संकष्टनाशनस्तोत्रम् संकटनाश के लिये ॥ नारद उवाच ॥ प्रणम्यशिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् । भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये ॥ प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् । तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥ लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च । सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ॥ नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् । एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥ द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं… Read More


श्रीगणेशप्रिय चतुर्थी व्रत— माहात्म्य एवं व्रत विधि शिवपुराण की कथा है — श्वेतकल्प में जब भगवान् शंकर के अमोघ त्रिशूल से पार्वतीनन्दन दण्डपाणि का मस्तक कट गया, तब पुत्रवत्सला जगज्जननी शिवा अत्यन्त दुःखी हुईं। उन्होंने बहुत—सी शक्तियों को उत्पन्न किया और उन्हें प्रलय मचाने की आज्ञा दे दीं। उन परम तेजस्विनी शक्तियों ने सर्वत्र संहार… Read More


मुद्रा लक्षण – प्रकरणम् अर्चने जपकाले च ध्याने काम्ये च कर्मणि । स्नाने चावाहने शङ्खे प्रतिष्ठाया च रक्षणे ॥ १ ॥ नैवेद्ये च तान्यत्र तत्तत्कल्पप्रकाशिते । स्थाने मुद्राः प्रदष्टव्या स्वस्वलक्षणसंयुताः ॥ २ ॥ आवाहनादि मुद्रा नव साधारणी मताः । तथा षडङ्गमुद्राश्च सर्वमन्त्रेषु योजयेत् ॥ ३ ॥ एकोनविंशतिर्मुद्रा विष्णोरुक्ता मनीषिभिः । काममुद्रा परा ख्याता शिवस्य दश… Read More


शक्ति ध्यान और प्रार्थना सक्तिन की सक्ति सुचि सरिता सिंगार ही की सोभा सील सदन सनेह-रस भोरी हूँ । संतन की सुखद, सुलभ दीन-हीनन की अलभ अलेख कृपा करत करोरी तूँ ॥ रसिक रसेस कृष्णचंद्र अखिलेस रानी भाग सुख संपत्ति सुहाग मति मोरी तूँ । दारुन दरिद्र दुख दीरघ विदारन को दिल दरियाव देवि राधिका… Read More


शिवसंकल्पसूक्त (कल्याणसूक्त ) मनुष्य शरीर में प्रत्येक इन्द्रिय का अपना विशिष्ट महत्त्व है, परंतु मन का महत्त्व सर्वोपरि है; क्योंकि मन सभी को नियन्त्रित करने वाला, विलक्षण शक्तिसम्पन्न तथा सर्वाधिक प्रभावशाली है। इसकी गति सर्वत्र है, सभी कर्मेन्द्रियाँ – ज्ञानेन्द्रियाँ, सुख-दुःख मन के ही अधीन हैं। स्पष्ट है कि व्यक्ति का अभ्युदय मन के शुभ… Read More


श्रद्धासूक्त ऋग्वेद के दशम मण्डल के १५१वें सूक्त को ‘श्रद्धासूक्त’ कहते हैं। इसकी ऋषि का श्रद्धा कामायनी, देवता श्रद्धा तथा छन्द अनुष्टुप् है । प्रस्तुत सूक्त में श्रद्धा की महिमा वर्णित है। अग्नि, इन्द्र, वरुण-जैसे बड़े देवताओं तथा अन्य छोटे देवों में भेद नहीं है – यह इस सूक्त में बतलाया गया है। सभी यज्ञ-कर्म,… Read More


सौमनस्यसूक्त [ संज्ञानसूक्त ( क ) ] ऋग्वेद १० वें मण्डल का यह १९१ वाँ सूक्त ऋग्वेद का अन्तिम सूक्त है। इस सूक्त के ऋषि आङ्गिरस, पहले मन्त्र के देवता अग्नि तथा शेष तीनों मन्त्रों के संज्ञान देवता हैं। पहले, दूसरे तथा चौथे मन्त्रों का छन्द अनुष्टुप् तथा तीसरे मन्त्र का छन्द त्रिष्टुप् है। प्रस्तुत… Read More


विवाहसूक्त [ सोमसूर्यासूक्त ] ऋग्वेद के दशम मण्डल का ८५ वाँ सूक्त विवाहसूक्त कहलाता है। यह सोमसूर्यासूक्त भी कहलाता है। यह सूक्त बड़ा है और इसमें ४७ ऋचाएँ पठित हैं। इन ऋचाओं की द्रष्टा ऋषि का सावित्री सूर्या हैं। इस सूक्त में सूर्य, चन्द्र आदि देवों की भी स्तुतियाँ हैं । विवाहादि संस्कारों में इसके… Read More


अभयप्राप्तिसूक्त जीवन में सर्वाधिक प्रिय वस्तु अपने प्राण ही होते हैं और सबसे बड़ा भय भी प्राणों से रहित होने का-मृत्यु का ही होता है। इसी दृष्टि से मन्त्रद्रष्टा ऋषि ने सब प्रकार से भयमुक्त रहने के लिये प्राणों की प्रार्थना की है और कहा है-जिस प्रकार द्यौ, पृथिवी, अन्तरिक्ष, सूर्य, चन्द्रमा आदि सभी भयमुक्त… Read More


हिरण्यगर्भसूक्त हिरण्य को अग्नि का रेत कहते हैं। हिरण्यगर्भ अर्थात् सुवर्णगर्भ सृष्टि के आदि में स्वयं प्रकट होने वाला बृहदाकार- अण्डाकार तत्त्व है। यह सृष्टि का आदि अग्नि तत्त्व माना गया है। महासलिल में प्रकट हुए हिरण्यगर्भ की तीन गतियाँ बतायी गयी हैं- १- आपः (सलिल) में ऊर्मियों के उत्पन्न होने से समेषण हुआ। २-आगे… Read More