शिवमहापुराण – प्रथम विद्येश्वरसंहिता – अध्याय 14 शिवमहापुराण – प्रथम विद्येश्वरसंहिता – अध्याय 14 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः चौदहवाँ अध्याय अग्नियज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ आदि का वर्णन, भगवान् शिव के द्वारा सातों वारों का निर्माण तथा उनमें देवाराधन से विभिन्न प्रकार के फलों की प्राप्ति का कथन ऋषिगण बोले — हे प्रभो ! अग्नियज्ञ, देवयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, गुरुपूजा तथा ब्रह्मतृप्ति का… Read More
शिवमहापुराण – प्रथम विद्येश्वरसंहिता – अध्याय 13 शिवमहापुराण – प्रथम विद्येश्वरसंहिता – अध्याय 13 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः तेरहवाँ अध्याय सदाचार, शौचाचार, स्नान, भस्मधारण, सन्ध्यावन्दन, प्रणव-जप, गायत्री-जप, दान, न्यायतः धनोपार्जन तथा अग्निहोत्र आदि की विधि एवं उनकी महिमा का वर्णन ऋषिगण बोले — [हे सूतजी !] अब आप शीघ्र ही हमें वह सदाचार सुनाइये, जिससे विद्वान् पुरुष पुण्यलोकों पर विजय… Read More
शिवमहापुराण – प्रथम विद्येश्वरसंहिता – अध्याय 12 शिवमहापुराण – प्रथम विद्येश्वरसंहिता – अध्याय 12श्री गणेशाय नमःश्री साम्बसदाशिवाय नमःबारहवाँ अध्याय मोक्षदायक पुण्यक्षेत्रों का वर्णन, कालविशेष में विभिन्न नदियों के जल में स्नान के उत्तम फल का निर्देश तथा तीर्थों में पाप से बचे रहने की चेतावनी सूतजी बोले — हे बुद्धिमान् महर्षियो ! मोक्षदायक शिवक्षेत्रों का वर्णन सुनिये । तत्पश्चात् मैं लोकरक्षा के… Read More
शिवमहापुराण – प्रथम विद्येश्वरसंहिता – अध्याय 11 शिवमहापुराण – प्रथम विद्येश्वरसंहिता – अध्याय 11 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः ग्यारहवाँ अध्याय शिवलिंग की स्थापना, उसके लक्षण और पूजन की विधि का वर्णन तथा शिवपद की प्राप्ति करानेवाले सत्कर्मों का विवेचन ऋषिगण बोले — [हे सूतजी !] शिवलिंग की स्थापना कैसे करनी चाहिये, उसका लक्षण क्या है तथा उसकी पूजा कैसे करनी… Read More
शिवमहापुराण – प्रथम विद्येश्वरसंहिता – अध्याय 10 शिवमहापुराण – प्रथम विद्येश्वरसंहिता – अध्याय 10 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः दसवाँ अध्याय सृष्टि, स्थिति आदि पाँच कृत्यों का प्रतिपादन, प्रणव एवं पंचाक्षर-मन्त्र की महत्ता, ब्रह्मा विष्णु द्वारा भगवान् शिव की स्तुति तथा उनका अन्तर्धान होना ब्रह्मा और विष्णु बोले — हे प्रभो ! हम दोनों को सृष्टि आदि पाँच कृत्यों का लक्षण… Read More
दक्षिणामूर्ति शिव मन्त्र ॥ दक्षिणामूर्ति शिव ॥ दक्षिणामूर्ति शिव को तन्त्रों का रचियता माना है । बुद्धि, विवेक व ज्ञान की अभिवृद्धि करने वाले एवं जगद्गुरु है । जिन लोगों को सद्गुरु का आश्रय नहीं मिल पा रहा है वे दक्षिणामूर्ति शिव को गुरु मानकर अपनी साधना को आगे बढ़ा सकते हैं । यदि दीक्षित मन्त्र के अलावा… Read More
शिव – श्रीकण्ठादि कलामातृका न्यासः ॥ शिव श्रीकण्ठादि कलामातृका न्यासः ॥ कोई भी रुद्र प्रयोग हो, मृत्युंजय प्रयोग या शिव के किसी अन्य स्वरूप का यन्त्र का प्रयोग पुरश्चरणादि, होवें तो श्रीकण्ठादि कलामातृका न्यास करने से विशेष सिद्धि प्राप्त होती है । विनियोगः – अस्य श्रीकण्ठादिकलान्यासस्य दक्षिणामूर्ति ऋषिः, गायत्री छन्दः, अर्द्धनारीश्वरो देवता, हलो बीजानि, स्वराः शक्तयः, चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्ध्यर्थे न्यासे… Read More
शिवमहापुराण – प्रथम विद्येश्वरसंहिता – अध्याय 09 शिवमहापुराण – प्रथम विद्येश्वरसंहिता – अध्याय 09 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः नौवाँ अध्याय महेश्वर का ब्रह्मा और विष्णु को अपने निष्कल और सकल स्वरूप का परिचय देते हुए लिंगपूजन का महत्त्व बताना नन्दिकेश्वर बोले — वे दोनों ब्रह्मा और विष्णु भगवान् शंकर को प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर उनके दायें-बायें भाग में चुपचाप… Read More
शिवमहापुराण – प्रथम विद्येश्वरसंहिता – अध्याय 08 शिवमहापुराण – प्रथम विद्येश्वरसंहिता – अध्याय 08 श्री गणेशाय नमः श्री साम्बसदाशिवाय नमः आठवाँ अध्याय भगवान् शंकर द्वारा ब्रह्मा और केतकी पुष्प को शाप देना और पुनः अनुग्रह प्रदान करना नन्दिकेश्वर बोले — तदुपरान्त महादेव शिवजी ने ब्रह्मा के गर्व को मिटाने की इच्छा से अपनी भृकुटी के मध्य से भैरव नामक एक अद्भुत पुरुष… Read More
रुद्र यन्त्रम् ॥ रुद्र यन्त्रम् ॥ रुद्र यन्त्र के मध्य में पञ्चकोण है, उसके बाहर अष्टदल, उसके बाहर षोडशदल, उसके ऊपर चतुर्विंशतिदल, उसके ऊपर द्वात्रिंशदल तथा उसके बाहर चत्वारिंशदल (कहीं-कहीं पर ४५ दल का भी लेख है।) पश्चात् बाहर भूपूर में (द्वारयुक्त परिधि) बनाकर यन्त्र शोधन करें। यह यन्त्र शिव पूजन व मृत्युञ्जय प्रयोग दोनों में किया… Read More