श्रीमद्भागवतमहापुराण – तृतीय स्कन्ध – अध्याय १५ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पंद्रहवाँ अध्याय जय-विजय को सनकादि का शाप श्रीमैत्रेयजी ने कहा — विदुरजी ! दिति को अपने पुत्रों से देवताओ को कष्ट पहुँचने की आशङ्का थी, इसलिये उसने दूसरों के तेज का नाश करनेवाले इस कश्यपजी के तेज (वीर्य)… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – तृतीय स्कन्ध – अध्याय १४ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय चौदहवाँ अध्याय दिति का गर्भधारण श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! प्रयोजनवश सूकर बने श्रीहरि की कथा को मैत्रेयजी के मुख से सुनकर भी भक्तिव्रतधारी विदुजी की पूर्ण तृप्ति न हुई अतः उन्होंने हाथ जोड़कर फिर पूछा ॥… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – तृतीय स्कन्ध – अध्याय १३ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तेरहवाँ अध्याय वाराह अवतार की कथा श्रीशुकदेवजी ने कहा — राजन् ! मुनिवर मैत्रेयजी के मुख़ से यह परम पुण्यमयी कथा सुनकर श्रीविदुरजी ने फिर पूछा, क्योंकि भगवान् की लीलाकथा में इनका अत्यन्त अनुराग हो गया था ॥… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – तृतीय स्कन्ध – अध्याय १२ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय बारहवाँ अध्याय सृष्टि का विस्तार श्रीमैत्रेयजी ने कहा — विदुरजी ! यहाँतक मैंने आपको भगवान् की कालरूप महिमा सुनायी । अब जिस प्रकार ब्रह्माजी ने जगत् की रचना की, यह सुनिये ॥ १ ॥ सबसे पहले उन्होंने अज्ञान… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – तृतीय स्कन्ध – अध्याय ११ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ग्यारहवाँ अध्याय मन्वन्तरादि कालविभाग का वर्णन श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी ! पृथ्वी आदि कार्यवर्ग का जो सूक्ष्मतम अंश है — जिसका और विभाग नहीं हो सकता, तथा जो कार्यरूप को प्राप्त नहीं हुआ है और जिसका अन्य… Read More


॥ अथ शरभेशाष्टक स्तोत्रम् ॥ कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करते हुये स्तोत्र का 3 बार पाठ करे । तडित्कोटि प्रतीकाशां विषतन्तु तनीयसीं । इति कुण्डलिनी ध्यात्वा ॥ विनियोगः – अस्य श्री शरभेष्टाक मंत्रस्य कालाग्निरुद्र ऋषिः, जगती छंदः, भगवान श्री शरभेश्वरो देवता, खं बीजं, स्वाहा शक्तिः, चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्धयर्थे जपे विनियोगः । ऋष्यादिन्यासः – कालाग्निरुद्राय ऋषये… Read More


॥ शरभहृदय स्तोत्रम् ॥ किसी भी देवता का हृदय मित्र के समान कार्य करता है, शतनाम अंगरक्षक के समान एवं सहस्रनाम सेना के समान रखा करता है अत: इनका अलग-अलग महत्व है । भूमिका के अनुसार समुन्द्र मंथन के समय विष्णु ने शरभ हृदय की २१ आवृति ३ मास तक की तब शरभराज प्रकट ने… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – तृतीय स्कन्ध – अध्याय १० ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय दसवाँ अध्याय दस प्रकार की सृष्टि का वर्णन विदुरजी ने कहा — मुनिवर ! भगवान् नारायण के अन्तर्धान हो जानेपर सम्पूर्ण लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने अपने देह और मन से कितने प्रकार की सृष्टि उत्पन्न की ?… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – तृतीय स्कन्ध – अध्याय ९ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नवाँ अध्याय ब्रह्माजी द्वारा भगवान् की स्तुति ब्रह्माजी ने कहा — प्रभो ! आज बहुत समय के बाद मैं आपको जान सका हूँ । अहो ! कैसे दुर्भाग्य की बात है कि देहधारी जीव आपके स्वरूप को नहीं… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – तृतीय स्कन्ध – अध्याय ८ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय आठवाँ अध्याय ब्रह्माजी की उत्पत्ति श्रीमैत्रेयजी ने कहा — विदुरजी ! आप भगवद्भक्तों में प्रधान लोकपाल यमराज ही हैं; आपके पूरुवंश में जन्म लेने के कारण वह वंश साधुपुरुषों के लिये भी सेव्य हो गया है । धन्य… Read More