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भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ८२
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – ८२
द्वादश रविवारों का वर्णन और नन्दादित्य – व्रत की विधि

दिण्डी ने ब्रह्माजी से पूछा – ब्रह्मन् ! जो मनुष्य आदित्यवार के दिन श्रद्धा – भक्तिसे सूर्यदेव का स्नान –दानादि कर पूजन करते हैं, उनको कौन-सा फल प्राप्त होता है ? और जिस वार के संयोग से सप्तमी तिथि ‘विजया’ कहलाती हैं, उसके माहात्म्य का पुनः वर्णन करें ।
ब्रह्माजी ने कहा – दिण्डिन् ! जो मनुष्य आदित्यवार को श्राद्ध करते हैं, वे सात जन्म तक नीरोग रहते हैं तथा जो नक्त-व्रत एवं आदित्यहृदय* का पाठ करते हैं वे रोग से मुक्त हो जाते हैं और सूर्यलोक में निवास करते हैं । उपवास रखकर जो महाश्वेता मन्त्र महाश्वेता-मन्त्र ‘गायत्री-मन्त्र’ का ही अपर पर्याय प्रतीत होता है । का जप करते हैं, वे मनोवाञ्छित फल को प्राप्त करते हैं । आदित्यवार के दिन महाश्वेता-मन्त्र तथा षडक्षर मन्त्र –‘ॐ खखोल्काय स्वाहा’ का जप करने से निःसंदेह सूर्यलोक की प्राप्ति होती है ।
om, ॐसूर्यनारायण के द्वादश वार इस प्रकार हैं – नन्द, भद्र, सौम्य, कामद, पुत्रद, जय, जयन्त, विजय, आदित्याभिमुख, हृदय, रोगहा एवं महाश्वेता-प्रिय । माघ शुक्ल पक्ष की षष्ठी की नन्दसंज्ञा है । उस दिन नक्त-व्रत करके घृत से सूर्यनारायण को स्नान कराना चाहिये तथा श्वेत चन्दन, अगस्त्य के पुष्प, गुग्गुल-धूप आदि से पूजन करके अपूप आदि का नैवेद्य समर्पित करना चाहिये । ब्राह्मणों अपूप देकर स्वयं भी मौन धारण कर भोजन करना चाहिये । गेहूँ के अथवा यव के चूर्ण में घृत तथा खाँड़ या शक्कर मिलाकर अपूप बनाना चाहिये और उसी का नैवेद्य सूर्यनारायण को निवेदित कर निम्न मन्त्र पढ़ते हुए ब्राह्मणों को नैवेद्य दे देना चाहिये ।
आदित्यतेजसोत्पन्नं राज्ञीकरविनिर्मितम् ।
श्रेयसे मम विप्र त्वं प्रतिक्षापूपमुत्तमम् ॥ (ब्राह्मपर्व ८२ । १८)

ब्राह्मण नैवेद्य ग्रहण कर ले, तदनन्तर उस नैवेद्य को निम्न मन्त्र पढ़ते हुए पूजक को दे –
कामदं सुखदं धर्म्यं धनदं पुत्रदं तथा ।
सदास्तु ते प्रतीच्छामि मण्डकं भास्करप्रियम् ।। (ब्राह्मपर्व ८२ । १९)
उपर्युक्त दोनों मन्त्र ग्रहण करने और समर्पित करने के लिये हैं । नन्दवार का यह विधान कल्याणकारी हैं । जो इस विधिसे सूर्यदेव की पूजा करता है, उसे सूर्यलोक की प्राप्ति होती है । उसकी संतति का कभी क्षय नहीं होता अर्थात् उसकी कुल-परम्परा पृथ्वी पर चलती रहती है तथा उसके वंश में दारिद्र्य एवं रोग भी नहीं होते । सूर्यलोक प्राप्त करने के पश्चात् पुनर्जन्म होनेपर वह पृथ्वी का राजा होता है । इस पूजन-विधान को पढने अथवा श्रवण करनेसे भी कल्याण होता है एवं दिव्य अचल लक्ष्मी की प्राप्ति होती है ।
(अध्याय ८२)* भविष्यपुराण के नाम से प्राप्त होने वाले स्तोत्रों में “श्रीआदित्यहृदय-स्तोत्र’ का अत्यधिक प्रचार है और इसकी प्रसिद्धि प्राचीन काल में इतनी अधिक थी कि महर्षि पराशर ने सूर्य की दशा-अन्तर्दशाओं में शान्ति के लिये सर्वत्र इसी स्तोत्र के जप का निर्देश दिया है । यह स्तोत्र प्रायः दो सौ श्लोकों में उपनिबद्ध है । इसके पाठ से मनुष्य दुःख-दारिद्र्य तथा कुष्ठ आदि असाध्य रोगों से मुक्त होकर महासिद्धि को प्राप्त कर लेता है । इस स्तोत्र में भगवान् सूर्य की महिमा, अर्घ्यदानविधि आदि का सुन्दर वर्णन है । इसका मण्डलाष्टक बड़ा ही सुन्दर है । इसके पाठ से भगवान् सूर्य में श्रद्धा उत्पन्न होती है । सूर्योपासना में इस ‘आदित्यहृदय’ का महत्त्वपूर्ण स्थान है । यह स्तोत्र वर्तमान उपलब्ध भविष्यपुराण में प्राप्त नहीं होता, इससे यह उसका खिल-भाग प्रतीत होता है । नारदपुराण में उपलब्ध भविष्यपुराण की सूची भी वर्तमान में उपलब्ध भविष्यपुराण में नहीं मिलती । कालक्रम से पुराणों का प्राचीन रुप न रह जाने से आज वह सब एकत्र उपलब्ध नहीं हो पाता, परंतु प्रायः सभी बड़े स्तोत्र-संग्रहों में यह ‘आदित्यहृदय-स्तोत्र’ संगृहीत है । वाल्मीकीय रामायण में अगस्त्यमुनि प्रोक्त ‘आदित्यहृदय-स्तोत्र‘ भविष्यपुराण के ‘आदित्यहृदय-स्तोत्र’ से भिन्न है ।)

श्रीपद्म-पुराणे श्रीकृष्णार्जुन-सम्वादे आदित्य-हृदय-स्तोत्रम्

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