June 15, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 090 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ नब्बेवाँ अध्याय अभिषेक आदि की विधि का वर्णन अभिषेकादिकथनम् भगवान् शंकर कहते हैं — स्कन्द! शिव का पूजन करके गुरु शिष्य आदि का अभिषेक करे । इससे शिष्य को श्री की प्राप्ति होती है। ईशान आदि आठ दिशाओं में आठ और मध्य में एक- इस प्रकार नौ कलश स्थापित करे। उन आठ कलशों में क्रमशः क्षारोद क्षीरोद, दध्युदक, घृतोद, इक्षुरसोद, सुरोद, स्वादूदक तथा गर्भोद — इन आठ समुद्रों का आवाहन करे। इसी तरह क्रमानुसार उनमें आठ विद्येश्वरों का भी स्थापन करे, जिनके नाम इस प्रकार हैं — १. शिखण्डी, २. श्रीकण्ठ, ३. त्रिमूर्ति, ४ एकरुद्र, ५. एकनेत्र, ६. शिवोत्तम ७. सूक्ष्म और ८. अनन्तरुद्र ॥ १-४ ॥‘ मध्यवर्ती कलश में शिव, समुद्र तथा शिव-मन्त्र की स्थापना करे। यागमण्डप की दिशा के स्वामी के लिये रचित स्नान मण्डप में दो हाथ लंबी और आठ अङ्गुल ऊँची एक वेदी बनावे। उस पर कमल आदि का आसन बिछा दे और उसके ऊपर आसन स्वरूप अनन्त का न्यास करके शिष्य को पूर्वाभिमुख बिठाकर सकलीकरणपूर्वक पूजन करे। काञ्जी, भात, मिट्टी, भस्म, दूर्वा, गोबर के गोले, सरसों, दही और जल — इन सबके द्वारा उसके शरीर को मलकर क्षारोदक आदि के क्रम से नमस्कार सहित विद्येश्वरों के नाम-मन्त्रों द्वारा पूर्वोक्त कलशों के जल से शिष्य को स्नान करावे और शिष्य मन-ही-मन यह धारणा करे कि ‘मुझे अमृत से नहलाया जा रहा है’ ॥ ५-८१/२ ॥ तत्पश्चात् उसे दो श्वेत वस्त्र पहनाकर शिव के दक्षिण भाग में बिठावे और पूर्वोक्त आसन पर पुनः उस शिष्य की पहले की ही भाँति पूजा करे। इसके बाद उसे पगड़ी, मुकुट, योग-पट्टिका, कर्तरी(कैंची, चाकू या कटार), खड़िया, अक्षमाला और पुस्तक आदि अर्पित करे। वाहन के लिये शिविका आदि भी दे। तदनन्तर गुरु उस शिष्य को अधिकार सौंपे। ‘आज से तुम भलीभाँति जानकर, अच्छी तरह जाँच-परखकर किसी को दीक्षा, व्याख्या और प्रतिष्ठा आदि का उपदेश करना’ — यह आज्ञा सुनावे। तदनन्तर शिष्य का अभिवादन स्वीकार कर और महेश्वर को प्रणाम करके उनसे विघ्न समूह का निवारण करने के लिये इस प्रकार प्रार्थना करे — ‘प्रभो शिव । आप गुरुस्वरूप हैं; आपने इस शिष्य का अभिषेक करने के लिये मुझे आदेश दिया था, उसके अनुसार मैंने इसका अभिषेक कर दिया। यह संहिता में पारंगत है ‘ ॥ ९-१३१/२ ॥ मन्त्रचक्र की तृप्ति के लिये पाँच-पाँच आहुतियाँ दे। फिर पूर्णाहुति होम करे। इसके बाद शिष्य को अपने दाहिने बिठावे शिष्य के दाहिने हाथ की अङ्गुष्ठ आदि अँगुलियों को क्रमशः दग्ध दर्भाङ्ग- शम्बरों से ‘ऊषरत्व’ के लिये लाञ्छित करे । उसके हाथ में फूल देकर उससे कलश, अग्नि एवं शिव को प्रणाम करवावे। तदनन्तर उसके लिये कर्तव्य का आदेश दे — ‘तुम्हें शास्त्र के अनुसार भलीभाँति परीक्षा करके शिष्यों को अनुगृहीत करना चाहिये।’ मानव आदि का राजा की भाँति अभिषेक करने से अभीष्ट की प्राप्ति होती है। ‘ॐ श्लीं पशु हूं फट् । — यह अस्त्रराज पाशुपत मन्त्र है। इसके द्वारा अस्त्रराज का पूजन और अभिषेक करना चाहिये [^1] ॥ १४- १८ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘अभिषेक आदि की विधि का वर्णन’ नामक नव्येवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९० ॥ [^1]: सोमशम्भु ने अपने ग्रन्थ में यहाँ साधकाभिषेक तथा अस्त्राभिषेक का भी विधान दिया है। (देखिये ‘कर्मकाण्ड-क्रमावली’ श्लोक-सं० १०८७ से १११३ तक ) मुमुक्षोरिव संशोध्य शान्त्यतीतां विशोधयेत् । ततः सदाशिवं ध्यात्वा मूलमन्त्रेण पूर्णया ॥ १०८७ ॥ शान्तौ संयोज्य कुर्वीत गुणापादानमष्टधा । ॐ हूं आत्मन् अणिमा ते भवतु स्वाहा । ॐ हूं आत्मन् लघिमा ते भवतु स्वाहा । ॐ हूं आत्मन् महिमा ते भवतु स्वाहा । ॐ हूं आत्मन् प्राप्तिस्ते भवतु स्वाहा | ॐ हूं आत्मन् प्राकाम्यं ते भवतु स्वाहा । ॐ हूं आत्मन् ईशित्वं ते भवतु स्वाहा । ॐ हूं आत्मन् वशित्वं ते भवतु स्वाहा । ॐ हूं आत्मन् यत्रकामावसायिता ते भवतु स्वाहा ॥ पूर्ववद्योजनां कृत्वा पञ्चभिः कलशैस्ततः ॥ १०८८ ॥ कृतपञ्चकलान्यासैः साध्यशम्बरपूजितैः । मूलसाष्टशतालब्धैरभिषिच्य यथाक्रमम् ॥ १०८९ ॥ पर्यन्ते शान्तिकुम्भेन पञ्चमेनाभिषेचयेत् । विन्यस्याष्टसमुद्रैर्वा साध्याणुशतमन्त्रितैः ॥ १०९० ॥ पूर्वोक्तैरष्टभिः कुम्भै रेचकोद्भवमुद्रया । उदङ्मुखासनस्थोऽपि चित्ते कृत्वोणिमादिकम् ॥ १०९१ ॥ ददीत साध्यमन्त्रेण साधकस्याभिषेचनम् । निवेश्य दक्षिणे शंभोः सकलीकृत्य पूर्ववत् ॥ १०९२ ॥ उष्णीषकर्तरीहीनमधिकारं समर्पयेत् साध्यमन्त्रं समुच्चार्य प्रणवादि तु दीपितम् ॥ १०९३ ॥ रेचकोद्भवया दद्यात्पुष्पादियुतमञ्जलौ । महाप्रसाद इत्युक्त्वा शरदिन्दुसमुज्ज्वलम् ॥ १०९४ ॥ पूरकेण हृदम्भोजे साधकस्तं निवेशयेत् । संतर्प्य पावकं भक्त्या साध्यशम्बर संहिताम् ॥ १०९५ ॥ दक्षिणे मण्डलादीनि पद्मे साध्याणुमर्चयेत् । गुरुरासादितानुज्ञो विहिताष्टाङ्गसन्नतिः ॥ १०९६ ॥ पुण्यकाले मुहूर्ते च मन्त्रारोधनमाचरेत् । अणिमादिप्रसिद्ध्यर्थं घृतस्य पयसोऽथवा ॥ १०९७ ॥ गुग्गुलैचैव साहस्रं शतं वा होममाचरेत । आगमार्थाविसंवादि पारम्पर्यक्रमागतम् ॥ १०९८ ॥ श्रीसोमशंभुनाकारि साधकस्याभिषेचनम् । नृपतीनां नराणां च वन्ध्यादीनां च योषिताम् ॥ १०९९ ॥ महाविघ्नाभिभूतानां सद्यः शान्तिकरं परम् । लक्ष्मीविजयसौभाग्यधर्मादिषु फलप्रदम् ॥ ११०० ॥ आगमा [र्था] विसंवादि लिख्यतेऽस्त्राभिषेचनम् । ॐ श्लीं पशु हूं फट् नमः हृदयाय हूं फट् नमः । ॐ श्लीं शिरसे हूँ फट् नमः । ॐ पं श्लीं शिखायै हूं फट् नमः । ॐ शुं कवचाय हूं फट् नमः । ॐ हूं फट् अस्त्राय हूं फट् नमः ॥ सकृन्मन्त्रं समुच्चार्य शरीरं विन्यसेद्बुधः । अङ्गानि विन्यसेत्पश्चादोङ्कारादिनमोन्तकम ॥ ११०१ ॥ बहिरष्टदलं पद्मं ध्यात्वास्मिन्नस्त्रमर्चयेत् । मण्डले चतुरश्रे बा रजोराजीवराजिते ॥ ११०२ ॥ प्रणवासनमारूढं दशबाहुं महाबलम् । पञ्चास्यं दशकर्णं च प्रतिवक्त्रं त्रिलोचनम् ॥ ११०३ ॥ दंष्ट्राकरालमत्युग्रं महानादं सुदुर्जयम् । लेलिहानं दुराधर्ष सूर्यकोट्ययुतप्रभम् ॥ ११०४ ॥ इत्थं पाशुपतं शस्त्रं विघ्नसंघातमर्दनम् । कर्णिकायां समासीनं पूजयेत्परमेश्वरम् ॥ ११०५ ॥ बिन्दुनादविमुक्तेन विदध्यान्मारणादिकम् । युक्तेन बिन्दुनादाभ्यां भुक्तिमुक्ती च साधयेत् ॥ ११०६ ॥ प्रणवं तैजसे पत्रे श्लींकारं शाङ्करे दले । नैऋते तु तृतीयं तु चतुर्थं वायुगोचरे ॥ ११०७ ॥ हूंकारं चैव नेत्रेषु हूंफडिन्द्रदले स्थितम् । इत्थं विन्यस्य संपूज्य विधिना होममाचरेत् ॥ ११०८ ॥ नवात्माहुतिभिस्तत्र नवभिः संस्कृते ऽनले । त्रिमधुनास्त्रराजस्य यजेदष्टाधिकं शतम् ॥ ११०९ ॥ बलिं दत्त्वा विधानेन कलशं वाभि(रि)पूरितम् । पूजयेल्लक्षणोपेतं पूर्ववत्प्रणवासने ॥ १११० ॥ पूजयेदस्त्रमन्त्रेण शतेनाष्टाधिकेन तम् । अनेन स्नापयेच्छिष्यं ध्यात्वा रूपं यथोदितम् ॥ ११११ ॥ मङ्गलैर्वेदनिर्घोषैर्भिरीतूर्याङ्ग निःस्वनैः । दद्यादस्त्राक्षतादीनि गुरुराशीः पुरःसरम् ॥ १११२ ॥ इत्थमस्त्राभिषेकोऽपि महाविघ्नान्तकारकः । हिताय कथितः पुंसां श्रीमत्सोमाख्यशंभुना ॥ १११३ ॥ इत्यभिषेकविधिः । Content is available only for registered users. 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