॥ श्रीराधायाः परिहार स्तोत्रम् ॥

श्री राधा का षडक्षर मन्त्र इस प्रकार है —
“ॐ राधायै स्वाहा ॥”

॥ श्रीराधाजी का सामवेदोक्त ध्यान ॥

“श्वेतचम्पकवर्णाभां कोटिचन्द्रसमप्रभाम् ।
शरत्पार्वणचन्द्रास्यां शरत्पङ्कजलोचनाम् ॥
सुश्रोणीं सुनितम्बां च पक्वबिम्बाधरां वराम् ॥
मुक्तापङक्तिविनिन्द्यैकदन्तपङक्तिमनोहराम् ।
ईषद्धास्यप्रसन्नास्या भक्तानुग्रहकातराम् ।
वह्निशुद्धाशुकाधानां रत्नमालाविभूषिताम् ॥

रत्नकेयूरवलयां । रत्नमञ्जीररञ्जिताम् ।
रत्नकुण्डलयुग्मेन विचित्रेण विराजिताम् ।
सूर्यप्रभाप्रतिकृतिगण्डस्थलविराजिताम् ॥
अमूल्यरत्ननिर्माणमैवेयकविभूषिताम् ।
सद्रत्नसारनिर्माणकिरीटमुकुटोज्ज्वलाम् ।
रत्नाङ्गुलीयसंयुक्तां रत्नपाशकशोभिताम् ॥
बिभ्रतीं कबरीभारं मालतीमाल्यभूषिताम् ।
रूपाधिष्ठातृदेवीं च गजेन्द्रमन्दगामिनीम् ॥
गोपीभिः सुप्रियाभिश्च सेवितां श्वेतचामरैः ।
कस्तूरीविन्दुभिः सार्द्धमधश्चन्दनबिन्दुना ॥
सिन्दूरबिन्दुना चारुसीमन्ताधःस्थलोज्ज्वलाम् ।
रासे रासेश्वरयुतां राधा रासेश्वरी भजे ॥”

(ब्रह्मवै॰पु॰ प्रकृतिखण्ड अ॰ ५५ । १०–१५, १९ )

श्रीराधा की अङ्गान्ति श्वेत चम्पा के समान गौर हैं । वे अपने अङ्गों में करोड़ों चन्द्रमाओं के समान मनोहर कान्ति धारण करती हैं । उनका मुख शरदऋतु की पूर्णिमा के चन्द्रमा को लज्जित करता है । दोनों नेत्र शरत्-काल के प्रफुल्ल कमलों की शोभा को छीने लेते हैं । उनके श्रोणिदेश एवं नितम्बभाग बहुत ही सुन्दर हैं । अधर पके हुए बिम्बफल की लाली धारण करते हैं । वे श्रेष्ठ सुन्दरी हैं । मुक्ता की पंक्तियों को तिरस्कृत करनेवाली दन्तपङक्ति उनके मुख की मनोहरताको बढ़ाती है । उनके वदन पर मन्द मुस्कानजनित प्रसन्नता खेलती रहती है । वे भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये व्याकुल रहती हैं । अग्निशुद्ध चिन्मय वस्त्र उनके श्रीअङ्ग को आच्छादित करते हैं । वे रत्नों के हार से विभूषित हैं । रत्नमय केयूर और कंगन धारण करती हैं । रत्नों के ही बने हुए मंजीर उनके पैरों की शोभा बढ़ाते हैं । रत्ननिर्मित विचित्र कुण्डल उनके दोनों कानों की श्रीवृद्धि करते हैं । सूर्यप्रभा की प्रतिमा-रूप कपोल-युगल से वे सुशोभित होती हैं । अमूल्य रत्नों के बने हुए कण्ठहार उनके ग्रीवा-प्रदेश को विभूषित करते हैं । उत्तम रत्नों के सारतत्त्व से निर्मित किरीट-मुकुट उनकी उज्ज्वलता को जाग्रत् किये रहते हैं । रत्नों की मुद्रिका और पाशक ( चेन या पासा आदि) उनकी शोभा बढ़ाते हैं । वे मालती के पुष्पों और हारों से अलंकृत केशपाश धारण करती हैं । वे रूप की अधिष्ठात्री देवी हैं और गजराज की भाँति मन्द गति से चलती है । जो उन्हें अत्यन्त प्यारी हैं, ऐसी गोप-किशोरियाँ श्वेत चँवर लेकर उनकी सेवा करती हैं । कस्तूरी की बेंदी, चन्दन के बिन्दु और सिन्दूर की टीकी से उनके मनोहर सीमन्त का निम्नभाग अत्यन्त उद्दीप्त दिखायी देता है । रास में रासेश्वर के सहित विराजित रासेश्वरी राधा का मैं भजन करता हूँ ।

इस प्रकार ध्यान कर मस्तक पर पुष्प अर्पित करके पुनः जगदम्बा श्रीराधा का चिन्तन करे और फूल चढ़ावे । पुनः ध्यान के पश्चात् सोलह उपचार अर्पित करे । आसन
वसन, पाद्य, अर्घ्य, गन्ध, अनुलेपन, धूप, दीप, सुन्दर पुष्प, स्नानीय, रत्नभूषण, विविध नैवेद्य, सुवासित ताम्बूल, जल, मधुपर्क तथा रत्नमयी शय्या — ये सोलह उपचार है । [आसन आदि के स्थान पर साधारण लोग पुष्प आदि का आसन तथा अन्य उपचार, जो सर्वसुलभ हैं, दे सकते हैं; परंतु मानसिक भावना द्वारा उसे रत्नसिंहासन आदि मानकर ही अर्पित करें । इस भावना के अनुसार ये पूजासम्बन्धी मन्त्र हैं । मानसिक भावना द्वारा उसम-से-उत्तम वरतु इष्टदेव को अर्पित की जा सकती है।] इन उपचारों के समर्पण के लिये जो सर्वसम्मत मन्त्र हैं, उन्हें सुनो —
(१) आसन —
रत्नसारविकारं च मिर्मित विश्वकर्मणा ।
वरं सिंहासनं रम्यं राधे पूजासु गृहयताम् ॥

राधे ! पूजा के अवसर पर विश्वकर्मा द्वारा रचित रमणीय श्रेष्ठ सिंहासन, जो रत्नसार का बना हुआ है, ग्रहण करो ।
(२) वसन —
अमूल्यरत्नखचितममूल्यं सूक्ष्ममेव च ।
वह्निशुद्धं निर्मलं च वसनं देवि गृह्यताम् ॥

देवि ! बहुमूल्य रत्न से जटित सूक्ष्म वस्त्र, जिसका मूल्य आँका नहीं जा सकता, आपकी सेवा में प्रस्तुत है । यह अग्नि से शुद्ध किया गया, चिन्मय एवं स्वभावतः निर्मल है । इसे स्वीकार करो ।
(३) पाद्य —
सद्रत्नसारपात्रस्थं सर्वतीर्थोदकं शुभम् ।
पादप्रक्षालनार्थ च राधे पाद्यं च गृह्यताम् ॥

राधे ! उत्तम रत्नसार द्वारा निर्मित पात्र में सम्पूर्ण तीर्थों का शुभ जल तुम्हारी सेवामें अर्पित किया गया है । तुम्हारे दोनों चरणों को पखारने के लिये यह पाद्य जल है । इसे ग्रहण करो ।
(४) अर्घ्य —
दक्षिणावर्तशङ्खस्थं सदूर्वापुष्पचन्दनम् ।
पूतं युक्तं तीर्थतोयै राधेऽर्घ्यं प्रतिगृह्यताम् ॥

राधे ! दक्षिणावर्त शङ्ख में रक्खा हुआ दूर्वा, पुष्प, चन्दन तथा तीर्थजल से युक्त यह पवित्र अर्घ्य प्रस्तुत है । इसे स्वीकार करो ।
(५) गन्
पार्थिवद्रव्यसम्भूतमतीवसुरभीकृतम् ।
मङ्गलार्ह पवित्रं च राधे गन्धं गृहाण मे ॥

राधे ! पार्थिव द्रव्यों से सम्भूत अत्यन्त सुगन्धित मङ्गलोपयोगी तथा पवित्र गन्ध मुझसे ग्रहण करो ।
(६) अनुलेपन ( चन्दन )
श्रीखण्डचूर्णं सुस्निग्धं कस्तुरीकुङ्कुमान्वितम् ।
सुगन्धयुक्तं देवेशि गृह्यतामनुलेपनम् ॥

देवेश्वरि । कस्तुरी, कुङ्कुम और सुगन्ध से युक्त यह सुस्निग्ध चन्दनचूर्ण अनुलेपन के रूप में तुम्हारे सामने प्रस्तुत है । इसे स्वीकार करो ।
(७) धूप
वृक्षनिर्याससंयुक्तं पार्थिवद्रब्यसंयुतम् ।
अग्निखण्डशिखाजातं धूपं देवि गृहाण मे ॥

देवि ! वृक्ष की गोंद ( गुग्गुल ) तथा पार्थिव द्रव्यों से संयुक्त यह धूप प्रज्वलित अग्निशिखा से निर्गत धूम के रूप में प्रस्तुत है । मेरी इस वस्तु को ग्रहण करो ।
(८) दीप
अन्धकारे भयहरममूल्यमणिशोभितम् ।
रत्नप्रदीपं शोभाढ्यं गृहाण परमेश्वरि ॥

परमेश्वरि अमूल्य रत्नों का बना हुआ यह परम उज्जवल शोभाशाली रत्नप्रदीप अन्धकार-भय को दूर करने वाला है । इसे स्वीकार करो ।
(९) पुष्प
पारिजातप्रसूनं च गन्धचन्दनचर्चितम् ।
अतीव शोभनं रम्यं गृह्यतां परमेश्वरि ॥

परमेश्वरि ! गन्ध और चन्दन से चर्चित, अत्यन्त शोभायमान यह रमणीय पारिजात-पुष्प ग्रहण करो ।
(१०) स्नानीय
सुगन्धामलकीचूर्णं सुस्निग्धं सुमनोहरम् ।
विष्णुतैलसमायुक्तं स्नांनीयं देवि गृह्यताम् ॥

देवि ! विष्णुतैल से युक्त यह अत्यन्त मनोहर एवं सुस्निग्ध सुगन्धित आँवले का चूर्ण सेवामें प्रस्तुत है । इस स्नानोपयोगी वस्तु को तुम स्वीकार करो ।
(११) भूषण
अमूल्यरत्ननिर्माण केयूरवलयादिकम् ।
शङ्खं सुशोभनं राधे गृह्यतां भूषणं मम ॥

राधे ! अमूल्य रत्नों के बने हुए केयूर, कङ्कण आदि आभूषणों को तथा परम शोभाशाली शङ्ख की चूड़ियों को मेरी ओर से ग्रहण करो ।
(१२) नैवेद्
कालदेशोद्भवं पक्वफलं च लड्डुकादिकम् ।
परमान्नं च मिष्टान्नं नैवेद्यं देवि गृह्यताम् ॥

देवि ! देश-काल के अनुसार उपलब्ध हुए पके हुए फल तथा लड्डू आदि उत्तम मिष्टान्न नैवेद्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है । इसे स्वीकार करो ।
(१३) ताम्बूल और (१४) जल
ताम्बूलं च वरं रम्यं कर्पूरादिसुवासितम् ।
सर्वभोगाधिकं स्वादु सलिलं देवि गृह्यताम् ॥

देवि ! कर्पूर आदि से सुवासित, सब भोगों से उत्कृष्ट, रमणीय एवं सुन्दर ताम्बूल तथा स्वादिष्ट जल ग्रहण करो ।
(१५) मधुपर्
अशनं रत्नपात्रस्थं सुस्वादु सुमनोहरम् ।
मया निवेदितं भक्त्या गृह्यतां परमेश्वरि ॥

वरमेश्वरि ! रत्नमय पात्र में रक्खा हुआ यह अशन (मधुपर्क) अत्यन्त स्वादिष्ट तथा परम मनोहर है । मैंने भक्तिभाव से इसे सेवामें समर्पित किया है । कृपया स्वीकार करो ।
(१६) शय्या
रत्नेन्द्रसारनिर्माणं वह्विशुद्धांशुकान्वितम् ।
पुष्पचन्दनचर्चाढ्यं पर्य्यङ्कं देवि गृह्यताम् ॥

देवि ! श्रेष्ठ रत्नों के सारभाग से निर्मित, अग्निशुद्ध निर्मल वस्त्र से आच्छादित तथा पुष्प और चन्दन से चर्चित यह शय्या प्रस्तुत है । इसे ग्रहण करो ।

इस प्रकार देवी श्रीराधा का सम्यक् पूजन करके उनके लिये तीन बार पुष्पाञ्जलि दे तथा देवी की आठ नायिकाओं का, जो उनकी परम प्रिया परिचारिकाएँ हैं, यत्नपूर्वक भक्तिभाव से पञ्चोपचार पूजन करे । प्रिये ! उनके पूजन का क्रम पूर्व आदि से आरम्भ करके दक्षिणावर्त बताया गया है । पूर्वदिशा में मालावती, अग्नि-कोण में माधवी, दक्षिण में रत्नमाला, नैऋत्यकोण में सुशीला, पश्चिम में शशिकला, वायव्यकोण में पारिजाता, उत्तर में पद्मावती तथा ईशानकोण में सुन्दरी की पूजा करे ।

व्रती पुरुष व्रतकाल में यूथिका ( जूही ), मालती और कमलों की माला चढ़ावे । तत्पश्चात् सामवेदोक्त रीति से “परिहार” – नामक स्तुति करे — परिहार के मन्त्र इस प्रकार हैं —

॥ श्रीराधायाः परिहार स्तोत्रम् ॥
त्वं देवी जगतां माता विष्णुमाया सनातनी ।
कृष्णप्राणाधिदेवी च कृष्णप्राणाधिका शुभा ॥

कृष्णप्रेममयी शक्तिः कृष्णसौभाग्यरूपिणी ।
कृष्णभक्तिप्रदे राधे नमस्ते मङ्गलप्रदे ॥

अद्य मे सफलं जन्म जीवनं सार्थकं मम ।
पूजितासि मया सा च या श्रीकृष्णेन पूजिता ॥

कृष्णवक्षसि या राधा सर्वसौभाग्यसंयुता ।
रासे रासेश्वरीरूपा वृन्दा वृन्दावने वने ॥

कृष्णप्रिया च गोलोके तुलसी कानने तु या ।
चम्पावती कृष्णसङ्गै क्रीड़ा चम्पककानने ॥

चन्द्रावली चन्द्रवने शतशृङ्गे सतीति च ।
विरजादर्पहन्त्री च विरजातटकानने ॥

पद्मावती पद्मवने कृष्णा कृष्णसरोवरे ।
भद्रा कुञ्जकुटीरे च काम्या च काम्यके वने ॥

वैकुण्ठे च महालक्ष्मीर्वाणी नारायणोरसि ।
क्षीरोदे सिन्धुकन्या च मर्त्ये लक्ष्मीहरिप्रिया ॥

सर्वस्वर्गे स्वर्गलक्ष्मीर्देवदुःखविनाशिनी ।
सनातनी विष्णुमाया दुर्गा शंकरवक्षसि ॥

सावित्री वेदमाता च कलया ब्रह्मवक्षसि ।
कलया धर्मपत्नी त्वं नरनारायणप्रसूः ॥

कलया तुलसी त्वं च गङ्गा भुवनपावनी ।
लोमकूपोद्भवा गोप्यः कलांशा रोहिणी रतिः ॥

कलाकलांशरूपा च शतरूपा शची दितिः ।
अदितिर्देवमाता च त्वकलांशा हरिप्रिया ॥

देव्यश्च मुनिपत्नयश्च त्वत्कलाकलया शुभे ।
कृष्णभक्तिं कृष्णदास्यं देहि मे कृष्णपूजिते ॥

एवं कृत्वा परीहारं स्तुत्वा च कवचं पठेत् ।
पुरा कृतं स्तोत्रमेतद् भक्तिदास्यप्रदं शुभम् ॥

॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते श्रीराधायाः परिहार स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
(ब्रह्मवै॰पु॰ प्रकृतिखण्ड अ॰ ५५ ॥ ४४-५७)

श्रीराधे ! तुम देवी हो । जगज्जननी सनातनी विष्णु-माया हो । श्रीकृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी तथा उन्हें प्राणों से भी अधिक प्यारी हो । शुभस्वरूपा हो । कृष्णप्रेममयी शक्ति तथा श्रीकृष्ण-सौभाग्यरूपिणी हो । श्रीकृष्ण की भक्ति प्रदान करनेवाली मङ्गलदायिनी राधे ! तुम्हें नमस्कार है । आज मेरा जन्म सफल है । आज मेरा जीवन सार्थक हुआ क्योंकि श्रीकृष्ण ने जिसकी पूजा की है, वही देवी आज मेरे द्वारा पूजित हुई । श्रीकृष्ण के वक्षःस्थल में जो सर्वसौभाग्य-शालिनी राधा हैं, वे ही रासमण्डल में रासेश्वरी, वृन्दावन में वृन्दा, गोलोक में कृष्णप्रिया, तुलसी-कानन में तुलसी, कृष्ण-संग में चम्पावती, चम्पक-कानन में क्रीडा, चन्द्रवन में चन्द्रावली, शतशृङ्ग पर्वत पर सती, विरजातटवर्ती कानन में विरजादर्प-हन्त्री, पद्मवन में पद्मावती, कृष्णसरोवर में कृष्णा, कुञ्जकुटीर में भद्रा, काम्यकवन में काम्या, वैकुण्ठ में महालक्ष्मी, नारायण के हृदय में वाणी, क्षीरसागर में सिन्धुकन्या, मर्त्यलोक में हरिप्रिया लक्ष्मी, सम्पूर्ण स्वर्ग में देव-दुःख-विनाशिनी स्वर्ग-लक्ष्मी तथा शंकर के वक्षःस्थल पर सनातनी विष्णुमाया दुर्गा हैं । वही अपनी कला द्वारा वेदमाता सावित्री होकर ब्रह्मवक्ष में विलास करती हैं । देवि राधे ! तुम्हीं अपनी कला से धर्म की पत्नी एवं मुनि नर-नारायण की जननी हो । तुम्हीं अपनी कला द्वारा तुलसी तथा भुवनपावनी गङ्गा हो । गोपियाँ तुम्हारे रोम-कूपों से प्रकट हुई हैं । रोहिणी तथा रति तुम्हारी कला की अंशस्वरूपा हैं । शतरूपा, शची और दिति तुम्हारी कला की कलांशरूपिणी हैं । देवमाता हरिप्रिया अदिति तुम्हारी कलांश-रूपा हैं । शुभे । देवाङ्गनाएँ और मुनिपत्नियाँ तुम्हारी कला की कलासे प्रकट हुई हैं । कृष्णपूजिते ! तुम मुझे श्रीकृष्ण की भक्ति और श्रीकृष्ण का दास्य प्रदान करो । इस प्रकार परिहार एवं स्तुति करके कवच का पाठ करे । यह प्राचीन शुभ स्तोत्र श्रीहरि की भक्ति एवं दास्य प्रदान करनेवाला है ।

इस प्रकार जो प्रतिदिन श्रीराधा की पूजा करता है, वह भारतवर्ष में साक्षात् विष्णु के समान है । जीवन्मुक्त एवं पावन है । उसे निभय ही गोलोक-धाम की प्राप्ति होती है । शिवे । जो प्रतिवर्ष कार्तिक की पूर्णिमा को इसी क्रम से राधा की पूजा करता है, वह राजसूययज्ञ के फल का भागी होता है । इह लोक में उत्तम ऐश्वर्य से सम्पन्न एवं पुण्यवान होता है और अन्त में सब पापों से मुक्त हो श्रीकृष्णधाम में जाता है । पार्वति ! आदिकाल में पहले श्रीकृष्ण ने इसी क्रम से वृन्दावन के रास-मण्डल में श्रीराधा की स्तुति एवं पूजा की थी । दूसरी बार तुम्हारे वर से वेदमाता सावित्री को पाकर सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने इसी क्रम से राधा का पूजन किया था । नारायण ने भी श्रीराधा-की आराधना करके महालक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा तथा भुवन-पावनी पराशक्ति तुलसी को प्राप्त किया था । क्षीरसागरशायी श्रीविष्णु ने राधा की आराधना करके ही सिन्धुसुता को प्राप्त किया था । पहले दक्षकन्या की मृत्यु हो जाने पर मैंने भी श्रीकृष्ण की आज्ञा से पुष्कर में श्रीराधा की पूजा की और उसके प्रभाव से तुम्हें प्राप्त किया । पतिव्रता श्रीराधा की पूजा करके उनके दिये हुए वर से ही कामदेव ने रति को, धर्मदेव ने सती-साध्वी मूर्ति को तथा देवताओं और मुनियों ने धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष को प्राप्त किया था । इस प्रकार मैंने श्रीराधा की पूजा का विधान बताया है ।

 

 

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