श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -102
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
एक सौ दोवाँ अध्याय
पार्वती की तपस्या से प्रसन्न हो भगवान् शिव का ब्राह्मणवेष में आकर उन्हें वरदान देना, हिमालय द्वारा पार्वती स्वयंवर की घोषणा, स्वयंवर में भगवान् शिव का बालरूप में उपस्थित होकर सभी को मोहित करना, पुनः ब्रह्मा की स्तुति से प्रसन्न हो महेश्वर का मनोहर वर रूप धारणकर सबको आनन्दित करना
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे द्व्यधिकशततमोऽध्यायः
उमास्वयंवर

सूतजी बोले — [हे ऋषियो ! ] भगवान् वृषभध्वज शर्व पार्वती की तपस्या से प्रसन्न हो गये। इसके बाद ब्रह्माजी के कहने से भगवान् भव ने सभी आश्रमों के हित लिये और क्रीड़ा करने के लिये विधिपूर्वक पार्वती के साथ विवाह किया ॥ १-२ ॥ उस समय कमल से उत्पन्न ब्रह्माजी स्वयं मरीचि आदि महर्षियों के साथ महादेवी पार्वती के तपोवन में गये थे। उन्होंने जगत् की निमित्तकारण स्वरूपा उन देवी की प्रदक्षिणा करके कहा — ‘हे शैलजे ! आप तपस्या से लोकों को किसलिये संतप्त कर रही हैं ? हे मातः ! आपने ही सम्पूर्ण जगत् का सृजन किया है, अतः आप इसका विनाश मत कीजिये; आप अपने तेज से इन समस्त लोकोंको धारण कीजिये । श्रीमान् शिवजी सभी देवताओं के ईश्वर तथा सभी लोकों के स्वामी हैं। हम लोग जिन देवाधिदेव के सेवक कहे जाते हैं, वे परमेश्वर ही स्वयं आपका वरण करेंगे। हे वरदे ! जिन्होंने आपका सृजन किया है और हे अम्बिके ! जो आपके बिना रह नहीं सकते; वे [शिवजी] आपके पति होंगे; इसमें सन्देह नहीं है ‘ ॥ ३-७१/२

ऐसा कहकर उन पार्वती को नमस्कार करके बार- बार उनकी ओर देखकर पितामह (ब्रह्मा) – के चले जाने पर भगवान् परमेश्वर [ शिव] अनुग्रह करने के लिये ब्राह्मण के रूप में उस आश्रम में गये ॥ ८-९ ॥ द्विजरूप से उपस्थित महादेव को देखकर उन पार्वती ने उनकी दीप्ति आदि के द्वारा उन्हें भगवान् वृषभध्वज जानकर प्रणाम किया। ब्राह्मण के छद्मरूप में आये हुए वरदाता महादेव की पूजा करके पार्वती ने उन परमेशान परमेश्वर की स्तुति की ॥ १०-११ ॥ तदनन्तर देवी पर अनुग्रह करके शिवजी हँसते हुए बोले — ‘हे महादेवि ! सभी देवताओं का स्वामी मैं शिव महात्मा हिमालय के कुलधर्म की परम्परा की रक्षा करता हुआ क्रीड़ा करने के लिये सज्जनों के मध्य तुम्हारे दिव्य तथा अतिसुन्दर स्वयंवर में सौम्य रूप धारण करके तुमसे मिलूँगा’ ॥ १२-१३१/२

ऐसा कह करके उन्हें दिव्य दृष्टि से देखकर शिवजी अपने अभीष्ट (प्रिय) दिव्य लोक को चले गये और इसके बाद वे भी चली गयीं। तब देवी को देखकर मैनासहित हिमालय साक्षात् तपस्विनी अपनी पुत्री का आलिंगन करके, उनका मस्तक सूँघकर और उनकी पूजा करके अत्यन्त प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् देवाधिदेव [शिव] – द्वारा अपनी पुत्री को दिये गये संकेत को न जानते हुए भी हिमालय ने सभी लोकों में देवी के स्वयंवर की घोषणा कर दी ॥ १४–१६१/२

इसके अनन्तर ब्रह्मा, साक्षात् भगवान् जनार्दन विष्णु, ऐश्वर्यशाली इन्द्र, अग्निदेव, सूर्य, भग, त्वष्टा, अर्यमा, विवस्वान्, यम, वरुण, वायु, सोम, ईशान, सभी रुद्र, मुनिगण, दोनों अश्विनीकुमार, बारहों आदित्य, समस्त गन्धर्व, गरुड़, यक्ष, सिद्ध, साध्य, दैत्य, किंपुरुष, उरग, समुद्र, नद, वेद, मन्त्र, स्तोत्र आदि, क्षण, नाग, पर्वत, सभी यज्ञ, सूर्य आदि ग्रह, वसु, रुद्र तथा आदित्य आदि तैंतीस देवताओं के भेद – प्रभेदरूप ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव ये तीन तीन सौ तथा तीन हजार तीन देवता तथा अन्य बहुत-से देवता पर्वतराज की पुत्री के अत्युत्तम स्वयंवर में पहुँचे ॥ १७–२२ ॥

तदनन्तर पार्वती देवी स्वर्णनिर्मित तथा सभी रत्नों से अलंकृत सर्वतोभद्र नामक उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर नृत्य करती हुई अप्सराओं, सभी आभूषणों से विभूषित विविध गन्धर्वों, सिद्धों तथा परम सुन्दर किन्नरों के साथ और बन्दीजनों द्वारा स्तुत होती हुई वहाँ उपस्थित हुईं। [उनकी सखी] मालिनी रत्नकिरणों से मिश्रित श्वेत वर्ण का सन्ध्याकालीन चन्द्रमण्डलसदृश छत्र [उन] पार्वती के ऊपर लगाये हुए थी। वे पार्वती हाथों में चँवर लिये हुई दिव्य स्त्रियों से घिरी हुई थीं। कल्पवृक्ष के पुष्पों से निर्मित माला [हाथ में] लेकर जया [नामक सखी] खड़ी थी और विजया व्यजन (पंखा) लेकर देवी के समीप खड़ी थी ॥ २३-२७ ॥ देवताओं की सभा में [अपने हाथ में] माला लेकर देवी पार्वती के स्थित होने पर भगवान् वृषभध्वज भव महादेव क्रीड़ा करने के लिये एक शिशु के रूप में होकर देवी की गोद में सोये हुए की भाँति स्थित हो गये। तब उनकी गोद में स्थित शिशु को देखकर ‘यहाँ पर यह कौन है – ऐसा विचार करके [ वहाँ ] उपस्थित देवतागण क्षुब्ध हो उठे ॥ २८-२९१/२

वृत्रासुर का संहार करने वाले इन्द्र ने भुजा उठाकर उस देवदेव [शिशु]-के ऊपर वज्र चलाना चाहा, किंतु उनका उठा हुआ वह बाहु वैसा ही रह गया। शिशुरूपधारी [शिव] के द्वारा लीलापूर्वक स्तम्भित कर दिये गये वे इन्द्र वज्र फेंकने तथा अपनी भुजा चलाने में समर्थ नहीं हुए। [ इसी प्रकार ] अग्निदेव भी अपनी शक्ति चलाने में समर्थ नहीं हुए और वैसे ही खड़े रह गये ॥ ३०-३२ ॥ श्रेष्ठ मुनियो ! इसी प्रकार यम अपने दण्ड को, निर्ऋति अपने खड्ग को, वरुण अपने नागपाश को, वायुदेव अपने ध्वजदण्ड को, सोम अपनी गदा को, दण्डधारियों में श्रेष्ठ कुबेर अपने दण्ड को तथा ईशान अपने तीक्ष्ण त्रिशूल को उठाकर खड़े ही रह गये। सभी रुद्र शूल को, सभी आदित्य मुसल को तथा वसुगण मुद्गर को उठाये ही रह गये; सभी देवता शीघ्र ही महादेव के द्वारा स्तम्भित कर दिये गये । [ इसी प्रकार ] देवाधिदेव ने अन्य देवताओं को भी स्तम्भत कर दिया ॥ ३३-३५१/२

विष्णु [अपने] सिर को हिलाते हुए चक्र उठाकर खड़े रहे। उस बालक ने उनके भी सिर को स्थिर कर दिया। वे [ विष्णु ] अपना चक्र फेंकने तथा बाहुओं को चलाने में समर्थ नहीं हुए। पूषा ने मोहित होकर अपने दाँतों से दाँतों को किटकिटाते हुए उस बालक की ओर देखा। शिव के देखनेमात्र से ही उसके दाँत गिर गये । उसी प्रकार विभु शिव ने सबके बल, तेज तथा योग को स्तम्भित कर दिया ॥ ३६-३८१/२

इसके बाद क्रोध में भरे हुए उन समस्त देवताओं के स्तम्भित हो जाने पर अत्यन्त व्याकुल ब्रह्मा ने शंकर का ध्यान करके यह जान लिया कि उमाकी गोद में वे भगवान् ईशान ही विराजमान हैं। ईशानदेव को पहचानकर शीघ्र उन्हें उठाकर विस्मित हुए पितामह ने शम्भु के चरणों की वन्दना की और प्राचीन सामगानों, उनके पवित्र नामों तथा गुप्त नामों के द्वारा उनकी स्तुति की ॥ ३९-४११/२

[ब्रह्मा ने कहा — ] आप समस्त लोकों के स्रष्टा तथा प्रकृति के प्रवर्तक हैं। आप सभी लोकों की बुद्धि एवं अहंकार हैं। आप ईश्वर हैं। हे ईश ! आप ही सभी प्राणियों की इन्द्रियों के प्रवर्तक हैं । हे महाबाहो ! सर्वप्रथम आपके दाहिने हाथ से पुरातन मैं [ ब्रह्मा] उत्पन्न हुआ हूँ और बायें हाथ से भगवान् प्रभु नारायण उत्पन्न हुए हैं। हे सृष्टिकारण ! ये देवी प्रकृति सर्वदा आपकी पत्नी का रूप धारणकर जगत् की कारणभूता बनी हैं। हे महादेव ! आपको नमस्कार है; महादेवी को बार-बार नमस्कार है। हे देवेश! मैंने आपकी कृपा से तथा आपके आदेश से इन प्रजाओं तथा देवता आदि का सृजन किया है। आपके योग से मोहित होकर ये देवगण अब मूढ़ता को प्राप्त हो गये हैं। अब आप इन पर अनुग्रह कीजिये, जिससे ये पूर्वी भाँति हो जायँ ॥ ४२–४७ ॥

सूतजी बोले — [हे ऋषियो!] इस प्रकार देवदेव महेश्वर का स्तवन करके पद्मयोनि भगवान् ब्रह्मा ने उन [शिव] -के द्वारा स्तम्भित किये गये देवताओं से कहा —  मूढ़ता को प्राप्त आप सभी देवताओं ने सभी देवों से नमस्कृत होने वाले यहाँ आये हुए देवदेव शंकर को नहीं पहचाना। हे देवताओ ! इन्द्र आदि आप सभी देवगण नारायण को, सभी मुनियों को तथा मुझको साथ लेकर इन प्रकृतिस्वरूपा पार्वती के साथ विराजमान सर्वश्रेष्ठ, प्रभु, देवेश, परमात्मा, ईश्वर शंकर की शरण में शीघ्र चलिये ॥ ४८- ५१ ॥

तब उन शिव के द्वारा वहाँ पर स्तम्भित किये गये नारायणसहित उन सभी श्रेष्ठ देवताओं ने प्रभु [शिव] -को मन से प्रणाम किया ॥ ५२ ॥ इसके बाद देवदेव त्रिलोचन [ शिव ] उन पर प्रसन्न हो गये और उन प्रभु ने ब्रह्मा के वचनानुसार सबको पूर्व की भाँति कर दिया ॥ ५३ ॥ इस प्रकार प्रसन्न हो जाने पर उन देवेश्वर ने सभी देवताओं के द्वारा न देखे जा सकने वाला, दिव्य तथा परम अद्भुत शरीर धारण किया ॥ ५४ ॥ नारायण, यम, सभी रुद्र आदि के सहित वे देवता तब उनके तेज से इन्द्र, चन्द्र, सूर्य, ब्रह्मा, साध्यगण, प्रतिहत ( नष्ट) दृष्टि वाले हो गये। तब उन लोगों ने प्रभु से [ दिव्य] दृष्टि के लिये प्रार्थना की। इस पर उमापति शर्व ने उन्हें सब कुछ देखने में समर्थ दिव्य दृष्टि प्रदान की; साथ ही उन्होंने भवानी तथा हिमालय को भी दिव्य दृष्टि दी ॥ ५५-५६१/२

तब दिव्य दृष्टि प्राप्त करके ब्रह्मा तथा शक्र-सहित इन्द्र, विष्णु आदि प्रधान देवताओं ने उन महेश्वर का दर्शन किया । ब्रह्मा आदि देवताओं, भवानी (पार्वती), गिरीश्वर [ हिमालय ], मुनियों तथा शिवप्रिय गणेश्वरों ने शीघ्र ही महादेव को प्रणाम किया । आकाशचारी सिद्धों तथा चारणों ने [उनपर ] पुष्पवृष्टि की, देवदुन्दुभियाँ बजने लगीं, मुनिगण प्रभु की स्तुति करने लगे, प्रधान गन्धर्व गाने लगे तथा अप्सराएँ नाचने लगीं, सभी गणेश्वर आनन्दित हो उठे और अम्बा पार्वती भी आनन्दविभोर हो गयीं ॥ ५७–६०१/२ ॥ उस समय आह्लादित देवी [ पार्वती ] – ने त्रिदेवों के समक्ष उन शिव के चरणों में दिव्य तथा सुगन्धित माला समर्पित कर दी। ब्रह्मा-यक्ष-उरग-राक्षसों सहित सभी देवताओं ने ‘साधु-साधु’ कहकर वहॉ पर उन पार्वती के द्वारा पूजित शिव को उन देवी समेत पृथ्वीतल पर मस्तक टेककर प्रणाम किया ॥ ६१–६३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘उमास्वयंवर’ नामक एक सौ दोवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०२ ॥

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