July 15, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 294 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ चौरानबेवाँ अध्याय नाग-लक्षण 1 नागलक्षणानिः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं नागों की उत्पत्ति, सर्पदंश में अशुभ नक्षत्र आदि, सर्पदंश के विविध भेद, देश के स्थान, मर्मस्थल, सूतक और सर्पदष्ट मनुष्य की चेष्टा — इन सात लक्षणों को कहता हूँ ॥ १ ॥ शेष, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंखपाल एवं कुलिक — ये आठ नागों में श्रेष्ठ हैं। इन नागों में से दो नाग ब्राह्मण, दो क्षत्रिय, दो वैश्य और दो शूद्र कहे गये हैं। 2 ये चार वर्णों के नाग क्रमशः दस सौ, आठ सौ, पाँच सौ और तीन सौ फणों से युक्त हैं। इनके वंशज पाँच सौ नाग हैं। उनसे असंख्य नागों की उत्पत्ति हुई है। आकार भेद से सर्प फणी, मण्डली और राजिल — तीन प्रकार के माने जाते हैं। ये वात, पित्त और कफप्रधान हैं। इनके अतिरिक्त व्यन्तर, दोषमिश्र तथा दर्वीकर जाति वाले सर्प भी होते हैं। ये चक्र, हल, छत्र, स्वस्तिक और अंकुश के चिह्नों से युक्त होते हैं। गोनस सर्प विविध मण्डलों से चित्रित, दीर्घकाय और मन्दगामी होते हैं। राजिल सर्प स्निग्ध तथा ऊर्ध्व भाग और पार्श्वभाग में रेखाओं से सुशोभित होते हैं। व्यन्तर सर्प मिश्रित चिह्नों से युक्त होते हैं। इनके पार्थिव, आप्य (जलसम्बन्धी), आग्नेय और वायव्य — ये चार मुख्य भेद और छब्बीस अवान्तर भेद हैं। गोनस सर्पों के सोलह, राजिल जातीय सर्पों के तेरह और व्यन्तर सर्पों के इक्कीस भेद हैं। सर्पों की उत्पत्ति के लिये जो काल बताया गया है, उससे भिन्न काल में जो सर्प उत्पन्न होते हैं, वे ‘व्यन्तर’ माने गये हैं आषाढ़ से लेकर तीन मासों तक सर्पों की गर्भस्थिति होती है। गर्भस्थिति के चार मास व्यतीत होने पर (सर्पिणी) दो सौ चालीस अंडे प्रसव करती है। ‘ सर्प-शावक के उन अंडों से बाहर निकलते ही उनमें स्त्री, पुरुष और नपुंसक के लक्षण प्रकट होने से पूर्व ही प्रायः सर्पगण उनको खा जाते हैं। कृष्णसर्प आँख खुलने पर एक सप्ताह में अंडे से बाहर आता है। उसमें बारह दिनों के बाद ज्ञान का उदय होता है। बीस दिनों के बाद सूर्यदर्शन होने पर उसके बत्तीस दाँत और चार दाड़ें निकल आती हैं। सर्प की कराली, मकरी, कालरात्रि और यमदूतिका — ये चार विषयुक्त दाढ़ें होती हैं। ये उसके वाम और दक्षिण पार्श्व में स्थित होती हैं। सर्प छः महीने के बाद केंचुल को छोड़ता है और एक सौ बीस वर्ष तक जीवित रहता है। शेष आदि सात नाग क्रमशः रवि आदि वारों के स्वामी माने गये हैं। वे वारेश दिन तथा रात्रि में भी रहते हैं। (दिन के सात भाग करने पर पहला भाग वारेश का होता है। शेष छः भागों का अन्य छः नाग क्रमशः उपभोग करते हैं।) शेष आदि सात नाग अपने-अपने वारों में उदित होते हैं, किंतु कुलिक 3 का उदय सबके संधिकाल में होता है। अथवा महापद्म और शङ्खपाल के साथ कुलिक का उदय माना जाता है। मतान्तर के अनुसार महापद्म और शङ्खपाल के मध्य की दो घड़ियों में कुलिक का उदय होता है। कुलिकोदय का समय सभी कार्यों में दोषयुक्त माना गया है। सर्पदंश में तो वह विशेषतः अशुभ है। कृत्तिका, भरणी, स्वाती, मूल, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वभाद्रपदा, अश्विनी, विशाखा, आर्दा, आश्लेषा, चित्रा, श्रवण, रोहिणी, हस्त नक्षत्र, शनि तथा मङ्गलवार एवं पञ्चमी, अष्टमी, षष्ठी, रिक्ता-चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी एवं शिवा (तृतीया) तिथि सर्पदंश में निन्द्य मानी गयी हैं। पञ्चमी और चतुर्दशी तिचियों में सर्प का दंशन विशेषतः निन्दित है। यदि सर्प चारों संध्याओं के समय, दग्धयोग या दग्धराशि में डँस ले, तो अनिष्टकारक होता है। एक, दो और तीन दंशनों को क्रमशः ‘दष्ट’, ‘विद्ध’ और ‘खण्डित’ कहते हैं। सर्प का केवल स्पर्श हो, परंतु वह डँसे नहीं तो उसे ‘अदेश’ कहते हैं। इसमें मनुष्य सुरक्षित रहता है। इस प्रकार सर्पदंश के चार भेद हुए। इनमें तीन, दो एवं एक दंश वेदना-जनक और रक्तस्राव करने वाले हैं। एक पैर और कूर्म के समान आकार वाले दंश मृत्यु से प्रेरित होते हैं। अङ्गों में दाह, शरीर में चीटियों के रेंगने का-सा अनुभव, कण्ठशोथ एवं अन्य पीड़ा से युक्त और व्यथाजनक गाँठ वाला दंशन विषयुक्त माना जाता है, इनसे भिन्न प्रकार का सर्पदंश विषहीन होता है। देवमन्दिर, शून्यगृह, वल्मीक (बाँबी), उद्यान, वृक्ष के कोटर, दो सड़कों या मार्गों की संधि, श्मशान, नदी-सागर-संगम, द्वीप, चतुष्पथ (चौराहा), राजप्रासाद, गृह, कमलवन, पर्वतशिखर, बिलद्वार, जीर्णकूप, जीर्णगृह, दीवाल, शोभाञ्जन, श्लेष्मातक (लिसोडा) वृक्ष, जम्बूवृक्ष, उदुम्बरवृक्ष, वेणुवन (बैसवारी), वटवृक्ष और जीर्ण प्राकार (चहारदीवारी) आदि स्थानों में सर्प निवास करते हैं। इन्द्रिय-छिद्र, मुख, हृदय, कक्ष, जत्रु (ग्रीवामूल), तालु, ललाट, ग्रीवा, सिर, चिबुक (ठुड्डी), नाभि और चरण — इन अङ्गों में सर्पदंश अशुभ है। विषचिकित्सक को सर्पदंश की सूचना देने वाला दूत यदि हाथों में फूल लिये हो, सुन्दर वाणी बोलता हो, उत्तम बुद्धि से युक्त हो, सर्पदष्ट मनुष्य के समान लिङ्ग एवं जातिका हो, श्वेतवस्त्रधारी हो, निर्मल और पवित्र हो, तो शुभ माना गया है। इसके विपरीत जो दूत मुख्यद्वार के सिवा दूसरे मार्ग से आया हो, शस्त्रयुक्त एवं प्रमादी हो, भूमि पर दृष्टि गड़ाये हो, गंदा या बदरंग वस्त्र पहने हो, हाथ में पाश आदि लिये हो, गद्गदकण्ठ से बोल रहा हो, सूखे काठ पर बैठा हो, खिन्न हो तथा जो हाथ में काले तिल लिये हो या लाल रंग के धब्बे से युक्त वस्त्र धारण किये हो अथवा भीगे वस्त्र पहने हुए हो, जिसके मस्तक के बालों पर काले और लाल रंग के फूल पड़े हों, अपने कुचों का मर्दन, नखों का छेदन या गुदा का स्पर्श कर रहा हो, भूमि को पैर से खुरच रहा हो, केशों को नोंच रहा हो या तिनके तोड़ रहा हो, ऐसे दूत दोषयुक्त कहे गये हैं। इन लक्षणों में से एक भी हो तो अशुभ है ॥ २-२८ ॥ अपनी और दूत को यदि इडा अथवा पिङ्गला या दोनों ही नाड़ियाँ चल रही हों, उन दोनों के इन चिह्नों से डँसने वाले सर्प को क्रमशः स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसक जाने। दूत अपने जिस अंग का स्पर्श करे, रोगी के उसी अंग में सर्प का दंश हुआ जाने। दूत के पैर चञ्चल हों तो अशुभ और यदि स्थिर हों तो शुभ माने गये हैं ॥ २९-३० ॥ किसी जीव के पार्श्वदेश में स्थित दूत शुभ और अन्य भागों में स्थित अशुभ माना गया है। दूत के निवेदन के समय किसी जीव का आगमन शुभ और गमन अशुभ है। दूत की वाणी यदि अत्यन्त दोषयुक्त हो अथवा सुस्पष्ट प्रतीत न होती हो तो वह निन्दित कही गयी है। उसके सुस्पष्ट एवं विभक्त वचनों द्वारा यह ज्ञात होता है कि सर्प का दंशन विषयुक्त है अथवा विषरहित। दूत के वाक्य के आदि में ‘स्वर’ और ‘कादि’ वर्ग के भेद से लिपि के दो प्रकार माने जाते हैं। दूत के वचन से वाक्य के आरम्भ में स्वर प्रयुक्त हो, तो सर्पदष्ट मनुष्य की जीवनरक्षा और कादिवर्गों के प्रयुक्त होने पर अशुभ की आशङ्का होती है। यह मातृका-विधान है। ‘क’ आदि वर्गों में आरम्भ के चार अक्षर क्रमशः वायु, अग्नि, इन्द्र और वरुणदेवता-सम्बन्धी होते हैं। कादि वर्गों के पञ्चम अक्षर नपुंसक माने गये हैं। ‘अ’ आदि स्वर ह्रस्व और दीर्घ के भेद से क्रमशः इन्द्र एवं वरुणदेवता-सम्बन्धी होते हैं। दूत के वाक्यारम्भ में वायु और अग्निदैवत्य अक्षर दूषित और ऐन्द्र अक्षर मध्यम फलप्रद हैं। वरुणदैवत्य वर्ण उत्तम और नपुंसक वर्ण अत्यन्त अशुभ हैं ॥ ३१-३५ ॥ विषचिकित्सक के प्रस्थानकाल में मङ्गलमय वचन, मेघ और गजराज की गर्जना, दक्षिणपार्श्व में फलयुक्त वृक्ष हो और वामभाग में किसी पक्षी का कलरव हो रहा हो, तो वह विजय या सफलता का सूचक है। प्रस्थानकाल में गीत आदि के शब्द शुभ होते हैं। दक्षिणभाग में अनर्थसूचक वाणी, चक्रवाक का रुदन — ऐसे लक्षण सिद्धि के सूचक हैं। पक्षियों की अशुभ ध्वनि और छींक — ये कार्य में असिद्धि प्रदान करते हैं। वेश्या, ब्राह्मण, राजा, कन्या, गौ, हाथी, ढोलक, पताका, दुग्ध, घृत, दही, शङ्ख, जल, छत्र, भेरी, फल, मदिरा, अक्षत, सुवर्ण और चाँदी — ये लक्षण सम्मुख होने पर कार्यसिद्धि के सूचक हैं। काष्ठ पर अग्नि से युक्त शिल्पकार, मैले कपड़ों का बोझ ढोने वाले पुरुष, गले में टंक (पाषाणभेदक शस्त्र) धारण किये हुए मनुष्य, श्रृंगाल, गृध्र, उलूक, कौड़ी, तेल, कपाल और निषिद्ध भस्म- — ये लक्षण नाश के सूचक हैं। विष के एक धातु से दूसरे धातु में प्रवेश करने से विषसम्बन्धी सात रोग होते हैं। विषदंश पहले ललाट में, ललाट से नेत्र में और नेत्र से मुख में जाता है। मुख में प्रविष्ट होने के बाद वह सम्पूर्ण धमनियों में व्याप्त हो जाता है। फिर क्रमशः धातुओं में प्रवेश करता है ॥ ३६-४१ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘नागलक्षणकथन नामक दो सौ चौरानवेयाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९४ ॥ 1. अग्निपुराण में जिस धन्वन्तरि सुश्रुत-संवाद द्वारा आयुर्वेद का प्रतिपादन किया गया है, वही विस्तारपूर्वक ‘सुश्रुत’ ग्रन्थ में वर्णित है। सर्पों के सम्बन्ध में ‘सुश्रुत’ ग्रन्थ में (पू० तन्त्र, कल्पस्थान, अध्याय ४ में) जो कुछ कहा गया है, उसका सारांश इस प्रकार है — सर्प दो प्रकार के होते हैं — ‘दिव्य’ और ‘भौम’। दिव्य सर्प वासुकि और तक्षक आदि हैं। वे इस पृथ्वी का बोझ उठाने वाले हैं; प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी होते हैं। वे कुपित हो जायँ तो फुफकार और दृष्टिमात्र से सम्पूर्ण जगत् को दग्ध कर सकते हैं। वे सदा नमस्कार के ही योग्य हैं। उनके डसने की कोई दवा नहीं है। चिकित्सा से उनका कोई प्रयोजन नहीं है। परंतु जो भूमि पर उत्पन्न होने वाले सर्प हैं, जिनकी दाढों में विष होता है तथा जो मनुष्यों को काटते हैं, उनकी संख्या अस्सी है। उन सबके पाँच भेद हैं — दर्वीकर, मण्डली, राजिमान्, निर्विष और वैकरञ्ज। राजिमान् को ही अग्निपुराण में ‘राजिल’ कहा गया है। इनमें ‘दर्वीकर’ छब्बीस, ‘मण्डली’ बाईस, ‘राजिमान्’ (या राजिल) दस, ‘निर्विष’ बारह तथा ‘वैकरञ्ज’ तीन प्रकार के होते हैं। वैकरञ्जों द्वारा मण्डली तथा राजिल के संयोग से उत्पन्न चित्रित सर्प सात प्रकार के माने गये हैं। मण्डली के संयोग से उत्पन्न चार और राजिल के संयोग से उत्पन्न तीन। इस तरह इनके अस्सी प्रकार हुए। दर्वीकर सर्प चक्र, हल, छत्र, स्वस्तिक और अड्कुश का चिह्न धारण करने वाले, फणयुक्त तथा शीघ्रगामी होते हैं। मण्डली सर्प विविध मण्डलों से चित्रित, मोटे तथा मन्दगामी हुआ करते हैं। वे अग्नि तथा सूर्य के तुल्य तेजस्वी जान पड़ते हैं। राजिमान् अथवा राजिल सर्प चिकने होते हैं। वे तिरछी, ऊर्ध्वगामिनी एवं बहुरंगी रेखाओं द्वारा चित्रित से जान पड़ते हैं। चरक ने भी इन सर्पों के विषय में ऐसा ही, किंतु संक्षिप्त विवरण दिया है- दर्वीकरः फणी ज्ञेयो मण्डली मण्डलाफणः। बिन्दुलेखो विचित्राङ्गः पतङ्गः स्यात्तु राजिमान् ॥ ‘फणवाले (दर्वीकर) सर्प वायु को प्रकुपित करते हैं। मण्डली सर्पों के दंशन से पित्त का प्रकोप बढ़ता है तथा राजिमान् सर्प कफ-प्रकोप को बढ़ाने वाले होते हैं।’ (सुश्रुत, उत्तरतन्त्र, कल्पस्थान ४।२९) ‘राजिमान् सर्प रात के पिछले पहर में, मण्डली सर्प रात के शेष तीन पहरों में और दर्वीकर सर्प दिन में चरते और विचरते हैं।’ (सुश्रुत, उत्तरतन्त्र, कल्पस्थान ४।३१) ‘दर्वीकर सर्प तरुणावस्था में, मण्डली वृद्धावस्था में और राजिमान् सर्प मध्यवय में उग्र विष वाले होकर लोगों की मृत्यु के कारण बनते हैं। (सुश्रुत ४।३२) मण्डली सर्पों को गोनस भी कहते हैं।’ ‘सुश्रुत संहिता’ की ‘आयुर्वेद-तत्त्व-संदीपिका’ व्याख्या में सर्पो का वर्गीकरण इस प्रकार दिया गया है — ‘सुश्रुत संहिता’, पू० तन्त्र, कल्पस्थान, अध्याय ४ श्लोक २५ से २८ तक कुछ विशेष चिह्न और रंगों के आधार पर सर्पों में ब्राह्मणादि जातियों की परिकल्पना की गयी है । जो सर्प मोती और चाँदी के समान सफेद, कपिल वर्ण के सुनहरे रंग के तथा सुगन्धयुक्त होते हैं, वे जाति से ब्राह्मण माने गये हैं । जो स्निग्ध वर्ण (चिकने), अत्यन्त क्रोधी, सूर्य और चन्द्रमा के समान आकृति के या छत्र अथवा कमल के समान चिह्न धारण करने वाले होते हैं, उन्हें क्षत्रिय जाति का सर्प मानना चाहिये। जो काले और वज्र के समान रंग वाले हैं अथवा जो कान्ति से लाल, धूमिल एवं कबूतर के से दिखायी देते हैं, वे सर्प वैश्य माने गये हैं। जिनका रंग भैसों और चीतों के समान हो, जो कठोर त्वचा वाले हों, वे भाँति-भाँति के विचित्र रंग वाले सर्प शूद्र जाति के होते हैं । 2. तन्त्रसार – संग्रह ‘की ‘विषनारायणीय’ टीका में ब्राह्मण आदि वर्णवाले दो-दो नागों के क्रम के विषय में एक श्लोक उपलब्ध होता है — आद्यन्तौ च तदाद्यन्तौ तदाद्यन्तौ च मध्यगौ । ‘ आदि और अन्त के नाग ब्राह्मण हैं। उसके बाद पुनः आदि-अन्त के नाग क्षत्रिय हैं, तत्पश्चात् पुनः आदि-अन्त के नाग वैश्य हैं और मध्यवर्ती दो नाग शूद्र हैं ।’ ‘शारदातिलक’ १० । ७ में इन नागों को त्वरिता देवी का आभूषण बताया गया है। उक्त श्लोक की टीका में उद्धृत ‘नारायणीय तन्त्र के श्लोकों में इन नागों का ध्यान इस प्रकार बताया गया है — अनन्तकुलिकौ विप्रौ वह्निवर्णावुदाहृतौ । प्रत्येकं तु सहस्रेण फणानां समलंकृतौ ॥ वासुकिः शङ्खपालश्च क्षत्रियौ पीतवर्णकौ । प्रत्येकं तु फणासप्तशतसंख्याविराजितौ ॥ तक्षकश्च महापद्मो वैश्यावेतावही स्मृतौ । नीलवर्णौ फणापञ्चशतौ तुङ्गोत्तमाङ्गकौ ॥ पद्मकर्कोटकौ शूद्रौ फणात्रिशतकौ सितौ । ‘अनन्त ( शेषनाग ) और कुलिक — ये दो नाग ब्राह्मण कहे गये हैं । इनकी अङ्गकान्ति अग्नि के समान उज्ज्वल है। इनमें से प्रत्येक सहस्र फणों से समलंकृत हैं । वासुकि और शङ्खपाल — ये क्षत्रिय हैं। इनकी कान्ति पीली है । इनमें से प्रत्येक सात सौ फणों द्वारा सुशोभित हैं। तक्षक और महापद्म — ये दो नाग वैश्य माने गये हैं । इनकी अङ्गकान्ति नीली है । इनके उन्नत मस्तक पाँच-पाँच सौ फणों से अलंकृत हैं। पद्म तथा कर्कोटक — ये दो नाग शूद्र हैं और उनकी कान्ति श्वेत है । ‘ निम्नाङ्कित रीति से नागों के वर्ण आदि को जानना चाहिये — 3. प्रतिदिन दिनमान के सात भागों में वारेश से आरम्भ कर कुलिक के सिवा अन्य सात नाग क्रमशः एक-एक अंश के स्वामी होते हैं । लोकप्रचलित फलित ग्रन्थों में शनि का अंश ही कुलिक का अंश माना गया है। इसलिये महापद्म और शङ्खपाल के मध्य की दो घड़ी ही सर्वसम्मत ‘कुलिकोदयकाल’ प्रतीत होता है । Content is available only for registered users. 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