शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [तृतीय-पार्वतीखण्ड] – अध्याय 46 शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [तृतीय-पार्वतीखण्ड] – अध्याय 46 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः छियालीसवाँ अध्याय नगर में बरातियों का प्रवेश, द्वाराचार तथा पार्वती द्वारा कुलदेवता का पूजन ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर शिवजी प्रसन्नचित्त होकर अपने गणों, देवताओं, दूतों तथा अन्य सभी लोगों के साथ कुतूहलपूर्वक हिमालय के घर गये ॥ १ ॥ हिमालय की… Read More
पितृ दोष शान्ति के उपाय पितृ दोष शान्ति के उपाय पितृदोष का नाम सुनते ही व्यक्ति चिंतित हो उठता है और अपनी सभी समस्याओं एवं कष्टों के कारण के रूप में उसी दोष को देखने लगता है । साथ ही उसके उपाय के लिए वह चाहता है कि कोई एक पूजा करवा दे, जिससे उसे इस दोष से छुटकारा मिल… Read More
पितृसूक्त ॥ पितृसूक्त ॥ ऋग्वेदके १० वें मण्डलके १५वें सूक्तकी १-१४ ऋचाएँ ‘पितृसूक्त’ के नामसे ख्यात हैं । पहली आठ ऋचाओं में विभिन्न स्थानों में निवास करनेवाले पितरों को हविर्भाग स्वीकार करने के लिये आमन्त्रित किया गया है । अन्तिम छः ऋचाओं में अग्नि से प्रार्थना की गयी है कि वे सभी पितरों को साथ लेकर… Read More
वेदोक्त पितृसूक्त ॥ वेदोक्त पितृसूक्त ॥ शुक्लयजुर्वेद के अध्याय 35 में पितृसूक्त दिया गया है। इसका नियमित पाठ करने से पितृदोष की शान्ति होती है। यह सूक्त निम्नलिखित है – अपेतो यन्तु पणयोऽसुम्ना देवपीयवः । अस्य लोकः सुतावतः । द्युभिरहोभिरक्तुभिर्व्यक्तं यमो ददात्ववसानमस्मै ॥ १ ॥ सविता ते शरीरेभ्यः पृथिव्याँल्लोकमिच्छतु । तस्मै युज्यन्तामुस्रियाः ॥ २ ॥ वायुः पुनातु… Read More
पुराणोक्त पितृस्तोत्र ॥ पुराणोक्त पितृस्तोत्र ॥ मनोकामनाओं की पूर्ति करते है । यहाँ मार्कण्डेय पुराण (04/1-13) में वर्णित चमत्कारी पितस्तोत्र दिया जा रहा है । इसका नियमित पाठ करना चाहिए । ॥ रुचिरुवाच ॥ (सप्तार्चिस्तपम्) अमूर्त्तानां च मूर्त्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ॥ नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम् । इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ॥… Read More
अभीष्ट फलदायक बाह्य शान्ति सूक्त अभीष्ट फलदायक बाह्य शान्ति सूक्त (कुल-देवता की प्रसन्नता के लिए अमोघ अनुभूत सूक्त) नमो वः पितरो, यच्छिव तस्मै नमो, वः पितरो यतृस्योन तस्मै । नमो वः पितरः, स्वधा वः पितरः ॥ 1 ॥ नमोऽस्तु ते निर्ऋर्तु, तिग्म तेजोऽयस्यमयान विचृता बन्ध-पाशान् । यमो मह्यं पुनरित् त्वां ददाति । तस्मै यमाय नमोऽस्तु मृत्यवे ॥ 2 ॥ नमोऽस्त्वसिताय,… Read More
शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [तृतीय-पार्वतीखण्ड] – अध्याय 45 शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [तृतीय-पार्वतीखण्ड] – अध्याय 45 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः पैंतालीसवाँ अध्याय भगवान् शिव का अपने परम सुन्दर दिव्य रूप को प्रकट करना, मेना की प्रसन्नता और क्षमा-प्रार्थना तथा पुरवासिनी स्त्रियों का शिव के रूप का दर्शन करके जन्म और जीवन को सफल मानना ब्रह्माजी बोले — हे मुने ! इसी… Read More
शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [तृतीय-पार्वतीखण्ड] – अध्याय 44 शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [तृतीय-पार्वतीखण्ड] – अध्याय 44 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः चौवालीसवाँ अध्याय शिवजी के रूप को देखकर मेना का विलाप, पार्वती तथा नारद आदि सभी को फटकारना, शिव के साथ कन्या का विवाह न करने का हठ, विष्णु द्वारा मेना को समझाना ब्रह्माजी बोले — [हे नारद!] चेतना प्राप्तकर शैलप्रिया सती… Read More
शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [तृतीय-पार्वतीखण्ड] – अध्याय 43 शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [तृतीय-पार्वतीखण्ड] – अध्याय 43 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः तैंतालीसवाँ अध्याय मेना द्वारा शिव को देखने के लिये महल की छत पर जाना, नारद द्वारा सबका दर्शन कराना, शिव द्वारा अद्भुत लीला का प्रदर्शन, शिवगणों तथा शिव के भयंकर वेष को देखकर मेना का मूर्च्छित होना मेना बोलीं — हे… Read More
शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [तृतीय-पार्वतीखण्ड] – अध्याय 42 शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [तृतीय-पार्वतीखण्ड] – अध्याय 42 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः बयालीसवाँ अध्याय हिमालय द्वारा प्रेषित मूर्तिमान् पर्वतों और ब्राह्मणों द्वारा बरात की अगवानी, देवताओं और पर्वतों के मिलाप का वर्णन ब्रह्माजी बोले — गिरिराज हिमालय सर्वव्यापी शिवजी को अपने नगर के निकट आया हुआ सुनकर बड़े प्रसन्न हुए ॥ १ ॥… Read More