राधामाधव प्रातः स्तवराज ॥ राधामाधव प्रातः स्तवराज ॥ प्रातः स्मरामि युगकेलिरसाभिषिक्तं वृन्दावनं सुरमणीयमुदारवृक्षम् । सौरीप्रवाहवृतमात्मगुणप्रकाशं युग्माङ्घ्रिरेणुकणिकाञ्चितसर्वसत्त्वम् ॥ १ ॥ जहाँपर सगुण हुए परमात्मा के दिव्य लीलागुणों का प्रकाश हुआ है, जो यमुनाजी के जलप्रवाह से आवेष्टित, अतीव रमणीय तथा वांछित फल देनेवाले वृकषों से समन्वित है और जिसमें अवस्थित सकल प्राणिसमुदाय युगल-स्वरूप की चरण-धूलिसे परिपूत है । राधामाधव-युगल… Read More
श्रीकृष्ण स्तोत्रम् – भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा तथा दिव्य प्रेम की प्राप्ति के लिये भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा तथा दिव्य प्रेम की प्राप्ति के लिये निम्नलिखित स्तोत्र माहेश्वरतन्त्र के ४७वें पटल से दिया जा रहा है । इस स्तोत्र की विशेषता क्या है – इस विषय में पार्वतीजी प्रश्न करती है कि – ॥ श्रीकृष्ण स्तोत्रम् ॥ ॥ पार्वत्युवाच ॥ भगवन् श्रोतुमिच्छामि यथा कृष्णः प्रसीदति । विना जपं विना… Read More
पाण्डवकृत कात्यायनी स्तुति ॥ पाण्डवकृत कात्यायनी स्तुति ॥ शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिये नित्य पाठ करें – ततो धर्मसुतो राजा गुरून्युद्धे व्यवस्थितान् । भीष्मद्रोणमुखान्सर्वान्प्रणिपत्य पृथक् पृथक् । युद्धाय तैरनुज्ञात स्वरथ पुनरागमत् ॥ १ ॥ ततस्ते पाण्डवा सर्वे अवप्लुत्य रथोत्तमात् । संग्रामे जयलाभाय तुष्टुवुर्जगदम्विकाम् ॥ २ ॥ ॥ पाण्डवा ऊचु ॥… Read More
श्रीराधिका सहस्रनाम स्तोत्रम् (वासुदेवरहस्ये राधातन्त्रे ) ॥ अथ श्रीराधिका सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥ इस सहस्रनाम स्तोत्र में पूर्णाभिषेक दीक्षा से मन्त्र व कर्म के ज्ञान हेतु कहा गया है । ॥ ईश्वरोवाच ॥ इति ते कथितं देवि किमन्यत् कथयामि ते । श्रोत्री त्वं परमेशानि अहं वक्ता च शाश्वतः ॥ ॥ देव्युवाच ॥ कियदन्यन्महादेव पृच्छामि यदिहोच्यते । हृदये तव देवेश नानातन्त्राणि सन्ति वै… Read More
श्रीराधिकासहस्रनामस्तोत्रम् ॥ श्रीराधिकासहस्रनामस्तोत्रम् ॥ ॥ श्रीपार्वत्युवाच ॥ देवदेव जगन्नाथ भक्तानुग्रहकारक । यद्यस्ति मयि कारुण्यं मयि यद्यस्ति ते दया ॥ १ ॥ यद्यत् त्वया निगदितं तत्सर्वं मे श्रुतं प्रभो । गुह्याद् गुह्यतरं यत्तु यत्ते मनसि काशते ॥ २ ॥ त्वया न गदितं यत्तु यस्मै कस्मै कदचन । तस्मात् कथय देवेश सहस्रं नाम चोत्तमम् ॥ ३ ॥ श्रीराधाया… Read More
श्रीराधा अष्टादशशतीनाम स्तोत्र ॥ श्रीराधा अष्टादशशतीनाम स्तोत्र ॥ राधा ने वृन्दा से कहा कि तुम मेरे जन्म एवं समागम के बारे में कुछ नहीं जानती और न ही तुम मेरे नाम प्रभाव को जानती हो । वृन्दा ने जब उनके नाम प्रभाव को जानना चाहा तो राधा ने अपने १८०० नाम बताये । श्रीराधा के ये १८०० नाम… Read More
भुवनेश्वरीकृत राधास्तुतिः ॥ अथ भुवनेश्वरीकृत राधास्तुतिः॥ राधा ने भुवनेश्वरी को स्मरण कर वृन्दावन को गोलोकमय बनाने को कहा तब भुवनेश्वरी ने राधा की महिमा वर्णन करते हुए प्रशंसापूर्वक कहा कि राधा आप त्रिभुवन की स्वयं लक्ष्मी हो । उसका यथा वर्णन — ॥ ब्राह्मणी उवाच ॥ ततः किमभवत् पश्चाद् देवगन्धर्व कथ्यताम् । पुनीहि मे श्रुतिपुटौ नानादोषकुलाकुलौ ॥… Read More
त्रिपुरसुन्दर्यादूती वशिनीकृत राधा स्तुतिः ॥ त्रिपुरसुन्दर्यादूती वशिनीकृत राधा स्तुतिः ॥ राधा ने त्रिपुर सुन्दरी की उपासना की कि हे मां मेरी सहायता करो तथा त्रिपुरसुन्दरी ने अपनी वशिन्यादि दूतियों को सहायता करने को कहा तब वशिन्यादि ने राधा की प्रशंसा व स्तुति की । यथा — जय जय राधे कृतनतराधे जगदभिवन्द्ये सुरवरवन्द्ये । धृतबहुरूपे स्मरमखरूपे सरसिजवक्त्रे सुमदिरनेत्रे ॥ जय… Read More
श्रीराधा कृपाकटाक्ष स्तोत्र ॥ अथ श्रीराधा कृपाकटाक्ष स्तोत्र ॥ मुनीन्द्र-वृन्द-वन्दिते त्रिलोक-शोकहारिणि, प्रसन्न-वक्त्र-पङ्कजे निकुञ्ज-भूविलासिनि । व्रजेन्द्र-भानुनन्दनि व्रजेन्द्र सूनुसङ्गते, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम् ॥ १ ॥ अशोक-वृक्ष-वल्लरी-वितान-मण्डप-स्थिते, प्रवाल-बाल)-पल्लव-प्रभारुणाङ्घ्रिकोमले । वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम् ॥ २ ॥… Read More
सरस्वतीस्तोत्रं अथवा वाणीस्तवनं याज्ञवल्क्योक्त ॥ सरस्वतीस्तोत्रं अथवा वाणीस्तवनं याज्ञ्यवल्क्योक्त ॥ ॥ नारायण उवाच ॥ वाग्देवतायाः स्तवनं श्रूयतां सर्वकामदम् । महामुनिर्याज्ञवल्क्यो येन तुष्टाव तां पुरा ॥ १ ॥ गुरुशापाच्च स मुनिर्हतविद्यो बभूव ह । तदाऽऽजगाम दुःखार्तो रविस्थानं च पुण्यदम् ॥ २ ॥ सम्प्राप्य तपसा सूर्यं कोणार्के दृष्टिगोचरे । तुष्टाव सूर्य्यं शोकेन रुरोद स पुनः पुनः ॥ ३ ॥ सूर्य्यस्तं पाठयामास… Read More