श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-103
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ तीनवाँ अध्याय
कमलासुर और मयूरेश का भीषण युद्ध, कमलासुर के रक्तबिन्दुओं से अनेक दैत्यों की उत्पत्ति, देवी सिद्धि-बुद्धि की सेना के सैनिकों द्वारा उन असुरों का भक्षण, मयूरेश्वर द्वारा कमलासुर का वध और मुनिगणों द्वारा की गयी मयूरेश्वर – स्तुति
अथः त्र्युत्तरशततमोऽध्यायः
कमलासुरवध

ब्रह्माजी बोले — उस दैत्य कमलासुर का वैसा उत्कट पराक्रम देखकर देव मयूरेश अत्यन्त शीघ्रता से उस दैत्य के सामने आये और बाणों की वर्षा से उस पर प्रहार करने लगे। दैत्य कमलासुर ने भी अपने अत्यन्त शीघ्रगामी बाणों से मयूरेश द्वारा की गयी बाणवृष्टि को रोका । यह देखकर गुणों को ग्रहण करने वालों में श्रेष्ठ भगवान् मयूरेश उसपर अत्यन्त सन्तुष्ट हुए ॥ १-२ ॥ उन्होंने उस दैत्य कमलासुर को अपने विराट् विश्वरूप का दर्शन कराया। उस समय कमलासुर ने दसों दिशाओं में मयूरेश को ही देखा ॥ ३ ॥ तब विस्मित होकर उसने अपने नेत्रों को बन्द कर लिया और अपने हृदयदेश में भी उन मयूरेश का ही दर्शन किया। तदनन्तर वह दैत्यराज कमलासुर ज्यों ही भागने के लिये उद्यत हुआ, त्यों ही देव मयूरेश ने उसकी चोटी पकड़कर पुनः उससे कहा — अरे दैत्येन्द्र ! ठहर जाओ, अपने द्वारा कहे गये उन प्रगल्भ वचनों का स्मरण करो और मुझसे युद्ध करो ॥ ४-५ ॥

तदनन्तर दैत्य कमलासुर ने उन मयूरेश को जब अकेला ही अपने सामने खड़ा देखा, तब वह महाबली एकाएक युद्ध के लिये दौड़ पड़ा और उसने महान् गर्जना की। तब दस आयुध धारण करने वाले देव विघ्नराज ने उस समय उससे युद्ध आरम्भ कर दिया और शस्त्रों के आघात से उसके शरीर को भेद डाला ॥ ६-७ ॥ उस कमलासुर के शरीर का रक्तबिन्दु जहाँ गिरता था, वहीं एक दूसरा असुर उत्पन्न हो जाता था, जो उसी कमलासुर के समान रूपवाला और उसी के समान बल- पराक्रम से सम्पन्न रहता था, इस प्रकार वहाँ असंख्य असुर उत्पन्न हो गये। विविध प्रकार के अस्त्रों तथा शस्त्रों से तथा बाणों की वर्षा से वे मयूरेश पर आघात करने लगे। तदनन्तर क्रोधाग्नि में जलते हुए देव मयूरेश को उन असुरों ने घेर लिया ॥ ८-९ ॥ उसी समय साढ़े तीन करोड़ सैनिकों के साथ देवी सिद्धि एवं बुद्धि अत्यन्त क्रुद्ध होकर वहाँ उपस्थित हुईं और फिर युद्ध होने लगा ॥ १० ॥

सिद्धि एवं बुद्धि नामक वे दोनों देवियाँ गणराज से कहने लगीं — क्षुधा को दूर करने वाला भक्ष्य पदार्थ हमें प्रदान कीजिये। तब देव गणराज बोले — आप लोग दैत्यों के रक्त से उत्पन्न उन बहुत-से असुरों का भक्षण करें। मयूरेश के द्वारा इस प्रकार कही गयी उन देवियों ने उस समय भूतगणों के साथ मिलकर शीघ्र ही उन सभी दैत्यों को खा डाला। देव मयूरेश ने अपने खड्ग से उस दैत्य कमलासुर पर प्रहार किया तो उसके रक्त से पुनः सैकड़ों दैत्य उत्पन्न हो गये ॥ ११-१३ ॥ तब देवियों ने तथा उनके सैनिकों ने कमलासुर के रक्त से उत्पन्न उन सभी दैत्यों का फिर भक्षण कर लिया तथा चारों ओर प्रवाहित रक्त को भी पी डाला । तदनन्तर अत्यन्त खिन्न हुए मयूरेश ने अत्यन्त शीघ्रगामी शूल को उठाकर उस दैत्य कमलासुर पर छोड़ा। वह शूल दसों दिशाओं को जलाता हुआ, पर्वतों को चूर-चूर करता हुआ, आकाश को निनादित करता हुआ और ग्रह- नक्षत्रों को गिराता हुआ बड़े ही वेग से गिरा और उसने उस दैत्य के शरीर का भेदन करते हुए उस शरीर के तीन टुकड़े कर डाले ॥ १४–१५१/२

उस कमलासुर दैत्य का कटा हुआ मस्तक भीमा नदी के दक्षिणी तट पर गिरा । उसके दोनों पैर कृष्णा नदी के उत्तरी तट पर गिरे और वक्ष:स्थल वहाँ पर गिरा, जहाँ गुणेश्वर खड़े थे । उस समय सभी लोग अत्यन्त प्रसन्न मन वाले हो गये और वे गुणेश्वर की जय-जयकार करने लगे ॥ १६-१७ ॥

वे बोले हे देव मयूरेश! आपकी जय हो, आपने दुष्टों का विनाश किया है। उसी समय अपने गणों से घिरे हुए गौरीपति भगवान् शंकर वहाँ आये ॥ १८ ॥ उनके साथ में गौतम आदि मुनिगण तथा देवी पार्वती भी थीं। उस समय सभी वाद्य बज रहे थे और आकाश से पुष्पवृष्टि हो रही थी । तब देवी पार्वती ने मयूरेश का आलिंगन कर अत्यन्त प्रसन्नता के साथ उन्हें अपना स्तनपान कराया और वे मुनिगण देवताओं के ईश उन मयूरेश्वर की स्तुति करने लगे ॥ १९-२० ॥

॥ मुनयः उवाच ॥
कमलाकान्तहृदय हृद्दयानन्दवर्धन ।
कमलाकान्तनमित कमलासुरनाशन ॥ २१ ॥
कमलासेवितपद जय त्वं कमलाप्रद ।
कमलासनवन्द्येश कमलाकरशीतल ॥ २२ ॥
कमलाङ्कसुपादाब्ज कमलाङ्कितसत्कर ।
कमलाबन्धुतिलक भक्तानां कमलाप्रद ॥ २३ ॥
कमलासूनुरिपुज कमलासूनुसुन्दर ।
कमलापितृरत्नानां मालया जय शोभित ॥ २४ ॥
कमलासुरबाणानां कमलेन निवारक ।
कमलाक्रान्तकमलकोशजित्करपङ्कज ॥ २५ ॥
कमलापतिहस्तस्थपद्मकोशनिभेक्षण ।
सर्वहृत्कमलानन्द जय सर्वाघनाशन ॥ २६ ॥
कमलाङ्कुशहस्ताब्ज जयविघ्नहराव्यय ।
त्वया विनिहतः पापः शक्रादिभयदो रिपुः ॥ २७ ॥
वज्रचक्राद्यभेद्यो यो मुनीनामपि भीतिदः ।

मुनिगण बोले लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु के हृदय में विराजमान होकर जो हृदय के आनन्द को बढ़ाने वाले हैं, रमाकान्त विष्णु के द्वारा वन्दित हैं, कमलासुर का विनाश करने वाले हैं, देवी लक्ष्मी के द्वारा जिनके चरण सदा सेवित होते रहते हैं, उन लक्ष्मी प्रदान करने वाले आप मयूरेश की जय हो ॥ २११/२

हे ईश! आप कमल के आसन पर विराजमान रहने वाले ब्रह्मा द्वारा सदा वन्दित होते रहते हैं, आप कमलाकर अर्थात् चन्द्रमा के समान शीतलता प्रदान करने वाले हैं, कमल के चिह्न से सुशोभित चरणकमलों वाले हैं, आपके श्रेष्ठ हाथ कमल के चिह्न से सुशोभित हैं, आप लक्ष्मी के भाई चन्द्रमा को तिलक के रूप में धारण करने वाले हैं, भक्तजनों को आप लक्ष्मी प्रदान करने वाले हैं, आप कमला लक्ष्मी के पुत्र कामदेव के शत्रु भगवान् शिव के पुत्र हैं, कमला के पुत्र कामदेव के समान सुन्दर हैं और लक्ष्मी के पिता समुद्र से उत्पन्न होने वाले रत्नों की माला से सुशोभित हैं, आपकी जय हो । कमलासुर के द्वारा चलाये गये बाणों का आपने अपने कमल के द्वारा निवारण किया है, कमलाकान्त श्रीहरि के द्वारा धारित कमल के कोश की शोभा को जीत लेने वाले करकमल से युक्त — आपकी जय हो ॥ २२-२५ ॥

सभी प्रकार के पापों का विनाश करने वाले हे मयूरेश! आप लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु के हाथ में विराजमान रहने वाले कमलकोश के समान नेत्रोंवाले हैं और सभी के हृदयरूपी कमल को आनन्द प्रदान करने वाले हैं, आपकी जय हो । हे देव ! आप अपने करकमलों में कमल तथा अंकुश धारण करते हैं, समस्त विघ्नों के विनाशक हैं और अविनाशी हैं, आपकी जय हो। आपने ऐसे पापरूपी शत्रु का विनाश किया है, जो इन्द्र आदि देवताओं को भी भय प्रदान करने वाला था; वज्र, चक्र आदि आयुधों से भी अभेद्य था और जो मुनिजनों को भी भयभीत करने वाला था ॥ २६–२७१/२

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार स्तुति करने के अनन्तर गौतम आदि महर्षियों ने उन मयूरेश्वर का पूजन किया। भगवान् शिव ने भी अपने दस हाथों के द्वारा मयूरेश का आलिंगनकर उनकी पूजा की। तदनन्तर वे मुनिगण मयूरेश्वर तथा भगवान् शिव से बोले — ॥ २८-२९ ॥

सभी देवताओं के साथ आप यहाँ पर भक्तों के मनोरथों को सिद्ध करते हुए तथा सभी विघ्नसमूहों का निवारण करते हुए सर्वदा के लिये विराजमान रहें ॥ ३० ॥

इस प्रकार से प्रार्थना किये गये लोककल्याण करने वाले वे दोनों भगवान् शंकर और देव मयूरेश्वर सभी देवताओं के साथ वहाँ पर स्थित हो गये। वे भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करने लगे और समस्त विघ्नसमूहों का निवारण करने लगे। तदनन्तर देवशिल्पी विश्वकर्मा ने वहाँ पर एक सुन्दर मन्दिर का निर्माण किया ॥ ३१-३२ ॥ वह मन्दिर असंख्य द्वारों, असंख्य शिखरों तथा असंख्य आश्चर्यों से समन्वित था । वहाँ पर एक सुन्दर नगर भी बस गया, जिसमें सभी प्रकार के लोग निवास करते थे ॥ ३३ ॥ महर्षियों ने उस नगर का नाम मयूरेशपुर रखा और नाना प्रकार के भवनों (आश्रमों) – में स्थित होकर मुनिजनों ने वहाँ पर तपस्या की ॥ ३४ ॥

भगवान् शिव भी देवी पार्वती तथा गणों के साथ वहाँ पर तप करने लगे। वे द्विजगण भगवान् शिव का भी ध्यान-पूजन तथा स्मरण वहाँ पर करने लगे । देव मयूरेश पहले की ही भाँति मुनिबालकों के साथ [वहाँ पर ] क्रीडा करने लगे ॥ ३५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘कमलासुर के वध का वर्णन’ नामक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०३ ॥

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