February 3, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -104 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ एक सौ चारवाँ अध्याय गजानन का प्राकट्य कराने के लिये देवताओं द्वारा भगवान् शिव की स्तुति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे चतुरधिकशततमोऽध्यायः देवस्तुति ऋषिगण बोले — [ हे सूतजी !] गणों के स्वामी गजानन विनायक कैसे उत्पन्न हुए; उनका प्रभाव कैसा है ? इसे आप बताने की कृपा कीजिये ॥ १ ॥ सूतजी बोले — हे द्विजो! इसी बीच इन्द्र तथा उपेन्द्रसहित देवतागण एकत्र होकर दैत्यों के धर्म में विघ्न करने के लिये प्रवृत्त हुए। हे विप्रो ! [ वे विचार करने लगे कि] असुर, यातुधान, क्रूर कर्म वाले राक्षस तथा पृथ्वी पर जो अन्य तमोगुणी तथा रजोगुणी लोग हैं, उन्होंने अविघ्नतापूर्वक कार्य करने हेतु यज्ञ-दान आदि के द्वारा महेश्वर, ब्रह्मा तथा विष्णु की सम्यक् पूजा करके अभीष्ट वर प्राप्त कर लिया है; अतः सुरश्रेष्ठो ! सर्वदा हम लोगों का पराभव हो रहा है। इसलिये उनके विघ्न के लिये, देवताओं के अविघ्न के लिये, स्त्रियों को पुत्रप्राप्ति के लिये तथा पुरुषों के कर्म की सिद्धि के लिये आप सभी लोग विघ्नेश गणपति के सृजन हेतु शंकर की स्तुति कीजिये ॥ २-६ ॥ आपस में ऐसा कहकर वे [ देवता] निष्पाप ईश्वर शिव की स्तुति करने लगे — आप सर्वात्मा, सर्वज्ञ तथा पिनाकधारी को नमस्कार है। निष्पाप, विशेष रूप से ब्रह्माण्ड की रचना करने वाले, देवी [पार्वती ] -को तपस्या का फल प्रदान करने वाले, कायारहित, प्रयोजन के लिये शरीर धारण करने वाले, विष्णु की काया का अपहरण करने वाले, देह के भीतर अमृताधार-मण्डल में विराजमान रहने वाले आप [शिव] को नमस्कार है । कृत (सत्ययुग) आदि कालभेदों को उत्पन्न करने वाले तथा कालवेग आप [शिव] – को नमस्कार है ॥ ७-९ ॥ कालाग्नि के समान भयंकर रूप वाले, धर्म आदि आठ पदों (स्थानों) वाले, महाकाली को विशुद्ध (गौर) देह करने वाले तथा कालिका ( चण्डिका) – की उत्पत्ति करने वाले आप [शिव] – को नमस्कार है ॥ १० ॥ कालकण्ठ, प्रधानस्वरूप, वाहन ( कर्मफल की प्राप्ति कराने वाले ) तथा सर्वश्रेष्ठ आप [ शिव] – को नमस्कार है। अम्बिकापति तथा हिरण्यपति आप [शिव]- को नमस्कार है ॥ ११ ॥ हिरण्यरेता, शर्व, शूली और कपाल – दण्ड-पाश-असि – चर्म – अंकुश धारण करने वाले [ शिव] को नमस्कार है। पार्वतीपति, सुवर्ण के समान शुक्ल (शुद्ध), [अर्धनारीश्वररूप होने के कारण] पीत-शुक्ल वर्ण वाले तथा देवताओं की रक्षा के लिये अग्निरूप वाले आप [शिव] – को नमस्कार है ॥ १२-१३ ॥ तुरीयातीत, [देवयज्ञ आदि ] पंच महायज्ञों के कर्ताओं को फल देने वाले, पंचमुख सर्प को हार के रूप में धारण करने वाले तथा पंचाक्षर [ मन्त्र ] -मय आप [शिव] -को नमस्कार है । पाँच प्रकार से [ रुद्र आदि ] पंच कैवल्य देवों द्वारा पूजित मूर्ति वाले, पंचाक्षर मन्त्ररूप दृष्टि वाले तथा परात्परतर आप [ शिव] को नमस्कार है ॥ १४-१५ ॥ [ अकार आदि ] सोलह स्वरमय वज्र के समान [ अभेद्य] अंगों तथा मुख वाले, अक्षय रूप वाले, ‘क’ से प्रारम्भ होने वाले पाँच अक्षररूप हाथ वाले, ‘च’ आदि [पाँच वर्णरूप] हाथ वाले, ‘ट’ आदि [ पाँच वर्णरूप] पाद वाले, ‘त’ आदि [पाँच वर्णरूप] पाद वाले, ‘प’ आदि [[पाँच वर्णरूप] मेढ्र (लिंग) वाले, ‘य’ कारमय अंग सम्बन्धी सात धातुओं को धारण करने वाले आप रुद्र को नमस्कार है । श ष स वर्णमय आत्मरूप वाले तथा ‘क्ष’ कारमय प्रलयरूप क्रोध वाले [शिव को] नमस्कार हैं। ल, व, रेफ, ह, ळ – पाँच वर्णरूप हृदयों वाले तथा निरंग आप [शिव]-को नमस्कार है ॥ १६–१८ ॥ सभी प्राणियों के हृदय में अनाहत ध्वनि करने वाले, भक्तों के द्वारा ध्रुवों के मध्य सदा दिखायी देने वाले, अत्यन्त भानु (सर्वप्रकाशक), सूर्य-चन्द्र-अग्निरूप नेत्र वाले, परमात्म-स्वरूपी, तीनों गुणों से ऊपर स्थित तथा तीर्थरूप पाद वाले आप [शिव] – को नमस्कार ॥ १९-२० ॥ तीर्थरूप तत्त्व वाले, सारस्वरूप ( तीर्थफलरूप) और उस तीर्थफल के भी अधिष्ठाता आप [शिव] – को नमस्कार है। ऋक् यजुः सामवेदस्वरूप तथा ओंकारस्वरूप [शिव] – को बार-बार नमस्कार है ॥ २१ ॥ [ ब्रह्मा, विष्णु, हर] तीन प्रकार के रूप को धारण करके प्रणवानन्तनाद में तुरीयरूप से स्थित रहने वाले, पीत – कृष्ण – रक्त वर्ण वाले, अपरिमित तेज वाले, ब्रह्माण्ड के बाहर क्रम से पाँच प्रकार से [ जल आदि ] पाँच स्थानों में स्थित रहने वाले और ब्रह्मा-विष्णु- कुमारस्वरूप आप [शिव] – को बार-बार नमस्कार है ॥ २२-२३ ॥ अम्बिका के परमेश्वर तथा सबके ऊपर विचरण करने वाले आप [शिव] – को नमस्कार है। मूल सूक्ष्म स्वरूप वाले तथा स्थूल-सूक्ष्मस्वरूप आप [ शिव] – को नमस्कार है ॥ २४ ॥ समस्त संकल्पों से रहित, सबसे रक्षित (गुप्त), आदि-मध्य-अन्त से रहित तथा ज्ञान में स्थित आप [शिव] – को बार-बार नमस्कार है ॥ २५ ॥ गणोंसहित यम, अग्नि, वायु, रुद्र, वरुण, सोम, इन्द्र तथा निशाचरों के द्वारा दिशाओं-विदिशाओं में नित्य पूजित आप [ शिव] – को नमस्कार है। सभी लोकों में तथा सभी मार्गों में सर्वदा पूजित आपको नमस्कार है। रुद्र, रुद्रनील, कद्रुद्र, प्रचेता, महेश्वर, धीर साक्षात् आप शिव को नमस्कार है ॥ २६-२७ ॥ हे भगवन् ! सुनिये; देवताओं तथा दैत्यों के स्वामी ब्रह्मा- इन्द्र आदि ने मख, कामदेव, यम, अग्नि तथा दक्षयज्ञ के विध्वंसरूपी आपके विचित्र क्रिया-कलाप का वर्णन स्तुति के बहाने किया है; आप क्षमा करें ॥ २८ ॥ सूतजी बोले — जो विद्वान् [ व्यक्ति ] इन्द्र, अग्नि आदि प्रधान देवताओं के द्वारा किये गये इस स्तव को भक्तिपूर्वक पढ़ता है अथवा [ दूसरों को] सुनाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है ॥ २९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘देवस्तुति’ नामक एक सौ चारवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०४ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe