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॥ स्कन्द माता ॥

भगवान शंकर ने पार्वती को एक बार “काली” कह दिया जिससे वे रुष्ट होकर तप करने चली गई । ब्रह्मा के वरदान से गौराङ्ग होकर पुनः शिव के साथ रहने लगी एवं स्कन्द कुमार को जन्म दिया ।
ये स्कन्द माता अग्निमण्डल की देवता है, स्कन्द इनकी गोद में बैठे हैं, इनकी तीन आँखें तथा चार भुजायें हैं । ये शुभ्रवर्णा है तथा पद्म के आसन पर विराजमान है। इनका वाहन सिंह ही है।

मंत्र – ॐ ह्रीं सः स्कंदमात्र्यै नमः।

॥ ध्यान एवं प्रार्थना ॥
सिंहासनगता नित्यं पद्माञ्चित करद्वया ।
शुभदास्तु सदा देवीं स्कन्दमाता यशस्विनी ॥

॥ यंत्रार्चनम् ॥
कल्पभेद से अलग अलग नवदुर्गायें हुई है । यथा –
जया, विजया, भद्रा, भद्रकाली, सुमुखी, दुर्मुखी, प्रज्ञा, व्याघ्रमुखी एवं सिंहमुखी । ये अष्टदेवियाँ इसके अष्टदल की नायिका मानी जाती है ।

यन्त्र रचना – त्रिकोण, षटकोण, अष्टदल एवं भूपुर बनाकर यंत्रार्चन करें ।


ॐ मं मण्डूकादि पीठ देवतायै नमः । से योग पीठ देवता का पूजन करें । फिर पीठ शक्तियों का पूजन करें ।
यथा पूर्वादिक्रमेण – ॐ बलायै नमः। ॐ ज्येष्ठायै नमः। ॐ रोद्रयै नमः। ॐ काल्यै नमः। ॐ कलविकरण्यै नमः। ॐ बलप्रमथिन्यै नमः। ॐ सर्वभूतदमन्यै नमः। ॐ मनोन्मन्यै नमः।
बिन्दुमध्य में देवि का आवाहन करें ।
प्रथमावरणम् – (त्रिकोणे) ॐ सं सत्त्वाय नमः। ॐ रं रजसेनमः। ॐ तं तमसे नमः।
द्वितीयावरणम् – (षट्कोणे) ॐ हृदय शक्तये नमः। ॐ शिरशक्तये नमः। ॐ शिखाशक्तये नमः। ॐ कवच शक्तये नमः। ॐ नेत्रशक्तये नमः। ॐ अस्त्र शक्तये नमः।
पुन: षट्कोणे षड् कृत्तिका मातृकायै नमः।
तृतीयावरणम् – (अष्टदलेकेसरेषु) ॐ असितांग भैरवाय नमः। ॐ रुरु भैरवाय नमः। ॐ चण्ड भैरवाय नमः। ॐ कपाल भैरवाय नमः । ॐ क्रोध भैरवाय नमः । ॐ उन्मत्त भैरवाय नमः । ॐ भीषण भैरवाय नमः । ॐ संहार भैरवाय नमः।
चतुर्थावरणम् – (अष्टदलाने) ॐ जयायै नमः। ॐ विजयायै नमः। ॐ भद्रायै नमः। ॐ भद्रकाल्यै नमः। ॐ सुमुख्यै नमः। ॐ दुमुख्यै नमः। ॐ प्रज्ञायै नमः। ॐ व्याघ्रमुख्यै नमः।
पंचमावरणम् – (भूपुरे चतुद्वारे) उत्तरे – ॐ नंदिने नमः। पूर्वे – ॐ भृङ्गवे नमः । दक्षिणे – ॐ महाकालाय नमः। पश्चिमे – ॐ गणेशाय नमः।
षष्ठमावरणम् – (भूपुरे) – इन्द्रादि लोकपालों व सप्तमावरण में उनके वज्रादि आयुधों का पूजन करे।
पुत्र प्राप्ति हेतु स्कन्दमाता का पूजन करें। षष्ठी तिथि इनकी प्रिय तिथी है। मंत्र जप कर दशांश हवन बिल्व फल से करें।
 

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