अग्निपुराण – अध्याय 125
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
एक सौ पचीसवाँ अध्याय
युद्धजयार्णव-सम्बन्धी अनेक प्रकार के चक्रों का वर्णन
युद्धजयार्णवीयनानाचक्राणि

शंकरजी ने कहा ‘ॐ ह्रीं कर्णमोटनि बहुरूपे बहुदंष्ट्रे ह्रूं फट्, ॐ हः, ॐ ग्रस ग्रस, कृन्त कृन्तच्छक च्छक ह्रूं फट् नमः ।’  इस मन्त्र का नाम ‘कर्णमोटी महाविद्या’ है। यह सभी वर्णों में रक्षा करने वाली है। इस मन्त्र को केवल पढ़ने से ही मनुष्य क्रोधाविष्ट हो जाता है तथा उसके नेत्र लाल हो जाते हैं। यह मन्त्र मारण, पातन, मोहन एवं उच्चाटन में उपयुक्त होता है ॥ १-२ ॥

अब स्वरोदय के साथ पाँच प्रकार के वायु का स्थान तथा उसका प्रयोजन कहता हूँ। नाभि से लेकर हृदय तक जो वायु का संचार होता रहता है, उसको ‘मारुतचक्र’ कहते हैं। जप तथा होम- कार्य में लगा हुआ क्रोधी साधक उससे संग्रामादि कार्यों में उच्चाटन कर्म करता है। कान से लेकर नेत्र तक जो वायु है, उससे प्रभेदन कार्य करे एवं हृदय से गुदामार्ग तक जो वायु है, उससे ज्वर दाह तथा शत्रुओं का मारण कार्य करना चाहिये। इसी वायु का नाम ‘वायुचक्र’ है। हृदय से लेकर कण्ठ तक जो वायु है, उसका नाम ‘रस’ है। इसे ही ‘रसचक्र’ कहते हैं। उससे शान्ति का प्रयोग किया जाता है तथा पौष्टिक रस के समान उसका गुण है। भौंह से लेकर नासिका के अग्रभाग तक जो वायु है, उसका नाम ‘दिव्य’ है। इसे ही ‘तेजश्चक्र’ कहते हैं। गन्ध इसका गुण है तथा इससे स्तम्भन और आकर्षण कार्य होता है। नासिकाग्र में मन को स्थिर करके साधक निस्संदेह स्तम्भन तथा कीलन कर्म करता है। उपर्युक्त वायुचक्र में चण्डघण्टा, कराली, सुमुखी, दुर्मुखी, रेवती, प्रथमा तथा घोरा — इन शक्तियों का अर्चन करना चाहिये। उच्चाटन करने वाली शक्तियाँ तेजश्चक्र में रहती हैं। सौम्या, भीषणी, देवी, जया, विजया, अजिता, अपराजिता, महाकोटी, महारौद्री शुष्ककाया, प्राणहरा — ये ग्यारह शक्तियाँ रसचक्र में रहती हैं ॥ ३-९ ॥

विरूपाक्षी, परा, दिव्या, ११ आकाश मातृकाएँ, संहारी, जातहारी, दंष्ट्राला, शुष्करेवती, पिपीलिका, पुष्टिहरा, महापुष्टि, प्रवर्धना, भद्रकाली, सुभद्रा, भद्रभीमा, सुभद्रिका, स्थिरा, निष्ठुरा, दिव्या, निष्कम्पा, गदिनी और रेवती — ये बत्तीस मातृकाएँ कहे हुए चारों चक्रों (मारुत, वायु, रस, दिव्य) में आठ-आठ के क्रम से स्थित रहती हैं ॥ १०- १२ ॥

सूर्य तथा चन्द्रमा एक ही हैं तथा उनकी शक्तियाँ भी भूतभेद से एक-एक ही हैं। जैसे भूतल पर नदी के जल की स्थानभेद से ‘तीर्थ’ संज्ञा हो जाती है, शरीर के अस्थिपञ्जर में रहने वाला एक ही प्राण कई मण्डलों (चक्रों) से विभक्त हो जाता है। जैसे वाम तथा दक्षिण अङ्ग के योग से वही वायु दस प्रकार का हो जाता है, वैसे ही वही वायु तत्त्वरूपी वस्त्र में छिपकर विचित्र बिन्दुरूपी मुण्ड के द्वारा कपालरूपी ब्रह्माण्ड के अमृत का पान करता है ॥ १३-१५ ॥

अब पञ्चवर्ग के बल से जिस प्रकार युद्ध में विजय होती है, उसे सुनो — ‘अ, आ, क, च, ट, त, प, य, श’ — यह प्रथम वर्ग कहा गया है। ‘इ, ई, ख, छ, ठ, थ, फ, र, ष’ — यह द्वितीय वर्ग है। ‘उ, ऊ, ग, ज, ड, द, ब, ल, स’ — यह तृतीय वर्ग है। ‘ए, ऐ, घ, झ, ढ, ध, भ, व, ह’ — यह चौथा वर्ग है। ‘ओ, औ, अं, अः, ङ, ञ, ण, न, म’ — यह पञ्चम वर्ग है। ये पैंतालीस अक्षर मनुष्यों के अभ्युदय के लिये हैं। इन वर्गों के क्रम से बाल, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत्यु — ये पाँच नाम हैं ॥ १६-१९ ॥

(अब तिथि, वार और नक्षत्रों के योग से काल- ज्ञान का वर्णन करते हैं —)  आत्मपीड़, शोषक, उदासीन — ये तीन प्रकार के काल होते हैं। मङ्गलवार को प्रतिपदा तिथि तथा कृत्तिका नक्षत्र हों तो वे प्राणी के लिये लाभदायक होते हैं। मङ्गलवार को षष्ठी तिथि तथा मघा नक्षत्र हों तो पीड़ाकारक होते हैं। मङ्गलवार को एकादशी तिथि और आर्द्रा नक्षत्र हों तो वे मृत्युदायक होते हैं। बुधवार, द्वितीया तिथि तथा मघा नक्षत्र का योग एवं बुधवार, सप्तमी तिथि और आर्द्रा नक्षत्र का योग लाभदायक होते हैं। बुधवार और भरणी नक्षत्र का योग हानिकारक होता है। इसी प्रकार बुधवार तथा श्रवण नक्षत्र के योग में ‘कालयोग’ होता है। बृहस्पतिवार, तृतीया तिथि और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का योग लाभकारक होता है। बृहस्पतिवार, अष्टमी तिथि, धनिष्ठा तथा आर्द्रा नक्षत्र एवं गुरुवार, त्रयोदशी तिथि, आश्लेषा नक्षत्र — ये योग मृत्युकारक होते हैं। शुक्रवार, चतुर्थी तिथि और पूर्वभाद्रपदा नक्षत्र का योग श्री वृद्धि करता है। शुक्रवार, नवमी तिथि और पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र — यह योग दुःखप्रद होता है। शुक्रवार, द्वितीया तिथि और भरणी नक्षत्र का योग यमदण्ड के समान हानिकर होता है। शनिवार पञ्चमी तिथि और कृत्तिका नक्षत्र का योग लाभ के लिये कहा गया है। शनिवार, दशमी तिथि और आश्लेषा नक्षत्र का योग पीड़ाकारक होता है शनिवार, पूर्णिमा तिथि और मघा नक्षत्र का योग मृत्युकारक कहा गया है ॥ २०-२६ ॥

(अब दिशा-तिथि दिन के योग से हानि-लाभ कहते हैं —) पूर्व, उत्तर, अग्नि, नैर्ऋत्य, दक्षिण, वायव्य, पश्चिम, ऐशान्य — ये इनमें से एक-दूसरे को देखते हैं। प्रतिपदा तथा नवमी आदि तिथियों में मेषादि राशियों के साथ ही रवि आदि वार को भी मिलाये। यह योग कार्यसिद्धि के लिये होता है। जैसे पूर्व दिशा, प्रतिपदा तिथि, मेष लग्न, रविवार — यह योग पूर्व दिशा के लिये युद्ध आदि कार्यों में सिद्धिदायक होता है। ऐसे और भी समझने चाहिये। मेष से चार राशियाँ अर्थात् मेष, वृष, मिथुन, कर्क एवं कुम्भ — ये लग्न पूर्ण विजय के लिये होते हैं। शेष राशियाँ मृत्यु के लिये होती हैं। सूर्यादि ग्रह तथा रिक्ता, पूर्णा आदि तिथियों का इसी तरह क्रमशः न्यास करना चाहिये, जैसा कि पहले दिशाओं के साथ कहा गया है। सूर्य के सम्बन्ध से युद्ध में कोई उत्तम फल नहीं होता सोम का सम्बन्ध संधि के लिये होता है। मङ्गल के सम्बन्ध से कलह होता है। बुध के सम्बन्ध से संग्राम करने से अभीष्ट साधन की प्राप्ति होती है। गुरु के सम्बन्ध से विजय लाभ होता है। शुक्र के सम्बन्ध से अभीष्ट सिद्ध होता है एवं शनि के सम्बन्ध से युद्ध में पराजय होती है ॥ २७-३० ॥

(पिङ्गला (पक्षि) चक्र से शुभाशुभ कहते हैं —) एक पक्षी का आकार लिखकर उसके मुख, नेत्र, ललाट, सिर, हस्त, कुक्षि, चरण तथा पंख में सूर्य के नक्षत्र से तीन-तीन नक्षत्र लिखे। पैर वाले तीन नक्षत्रों में रण करने से मृत्यु होती है तथा पंख वाले तीन नक्षत्रों में धन का नाश होता है। मुख वाले तीन नक्षत्रों में पीड़ा होती है और सिर वाले तीन नक्षत्रों में कार्य का नाश होता है। कुक्षि वाले तीन नक्षत्रों में रण करने से उत्तम फल होता है ॥ ३१-३२ ॥

(अब राहुचक्र कहते हैं —) पूर्व से नैर्ऋत्यकोणतक, नैर्ऋत्यकोण से उत्तर दिशातक, उत्तर दिशा से अग्निकोणतक, अग्निकोण से पश्चिमतक, पश्चिम से ईशानतक, ईशान से दक्षिणतक, दक्षिण से वायव्यकोणतक, वायव्यकोण से उत्तरतक चार-चार दण्ड तक राहु का भ्रमण होता है। राहु को पृष्ठ की ओर रखकर रण करना विजयप्रद होता है तथा राहु के सम्मुख रहने से मृत्यु हो जाती है ॥ ३३-३४ ॥

प्रिये ! मैं तुमसे अब तिथि-राहु का वर्णन करता हूँ। पूर्णिमा के बाद कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से अग्निकोण से लेकर ईशानकोण तक अर्थात् कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि तक राहु पूर्व दिशा में रहता है। उसमें युद्ध करने से जय होती है। इसी तरह ईशान से अग्निकोण तक और नैर्ऋत्यकोण से वायव्यकोण तक राहु का भ्रमण होता रहता है। मेषादि राशियों को पूर्वादि दिशा में रखना चाहिये। इस तरह रखने पर मेष, सिंह, धनु राशियाँ पूर्व में; वृष, कन्या, मकर — ये दक्षिण में; मिथुन, तुला, कुम्भ — ये पश्चिम में; कर्क, वृश्चिक, मीन — ये उत्तर में हो जाती हैं। सूर्य की राशि से सूर्य की दिशा जानकर सम्मुख सूर्य में रण करना मृत्युकारक होता है ॥ ३५-३७ ॥

(भद्रा की तिथि का निर्णय बताते हैं —) कृष्णपक्ष में तृतीया, सप्तमी, दशमी तथा चतुर्दशी को ‘भद्रा’ होती है। शुक्लपक्ष में चतुर्थी, एकादशी, अष्टमी और पूर्णिमा को ‘भद्रा’ होती है। भद्रा का निवास अग्निकोण से वायव्यकोण तक रहता है। अ, क, च, ट, त, प, य, श — ये आठ वर्ग होते हैं, जिनके स्वामी क्रम से सूर्य, चन्द्रमा, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु ग्रह होते हैं। इन ग्रहों के वाहन क्रम से गृध्र, उलूक, बाज, पिङ्गल, कौशिक (उलूक), सारस, मयूर, गोरङ्क नाम के पक्षी हैं। पहले हवन करके मन्त्रों को सिद्ध कर लेना चाहिये। उच्चाटन में मन्त्रों का प्रयोग पल्लवरूप से करना चाहिये ॥ ३८- ४० ॥

वश्य, ज्वर एवं आकर्षण में पल्लव का प्रयोग सिद्धिकारक होता है। शान्ति तथा मोहन प्रयोगों में ‘नमः’ कहना ठीक होता है। पुष्टि में तथा वशीकरण में ‘वौषट्’ एवं मारण तथा प्रीतिविनाश के प्रयोग में ‘हुम्’ कहना ठीक होता है। विद्वेषण तथा उच्चाटन में ‘फट्’ कहना चाहिये। पुत्रादि- प्राप्ति के प्रयोग में तथा दीति आदि में ‘वषट्’ कहना चाहिये। इस तरह मन्त्रों की छः जातियाँ होती हैं ॥ ४१-४२ ॥

अब हर तरह से रक्षा करने वाली ओषधियों का वर्णन करूंगा — महाकाली, चण्डी, वाराही ( वाराहीकंद), ईश्वरी, सुदर्शना, इन्द्राणी (सिंधुवार) — इनको शरीर में धारण करने से ये धारक की रक्षा करती हैं। बला (कुट), अतिबला (कंधी), भीरु (शतावरी अथवा कंटकारी), मुसली (तालमूली), सहदेवी, जाती (चमेली), मल्लिका (मोतिया), यूथी (जूही), गारुड़ी, भृङ्गराज (भटकटैया), चक्ररूपा — ये महौषधियाँ धारण करने से युद्ध में विजयदायिनी होती हैं। महादेवि ! ग्रहण लगने पर पूर्वोक्त ओषधियों का उखाड़ना शुभदायक होता है ॥ ४३–४६ ॥

हाथी की सर्वाङ्ग सम्पन्न मिट्टी की मूर्ति बनाकर, उसके पैर के नीचे शत्रु के स्वरूप को रखकर, स्तम्भन प्रयोग करना चाहिये। अथवा किसी पर्वत के ऊपर, जहाँ पर एक ही वृक्ष हो, उसके नीचे, अथवा जहाँ पर बिजली गिरी हो, उस प्रदेश में, वल्मीक की मिट्टी से एक स्त्री की प्रतिकृति बनाये। फिर ‘ॐ नमो महाभैरवाय विकृतदंष्ट्रोग्ररूपाय पिंगलाक्षाय त्रिशूलखड्गधराय वौषट्।’ हे देवि! इस मन्त्र से उस मृत्तिकामयी देवी की पूजा करके (शत्रु के) शस्त्र समूह का स्तम्भन करना चाहिये ॥ ४७-४८ ॥

अब संग्राम में विजय दिलाने वाले अग्नि कार्य का वर्णन करूँगा — रात में श्मशान में जाकर नंग-धड़ंग, शिखा खोलकर, दक्षिण मुख बैठकर जलती हुई चिता में मनुष्य का मांस, रुधिर, विष, भूसी और हड्डी के टुकड़े मिलाकर नीचे लिखे मन्त्र से आठ सौ बार शत्रु का नाम लेकर हवन करे — ‘ॐ नमो भगवति कौमारि लल लल लालय लालय घण्टादेवि ! अमुकं मारय मारय सहसा नमोऽस्तु ते भगवति विद्ये स्वाहा ।’ इस विद्या से हवन करने पर शत्रु अंधा हो जाता है ॥ ४९–५० ॥

(सब प्रकार की सफलता के लिये हनुमान् जी का मन्त्र कहते हैं —)  ‘ॐ वज्रकाय वज्रतुण्ड कपिलपिङ्गल करालवदनोर्ध्वकेश महाबल रक्तमुख तडिजिह्व महारौद्र दंष्ट्रोत्कट कटकरालिन् महादृढप्रहार लङ्केश्वरसेतुबन्ध शैलप्रवाह गगनचर, एह्येहि भगवन् महाबलपराक्रम भैरवो ज्ञापयति, एह्येहि महारौद्र दीर्घलाङ्गूलेन अमुकं वेष्टय वेष्टय जम्भय जम्भय खन खन वैते ह्रूं फट्।’ देवि! इस मन्त्र को ३८०० बार जप कर लेने पर श्रीहनुमान् जी सब प्रकार के कार्यों को सिद्ध कर देते हैं। कपड़े पर हनुमान् जी की मूर्ति लिखकर दिखाने से शत्रुओं का विनाश होता है ॥ ५१-५२ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘युद्धजयार्णव-सम्बन्धी विविध चक्रों का वर्णन’ नामक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥

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