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शत्रु को परास्त करने का मन्त्र

विधिः- उक्त मन्त्र के दो प्रकार के अनुष्ठान हैं —
१ छोटा,
२ बड़ा ।

छोटा अनुष्ठान १० दिनों का है, बड़ा अनुष्ठान एक वर्ष का । इन अनुष्ठानों से शत्रु का पराभव होता है । शत्रु को परास्त करने और उस पर विजय प्राप्त करने के लिए यह एक अमोघ शस्त्र है । शत्रु एक हो या अनेक हों — सभी पर पूरा प्रभाव होता है ।

मन्त्रः-

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छोटा अनुष्ठानः— ठीक मध्याह्न के समय (दिन के १२ बजे) किसी निर्जन जङ्गल में जाकर ऐसा स्थान चुने, जहाँ से लोगों का आना-जाना न होता हो । सिर नङ्गा कर खड़े होकर १००१ बार उक्त मन्त्र का जप करे । आँखें बन्द रखे । जप के बाद भूमि के ऊपर पश्चिम की ओर मुख करके बैठ जाए । फिर दाहिना हाथ उल्टा कर भूमि पर पाँच बार मारे और उक्त मन्त्र का उच्चारण करे । मन्त्र के उच्चारण के साथ शत्रु की आकृति का ध्यान करे । इसके बाद बायाँ हाथ उल्टा कर भूमि पर पुनः पाँच बार मारे और हर बार मन्त्र का उच्चारण करे । साथ ही शत्रु का ध्यान करे । १० दिन तक यह अनुष्ठान करे ।

इस प्रकार कुल १० हजार जप होगा । इससे मन्त्र सिद्ध हो जायगा । इस छोटे अनुष्ठान में किसी भी प्रकार के नियम-पालन की आवश्यकता नहीं है । जब कोई शत्रु परेशान करे, तब उसका ध्यान कर उक्त प्रयोग का पुनरावर्तन करे । अथवा पहले दाहिना हाथ उल्टा कर पाँच बार भूमि पर मारे, फिर बायाँ हाथ उल्टा कर पाँच बार भूमि पर मारे । साथ ही मन्त्र जप और शत्रु का ध्यान करता रहे । ऐसा करने से वह शत्रु परास्त होगा, साधक की विजय होगी ।

हाथ उल्टा करने पर हथेली आकाश की ओर होगी और हथेली के पीछे का भाग भूमि की ओर होगा ।

बड़ा अनुष्ठानः— यह चार चिल्लों में पूरा होता है । पहला ‘चिल्ला’ ४० दिनों में पूरा करे । बाद के ४० दिन छोड़ दे । फिर दूसरा चिल्ला करे और ४० दिन खाली छोड दे । अन्त में चौथा चिल्ला करे । उक्त चार अनुष्ठान ( चिल्ला ) हो जाने से साधक की जिह्वा ( वाणी) में ऐसा प्रभाव आ जाएगा कि चारों तरफ से गोलों या गोलियों की वर्षा हो और अनेक शत्रु साधक को मारने के लिए आ जाएं, तो साधक केवल एक बार उन सबको सम्बोधन कर दाहिने हाथ से सङ्केत करेगा और उक्त मन्त्र का उच्चारण करेगा, तब तुरन्त सब गोले-गोलियाँ बेकार हो जाएंगी और सभी शत्रु भाग जाएंगे । यही नहीं, इस मन्त्र का साधक यदि उड़ती हुई चीलों, कौओं या हिंसक पशु-पक्षियों की ओर हाथ से सङ्केत कर मन्त्र का उच्चारण करेगा, तो आकाश में उड़ते पक्षी नीचे भूमि पर गिर पड़ेंगे और जङ्गली पशु इत्यादि वश में आ जाएंगे ।

विशेषः—
१. चांद की १७ तारीख से पहला चिल्ला (अनुष्ठान) प्रारम्भ करे और ४० दिनों में उसे पूरा करे । बाद में ४० दिन ‘अनुष्ठान’ न करे ।
२. चाँद की १८ तारीख से दूसरा चिल्ला’ (अनुष्ठान) प्रारम्भ करे और ४० दिनों में उसे पूरा करे । बाद के ४० दिन न करे ।
३. चाँद की १९ तारीख से तीसरा ‘चिल्ला’ (अनुष्ठान) प्रारम्भ करे और ४० दिनों में उसे पूरा करे । बाद के ४० दिन न करे ।
४. चाँद की २० तारीख से चौथा अर्थात् अन्तिम चिल्ला’ (अनुष्ठान) प्रारम्भ करे । बाद के ४० दिन अनुष्ठान न करे ।
उक्त प्रकार ३२० दिनों का बड़ा अनुष्ठान होगा । इन सब दिनों में यम-नियम का पालन निम्न प्रकार करना चाहिए —
(१) मांस-मछली-अण्डा आदि आमिष भोजन का त्याग करे । निरामिष खानपान करे । सीधा-सादा सात्विक भोजन एक बार करे ।
(२) ब्रह्मचर्य का अखण्ड पालन करे ।
(३) सूर्योदय से सूर्यास्त तक मौन व्रत का पालन करे । न इशारे से, न जबान से या सचेत से, न और किसी भी तरह से किसी को कुछ बोलने या कुछ समझाने की मनाही है ।
(४) प्रत्येक ४० दिन की जप संख्या सवा लाख है । प्रति-दिन ३१२५ बार जप करे, तो ४० दिनों में सवा लाख जप होगा । ऐसा चार बार करना है । चिल्ले’ के बाद ४० दिनों में मन्त्र का स्मरण बराबर करता रहे ।
(५) प्रति – दिन जङ्गल में निर्जन स्थान में दोपहर के समय जाए और सिर नङ्गा करके खड़े रहकर मन्त्र का जप करे । संख्या ऊपर बताई है ।
(६) चार अनुष्ठानों व चार बिना अनुष्ठान के दिनों में कोई भी नियम यदि भङ्ग होगा, तो पूरी साधना निष्फल होगी । अतः पूरी सावधानी रखे ।
(७) फल-श्रुति के अनुसार शक्ति प्राप्त करना प्रयोगकर्ता पर — उसकी आन्तरिक सूझबूझ पर निर्भर है । इस प्रयोग से ऐसी अपूर्व शक्ति प्रगट होती है कि जिन्नात, हमजाद, यक्षिणी, भूत-प्रेत-प्रेतिनी व कर्ण-पिशाचिनी जैसी शक्तियाँ साधक के आसपास रहकर उसका मनचाहा कार्य करने में सहायिका होती हैं ।

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