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श्री पीताम्बरा
जय जयति सुखदा, सिद्धिदा, सर्वार्थ-साधक शंकरी ।
स्वाहा, स्वधा, सिद्धा, शुभा, दुर्गा नमो सर्वेश्वरी ।।
जय सृष्टि-स्थिति-कारिणी-संहारिणी साध्या सुखी ।
शरणागतोऽहं त्राहि माम् माँ ! त्राहि माम् बगलामुखी ।। १

जय प्रकृति-पुरुषात्मक-जगत्-कारण-करणि आनन्दिनी ।
विद्या-अविद्या, सादि-कादि, अनादि ब्रह्म-स्वरुपिणी ।।
ऐश्वर्य-आत्मा-भाव-अष्टक अंग परमात्मा-सखी ।
शरणागतोऽहं त्राहि माम् माँ ! त्राहि माम् बगलामुखी ।। २
जय पञ्च-प्राण-प्रदा मुदा, प्रज्ञान-ब्रह्म-प्रकाशिका ।
संज्ञान-धृति-आज्ञान-मति-विज्ञान-शक्ति-विधायिका ।।
जय सप्त-व्याहृति-रुप, ब्रह्म-विभूति, सुन्दरि शशि-मुखी ।
शरणागतोऽहं त्राहि माम् माँ ! त्राहि माम् बगलामुखी ।। ३
आपत्ति-अम्बुधि अगम अम्ब ! अनाथ आश्रय-हीन मैं ।
पतवार श्वास-प्रश्वास क्षीण, सुषुप्त तन-मन दीन मैं ।।
षड्-रिपु-तरंगित पञ्च-विष-नद पञ्च-भय-भीता दुखी ।
शरणागतोऽहं त्राहि माम् माँ ! त्राहि माम् बगलामुखी ।। ४
जय परम ज्योतिर्मय शुभम्, ज्योति परा अपरा परा ।
नैका, एका, अनजा अजा, मन-वाक्-बुद्धि-अगोचरा ।।
पाशांकुशा, पीतासना, पीताम्बरा, पंकज-मुखी ।
शरणागतोऽहं त्राहि माम् माँ ! त्राहि माम् बगलामुखी ।। ५
भव-ताप-रति-गति मति-कुमति कर्तव्य-कानन अति घना ।
अज्ञान-दावानल प्रबल संकट निकल मन अनमना ।।
दुर्भाग्य-घन-दरि पीत-पट-विद्युत झरो करुणा-अमी ।
शरणागतोऽहं त्राहि माम् माँ ! त्राहि माम् बगलामुखी ।। ६
हिय पाप-पीत-पयोधि में, प्रगटो जननि ! पीताम्बरा ।
तन-मन-सकल व्याकुल-विकल त्रय-ताप-वायु-भयंकरा ।।
अन्तःकरण दस इन्द्रियाँ, मम देह देवि ! चतुर्दशी ।
शरणागतोऽहं त्राहि माम् माँ ! त्राहि माम् बगलामुखी ।। ७
दारिद्र्य-दग्ध-क्रिया, कुटिल-श्रद्धा, प्रज्वलित वासना ।
अभिमान-ग्रन्थित-भक्ति-हार, विकार-मय मम साधना ।।
अज्ञान-ध्यान, विचार-चञ्चल, वृत्ति वैभव-उन्मुखी ।
शरणागतोऽहं त्राहि माम् माँ ! त्राहि माम् बगलामुखी ।। ८

आठ ऐश्वर्य – १॰ अणीमा, २॰ महिमा, ३॰ गरिमा, ४॰ लघिमा, ५॰ प्राप्ति, ६॰ प्राकाम्य, ७॰ ईशित्व तथा ८॰ वशीत्व ।
आत्मा के आठ गुण – १॰ दया, २॰ क्षमा, ३॰ अनसूया, ४॰ शौच, ५॰ अनायास, ६॰ मंगल, ७॰ अकृपणता तथा ८॰ अस्पृहा ।
आठ भाव – १॰ धर्म, २॰ ज्ञान, ३॰ वैराग्य, ४॰ ऐश्वर्य, ५॰ अधर्म, ६॰ अज्ञान, ७॰ अवैराग्य (राग) तथा अनैश्वर्य ।
पञ्च-प्राण – १॰ प्राण, २॰ अपान, ३॰ समान, ४॰ व्यान तथा ५॰ उदान ।
पञ्च-विष – १॰ अविद्या, २॰ अस्मिता (अहंकार), ३॰ राग, ४॰ द्वेष तथा ५॰ अभिनिवेश ।
पञ्च-भय – १॰ गर्भ, २॰ जन्म, ३॰ रोग, ४॰ बुढ़ापा तथा मृत्यु का भय ।

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