भगवान् श्रीशङ्कराचार्य विरचित
श्रीभगवती-मानस-पूजा-स्तोत्र
(हिन्दी पद्यानुवाद श्री अमरसिंह ‘अमर’)

॥ प्रबोधन ॥
उषा-काल में गायक जन की मङ्गल-ध्वनि से शीघ्र जागिए ।
महती कृपा-कटाक्ष द्वारा, जगदम्बे ! जग को सुख-मय करिए ॥ १ ॥
॥ आवाहन ॥
स्वर्ण-वेदियों से अति शोभित, दिशि-दिशि स्वर्ण-कलश से सज्जित ।
मणि-मय मम मानस-मण्डप में, कृपया पूजन ग्रहण कीजिए ॥ २ ॥
॥ शिविका-समर्पण ॥
स्वर्ण-मयी, कोमल-पट-आवृत, सुन्दर गद्दे से स-शोभिता ।
जगदम्बे ! तुमको अर्पित मानस ‘शिविका’, नव-रत्न- अलंकृता ॥ ३ ॥
॥ मन्दिर-समर्पण ॥
मणि-मय निज ‘मन-मन्दिर’, जिसका शीर्ष कनक-घट से है शोभित ।
जिस पर जल-धर-चुम्बि पताका, वह मन्दिर निवास-हित अर्पित ॥ ४ ॥durga
॥ आसन-समर्पण ॥
मानस ‘सिंहासन’ की वेदी, सुन्दर रुइ-गद्दी से शाभित,
और, ‘सुवर्ण-पीठ’ यह माँ, अगणित पुष्पों द्वारा आच्छादित ।
कोटि बाल-सूर्यों-सम तेज-स्वरूपा, हे भगवति ! विराजिए,
और ‘सुवर्ण-पीठ’ पर माता, युगल चरण-कमलों को रखिए ॥ ५ ॥
॥ वितान-समर्पण ॥
कनक-जड़ित चार स्तम्भ-युक्त, मणि-मुक्ता की झालर से शोभित,
अति सुन्दर नव मनज चँदोवा, हे भवानि ! है तुम्हें समर्पित ॥ ६ ॥
॥ पाद्य-समर्पण ॥
विष्णु-कान्ता, दूब, कमल – इसमें विभिन्न हैं पुष्प समन्वित –
यह मानसिक ‘पाद्य’ माता, निज चरण-कमल-हित हो स्वीकारित ॥ ७ ॥
॥ अर्घ्य-समर्पण ॥
गन्ध, पुष्प, जौ, सरसों, दूर्वा, तिल, कुश, अक्षत-युक्त अर्ध्य’ यह,
माँ ! कपया स्वीकारें, रत्नों-जटित कनक-घट बीच निहित यह ॥ ८ ॥
॥ आचमन ॥
अमृत-सम कङ्कोल, लौंग, जायफल, गन्ध-युत शीतल जल से –
कमल-समान कान्ति-युत निज हाथों से देवि आचमन कर लें ॥ ९ ॥
॥ मधुपर्क-समर्पण ॥
स्वर्ण-पात्र में निहित, और जो रत्न-जटित ढक्कन से रक्षित ।
यह ‘मधुपर्क’ मानसिक, अर्पित तुमको, इसे ग्रहण माँ ! कर लें ॥ १० ॥
॥ तैल-समर्पण ॥
विविध भाँति के पुष्पों द्वारा है, यह बारम्बार सु-वासित,
निहित रत्न-मय स्वर्ण-पात्र में, मँडराते भौरों से आवृत ।
एवं सुर-सुन्दरियों के हाथों द्वारा, चहुँ दिग् गृहीत जो –
चम्पा, जिसका ‘तैल’ भ्रमर-कज्जली केश-घन में माँ ! तेरे –
तथा सभी अङ्गों में निज मानस के श्रद्धा-पूर्ण भाव से –
जगज्जननि ! करता हूँ लेपन, भगवति, अम्बे, भुवन-पालिके ॥ ११ ॥
॥ उद्वर्तन और जल-स्नान ॥
कुङ्कम-पङ्क, सुवर्ण-चूर्ण, केसर से युक्त सुगन्धित ‘उबटन ‘–
तव शरीर में लेपन को मैं श्रद्धा-पूर्ण भावना करता ।
केश स्वच्छ कर आमलकों से, जो कस्तूरि आदि से सुरभित,
सुरभित, गुनगुन रत्न-जटित घट के जल से मैं स्नान कराता ॥ १२ ॥
॥ दधि-दुग्ध आदि से स्नान ॥
श्वेत-शर्करा, दुग्ध, दही, घृत, मधु से पुनः तुम्हें नहलाता ।
पुनः गुनगुने जल से जननी, स्नेह-पात्र तव स्नान कराता ॥ १३ ॥
॥ तीर्थ-जल से स्नान ॥
खस, इलायची, पुष्पों से, गङ्गादि-तीर्थ के वासित जल से –
निर्मल मुक्ता, माणिक्यों से युक्त, स्वच्छ स्वर्ण-मय जल से –
स्नेह-सहित मम ‘स्नान-भाव’ स्वीकार करें, जो अम्बे ! अर्पित –
सादर तन्त्र-वेद-मन्त्रों को उच्चारित कर प्रमुदित मन से ॥ १४ ॥
॥ वस्त्र-समर्पण ॥
बाल-सूर्य सम, दाड़िम पुष्पों की आभा से स्पर्धा करते –
श्रेष्ठ दिव्य ‘वस्त्रों’ की मैंने आदर-पूर्ण भावना की है ।
मुक्ता-विंधी ‘कञ्चुकी’ भी, जो पीत-वर्ण, स्वीकार करें माँ ।
तप्त स्वर्ण द्युति -पूर्ण ‘ओढ़नी’, अनुपम अङ्गीकार करें माँ ॥ १५ ॥
॥ पादुका-समर्पण ॥
नौ रत्नों से सज्जित, सुन्दर ‘स्वर्ण-पादुकाओं’ पर अम्बे ! –
लीला-पूर्वक आप कृपा कर, रखें चरण-द्वय निज, जगदम्बे ! ॥ १६ ॥
॥ केश-प्रसाधन ॥
देवि ! आपकी केश-राशि को, बहुल अगरु पुष्पों के द्वारा –
सादर धूपित, कर कङ्घे से स्वच्छ, जननि ! मैं पूजन करता ।
सुरभित कमल तथा सुरभित चम्पक-सुमनों के द्वारा माता ! –
तत्क्षण उन्हें स्वर्ण-सूत्रों से गूँध, केश मैं वेष्टित करता ॥ १७ ॥
॥ कज्जल-समर्पण ॥
स्वर्ण-शलाका द्वारा मैंने, ‘सौवीराञ्जन’ से है माता ! –
तव नेत्रों को अम्बे ! रञ्जित किया-यदपि वह अमल नहीं है ।
तव सम्पर्क-प्राप्त अब उसको, अब ब्रह्मा, इन्द्रादिक द्वारा –
वाञ्छित होने की अञ्जन’ को, जगदम्बे ! योग्यता प्राप्त है ॥ १८ ॥
॥ आभूषण-समर्पण ॥
चरणों में दो ‘नूपुर’, कटि में सुभग करधनी, वक्षस्थल पर –
मुक्ताओं का ‘हार’ गले में नक्षत्रों की अनुपम ‘माला’,
बाजूबन्द’ बाँह में, ‘कङ्गन’ रत्न-जटित तव दिव्य करों में,
‘कर्ण-फूल’ कानों में पहना ‘चूडा-मणि’ से शीश सजाता ॥ १९ ॥
देवि ! आपकी केशवेणियों में, सुवर्ण को ‘पुष्प’ लगाकर –
‘मोती-लड़ी’ माँग में, मस्तक स्वर्ण-तिलक’, ‘माणिक्य’ नाक में,
वक्षस्थल पर ‘मोती की जाली’, अङ्गुलियों में अँगूठियाँ,
जननी ! बालक तव कानों में, रत्न-जटित ‘कुण्डल’ पहिनाता ॥ २० ॥
॥ तिलक, अङ्गराग-समर्पण ॥
मातु । तुम्हारे अति उज्ज्वल मस्तक पर मैं केशर, कस्तूरी –
कर्पूरागरु – ‘तिलक’ लगाता, ‘अङ्ग-राग’ तव दिव्य देह में ।
पुष्प द्रव से युक्त यक्ष-कर्दम का रस तव वक्षस्थल में –
तब जगदम्ब ! लेप ‘कुङ्कुम’ का, करता मैं दोनों चरणों में ॥ २१ ॥
॥ अक्षत-समर्पण ॥
रत्न-रूप ‘अक्षत’, सुन्दर अन-बिधे मोतियों, निश्क्षत जौ से,
मानस-पूजन करता माँ ! मैं या केसर-रञ्जित ‘अक्षत’ से ॥ २२ ॥
॥ सुगन्धित द्रव्य-समर्पण ॥
चम्पक-तैल, सुगन्धित चन्दन, कस्तूरी, रेशमी वस्त्र ये,
जननि ! शीघ्र स्वीकार करें इनको, प्रस्तुत हैं द्रव्य चार ये ॥ २३ ॥
॥ सिन्दूर-समर्पण ॥
हे भगवति ! आपकी माँग में, यह सिन्दूर स-आदर सज्जित –
मेरे हृदय-कमल पर वर्षा करे हर्ष को माँ, जगदम्बे !
उदय-काल की सूर्य-प्रभा-सम, सदा रक्त-वर्णी रहती है ,
अतः ध्यान करने पर अन्तःकरण-कलुष हरती यह अम्बे ! ॥ २४ ॥
॥ पुष्प-समर्पण ॥
लौंग, कन्द, मन्दार ‘पुष्प’, करवीर दिव्य सुमनों से सादर –
माँ त्रैलोक्य-मोहिनी ! तेरा पुत्र निरन्तर अर्चन करता ॥
जूही, गुड़हल, मौलसिरी, चम्पा, केतकी, चमेली जैसे –
सुन्दर सुमन, सुवन यह तेरा, तुझको देवि ! समर्पण करता ॥ २५ ॥
सोनजुही कचनार, केवड़ा, मौलसिरी, मालती, चमेली –
“पुष्प’ कनेर आदि द्वारा माँ ! तव शरीर का पूजन करता ॥ २६ ॥
इसी भाँति ही रक्त-कमल से, श्वेत-कमल जल-वेतस पुष्पों –
द्वारा भी तेरे शरीर का आदर से परिपूजन करता ॥ २७ ॥
॥ धूप-समर्पण ॥
श्वेतभ्रक के साथ, लाख से युक्त, बिल्व-मिश्रित कपूर से –
सुरभित मधु, शर्करा-युक्त, गो-घृत में सने अगरु-चन्दन से –
‘धूप-भावना’, गुग्गुल आदि अनेक वस्तुओं से यह निर्मित,
कृपया स्नेह-सहित स्वीकारें, करता अर्पित माँ ! तेरे हित ॥ २८ ॥
॥ आरती (नीराजन) ॥
रत्न-जटित इस स्वर्ण-पात्र में स्थापित ये सुन्दर ‘दीपक’ हैं,
गो-घृत से प्रज्ज्वलित; कोटि-सूर्यों सम द्युति से अन्धकार को –
दूर भगाने में समर्थ स्वर्णाग्नि-शिखा, इन दीपों की है,
प्रति-दिन सदा ‘आरती’ करता, ले ऐसे मणि-मय दीपों को ॥ २९ ॥
॥ तर्पण ॥
दही, दुग्ध, शर्करा, सुगन्धित शालि-खीर, घृत, वटक दही के,
माल-पुआ, मधु एवं कदली आदि विभिन्न फलों को मैं माँ –
धनियाँ, जीरा, हींग और अदरख, हल्दी के साथ सुवासित –
अमृत से भी अधिक स्वाद के शाक अर्पित कर तृप्त करूँ माँ ! ॥ ३० ॥
॥ नैवेद्य-समर्पण ॥
दाल, दही, शर्करा, दुग्ध, घी, पुए प्रभृति यह परम अन्न लें ।
जीरा, हींग, मिर्च आदिक से युक्त, शाक कृपया माँ खाएँ ॥ ३१ ॥
॥ दुग्ध-समर्पण ॥
यह घृत-खीर उत्तमोत्तम है, करें कृपा-स्वीकार करें माँ ! ।
‘उत्तम मधु-अमृत समान, यह ‘दुग्ध’ कृपाकर पान करें माँ ! ॥ ३२ ॥
॥ हाथ-मुख-प्रक्षालन ॥
दोनों हाथ और मुख को, इस कांस्य-पात्र में गुन-गुन जल से –
प्रक्षालन कर, कुंकुम और कपुर-युक्त चन्दन हाथों पर उबटन कर लें ॥ ३३ ॥
॥ गङ्गा-जल-समर्पण ॥
शुचि ‘गङ्गा-जल’ वासित खस से, पट से छाना अम्ब ! सुधा-सम,
स्वर्ण-कलश में शुद्ध निषेवित, ‘गङ्गा-जल’ माँ ! कृपया पी लें ॥ ३४ ॥
॥ फल-समर्पण ॥
केला, जामुन, आम, बेर, अङ्गुर, अनार, नारियल अर्पित ।
निम्बु, बिजौरा, खरबूजा, नारङ्गी ‘फल’, अखरोट समर्पित ॥ ३५-३६ ॥
॥ ताम्बूल-समर्पण ॥
लौंग, कपूर, श्वेत कत्था, तक्कोल-चूर्ण, स्वादिष्ट सुपारी,
मधुर जायफल आदि समर्पित कैतक-श्वेत ‘पान-पत्ते’ में ॥
मात ! सुवासित ‘ताम्बूल’ यह, मुख-छवि-शोभा-हित स्वीकारें ।
है सुरभित इलायची भी शोभित, हे अम्बे ! इस पत्ते में ॥
तप्त स्वर्ण-आभा से भी सुन्दर ‘ताम्बूल’, स्वर्ण-सी पुङ्गी,
स्वर्ण-पात्र-रक्षित, मोती-कत्थे का पान मुख-कमल रख लें ॥ ३७-३९ ॥
॥ आरती-समर्पण ॥
डमरू-जैसे वृहत् दीपकों, जो आबद्धित पक्व गेहुँ से –
में पर्याप्त डाल घृत, रखकर अम्बे ! विस्तृत स्वर्ण-पात्र में,
घुटने टेक, विनम्र हृदय से, ‘पात्र-आरती’ शिर पर रखकर,
तव मुख-मण्डल ओर घुमाता, साढे तीन बार जगदम्बे ! ॥
प्रति-दिन इस प्रकार माँ ! तेरी, माता ! सदा ‘आरती’ करता ।
ऐसा कर, मुझको है तेरी दया-दृष्टि मिलती जगदम्बे ! ॥ ४०-४१ ॥
॥ दक्षिणा-समर्पण ॥
इन मणि-युक्त मोतियों द्वारा, तेरे ऊपर वर्षा करके –
तीन लोक के सबसे सुन्दर वस्त्रों द्वारा पूजन करता ।
बहु प्रकार के मोती एवं माणिक्यों से युक्त स्वर्ण की –
वर्षा-रूपी दिव्य ‘दक्षिणा’, त्रैलोकेश्वरि ! मैं अर्पित करता ॥ ४२ ॥
॥ छत्र-समर्पण ॥
स्वर्ण-दण्ड-भूषित, शोभित जो बिम्ब-समान पूर्ण-शशि-जैसा –
शोभा-शाली, स्वर्ण-कलश-युत रत्न-खचित अति शोभा देता ।
मुक्ताओं की जाली से आच्छादित, दिव्य छत्र जगदम्बे ! ॥
स्वयं विश्वकर्मा-निर्मित, त्रैलोकों को आह्लादित करता ।
सृष्टि-स्वरूपा माता ! तेरा रूप हृदय-धर बालक तेरा –
प्रेम-पूर्वक हाथों में कर ‘छत्र ग्रहण, शिर छाया करता ॥ ४३ ॥
॥ चँवर ॥
शरच्चन्द्र की किरणों जैसा, गौर-वर्ण मुक्ता-मणि-शोभित-
स्वर्ण-दण्ड-युत ‘चँवरों द्वारा स्नेहासक्त हवा मैं करता ॥ ४४ ॥
॥ दर्पण ॥
रवि-मण्डल-सम, मणि-वेष्टित, यह ‘दर्पण’ अम्बे चञ्चल-नयने ! –
अर्पित-इसमें पूर्ण-चन्द्र-सम, निज सुन्दर मुख-मण्डल देखें ॥ ४५ ॥
॥ नीराजन ॥
इन्द्र आदि देवता सभी अम्बे ! तुमको प्रणाम जब करते –
लगता, मुकुट-दीपकों से, तव चरण-पृष्ठ की ‘आरति’ करते ।
कोटि दीपकों को निज-मानस में, मैं भी कल्पित करता हूँ,
और तुम्हारे सारे तन की, जगदम्बे ! ‘आरति’ करता हूँ ॥ ४६ ॥
॥ वाहनार्थ अश्व-समर्पण ॥
तुङ्ग ‘अश्व’ गतिशील, युक्त जो रत्नों द्वारा जटित जीन से,
स्वर्ण-भूषणों से भूषित, गम्भीर मधुर स्वर, अनल-वेग से –
जो चलता है, सर्व-गुणों से युक्त ‘अश्व’ वह, तव वाहन-हित –
एवं शत ऐसे ही सुन्दर ‘अश्व’ देवि ! हैं तुम्हें समर्पित ॥ ४७ ॥
॥ गज-समर्पण ॥
भौंर-वृन्द से घिरी कनपटी, आच्छादित सिन्दूर-चूर्ण से –
स्वर्ण-विनिर्मित किङ्किणि, घण्टे से है जिसका कण्ठ सुशोभित ।
चँवरों, जैसे जिसके कर्ण-युगल हैं , ऐसा मतवाला गज –
घने जलद की आभावाला, जननी ! करे तुम्हें आनन्दित ॥ ४८ ॥
॥ रथ-समर्पण ॥
द्रुत-तम वेग-वान अश्वों से शोभित, जिसके चक्र मणि-जटित-
स्वर्ण-वितान-युक्त सुन्दर ‘रथ’, करता भगवति ! तुम्हें समर्पित ॥ ४९ ॥
॥ चतुरङ्ग सैन्य-समर्पण ॥
हय, गज, रथ-आरोहित एवं अन्य सैनिकों द्वारा शोभित,
घन-सम दुन्दुभि-ध्वनि करती दश दिश, ‘चतुरङ्ग सैन्य’ है अर्पित ॥ ५० ॥
॥ दुर्ग-समर्पण ॥
सप्त-सागरों की खाँई से घिरा, अत्यधिक सम्पति-शाली,
पृथ्वी-तल नामक, विशाल, दृढ़ ‘दुर्ग’ समग्र देवि ! है अर्पित ॥ ५१ ॥
॥ व्यजन-समर्पण ॥
श्वेत-कमल से युक्त, सहज-शीतल-मधु-पवन-सुगन्धित, युक्ता –
पङ्खों से; पराग-पीता भौरों से गुञ्जित ‘व्यजन’ डुलाता ॥ ५२ ॥
॥ नृत्य-वाद्य-गायन-समर्पण ॥
जिसके चञ्चल केश-पाश, भौंरों-से काले, घुँघराले हैं,
टूटे जिसके सुमन-माल, इस रङ्ग-भूमि ऊपर बिखरे हैं,
नृत्य-रती यह नटी तुम्हारा, हृदय-कमल आनन्दित कर दे,
जगज्जननि ! यह ‘नृत्य’ हृदय में तेरे अम्ब ! मधुर रस भर दे ॥ ५३ ॥
युव-जन-सुख-प्रद बालाएँ ये, अति सुन्दर क्रीड़ा करती हैं,
मुख, भौं, नयन नचाने से, इनकी बेणी चञ्चल होती है ।
चञ्चल भृङ्ग -सुशोभित पुष्पों से शोभित ये नृत्य कर रहीं,
रङ्ग-भवन में थिरक रहीं, माँ तेरे उर आनन्द भर रहीं ॥ ५४ ॥
रुचिर कुचोंवाली नर्तकियाँ, प्रति-गृह प्रति-दिन नर्तन करतीं,
झिमिकि-झिमिकि, धिधि-धिद्धि, धिद्धि-धिधि-ऐसी सदा ताल-ध्वनि आती ।
तत्-तत्, थैपी-थैपी ध्वनि, जगदम्बे ! उर आह्लादित करती,
नाद-जन्य यह ध्वनि तेरे, मन की प्रसन्नता हेतु गूँजती ॥ ५५ ॥
चञ्चल केश-राशि उनकी-ज्यों भौंरों के समूह मँडराएँ ,
जिनके स्मित-युत-मुख की शोभा निरख, कमल के पुष्प लजाएँ ।
जो हैं दिव्य-रूप परिपूर्णा, अनुपम, अति सुन्दर पट-वेष्टित,
नृत्य-रती नटियों के मधु-स्वर तव आनन्द हृदय उपजाएँ ॥ ५६ ॥
डमरू -डिम्डिम, झल्लरि-जर्झर-मधुर शब्दवाले घण्टों से –
तत्क्षण झंकृत ध्वनियाँ तेरे, सदय हृदय को सुख पहुँचाएँ ॥ ५७ ॥
वीणाओं के सप्त सुरों पर, मधुर राग में वादन करतीं –
माता ! तेरे स्वर्ण-द्वार पर, स्वर्गिक मधुर स्वरों में गाती –
तेरी महिमा के मधु गीतों को, गन्धर्वों की कन्याएँ ।
तेरा पुत्र प्रार्थना करता, देव-पूजिता ! कृपया सुन लें ॥ ५८ ॥
नर्तकियों के सुन्दर और विलक्षण नृत्यों से माँ ! तुझको –
क्षण-भर को भी आनन्दित करके भगवति, जगदीश्वरि, अम्बे ! –
स्वयं पुत्र तेरा मैं अपने गायन, वाद्य, विचित्र नृत्य से –
तेरे मन को आह्लादित, आनन्दित करता माँ, जगदम्बे ! ॥ ५९ ॥
॥ स्तुति ॥
ब्रह्मा आदि चार मुख से भी निपुण नहीं वर्णन करने में –
तेरे गुण; तब एक-मुखी, कैसे समर्थ तव ‘स्तुति’ करने में ॥ ६० ॥
॥ प्रदक्षिणा ॥
कर ‘प्रदक्षिणा’ अश्वमेध-से यज्ञों का फल अर्चक पाता –
प्रति पग पर, ऐसी अघ-नाशक तेरी, माँ ! प्रदक्षिणा करता ॥ ६१ ॥
॥ प्रणाम-समर्पण ॥
रक्त-कमल-सम लाल प्रभावाले तलुओं का वन्दन करता,
ऊर्ध्व-रेख के कुलिश-चिह्नवाले पद का अभिनन्दन’ करता ।
सभी देवताओं द्वारा वन्दित तेरे युग पद-कमलों का,
अष्टाङ्गों द्वारा माता ! तेरा सुत सविनय ‘वन्दन’ करता ॥ ६२ ॥
॥ पुष्पाञ्जलि ॥
भगवति। तेरे युगल चरण-कमलों का पङ्कज-पुष्पों द्वारा –
पूजन कर, तवे कण्ठ-देश में, स्वर्ण-नलिन-माला पहिनाकर –
तेरे हृदय-कमल को प्रमुदित करने की आकांक्षा करता,
रत्नों की ‘पुष्पाञ्जलि’ शिर पर, आदर-पूर्वक अर्पित करता ॥ ६३ ॥
॥ भवन-समर्पण ॥
यह ‘प्रासाद’ निवास-हेतु है, यह है स्वर्ण-वितान सुसज्जित,
धूपित है मणि-जटित मञ्च यह, अगरु, धूप से भवन सुगन्धित ॥ ६४ ॥
॥ पर्यङ्क-समर्पण ॥
माणिक-सज्जित स्वर्ण-पीठ पर, अभय, वरद चरणों को रख कर –
बैठें, कोमल पट आच्छादित, जगदम्बे ! इस ‘स्वर्ण-पलँग’ पर ॥ ६५ ॥
॥ आलता-समर्पण ॥
माता ! तेरे युगल-चरण हैं, पद्म-राग-मणि से भी सुन्दर,
कमल-चिह से शोभित, इन चरणों का शुभ दर्शन करता हूँ ॥
अतिशय शोभा मैं निहारता, रक्ताभा-रजित चरणों की –
और ‘महावर’ द्वारा इनको, पुनः लालिमा से भरता हूँ ॥ ६६ ॥
॥ गण्डुष-पात्र-समर्पण ॥
सुरभित ताम्बूल से रञ्जित, खस से देवि ! सुगन्धित मुख के –
इस गण्डूष-सुवासित रस को, स्वर्णिम ‘पीक-दान’ में छोडें ॥ ६७ ॥
॥ शयन-प्रार्थना ॥
अति कोमल रुइ के गद्दे की, शैया पर सुख-पूर्वक सोएँ –
क्षण भर शिव के सङ्ग अकेले, पर निज सुत को माँ ! न भुलाएँ ॥ ६८ ॥
॥ ध्यान ॥
मुक्ता, कुन्द-पुष्प, शशि-सम, जो त्रिभुवन-जननी गौर-वर्ण हैं,
जिनका माणिक-जटित मुकुट है, गर्भित रत्न कर्ण- भूषण हैं,
हाथों से जो अक्ष-माल, पुस्तक, वर और अभय-युक्ता हैं,
जो त्रिलोचना माँ मस्तक पर, चन्द्र-कला से संयुक्ता हैं,
देवों के मणि-मय मुकुटों से द्योतित स्वर्ण-पीठ है जिनका,
जिस पर आनन्दित विराजतीं, मन में ध्यान करू उन माँ का ॥ ६९ ॥
॥ क्षमा-प्रार्थना ॥
भक्ति-सहित मैंने यह ‘मानस-पूजन’ हेतु कल्पना की है ।
कर मेरे अपराध क्षमा’, जगदीश्वरि ! यह पूजन स्वीकारें ॥
जो भी इसमें न्यून मिले, हो पूर्ण कृपा से माँ, सुरेश्वरी ! ।
मेरे हृदय-पटल में अम्बे ! तब निवास हो सदा ईश्वरी ! ॥ ७० ॥
॥ फल- श्रुति ॥
सुधी व्यक्ति- असमर्थ बाह्य-पूजन में, जो यह पाठ करेगा,
निज अभीष्ट हो प्राप्त, बाह्य-पूजन का फल वह प्राप्त करेगा ॥ ७१ ॥
भक्ति-सहित जो साधक प्रति-दिन करे पाठ ‘मानस-पूजन का –
वाग्-दायिनी के प्रसाद से, एक वर्ष में ‘कवि’ बन जाता ॥ ७२ ॥
प्रातः वा मध्याह्न-काल वा सन्ध्या-समय पाठ करता जो,
‘धर्म-अर्थ-कामना पूर्ण हो, और ‘शिवत्व प्राप्त हो उसको ॥ ७३ ॥

मानस-पूजा के नियम
हिन्दुओं की पूजा का मुख्य ध्येय अपने स्वरूप- मन, बुद्धि, चित्त और ‘अहङ्कार’ को क्रमशः प्रकाशित करना है । अस्तित्व के विभिन्न स्तरों को देखते ही हिन्दुओं ने विविध भावना-मयी पूजन-विधियों की रचना की है ।
इन सबमें ‘मानस-पूजन’ सबसे उत्तम पूजन-विधि है । इसमें बाह्यत्व का सर्वथा अभाव रहता है तथा भावना के द्वारा ‘इष्ट-देव’ के स्मरण-रूपी प्रकाश से अपने मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्कार को प्रकाश-मय किया जाता है ।
‘मानस-पूजा’ में पूजा करनेवाला एक ओर अपने मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्कार को विषय-वासना से हटाता है, तो दूसरी ओर पूर्ण श्रद्धा के साथ विशुद्ध भावना-मयी क्रियाओं द्वारा एकमात्र सत्य, प्रकाश-मय अपने इष्ट-देव’ का स्मरण करता है, जिससे देह, प्राण, मन, बुद्धि आदि की बाधाएँ क्रमशः दूर हो जाती हैं और अन्ततः चित्त में साक्षात् ‘इष्ट-देव’ आविर्भूत हो जाते हैं ।
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि प्रत्येक जीव के लिए विषय-उपभोगार्थ पाँच प्रधान मार्ग प्रति-क्षण सुलभ हैं । इन्हें हम ‘पञ्च ज्ञानेन्द्रिय’ कहते हैं । यथा- (१) नेत्र, (२) कर्ण, (३) नासिका, (४) जिह्वा और (५) त्वचा । इन्हीं पञ्च- ज्ञानेन्द्रियों द्वारा मन, बुद्धि आदि अन्तःकरण विषयों का उपभोग करते हैं और अपने वास्तविक प्रकाश-मय स्वरूप से अनभिज्ञ रहते हैं ।
‘मानस-पूजा’ में इन पञ्च-ज्ञानेन्द्रियों को अन्तर्मुखी भाव से ‘इष्ट-देव’ के दिव्य प्रकाश-मय स्वरूप के प्रति समर्पित किया जाता है, जिससे इनके द्वारा विषय-उपभोग-रूपी बाधा समाप्त हो जाती है ।
नेत्रों द्वारा ‘इष्ट-देव’ का ध्यान होने से नेत्रों की अन्य सांसारिक विषय देखने की लालसा समाप्त हो जाती है । इष्ट-देव की स्तुति, गायन के श्रवण से कर्णों की, ‘इष्ट-देव’ के प्रति समर्पित सुगन्धि से नासिका की, ‘इष्ट-देव’ के प्रति अर्पित नैवेद्य से जिह्वा की एवं ‘इष्ट-देव’ के स्नान, प्रदक्षिणा से त्वचा की अन्य विषय-भोग-रूपी बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं ।
ऐसी सिद्धि-दायिनी ‘मानस-पूजा’ को कोई भी व्यक्ति किसी भी समय कर सकता है । किन्हीं विशेष नियमों का बन्धन भी नहीं है । केवल बाह्य विषयों से अपने चित्त को हटाकर स्वच्छ शरीर और मन से पूर्ण श्रद्धा के साथ ‘इष्ट-देव’ के प्रति समर्पण करना होता है ।
पूर्ण समर्पण के लिए सबसे पहले अपने हृदय में ‘इष्ट-देव’ के विशिष्ट स्वरूप को निर्दिष्ट ध्यान द्वारा प्रतिष्ठित करना होता है । फिर उस स्वरूप में मन-ही-मन उन्हें आमन्त्रित (आवाहन) किया जाता है । आमन्त्रण के बाद उन्हें सुख-पूर्वक विराजमान होने के लिए मानसिक भावना द्वारा भव्य मन्दिर, पालकी, सिंहासन, चॅदोवा आदि समर्पित किए जाते हैं । इस प्रकार जब इष्ट-देवता हृदय में स्थान ग्रहण कर लेते हैं, तब भावना द्वारा उनके चरण-कमलों को मन-ही-मन धोते हैं (पाद्य-समर्पण) ।
इसके बाद मानसिक भावना द्वारा इष्ट-देवता का अभिषेक (अर्घ्य-समर्पण) किया जाता है । उन्हें आचमन, मधुपर्क दिया जाता है । सुगन्धित तैल अर्पित किया जाता है । फिर विविध प्रकार से भावना द्वारा स्नान कराते हैं । स्नान के बाद वस्त्र, पादुका, विविध आभूषण आदि भावना द्वारा समर्पित करके पहले मानसिक पुष्पों से उनकी पूजा करते हैं । फिर भावना द्वारा ही धूप, आरती, तर्पण, नैवेद्य, आरती, दक्षिणा द्वारा उनकी विधि-वत् पूजा करते हैं । अत्यन्त सेवा-भाव से छत्र, दर्पण आदि दिए जाते हैं और उनकी विस्तृत आरती (नीराजन) की भावना की जाती है ।
नीराजन के बाद ‘इष्ट-देव’ के आनन्द के लिए मन-ही-मन विविध सुशोभित वाहन समर्पित करते हैं । पङ्खों से उन्हें शीतलता (व्यजन) प्रदान करते हैं । फिर मन से नृत्य, वाद्य, गायन द्वारा उन्हें प्रसन्न करते हैं । उनके चारों ओर प्रदक्षिणा करके उन्हें प्रणाम, पुष्पाञ्जलि समर्पित करते हैं ।
सबसे अन्त में हृदय में शयन हेतु उन्हें मनोहर पर्यङ्कादि से युक्त शयनागार समर्पित करते हुए प्रार्थना करते हैं कि विश्राम करते समय भी ‘इष्ट-देवता’ अपने भक्त के प्रति कृपा-भाव बनाए रखें ।
‘मानस-पूजा’ का उक्त विधान सरल होते हुए भी कितना प्रभावी है, इसका अनुभव केवल वही साधक कर सकते हैं, जो बाह्य संसार को-अपने शरीर तक को भूलकर एकाग्र होकर अपने मन की भावना से निर्दिष्ट सामग्री को प्रत्यक्ष देखने का प्रयास कर सकते हैं । इस प्रयास में यह ‘मानस-पूजा-स्तोत्र’ बड़ा सहायक सिद्ध होता है ।

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