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ऋग्वेदीया श्रीराधोपनिषत्
[ भगवत्स्वरूपा श्रीराधिकाजी की महिमा तथा उनका स्वरूप ]

“ओमथोर्ध्व मन्थिन ऋषयः सनकाद्या भगवन्तं हिरण्यगर्भमुपासित्वोचुः देव कः परमो देवः, का वा तच्छक्तयः, तासु च का वरीयसी भवतीति सृष्टिहेतुभूता च केति ।
स होवाच — हे पुत्रकाः शृणुतेदं ह वाव गुह्याद् गुह्यतरमप्रकाश्यं यस्मै कस्मै न देयम् ।
स्निग्धाय ब्रह्मवादिने गुरुभक्ताय देयमन्यथा दातुर्महदघम्भवतीति ।
कृष्णो ह वै हरिः परमो देवः षड्विधैश्वर्यपरिपूर्णो भगवान् गोपीगोपसेव्यो वृन्दाराधितो वृन्दावनाधिनाथः, स एक एवेश्वरः ।
तस्य ह वै द्वैततनुर्नारायणोऽखिलब्रह्माण्डाधिपतिरेकोंऽशः प्रकृतेः प्राचीनो नित्यः ।


एवं हि तस्य शक्तयस्त्वनेकधा ।
आह्लादिनीसंधिनीज्ञानेच्छाक्रियाद्या बहुविधाः शक्तयः ।
तास्वाह्लादिनी वरीयसी परमान्तरङ्गभूता राधा ।
कृष्णेन आराध्यत इति राधा, कृष्णं समाराधयति सदेति राधिका गान्धर्वेति व्यपदिश्यत इति ।
अस्या एव कायव्यूहरूपा गोप्यो महिष्यः श्रीश्चेति ।
येयं राधा यश्च कृष्णो रसाब्धिर्देहेनैकः क्रीडनार्थं द्विधाभूत् ।
एषा वै हरेः सर्वेश्वरी सर्वविद्या सनातनी कृष्णप्राणाधिदेवी चेति विविक्ते वेदाः स्तुवन्ति, यस्या गतिं ब्रह्मभागा वदन्ति ।
महिमास्याः स्वायुर्मानेनापि कालेन वक्तुं न चोत्सहे ।
सैव यस्य प्रसीदति तस्य करतलावकलितम्परमं धामेति ।
एतामवज्ञाय यः कृष्णमाराधयितुमिच्छति स मूढतमो मूढतमश्चेति ।
अथ हैतानि नामानि गायन्ति श्रुतयः —

राधा रासेश्वरी रम्या कृष्णमन्त्राधिदेवता ।
सर्वाद्या सर्ववन्द्या च वृन्दावनविहारिणी ॥
वृन्दाराध्या रमाशेषगोपीमण्डलपूजिता ।
सत्या सत्यपरा सत्यभामा श्रीकृष्णवल्लभा ॥
वृषभानुसुता गोपी मूलप्रकृतिरीश्वरी ।
गान्धर्वा राधिकारम्या रुक्मिणी परमेश्वरी ॥
परात्परतरा पूर्णा पूर्णचन्द्रनिभानना ।
भुक्तिमुक्तिप्रदा नित्यं भवव्याधिविनाशिनी ॥

इत्येतानि नामानि यः पठेत् स जीवन्मुक्तो भवति ।
इत्याह हिरण्यगर्भो भगवानिति ।
संधिनी तु धामभूषणशय्यासनादिमित्रभृत्यादिरूपेण परिणता मृत्युलोकावतरणकाले मातृपितृरूपेण चासीदित्यनेकावतारकारणा ।
ज्ञानशक्तिस्तु क्षेत्रज्ञशक्तिरिति ।
इच्छान्तर्भूता माया सत्त्वरजस्तमोमयी बहिरङ्गा जगत्कारणभूता सैवाविद्यारूपेण जीवबन्धनभूता ।
क्रियाशक्तिस्तु लीलाशक्तिरिति ।
य इमामुपनिषदमधीते सोऽव्रती व्रती भवति, स वायुपूतो भवति, स सर्वपूतो भवति, राधाकृष्णप्रियो भवति, स यावच्चक्षुः पातं पङ्क्तीः पुनाति ॐ तत्सत् ॥”
॥ इति ऋग्वेदीया श्रीराधोपनिषत् ॥

vadicjagat

हिन्दी भावार्थः—
ऊर्ध्वरेता बालब्रह्मचारी सनकादि ऋषियों ने भगवान ब्रह्माजी की उपासना करके उनसे पूछा — ‘हे देव ! परम देवता कौन हैं ?उनकी शक्तियाँ कौन-कौन हैं ?उन शक्तियों में सबसे श्रेष्ठ, सृष्टि की हेतुभूता कौन शक्ति है ?’

सनकादिक के प्रश्न को सुनकर श्रीब्रह्माजी बोले — ‘पुत्रो ! सुनो; यह गुह्यों में भी गुह्यतर-अत्यन्त गुप्त रहस्य है, जिस किसी के सामने प्रकट करने योग्य नहीं है और देने योग्य भी नहीं है । जिनके हृदय में रस हो, जो ब्रह्मवादी हों, गुरुभक्त हों उन्हीं को इसे बताना है; नहीं तो किसी अनधिकारी को देने से महापाप होगा ! भगवान् हरि श्रीकृष्ण ही परम देव हैं, वे (ऐश्वर्य, यश, श्री, धर्म, ज्ञान और वैराग्य — इन) छहों ऐश्वर्यों से परिपूर्ण भगवान् हैं । गोप-गोपियाँ उनका सेवन करती हैं, वृन्दा (तुलसीजी)
उनकी आराधना करती हैं, वे भगवान् ही वृन्दावन के स्वामी हैं, वे ही एकमात्र परमेश्वर हैं । उन्हीं के एक रूप हैं — अखिल ब्रह्माण्डों के अधिपति नारायण, जो उन्हीं के अंश हैं, वे प्रकृति से भी प्राचीन और नित्य हैं ।

उन श्रीकृष्ण की ह्लादिनी, संधिनी, ज्ञान, इच्छा, क्रिया आदि बहुत प्रकार की शक्तियाँ हैं । इनमें आह्लादिनी सबसे श्रेष्ठ है । यही परम अन्तरंगभूता ‘श्रीराधा’ हैं, जो श्रीकृष्ण के द्वारा आराधिता हैं । श्रीराधा भी श्रीकृष्ण का सदा समाराधन करती हैं, अतः वे ‘राधिका’ कहलाती हैं ।

इनको ‘गान्धर्वा’ भी कहते हैं । समस्त गोपियाँ, पटरानियाँ और लक्ष्मीजी इन्हीं की कायव्यूहरूपा हैं । ये श्रीराधा और रस-सागर श्रीकृष्ण एक ही शरीर हैं, लीला के लिये ये दो बन गये हैं । ये श्रीराधा भगवान् श्रीहरि की सम्पूर्ण ईश्वरी हैं. सम्पूर्ण सनातनी विद्या हैं, श्रीकृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं । एकान्त में चारों वेद इनकी स्तुति करते हैं । ब्रह्मवेत्ता जिनके परमपद का प्रतिपादन करते हैं । इनकी महिमा का मैं (ब्रह्मा) अपनी समस्त आयु में भी वर्णन नहीं कर सकता । जिन पर इनकी कृपा होती है, परमधाम उनके करतलगत हो जाता है । इन राधिका को न जानकर जो श्रीकृष्ण की आराधना करना चाहता है, वह मूढ़तम है — महामूर्ख है ।

श्रुतियाँ इनके इन नामों का गान करती हैं —
१. राधा, २. रासेश्वरी, ३. रम्या, ४. कृष्णमन्त्राधिदेवता, ५. सर्वाद्या, ६. सर्ववन्द्या, ७. वृन्दावनविहारिणी, ८, वृन्दाराध्या, ९, रमा, १०. अशेषगोपीमण्डलपूजिता, ११, सत्या, १२. सत्यपरा, १३. सत्यभामा, १४. श्रीकृष्णवल्लभा, १५, वृषभानुसुता, १६. गोपी, १७. मूलप्रकृति, १८. ईश्वरी, १९. गान्धर्वा, २०, राधिका, २१, आरम्या, २२. रुक्मिणी, २३. परमेश्वरी, २४. परात्परतरा, २५. पूर्णा, २६. पूर्णचन्द्रनिभानना, २७, भुक्तिमुक्तिप्रदा, २८. भवव्याधिविनाशिनी ॥
इन [अट्ठाईस] नामों का जो पाठ करता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है — ऐसा भगवान् श्रीब्रह्माजी ने कहा है ।

[यह तो आह्लादिनी शक्ति का वर्णन हुआ।] इनकी संधिनी शक्ति (श्रीवृन्दावन धाम, भूषण, शय्या तथा आसन आदि एवं मित्रसेवक आदि के रूप में परिणत होती है और इस मर्त्यलोक में अवतार लेने के समय वही माता-पिता के रूप में प्रकट होती है । यही अनेक अवतारों की कारणभूता है । ज्ञान शक्ति ही क्षेत्रज्ञशक्ति है । इच्छा शक्ति के अन्तर्भूत माया है । यह सत्त्व रज-तमोमयी है और बहिरंगा है, यही जगत् की कारणभूता है । यही अविद्यारूप से जीव के बन्धन में हेतु हैं । क्रियाशक्ति ही लीलाशक्ति है ।

जो इस उपनिषद् को पढ़ता है, वह अव्रती भी व्रती हो जाता है । वह वायु की भाँति पवित्र एवं वायु की भाँति पवित्र करनेवाला तथा सब ओर पवित्र एवं सबको पवित्र करनेवाला हो जाता है । वह श्रीराधा-कृष्ण को प्रिय होता है और जहाँ तक उसकी दृष्टि पड़ती है, वहाँ तकं सबको पवित्र कर देता है । ॐ तत्सत् ॥
॥ इस प्रकार ऋग्वेदीय श्रीराधोपनिषत् समाप्त हुआ ॥

उक्त लघुकाय ऋग्वेदीय राधोपनिषद् के अतिरिक्त एक अपेक्षाकृत विस्तृत अथर्ववेदीय राधोपनिषद् भी प्राप्त होता है, जो चार प्रपाठकों में विभक्त है । उसका पाठ इस उपनिषद् से सर्वथा भिन्न है ।

 

 

 

 

 

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