् स्नानकर उसके जल से जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक भगवती कामाख्यादेवी की पूजा करता है, वह संसार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है । ( महाभागवत ७८ । २१-२२) देवी तुलसी तथा धात्रीवृक्ष का माहात्म्य — ७९वें अध्याय में नारदमुनि के जिज्ञासा करने पर भगवान् शंकर तुलसी की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि सम्पूर्ण लोकों की रक्षा करने वाले विश्वात्मा विश्वपालक भगवान् श्रीपुरुषोत्तम ही तुलसीवृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित हैं — तुलसीद्रुमरूपस्तु भगवान्पुरुषोत्तमः। सर्वलोकपरित्राता विश्वात्मा विश्वपालकः ॥ ( महाभागवत ७९।५) दर्शन, स्पर्श, नाम संकीर्तन, धारण तथा प्रदान करने से तुलसी मनुष्य के सभी पापों का सर्वदा नाश करती है। प्रातः उठकर स्नान करके जो व्यक्ति तुलसीवृक्ष का दर्शन करता है, उसे सभी तीर्थों के दर्शन करने का फल नि:संदेह प्राप्त होता है । जो व्यक्ति वैशाख, कार्तिक तथा माघमास में प्रात:काल स्नान कर सुरेश्वर भगवान् विष्णु को विधिपूर्वक तुलसीपत्र अर्पित करता है, उसका पुण्यफल अनन्त कहा गया है । ( महाभागवत ७९ । २२-२३) इस अध्याय के अन्त में तुलसी के साथ धात्री (आँवला)-वृक्ष तथा बिल्ववृक्ष की भी अतुलनीय महिमा बतायी गयी है। यदि तुलसीवृक्ष के पास धात्रीवृक्ष हो और उन दोनों के निकट बिल्ववृक्ष हो तो वह स्थान काशी के समान महातीर्थस्वरूप है । उस स्थानपर भगवान् शंकर, देवी भगवती तथा भगवान् विष्णु का भक्तिभाव से पूजन महापातकों का नाश करने वाला और पुण्यप्रद जानना चाहिये। मनुष्य वहाँ प्राण त्यागकर मोक्ष प्राप्त करता है तथा उस क्षेत्र के प्रभाव से वह पुनर्जन्म नहीं लेता। रुद्राक्षकी महिमा — ८० वें अध्याय में श्रीमहादेवजी रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि शरीर के अङ्गों में रुद्राक्ष धारण करने से यह मनुष्यों के सैकड़ों जन्मों के अर्जित पापसमूहों का नाश कर देता है — अङ्गेषु धारणात्सर्वदेहिनां पापसंचयम् । विनाशयति रुद्राक्षफलं जन्मशतार्जितम् ॥ ( महाभागवत ८० । २) महादेवजी कहते हैं – नारद! अभिमानपूर्वक अथवा अज्ञानसे गुरु, देवताओं, महात्माओं तथा द्विजातियों को प्रणाम न करने से उत्पन्न हुए करोड़ों जन्म का जो भी पाप संचित रहता है, वह पाप सिर पर रुद्राक्ष धारण करनेसे नष्ट हो जाता है । ( महाभागवत ८० । ३-४ ) लोभ के कारण, असत्य भाषण तथा उच्छिष्ट आदि पदार्थों के भक्षण और सुरापान से होनेवाले करोड़ों जन्मों के पाप कण्ठ में रुद्राक्ष धारण करने से नष्ट हो जाते हैं। (महाभागवत ८०।५) दूसरों के धन का हरण करने, दूसरों के शरीर पर अत्यधिक चोट पहुँचाने, अस्पृश्य पदार्थों का स्पर्श करने तथा निन्दित वस्तुओं को ग्रहण करने से करोड़ों पूर्वजन्मों के संचित पाप हाथ में रुद्राक्ष धारण करने से नष्ट हो जाते हैं। ( महाभागवत ८० । ६-७ ) निन्दनीय बातों को सुनने से पूर्वजन्म के संचित पाप कान में रुद्राक्ष धारण करने से नष्ट हो जाते हैं । परस्त्रीगमन, ब्रह्महत्या तथा वैदिक [नित्य] कर्मों के त्याग करने से बहुत जन्मों के संचित पाप शरीर में जहाँ-कहीं भी रुद्राक्ष धारण करने से नष्ट हो जाते हैं । ( महाभागवत ८०।८-९ ) भगवान् शंकर कहते हैं कि रुद्राक्ष धारण करने वाला मनुष्य देवताओं में पूज्यतम तथा साक्षात् महारुद्र की भाँति पृथ्वीतल पर विचरण करता है — रुद्राक्षधारी विहरेन्महारुद्र इवापरः । निर्भयो धरणीपृष्ठे देवपूज्यतमः स्वयम् ॥ ( महाभागवत ८० । ११ ) जिस मनुष्य के घर में एकमुखी रुद्राक्ष रहता है, उसके घर में भलीभाँति स्थिर होकर लक्ष्मी निवास करती हैं — एकवक्त्रं तु रुद्राक्षं गृहे यस्य हि वर्तते । तस्य गेहे वसेल्लक्ष्मीः सुस्थिरा मुनिसत्तम ॥ इस प्रकार ८०वें अध्याय में महापातकों के नाशक तथा कल्याणकारी रुद्राक्ष का संक्षेप में वर्णन हुआ है। पार्थिवलिङ्गार्चन से कलियुग का प्रभाव नहीं पड़ता — इस अन्तिम अध्याय में कलियुगमें मानवों के स्वभाव का वर्णन, भगवान् शंकर की उपासना से उनका परम कल्याण तथा शिवनाम संकीर्तन की महिमा का वर्णन समारोहपूर्वक हुआ है । श्रीमहादेवजी कलियुग का वर्णन करते हुए कहते हैं कि कलियुग में मनुष्य धर्महीन, निरन्तर पापों में रत तथा सत्य से विमुख हो जायँगे। वे नित्य परायी स्त्री में आसक्त, परनिन्दा तथा परद्रोहपरायण और दूसरे के धन का हरण करने वाले होंगे। कलियुग में वे सदैव गुरुभक्ति से हीन, गुरुनिन्दा में रत, अपने कर्तव्यकर्मों से विमुख तथा धन के लोभी होंगे। इतना ही नहीं, द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) शूद्र की तरह आचरण करने वाले, वेद, तप, योगाभ्यास से रहित तथा कामुक और उदरपूर्ति करने वाले होंगे। स्त्रियाँ भी कलियुग में पतिभक्ति से हीन, भ्रष्ट तथा अपनी सास से द्वेष रखने वाली होंगी। पृथ्वी में अन्न की उपज कम होगी, मनुष्य अन्नरहित होंगे। प्रजा से नित्य ‘कर’ ग्रहण करने में संलग्न राजा म्लेच्छरूप होंगे। सज्जनों की हानि तथा दुर्जनों की उन्नति होगी । इस प्रकार के घोर कलियुग में पापीजनों का कल्याण भगवान् शंकर की पूजा से हो जायगा। जो व्यक्ति शिवशक्तिस्वरूप भगवान् शंकर का पार्थिव लिङ्ग बनाकर संयतेन्द्रिय होकर उसका पूजन करता है, उसपर कलियुग का प्रभाव नहीं पड़ता। श्रीमहादेवजी नारदजी से कहते हैं कि मुनिश्रेष्ठ ! कलियुग में भगवान् शंकर के पूजन से सरल कल्याण का कोई दूसरा उपाय नहीं है। भगवान् शंकर की आराधना में मिट्टी के पार्थिव लिङ्ग का बिल्वपत्र से पूजन तथा बिना किसी प्रयासके गाल बजा देना सायुज्यपद प्रदान करने वाला है । इस प्रकार अकिंचन के एकमात्र देव विश्वनाथ ही हैं । अतः कलियुग में भगवान् शंकर की पूजा के समान कोई अन्य पूजा नहीं है । शिवाराधना की महिमा – कहते हैं कि भगवान् शंकर का प्रसाद सामान्यरूप से अग्राह्य होता है, परंतु स्वयम्भूलिङ्ग के निर्माल्य (प्रसाद) – की विशेष महिमा बतायी गयी है । इस प्रसाद को ग्रहण करने वाला व्यक्ति शिवरूप हो जाता है। साथ ही भगवान् विष्णु के प्रतिरूप शालग्राम से युक्त भगवान् का प्रसाद भी विशेष महिमायुक्त ग्राह्य है। आगे के श्लोकों में भगवान् शिव के समीप नृत्य, गीत, वाद्य और भजन आदि की विशेष महिमा का वर्णन किया गया है। महादेवजी कहते हैं – मुने! जो व्यक्ति भगवान् शंकर के समीप भक्तिपूर्वक नृत्य करता है, वह सुन्दर शिवलोक को प्राप्त कर चिरकालतं ” आनन्द प्राप्त करता है, जो मानव भगवान् शंकर के- समीप गान करता है तथा वाद्य बजाता है, वह भगवान् शंकर के समीप रहकर उनके प्रमथगणों का- स्वामी हो जाता है । ( महाभागवत ८१ । २४-२५) बिल्ववृक्ष के नीचे, भगवती गङ्गा में तथा काशी में भगवान् शंकर के पूजन का विशेष महत्त्व बताते हुए श्रीमहादेवजी कहते हैं कि जो व्यक्ति बिल्ववृक्ष के नीचे भक्तिपूर्वक भगवान् शंकर का पूजन करता है, वह निश्चितरूप से हजारों अश्वमेधयज्ञों का फल प्राप्त करता है। जो व्यक्ति भगवती गङ्गा में भगवान् शंकर का बिल्वपत्र से पूजन करता है, यदि वह सैकड़ों पाप भी किया हो तब भी उसे मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। जो श्रेष्ठ व्यक्ति काशी में अवहेलनापूर्वक भी भगवान् शंकर की पूजा करता है, उसे भी भगवान् महेश्वर मुक्ति प्रदान कर देते हैं। जो व्यक्ति भगवान् शम्भु के नामों को स्मरण करता हुआ वेद तथा शास्त्रों में बताये गये कर्म करता है, उसका किया हुआ कर्म अक्षय्यतम हो जाता है— संस्मृत्य शम्भोर्नामानि यत्किंचित्कुरुते नरः । कर्म वेदादिशास्त्रोक्तं तदक्षय्यतमं भवेत् ॥ ( महाभागवत ८१ । ३६) ‘शिव, विश्वनाथ, विश्वेश, हर, गौरीपते ! आप प्रसन्न हों’ – इस प्रकार जो व्यक्ति एक बार भी कहता है, उसकी रक्षा के लिये उसके पीछे-पीछे अपने गणों के साथ शीघ्र ही शूल लेकर स्वयं भगवान् शंकर दौड़ पड़ते हैं । महामते ! जो व्यक्ति शिवनामस्मरण करता हुआ शरीर त्याग देता है, यदि वह सैकड़ों पाप भी किया हो, साक्षात् महेशत्व को प्राप्त कर लेता है — शिवेति विश्वनाथेति विश्वेशेति हरेति च । गौरीपते प्रसीदेति यो नरो भाषते सकृत् ॥ तस्य संरक्षणार्थाय पृष्ठतः प्रमथैः सह । शूलमादाय वेगेन स्वयं धावति शूलभृत् ॥ शिवनाम स्मरन्मर्त्यस्त्यक्त्वा देहं महामते । साक्षान्महेशतां याति कृतपापशतोऽपि चेत्॥ ( महाभागवत ८१ । ३७–३९) देवीपुराण के पाठ अथवा श्रवण का फल- अन्त में श्रीमहादेवजी नारदजी से कहते हैं कि मुनिश्रेष्ठ ! जो आपने पूछा, वह महापाप को हरनेवाला, पुण्यदायक सभी प्रका के मङ्गल को प्रदान करनेवाला प्रसंग मैंने आपको बता दिया। जो श्रद्धावान् व्यक्ति इसको पढ़ता या सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर उत्तम पद प्राप्त करता है— इति ते कथितं सर्वं यत्पृष्टं मुनिसत्तम । महापापहरं पुण्यं सर्वमङ्गलदं परम् ॥ य इदं शृणुयान्मर्त्यः सश्रद्धः पठतेऽथवा । सर्वपापविनिर्मुक्तः प्रयाति परमं पदम् ॥ ( महाभागवत ८१ । ४१-४२) इस प्रकार यह देवीपुराण [महाभागवत] पूर्ण हुआ। श्रीव्यासजी महाराज कहते हैं — जैमिने! यहाँ देवर्षि नारद के द्वारा पूछनेपर स्वयं भगवान् शंकर ने जो बात कही है, वह महान् पुण्यप्रदायक और परम कल्याणकारी है। इस पुराणके श्रवणसे व्यक्ति करोड़ों जन्मके सञ्चित पापोंसे मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है – अप्यनेकशतं कोटिजन्मान्तरसुसंचितम् । एतदाकर्ण्य संत्यज्य पापं मोक्षमवाप्नुयात् ॥ ( महाभागवत ८१ । ४७) Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. 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