February 8, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -011 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ ग्यारहवाँ अध्याय भगवान् शिव तथा देवी पार्वती की विभूतियों का वर्णन एवं लिङ्गपूजन का माहात्म्य श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे एकादशोऽध्यायः शिवविभूतिमहिमवर्णनं सनत्कुमार बोले — परापरवेत्ताओं में श्रेष्ठ तथा परमेश्वर शिव को प्राप्त कर लेने वाले हे गणाधिप ! अब आप मुझसे शिव तथा पार्वती की विभूतियों का वर्णन करें ॥ १ ॥ नन्दिकेश्वर बोले — ब्रह्मा के पुत्रों में श्रेष्ठ तथा योगिप्रवर हे सनत्कुमार! मैं शिव तथा पार्वती की विभूतियों को आपको अवश्य बताऊँगा [ वे इस प्रकार हैं — ] ॥ २ ॥ वे परमात्मा शिव (कल्याणरूप) कहे गये हैं तथा वे पार्वती शिवा ( कल्याणरूपिणी) कही गयी हैं। विद्वानों ने शिव को ही ईश्वर कहा है तथा पार्वती को माया कहा है। द्विजों ने शंकर को पुरुष तथा गौरी को प्रकृति बताया है। शिव अर्थस्वरूप हैं तो पार्वती वाणी हैं और शिव दिन हैं तो पार्वती रात हैं । महादेव सप्ततन्तुरूप यज्ञ हैं और रुद्राणी को दक्षिणा कहा गया है। भगवान् शंकर आकाश हैं तथा शंकरप्रिया पार्वती पृथ्वी हैं। भगवान् रुद्र समुद्र हैं और गिरिराजकुमारी उसकी लहरें हैं। शूल को आयुधरूप में धारण करने वाले भगवान् शिव वृक्ष हैं तो हाथ में शूल धारण करने वाले शिव की प्रिया पार्वती उसकी लता हैं ॥ ३-६ ॥ शिव ब्रह्मा हैं तो शंकर की अर्धांगिनी पार्वती सावित्री हैं। महेश्वर शिव विष्णु हैं तो परमेश्वरी भवानी लक्ष्मी हैं । महादेव हाथ में वज्र धारण करने वाले इन्द्र हैं तो पर्वतराज की पुत्री उमा शची हैं। स्वयं रुद्र ही अग्नि हैं तो शिव की अर्धांगिनी पार्वती स्वाहा हैं। त्रिनेत्र शिव यम हैं तो गिरिपुत्री पार्वती उनकी प्रिया हैं। भगवान् रुद्र वरुण हैं तो समस्त अभीष्ट प्रदान करने वाली पार्वती उनकी भार्या हैं। बालचन्द्र को मस्तक पर धारण करने वाले शिव वायु हैं तो शिववल्लभा पार्वती उनकी भार्या हैं। मस्तक पर अर्धचन्द्र से सुशोभित होने वाले शिव कुबेर हैं तो साक्षात् शिवा कुबेर पत्नी ऋद्धि कही गयी हैं । अर्धचन्द्र से सुशोभित मस्तक वाले शिव चन्द्रमा हैं तो रुद्रप्रिया शिवा रोहिणी हैं। भगवान् शिव सूर्यदेव हैं तो उनकी प्रिया भगवती उमा [सूर्यपत्नी] सुवर्चला हैं ॥ ७–११ ॥ त्रिपुर का नाश करने वाले शिव कार्तिकेय हैं तो शिवप्रिया पार्वती [कार्तिकेय भार्या] देवसेना हैं । भगवान् महेश्वर दक्षप्रजापति हैं तो उमा को प्रसूति जानना चाहिये । शम्भु पुरुष नामक मनु हैं तो शिवप्रिया पार्वती शतरूपा हैं। परमेश्वर शिव को रुचिप्रजापति तथा भवानी को आकूति कहा गया है। भग के नेत्र को विनष्ट करने वाले शिव भृगु हैं तो त्रिनेत्र शिव की प्रिया पार्वती ख्याति हैं । भगवान् रुद्र मरीचि हैं तो प्रभु शिव की प्रिया पार्वती सम्भूति हैं । परमेश्वर को कवि (शुक्र) तथा भवानी को रुचिरा कहा गया है । गंगाधर शिव को अंगिरा के रूप में जानना चाहिये और साक्षात् उमा को स्मृति के रूप में समझना चाहिये । चन्द्रशेखर शंकरजी पुलस्त्य हैं तो पिनाकधारी शिव की प्रिया पार्वती प्रीति हैं । त्रिपुर का विध्वंस करने वाले शिव ऋषि पुलह हैं तो कालरिपु शिव की प्रिया उमा दया हैं। दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाले शिव क्रतु हैं तो सर्वव्यापी शिव की भार्या पार्वती सन्नति हैं। विद्वानों ने तीन नेत्रों वाले शिव को अत्रि तथा साक्षात् उमा को अनसूया कहा है। महेश्वर शिव को वसिष्ठ तथा श्रेष्ठ उमा को ऊर्जा कहा गया है । [ संसार के] सभी पुरुष शिवरूप हैं और सभी स्त्रियाँ महेश्वरी पार्वतीरूपा हैं ॥ १२–१८ ॥ पुल्लिंगशब्दवाची जो भी पदार्थ हैं, वे सब रूद्र कहे गये हैं; स्त्रीलिङ्गशब्दवाची जो भी हैं, वे सब गौरी की विभूतियाँ हैं। सभी स्त्री – पुरुष उन्हीं दोनों की ही विभूतियाँ कही गयी हैं। पदार्थों की जो-जो शक्तियाँ हैं, वे सब गौरी हैं — ऐसा विद्वानों ने कहा है । वह शक्ति विश्वेश्वरी देवी उमा ही हैं और वह समस्त पदार्थ भगवान् महेश्वर ही हैं। शक्ति से युक्त जो भी पदार्थ हैं, वे सब महेश्वर शिवरूप हैं। आठों प्रकृतियाँ पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार देवी की मूर्तियाँ हैं और सभी विकृतियाँ उनकी देहबद्ध विभूतियाँ कही गयी हैं। जैसे अग्नि में अनेक विस्फुलिङ्ग बताये गये हैं, वैसे ही द्वन्द्वसत्त्व को प्राप्त शिव में सभी जीव स्थित हैं। जीवों के समस्त शरीर गौरीरूप हैं और समस्त जीव शंकर के अंशरूप से उनमें व्यवस्थित हैं । श्रवण के योग्य सब कुछ उमा का रूप है और उसके श्रोता भगवान् महेश्वर हैं। शिव विषय का आस्वादकत्व धारण करते हैं और पार्वती विषयात्मकता धारण करती हैं। शंकरप्रिया पार्वती सृजन करने योग्य सभी वस्तुओं को धारण करती हैं और अर्धबालचन्द्र को मस्तक पर धारण करने वाले वे विश्वात्मा ही उनके स्रष्टा हैं। भुवनेश्वरी उमा समस्त प्रारूप दृश्य वस्तुओं को धारण करती हैं और चन्द्रखण्ड को सिर पर धारण करने वाले भगवान् विश्वेश्वर उनके द्रष्टा हैं ॥ १९-२७ ॥ सम्पूर्ण रस उमारूप है और शम्भु रस ग्रहण करने वाले हैं; सूँघने योग्य वस्तुसमूह उमारूप है और शिव उसके घ्राता हैं। महादेवी महेश्वरी मानने योग्य वस्तुता (भाव) – को धारण करती हैं और वे विश्वात्मा महादेव महेश्वर उसका मनन करने वाले हैं। शिवप्रिया पार्वती बोध करने योग्य वस्तुओं को धारण करती हैं और बालचन्द्र को मस्तक पर धारण करने वाले वे भगवान् शिव उनके बोद्धा हैं । उमा पीठाकृति (जलहरी) हैं और शिव [ उसमें स्थित ] लिङ्गरूप हैं। देवता तथा दानव लिङ्ग तथा वेदी के रूप में स्थापित करके प्रयत्नपूर्वक उनकी पूजा करते हैं । जो-जो पदार्थ पुरुषचिह्नों वाले हैं, वे शिव की विभूतियाँ हैं और जो-जो पदार्थ स्त्रीचिह्नों वाले हैं, वे गौरी की विभूतियाँ हैं। स्वर्ग से पाताललोक पर्यन्त आठ आवरणों वाले ब्रह्माण्ड पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, अहंकार, महत्-तत्त्व और प्रकृति में जो भी जानने योग्य है, वह सब उमारूप है और उसके ज्ञाता भगवान् महेश्वर हैं । त्रिपुर का नाश करने वाले शिव की प्रिया देवी [ पार्वती ] क्षेत्रता (लिङ्गशरीररूपता) – को धारण करती हैं और अन्धक का संहार करने वाले भगवान् [शिव] क्षेत्रज्ञत्व (जीवरूपत्व) – को धारण करते हैं ॥ २८-३४ ॥ [जिस राजा के राज्य में] लोग शिवलिङ्ग को छोड़कर अन्य देवताओं का पूजन करते हैं, वह राजा अपने देशसहित रौरव नरक में जाता है। जो राजा शिवभक्त नहीं है और अन्य देवताओं के प्रति भक्तिपरायण रहता है, वह वैसे ही है, जैसे कोई युवती अपने पति को छोड़कर परपुरुषों में आसक्ति रखती है। ब्रह्मा आदि सभी देवता, बड़े-बड़े ऐश्वर्यशाली राजा, मनुष्य तथा मुनिगण शिवलिङ्ग की ब्राह्मणपुत्र रावण का संहार करके समुद्र के तट पर विधिपूर्वक पूजा करते हैं । भगवान् विष्णु ने [रामावतार में] सेनासहित शिवलिङ्ग की स्थापना की थी ॥ ३५-३८ ॥ हजारों पाप करके तथा सैकड़ों विप्रों का वध करके भी जो भक्तिपूर्वक रुद्र का आश्रय ग्रहण करता है, वह मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है । समस्त लोक लिङ्गमय है और सभी लिङ्ग में ही स्थित हैं; अत: यदि कोई शाश्वत पद की इच्छा रखता हो, तो उसे शिवलिङ्ग का पूजन अवश्य करना चाहिये। अपने कल्याण की कामना करने वाले मनुष्यों को सर्वरूप में स्थित इन दोनों (शिव-पार्वती) का सर्वदा पूजन, नमस्कार और चिन्तन करना चाहिये ॥ ३९-४१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत उत्तरभाग में ‘शिवविभूतिमहिमावर्णन’ नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe