श्रीगणपति-पूजन की विधि यहाँ गणेशजी के पूजन की शास्त्रीय विधि दी जाती है। जो यज्ञोपवीतधारी द्विज हों, वे वैदिक मन्त्रों तथा पौराणिक मन्त्रों से भी गणपति की पूजा कर सकते हैं। जिनके यज्ञोपवीत न हों, वे वैदिक मन्त्रों का उच्चारण न करके केवल पौराणिक मन्त्रों द्वारा पूजन सम्पन्न कर सकते हैं। गणपति की पूजा में… Read More


श्रीगणेशप्रिय चतुर्थी व्रत— माहात्म्य एवं व्रत विधि शिवपुराण की कथा है — श्वेतकल्प में जब भगवान् शंकर के अमोघ त्रिशूल से पार्वतीनन्दन दण्डपाणि का मस्तक कट गया, तब पुत्रवत्सला जगज्जननी शिवा अत्यन्त दुःखी हुईं। उन्होंने बहुत—सी शक्तियों को उत्पन्न किया और उन्हें प्रलय मचाने की आज्ञा दे दीं। उन परम तेजस्विनी शक्तियों ने सर्वत्र संहार… Read More


॥ श्रीगणेशन्यास ॥ सर्वविध रक्षा के लिये ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ आचम्य प्राणायामं कृत्वा । दक्षिणहस्ते वक्रतुण्डाय नमः । वामहस्ते शूर्पकर्णाय नमः । ओष्ठे विघ्नेशाय नमः । सम्पुटे गजाननाय नमः । दक्षिणपादे लम्बोदराय नमः । वामपादे एकदन्ताय नमः । शिरसि एकदन्ताय नमः । चिबुके ब्रह्मणस्पतये नमः । दक्षिणनासिकायां विनायकाय नमः । वामनासिकायां ज्येष्ठराजाय नमः ।… Read More


॥ पञ्चश्लोकि गणेशपुराणम् ॥ मोक्ष-प्राप्ति के लिये पञ्चश्लोकि गणेशपुराणम् श्रीविघ्नेशपुराणसारमुदितं व्यासाय धात्रा पुरा तत्खण्डं प्रथमं महागणपतेश्चोपासनाख्यं यथा । संहर्तुं त्रिपुरं शिवेन गणपस्यादौ कृतं पूजनं कर्तुं सृष्टिमिमां स्तुतः स विधिना व्यासेन बुद्धयाप्तये ॥ संकष्ट्याश्च विनायकस्य च मनोः स्थानस्य तीर्थस्य वै दूर्वाणां महिमेति भक्तिचरितं तत्पार्थिवस्यार्चनम्। तेभ्यो यैर्यदभीप्सितं गणपतिस्तत्तत्प्रतुष्टो ददौ ताः सर्वा न समर्थ एव कथितुं ब्रह्मा कुतो… Read More


मंगल विधान के लिये गणपतिर्विघ्नराजो लम्बतुण्डो गजाननः । द्वैमातुरश्च हेरम्ब एकदन्तो गणाधिपः ॥ विनायकश्चारुकर्णः पशुपालो भवात्मजः । द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्॥ विश्वं तस्य भवेद्वश्यं न च विघ्नं भवेत् क्वचित्। (पद्मपु० सृ० ६१ । ३१–३३) ‘गणपति, विघ्नराज, लम्बतुण्ड, गजानन, द्वैमातुर, हेरम्ब, एकदन्त, गणाधिप, विनायक, चारुकर्ण, पशुपाल और भवात्मज – ये बारह गणेशजी के नाम हैं।… Read More


तन्त्रसार के अनुसार श्रीगणेश ‘तन्त्रसार के द्वितीय परिच्छेद में विभिन्न गाणपत्य-सम्प्रदायों के उपास्य (१) महागणेश, (२) हेरम्बगणेश, (३) हरिद्रागणेश, (४) उच्छिष्टगणेश के मन्त्र, ध्यान-पूजा और प्रयोगविधि विस्तृत रूप से वर्णित हैं। गाणपत्य-सम्प्रदाय की छः शाखाओं में से चार शाखाओं की पूजा-पद्धति की एक झलक संक्षेप में यहाँ प्रस्तुत की जा रही है। (१) महागणेश या… Read More


ऋणहर्ता गणेश – मन्त्र का विधान कैलासपर्वते रम्ये शम्भुं चन्द्रार्धशेखरम् । षडाम्नायसमायुक्तं पप्रच्छ नगकन्यका ॥ रमणीय कैलास पर्वत पर छः आम्नायों से युक्त चन्द्रार्धशेखर भगवान् शिव बैठे थे, उस समय गिरिराजनन्दिनी पार्वतीजी ने उनसे पूछा — पार्वत्युवाच देवेश परमेशान सर्वशास्त्रार्थपारग । उपायमृणनाशस्य कृपया वद साम्प्रतम् ॥ पार्वती बोलीं — सम्पूर्ण शास्त्रों के अर्थ-ज्ञान में पारंगत… Read More


एकाक्षरगणपति-मन्त्र के जप का विधान         स्नान-संध्या-वन्दन आदि से निवृत्त हो, शुद्ध आसन पर आसीन साधक जप प्रारम्भ करने से पूर्व आचमन और प्राणायाम करके निम्नांकितरूप से संकल्प करे — संकल्प — ओमद्यैतस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे अमुकजनपदे नगरे ग्रामे वा कलियुगे प्रथमचरणे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथावमुक- वासरान्वितायाममुकामुकराशिस्थितेषु सूर्यादिषु नवग्रहेषु सत्सु — एवं विधग्रहगुणविशेषण… Read More


श्रीगणपति सहस्रनामावली तन्त्रों और पुराणों में वर्णित इष्टदेवता के सहस्त्रनामों द्वारा उनकी स्तुति करने की पावन परम्परा अत्यन्त प्राचीन- काल से चली आ रही है। इनके एक बार के पाठ से नाम-मन्त्रों की दस माला का जप सम्पन्न हो जाता है । भगवान्‌ के गुणों और लीला – चरित्रों को लेकर ऋषियों द्वारा उपदिष्ट सहस्रनामों… Read More


श्रीगणपति-ध्यान- मंजरी गणपति सिन्दूराभं त्रिनेत्रं पृथुतरजठरं हस्तपद्यैर्दधानं दन्तं पाशाङ्कुशेष्टान्युरुकरविलसद्बीजपूराभिरामम्। बालेन्दुद्योतमौलिं करिपतिवदनं दानपूरार्द्रगण्डं भोगीन्द्राबद्धभूषं भजत गणपतिं रक्तवस्त्राङ्गरागम् ॥ जो सिन्दूरकी-सी अंगकान्ति वाले और त्रिनेत्रधारी हैं; जिनका उदर बहुत विशाल है; जो अपने चार करकमलों में दन्त, पाश, अंकुश और वर-मुद्रा धारण करते हैं; जिनके विशाल शुण्ड-दण्ड में बीजपूर (बिजौरा नीबू या अनार) शोभा दे रहा है;… Read More