December 25, 2015 | aspundir | 1 Comment श्रुतिका मांगलिक स्तवन नमस्ते गणपतये । त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि । त्वमेव केवलं कर्तासि । त्वमेव केवलं धर्तासि । त्वमेव केवलं हर्तासि । त्वमेव सर्व खल्विदं ब्रह्मासि । त्यं साक्षादात्मासि नित्यम् ।। गणपति को नमस्कार है, तुम्हीं प्रत्यक्ष तत्त्व हो, तुम्हीं केवल कर्ता, तुम्हीं केवल धारणकर्ता और तुम्हीं केचल संहारकर्ता हो, तुम्हीं केवल समस्त विश्वरूप ब्रह्म हो और तुम्हीं साक्षात् नित्य आत्मा हो । ( श्रीगणपत्यथर्वशीर्ष) नमो वातपतये नमो गणपतये नम: प्रमथपतये नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्ननाशिने शिवसुताय श्रीवरदमूर्तये नम: ।। व्रातपति को नमस्कार, गणपति को नमस्कार, प्रमथपति को नमस्कार, लम्बोदर, एकदन्त, विघ्ननाशक, शिवतनय श्रीवरदमूर्ति को नमस्कार है । ( श्रीगणपत्यथर्वशीर्ष) विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव । यद् भद्रं तत्र आ सुव ।। समस्त संसार को उत्पन्न करनेवाले-सृष्टि-पालन-संहार करनेवाले किंवा विश्वमें सर्वाधिक देदीप्यमान एवं जगत् को शुभकर्मों में प्रवृत्त करनेवाले हे परब्रह्मस्वरूप सविता देव ! आप हमारे सम्पूर्ण- आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक – दुरितों (बुराइयों-पापों) को हमसे दूर-बहुत दूर ले जाये, दूर करें; किंतु जो भद्र ( भला) है, कल्याण है, श्रेय है, मङ्गल है, उसे हमारे लिये – विश्व के हम सभी प्राणियों के लिये-चारों ओर से ( भलीभाँति) ले आयें, दें । (ऋग्वेद ५ । ८२ । ५) इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूढमस्य पाँ्सुरे स्वाहा ।। सर्वव्यापी परमात्मा विष्णुने इस जगत् को धारण किया है और वे ही पहले भूमि, दूसरे अन्तरिक्ष और तीसरे द्युलोक में तीन पदों को स्थापित करते हैं अर्थात् सर्वत्र व्याप्त हैं । इन विष्णुदेव में ही समस्त विश्व व्याप्त है । हम उनके निमित्त हवि प्रदान करते है । ( यजुर्वेद ५ । १५) नम: शम्भवाय च मयोभवाय च नम: शंकराय च मयस्कराय च नम: शिवाय च शिवतराय च ।। कल्याण एवं सुख के मूल स्रोत भगवान् शिव को नमस्कार है । कल्याण के विस्तार करनेवाले तथा सुख के विस्तार करनेवाले भगवान् शिव को नमस्कार हैं । मङ्गलस्वरूप और मङ्गलमयता की सीमा भगवान् शिवको नमस्कार है । (यजुर्वेद १६ । ४१) हृत्पुण्डरीकमध्यस्था प्रातःसूर्यसमप्रभाम् । पाशाङ्कुशधरां सौम्यां वरदाभयहस्तकाम् । त्रिनेत्रा रक्तवसना भक्तकामदुघां भजे ।। नमामि त्वां महादेवीं महाभयविनाशिनीम् । महादुर्गप्रशमनीं महाकारुण्यरूपिणीम् ।। हृत्कमल के मध्य रहनेवाली, प्रातःकालीन सूर्यके समान प्रभावाली, पाश और अंकुश धारण करनेवाली, मनोहर रूपधारिणी, वर और अभयमुद्रा धारण किये हुए हाथोंवाली, तीन नेत्रोंसे युक्त, रक्तवस्त्र परिधान करनेवाली और कामधैनु के समान भक्तों के मनोरथ पूर्ण करनेवाली देवीको मैं भजता हूँ । महाभयका नाश करनेवाली, महासंकट को शान्त करनेवाली और महान करुणाकी साक्षात् मूर्ति तुम महादेवीको मैं नमस्कार करता हूँ । (श्रीदेव्यथर्वशीर्ष) Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe
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