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श्री बगला प्राकट्य

शिव के सम्मुख पार्वती, धर कर बोली माथ ।
बगला की उत्पत्ति की, कथा सुनाओ नाथ ! ।।
।। शिव उवाच ।।
कृत-युग के पहिले भुतल पर, वात-क्षोभ-हिन्दोल उठा ।
ध्रुव तारा हिल गया अचानक, जड़-चेतन भू डोल उठा ।।
प्रकृति पुरातन की शाखा के, नखत नीड़-सम टूट गए ।
सूरज-चन्दा की किस्मत को, तम-चर आकर लूट गए ।।

प्रलय-काल का दृश्य चतुर्दिक, दीख पड़ा जगती-तल में ।
डूब गए हिम-गिरि-सम पर्वत, महा-सागरों के जल में ।।
महाऽऽकाश के महा-उदर में, तत्त्व सभी लय होते थे ।
इन्द्रादिक सुर काँप-काँप कर, भय-विह्वल हो रोते थे ।।


करुणा से भर गए विष्णु भी, चिन्तन में लव-लीन हुए ।
तप करते वर्षों तक, नारायण अति क्षीण हुए ।।
सौराष्ट्र देश में निकट सरोवर, त्रिपुर-सुन्दरी प्रकट हुईं ।
मातृ-शक्ति को देख विष्णु की, आँखें श्रद्धा-विनत हुईं ।।


‘मा भैः’ कहकर त्रिपुरा ने, बगला का तब अवतार लिया ।
करुणा – पूरित नयना ने, जड़ – चेतन का उद्धार किया ।।
पीताम्बर-धारिणी माया की, यह विख्यात कहानी है ।
स्तम्भन-शक्ति-स्वरुपा बगला माता, स्वयं भवानी है ।।


मंगलवार चतुर्दशी, ‘वीर-रात्रि’ विख्यात ।
कुल-नक्षत्र मकार में, प्रकटीं बगला मात ।।

baglamukhi

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