।। अथ नवार्ण-मन्त्र जप विधानम् ।। “मन्त्र-महोदधि” व “श्रीदुर्गाकल्पतरु” में मन्त्र का उद्धार इस प्रकार है – ‘अथ नवाक्षरं मन्त्रं वक्ष्ये चण्डी-प्रवृत्तये । वाङ्-माया मदनो दीर्घा लक्ष्मीस्तन्द्री श्रुतीन्दु-युक्। डायै सदृग्-जलं कूर्म-द्वयं झिण्टीश-संयुतं – “ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” ।’ “मन्त्र-महार्णव” में उद्धार में प्रणव का उल्लेख नहीं है, किन्तु स्पष्ट मन्त्र को “ॐ” सहित दिया… Read More


फूल-मोहिनी-मन्त्र मन्त्रः- “ॐ नमो आदेश गुरु को । एक फूल, फूल भर दोना, चौंसठ जोगनी ने मिल किया टोना । फूल-फूल वह फूल न जानी, हनुमन्त वीर घेर-घेर दे आनी । जो सूँघे इस फूल की बास, उसका जी प्राण रहे हमारी पास । सूती होय, तो जगाइ लाव, बैठी होय, तो उठाइ लाव ।… Read More


अर्श (बवासीर) नाशक शाबर मन्त्र मन्त्रः- “ॐ नमो आदेश गुरु को । खुरासान सूं आया वीर, छप्पन सूर संग में तीर । सीस कटै और खून न आवै, टपका एक पड़न नहिं पावै ।। खूनी बादी कैसी होय, करो दूर पीड़ा कम होय । शब्द साँचा पिण्ड काँचा, फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा ।।”… Read More


सर्व-सौभाग्य-दायक त्रिलौह मुद्रिका (अंगुठी) निर्माण विधिः ‘त्रिलौह-मुद्रिका’ का निर्माण स्वर्ण, रजत एवं ताम्र तारों को परस्पर लपेट कर और उन्हें रज्जु-वत् ऐंठ कर करना चाहिए। स्वर्ण, रजत और ताम्र का अनुपात 25:16:10 रखें। सामान्यतः सवा छः रत्ती स्वर्ण, चार रत्ती रजत तथा ढाई रत्ती ताम्र-तार समान लम्बाई में लेकर शुभ मुहूर्त में निर्माण करना चाहिए।… Read More


त्रिविध फल-दायक शाबर मन्त्र मन्त्रः- १॰ “या भुज ते महिषासुर मारि, औ शुम्भ-निशुम्भ दोऊ दल थम्बा । आरत हेतु पुकारत हौं, जाइ कहाँ बैठी जगदम्बा ?।। खड्ग टूटो कि खप्पर फूटो कि सिंह थको, तुमरो जगदम्बा ! आज तोहे माता भक्त शपथ, बिनु शान्ति दिए जनि सोवहु अम्बा ! ।।”… Read More


त्रि-विध-सिद्धि-प्रद मन्त्र मन्त्रः- “ॐ ह्रीं श्रीं ठं ठं ठं नमो भगवते मम सर्व-कार्याणि, साधय-साधय, मां रक्ष-रक्ष, शीघ्रं मां धनिनं कुरु-कुरु हुं फट्, श्रियं देहि, प्रज्ञां देहि, ममापत्तिं निवारय-निवारय स्वाहा ।”… Read More


त्रैलोक्य-विजय श्रीनृसिंह कवच ।। पूर्व-पीठिका : श्री नारद उवाच ।। इन्द्रादि-देव-वृन्देश ! ईश्वर, जगत्-पते ! महा-विष्णोर्नृसिंहस्य, कवचं ब्रूहि मे प्रभो ! यस्य प्रपठनाद् विद्वांस्त्रैलोक्य-विजयी भवेत् ।।१ ।। श्री प्रजापतिरुवाच ।।… Read More


दिव्य मातंगी कवच ।। श्रीदेव्युवाच ।। साधु-साधु महादेव ! कथयस्व सुरेश्वर ! मातंगी-कवचं दिव्यं, सर्व-सिद्धि-करं नृणाम् ।। श्री-देवी ने कहा – हे महादेव ! हे सुरेश्वर ! मनुष्यों को सर्व-सिद्धि-प्रद दिव्य मातंगी-कवच अति उत्तम है, उस कवच को मुझसे कहिए ।… Read More


तन्त्रोक्त कवच संस्कार ‘तन्त्रों’ के अनुसार ‘कवच’ को भोज-पत्र आदि पर लिखकर रक्त-सूत्र (लाल-रेशमी डोरे) या श्वेत-सूत्र (सफेद-रेशमी डोरे) से लपेटे । तब स्वर्ण, रजत, ताम्र आदि धातु की ‘गुटिका’ (ताबीज) में उसे स्थापित करे । इस गुटिका को शुभ दिन ‘पञ्च-गव्य’ और ‘पञ्चामृत’ द्वारा स्नान कराए। स्नान कराते समय मूल-मन्त्र का जप करता रहे।… Read More


त्रयोदश-श्लोकी चण्डी (त्रयोदश-श्लोकी दुर्गा) पूर्व-पीठिका ।। श्रीशिव उवाच ।। देवि ! त्वं भक्ति-सुलभे ! सर्व-कार्य-विधायिनी । कलौ हि कार्य-सिद्धयर्थमुपायं ब्रुहि यत्नतः ।। ।।श्रीदेवी उवाच ।। श्रृणु देव ! प्रवक्ष्यामि, कलौ सर्वेष्ट-साधनम् । मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बा-स्तुतिः प्रकाश्यते ।।… Read More