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शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [प्रथम-सृष्टिखण्ड] – अध्याय 13
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
तेरहवाँ अध्याय
शिवपूजन की सर्वोत्तम विधि का वर्णन

ब्रह्माजी बोले — अब मैं पूजा की सर्वोत्तम विधि बता रहा हूँ, जो समस्त अभीष्ट सुखों को सुलभ करानेवाली है । हे देवताओ तथा ऋषियो ! आपलोग ध्यान देकर सुनें ॥ १ ॥ उपासक को चाहिये कि वह ब्राह्म मुहूर्त में उठकर जगदम्बा पार्वतीसहित भगवान् शिव का स्मरण करे तथा हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर भक्तिपूर्वक उनसे इस प्रकार प्रार्थना करे — ॥ २ ॥

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ देवेश उत्तिष्ठ हृदयेशय ।
उत्तिष्ठ त्वमुमास्वामिन्ब्रह्माण्डे मंगलं कुरु ॥ ३ ॥
जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिर्जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः ।
त्वया महादेव हृदिस्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि ॥ ४ ॥

हे देवेश्वर ! उठिये, उठिये । मेरे हृदय में शयन करनेवाले देवता ! उठिये । हे उमाकान्त ! उठिये और ब्रह्माण्ड में सबका मंगल कीजिये । मैं धर्म को जानता हूँ, किंतु मेरी उसमें प्रवृत्ति नहीं होती, मैं अधर्म को जानता हूँ, परंतु मैं उससे दूर नहीं हो पाता । हे महादेव ! आप मेरे हृदय में स्थित होकर मुझे जैसी प्रेरणा देते हैं, वैसा ही मैं करता हूँ ॥ ३-४ ॥

शिवमहापुराण

भक्तिपूर्वक यह वचन कहकर और गुरु के चरणों का स्मरण करके गाँव से बाहर दक्षिण दिशा में मलमूत्र का त्याग करने के लिये जाय ॥ ५ ॥ इसके बाद मिट्टी और जल से शरीर की शुद्धि करके दोनों हाथों और पैरों को धोकर दन्तधावन करे ॥ ६ ॥ सूर्योदय होने से पहले ही दातौन करके मुँह को सोलह बार जल की अँजलियों से धोये । हे देवताओ तथा ऋषियो ! षष्ठी, प्रतिपदा, अमावास्या और नवमी तिथियों तथा रविवार के दिन शिवभक्त को यत्नपूर्वक दातौन को त्याग देना चाहिये ॥ ७-८ ॥

अवकाश के अनुसार नदी आदि में जाकर अथवा घर में ही भली-भाँति स्नान करे । मनुष्य को देश और काल के विरुद्ध स्नान नहीं करना चाहिये ॥ ९ ॥ रविवार, श्राद्ध, संक्रान्ति, ग्रहण, महादान, तीर्थ, उपवास-दिवस अथवा अशौच प्राप्त होने पर मनुष्य गर्म जल से स्नान न करे । शिवभक्ति से युक्त मनुष्य तीर्थ आदि में प्रवाह के सम्मुख होकर स्नान करे ॥ १०-११ ॥ जो नहाने के पहले तेल लगाना चाहे, उसे विहित एवं निषिद्ध दिनों का विचार करके ही तैलाभ्यंग करना चाहिये । जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तेल लगाता हो, उसके लिये किसी भी दिन तैलाभ्यंग करना दोषपूर्ण नहीं है । अथवा जो तेल इत्र आदि से वासित हो, उसका लगाना किसी भी दिन दूषित नहीं है ॥ १२ ॥

श्राद्ध, ग्रहण, उपवास और प्रतिपदा के दिन तेल नहीं लगाना चाहिये । सरसों का तेल ग्रहण को छोड़कर किसी भी दिन दूषित नहीं होता ॥ १३ ॥ इस तरह देश-काल का विचार करके ही विधिपूर्वक स्नान करे । स्नान के समय अपने मुख को उत्तर अथवा पूर्व की ओर रखना चाहिये ॥ १४ ॥ उच्छिष्ट वस्त्र धारण करके स्नान कभी न करे । शुद्ध वस्त्र धारण करके इष्टदेव का स्मरण करते हुए स्नान करना चाहिये ॥ १५ ॥ जिस वस्त्र को दूसरे ने धारण किया हो तथा जिसे स्वयं रात में धारण किया गया हो, उससे तभी स्नान किया जा सकता है, जब उसे धो लिया गया हो ॥ १६ ॥ इसके पश्चात् देवताओं, ऋषियों तथा पितरों को तृप्ति देनेवाला तर्पण करना चाहिये । उसके बाद धुला हुआ वस्त्र पहने और आचमन करे ॥ १७ ॥

हे श्रेष्ठ द्विजो ! तदनन्तर गोबर आदि से लीपपोतकर स्वच्छ किये हुए शुद्ध स्थान में जाकर वहाँ सुन्दर आसन की व्यवस्था करे । वह आसन विशुद्ध काष्ठ का बना हुआ, पूरा फैला हुआ तथा चित्रमय होना चाहिये । ऐसा आसन सम्पूर्ण अभीष्ट फलों को देनेवाला है ॥ १८-१९ ॥ उसके ऊपर बिछाने के लिये यथायोग्य मृगचर्म आदि ग्रहण करे । शुद्ध बुद्धिवाला पुरुष उस आसन पर बैठकर भस्म से त्रिपुण्ड्र लगाये ॥ २० ॥ त्रिपुण्ड्र से जप, तप तथा दान सफल होते हैं । भस्म के अभाव में त्रिपुण्ड्र का साधन जल आदि बताया गया है ॥ २१ ॥

इस तरह त्रिपुण्डू करके मनुष्य रुद्राक्ष धारण करे और अपने (सन्ध्योपासना आदि) नित्यकर्म का सम्पादन करके पुनः शिव की आराधना करे ॥ २२ ॥ तत्पश्चात् तीन बार मन्त्रपूर्वक आचमन करे अथवा ‘गंगाबिन्दुः’ — ऐसा उच्चारण करते हुए एक बार आचमन करे ॥ २३ ॥ तत्पश्चात् वहाँ शिव की पूजा के लिये अन्न और जल लाकर रखे । दूसरी कोई भी जो वस्तु आवश्यक हो, उसे यथाशक्ति जुटाकर अपने पास रखे ॥ २४ ॥ इस प्रकार पूजन-सामग्री का संग्रह करके वहाँ धैर्य धारण करके जल, गन्ध और अक्षत से युक्त एक अर्घ्यपात्र लेकर उसे दाहिने भाग में रखे, उससे उपचार की सिद्धि होती है । फिर गुरु का स्मरण करके उनकी आज्ञा लेकर विधिवत् सकाम संकल्प करके पराभक्ति से सपरिवार शिव का पूजन करे ॥ २५-२७ ॥

एक मुद्रा दिखाकर सिन्दूर आदि उपचारों द्वारा सिद्धि-बुद्धिसहित विघ्नहारी गणेश का पूजन करे । लक्ष और लाभ से युक्त गणेशजी का पूजन करके उनके नाम के आदि में प्रणव तथा अन्त में नमः जोड़कर नाम के साथ चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग करते हुए नमस्कार करे । यथा — ॐ गणपतये नमः अथवा ॐ लक्षलाभयुताय सिद्धिबुद्धिसहिताय गणपतये नमः ॥ २८-२९ ॥

तदनन्तर उनसे क्षमाप्रार्थना करके पुनः भाई कार्तिकेयसहित गणेशजी का पराभक्ति से पूजन करके उन्हें बारंबार नमस्कार करे ॥ ३० ॥ तत्पश्चात् सदा द्वार पर खड़े रहनेवाले महोदर का पूजन करके सती-साध्वी गिरिराजनन्दिनी उमा की पूजा करे ॥ ३१ ॥ चन्दन, कुंकुम तथा धूप, दीप आदि अनेक उपचारों तथा नाना प्रकार के नैवेद्यों से शिवा का पूजन करके नमस्कार करने के पश्चात् साधक शिवजी के समीप जाय । यथासम्भव अपने घर में मिट्टी, सोना, चाँदी, धातु या अन्य [द्रव्य] पारे आदि की शिवप्रतिमा बनाये और उसे नमस्कार करके भक्तिपरायण होकर पूजा करे । उसकी पूजा हो जानेपर सभी देवता पूजित हो जाते हैं ॥ ३२-३४१/२॥

मिट्टी का शिवलिंग बनाकर विधिपूर्वक उसकी स्थापना करे । अपने घर में रहनेवाले लोगों को स्थापनासम्बन्धी सभी नियमों का सर्वथा पालन करना चाहिये । भूतशुद्धि करके प्राणप्रतिष्ठा करे ॥ ३५-३६ ॥ शिवालय में दिक्पालों की भी स्थापना करके उनकी पूजा करे । घर में सदा मूलमन्त्र का प्रयोग करके शिव की पूजा करनी चाहिये ॥ ३७ ॥

घर में द्वारपालों के पूजन का सर्वथा नियम नहीं है; क्योंकि घर में जिस शिवलिंग की पूजा की जाती है, उसमें सभी देवता प्रतिष्ठित रहते हैं ॥ ३८ ॥ घर पर होनेवाली शिव की पूजा के समय अंगोंसहित तथा सपरिवार उन सदाशिव का आवाहन करके पूजन किया जाय, ऐसा कोई नियम नहीं है ॥ ३९ ॥ भगवान् शिव के समीप ही अपने लिये आसन की व्यवस्था करे । उस समय उत्तराभिमुख बैठकर आचमन करे ॥ ४० ॥

उसके बाद दोनों हाथों का प्रक्षालन करके प्राणायाम करे । प्राणायाम-काल में मनुष्य को मूलमन्त्र की दस आवृत्तियाँ करनी चाहिये ॥ ४१ ॥ हाथों से पाँच मुद्राएँ दिखाये । यह पूजा का आवश्यक अंग है । इन मुद्राओं का प्रदर्शन करके ही मनुष्य पूजाविधि का अनुसरण करे ॥ ४२ ॥ तदनन्तर वहाँ दीप निवेदन करके गुरु को नमस्कार करे और पद्मासन या भद्रासन बाँधकर बैठे अथवा उत्तानासन या पर्यंकासन का आश्रय लेकर सुखपूर्वक बैठे और पुनः पूजन का प्रयोग करे । पुराने समय में तो पत्थर की बटिया की ही श्रद्धापूर्वक पूजा करके लोग भवसागर से पार हो जाते थे । यदि वे शुद्ध रूप में स्वयमेव घर में विद्यमान हैं, तो उसके लिये कोई नियम की आवश्यकता नहीं है ॥ ४३-४५ ॥

तत्पश्चात् अर्ध्यपात्र से उत्तम शिवलिंग का प्रक्षालन करे । मन को भगवान् शिव से अन्यत्र न ले जाकर पूजासामग्री को अपने पास रखकर निम्नांकित मन्त्रसमूह से महादेवजी का आवाहन करे ॥ ४६१/२ ॥

कैलासशिखरस्थं च पार्वतीपतिमुत्तमम् ॥ ४७ ॥
यथोक्तरूपिणं शंभुं निर्गुणं गुणरूपिणम् ।
पंचवक्त्रं दशभुजं त्रिनेत्रं वृषभध्वजम् ॥ ४८ ॥
कर्पूरगौरं दिव्यांगं चन्द्रमौलिं कपर्दिनम् ।
व्याघ्रचर्मोत्तरीयं च गजचर्माम्बरं शुभम् ॥ ४९ ॥
वासुक्यादिपरीतांगं पिनाकाद्यायुधान्वितम् ।
सिद्धयोऽष्टौ च यस्याग्रे नृत्यंतीह निरंतरम् ॥ ५० ॥
जयजयेति शब्दश्च सेवितं भक्त पूजकैः ।
तेजसा दुःसहेनैव दुर्लक्ष्यं देवसेवितम् ॥ ५१ ॥
शरण्यं सर्वसत्त्वानां प्रसन्नमुखपंकजम् ।
वेदैश्शास्त्रैर्यथा गीतं विष्णुब्रह्मनुतं सदा ॥ ५२ ॥
भक्तवत्सलमानंदं शिवमावाहयाम्यहम् ।

‘जो कैलास के शिखर पर निवास करते हैं, पार्वतीदेवी के पति हैं, समस्त देवताओं से उत्तम हैं, जिनके स्वरूप का शास्त्रों में यथावत् वर्णन किया गया है, जो निर्गुण होते हुए भी गुणरूप हैं, जिनके पाँच मुख, दस भुजाएँ और प्रत्येक मुखमण्डल में तीन-तीन नेत्र हैं, जिनकी ध्वजा पर वृषभ चिह्न अंकित है, जिनके अंग की कान्ति कर्पूर के समान गौर है, जो दिव्यरूपधारी, चन्द्रमारूपी मुकुट से सुशोभित तथा सिर पर जटाजूट धारण करनेवाले हैं, जो हाथी की खाल पहनते हैं और व्याघ्रचर्म ओढ़ते हैं, जिनका स्वरूप शुभ है, जिनके अंगों में वासुकि आदि नाग लिपटे रहते हैं, जो पिनाक आदि आयुध धारण करते हैं, जिनके आगे आठों सिद्धियाँ निरन्तर नृत्य करती रहती हैं, भक्तसमुदाय जय-जयकार करते हुए जिनकी सेवामें लगे रहते हैं, दुस्सह तेज के कारण जिनकी ओर देखना भी कठिन है, जो देवताओं से सेवित हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों को शरण देनेवाले हैं, जिनका मुखारविन्द प्रसन्नता से खिला हुआ है, वेदों और शास्त्रों ने जिनकी महिमा का यथावत् गान किया है, विष्णु और ब्रह्मा भी सदा जिनकी स्तुति करते हैं तथा जो भक्तवत्सल हैं, उन परमानन्दस्वरूप शिव का मैं आवाहन करता हूँ ।’ इस प्रकार साम्बशिव का ध्यान करके उनके लिये आसन दे ॥ ४७-५३ ॥

चतुर्थ्यन्त पद से ही क्रमशः सब कुछ अर्पित करे । [यथा — साम्बाय सदाशिवाय नमः आसनं समर्पयामि इत्यादि ।] तत्पश्चात् भगवान् शंकर को पाद्य और अर्घ्य दे । तदनन्तर परमात्मा शम्भु को आचमन कराकर पंचामृत-सम्बन्धी द्रव्यों द्वारा प्रसन्नतापूर्वक शंकर को स्नान कराये ॥ ५४-५५ ॥ वेदमन्त्रों अथवा समन्त्रक चतुर्थ्यन्त नामपदों का उच्चारण करके भक्तिपूर्वक यथायोग्य समस्त द्रव्य भगवान् को अर्पित करे । अभीष्ट द्रव्य को शंकर के ऊपर चढ़ाये । फिर भगवान् शिव को जलधारा से स्नान कराये ॥ ५६-५७ ॥

स्नान के पश्चात् उनके श्रीअंगों में सुगन्धित चन्दन तथा अन्य द्रव्यों का यत्नपूर्वक लेप करे । तत्पश्चात् सुगन्धित जल से ही उनके ऊपर जलधारा गिराकर अभिषेक करे । वेदमन्त्रों, षडंगों अथवा शिव के ग्यारह नामों द्वारा यथावकाश जलधारा चढाकर वस्त्र से शिवलिंग को अच्छी तरह पोछे ॥ ५८-५९ ॥ तदनन्तर आचमन प्रदान करे और वस्त्र समर्पित करे । नाना प्रकार के मन्त्रों द्वारा भगवान् शिव को तिल, जौ, गेहूँ, मूंग और उड़द अर्पित करे । फिर पाँच मुखवाले परमात्मा शिव को पुष्प चढ़ाये ॥ ६०-६१ ॥

प्रत्येक मुख पर ध्यान के अनुसार यथोचित अभिलाषा करके कमल, शतपत्र, शंखपुष्प, कुशपुष्प, धतूर, मन्दार, द्रोणपुष्प, तुलसीदल तथा बिल्वपत्र के द्वारा पराभक्ति के साथ भक्तवत्सल भगवान् शंकर की विशेष पूजा करे । अन्य सब वस्तुओं का अभाव होने पर शिव को केवल बिल्वपत्र ही अर्पित करे ॥ ६२-६४ ॥ बिल्वपत्र समर्पित होने से ही शिव की पूजा सफल होती है । तत्पश्चात् सुगन्धित चूर्ण तथा सुवासित उत्तम तैल, इत्र आदि विविध वस्तुएँ बड़े हर्ष के साथ भगवान् शिव को अर्पित करे । तदनन्तर प्रसन्नतापूर्वक गुग्गुल और अगुरु आदि से धूप निवेदित करे ॥ ६५-६६ ॥ तदनन्तर शंकरजी को घृतपूर्ण दीपक दे । इसके बाद निम्न मन्त्र से भक्तिपूर्वक पुनः अर्घ्य दे और भक्तिभाव से वस्त्रद्वारा उनके मुख का मार्जन करे —

रूपं देहि यशो देहि भोगं देहि च शंकर ॥ ६८ ॥
भुक्ति-मुक्तिफलं देहि गृहीत्वार्घं नमोस्तु ते ।

‘हे शंकर ! आपको नमस्कार है । आप इस अर्घ्य को स्वीकार करके मुझे रूप दीजिये, यश दीजिये, सुख दीजिये तथा भोग और मोक्ष का फल प्रदान कीजिये ।’
इसके बाद भगवान् शिव को भाँति-भाँति के उत्तम नैवेद्य अर्पित करे ॥ ६७-६९ ॥

इसके पश्चात् प्रेमपूर्वक शीघ्र आचमन कराये । तदनन्तर सांगोपांग ताम्बूल बनाकर शिव को समर्पित करे । इसके अनन्तर पाँच बत्ती की आरती बनाकर भगवान् को दिखाये । पैरों में चार बार, नाभिमण्डल के सामने दो बार, मुख के समक्ष एक बार तथा सम्पूर्ण अंगों में सात बार आरती दिखाये । तत्पश्चात् यथोक्त ध्यान करके मन्त्र का उच्चारण करे ॥ ७०-७२ ॥

बुद्धिमान् मनुष्य को गुरु के द्वारा बताये गये नियम के अनुसार ही मन्त्र का जप करना चाहिये । अथवा अपने ज्ञान के अनुसार जितनी संख्या में हो सके, उतनी संख्या में ही मन्त्रों का विधिवत् उच्चारण करे ॥ ७३-७४ ॥ प्रेमपूर्वक नाना प्रकार के स्तोत्रों से वृषभध्वज शंकर की स्तुति करे । तत्पश्चात् धीरे-धीरे शिव की परिक्रमा करे ॥ ७५ ॥ इसके बाद भक्त पुरुष साष्टांग प्रणाम करे और शिव की प्रसन्नता के लिये उन परमेश्वर शंकर को इस मन्त्र से भक्तिपूर्वक पुष्पांजलि दे —

शंकराय परेशाय शिवसंतोषहेतवे ॥
अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाद्यद्यत्पूजादिकं मया ॥ ७७ ॥
कृतं तदस्तु सफलं कृपया तव शंकर ।
तावकस्त्वद्गतप्राण त्वच्चित्तोहं सदा मृड ॥ ७८ ॥
इति विज्ञाय गौरीश भूतनाथ प्रसीद मे ।
भूमौ स्खलितवादानां भूमिरेवावलंबनम् ॥ ७९ ॥
त्वयि जातापराधानां त्वमेव शरणं प्रभो ।

‘हे शंकर ! मैंने अज्ञान से या जान-बूझकर जो-जो पूजन आदि किया है, वह आपकी कृपा से सफल हो । हे मृड ! मैं आपका हूँ, मेरे प्राण सदा आपमें लगे हुए हैं, मेरा चित्त सदा आपका ही चिन्तन करता है — ऐसा जानकर हे गौरीनाथ ! हे भूतनाथ ! आप मुझपर प्रसन्न होइये । हे प्रभो ! धरती पर जिनके पैर लड़खड़ा जाते हैं, उनके लिये भूमि ही सहारा है, उसी प्रकार जिन्होंने आपके प्रति अपराध किये हैं, उनके लिये भी आप ही शरणदाता हैं ॥ ७६-७९१/२ ॥

इस प्रकार बहुविध प्रार्थना करके उत्तम विधि से पुष्पांजलि अर्पित करने के पश्चात् पुनः भगवान् को बार-बार नमस्कार करे । [तत्पश्चात् यह बोलकर विसर्जन करना चाहिये]

स्वस्थानं गच्छ देवेश परिवारयुतः प्रभो ।
पूजाकाले पुनर्नाथ त्वया गंतव्यमादरात् ।

‘हे देवेश ! हे प्रभो ! अब आप परिवारसहित अपने स्थान को जायँ । नाथ ! जब पूजा का समय हो, तब पुनः आप आदरपूर्वक पधारें’ ॥ ८०-८११/२ ॥

इस प्रकार भक्तवत्सल शंकर की बारम्बार प्रार्थना करके उनका विसर्जन करे और उस जल को अपने हृदय में लगाये तथा मस्तक पर चढ़ाये ॥ ८२१/२ ॥

हे ऋषियो ! इस तरह मैंने शिवपूजन की सारी विधि बता दी, जो भोग और मोक्ष को देनेवाली है । अब आपलोग और क्या सुनना चाहते हैं ? ॥ ८३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के प्रथम सृष्टिखण्ड में सृष्टि-उपाख्यान में शिवपूजनवर्णन नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥

 

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