May 17, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-13 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-त्रयोदशोऽध्यायः तेरहवाँ अध्याय क्रौंच, शाक और पुष्करद्वीप का वर्णन भुवनकोशवर्णने क्रौञ्चशाकपुष्करद्वीपवर्णनम् नारदजी बोले — हे सर्वार्थदर्शन ! अब आप शेष द्वीपों के परिमाण बतलाइये, जिन्हें जाननेमात्र से मनुष्य परम आनन्दमय हो जाता है ॥ १ ॥ श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] कुशद्वीप के चारों ओर घृत के समुद्र का महान् आवरण है। उसके बाहर उससे दूने परिमाण वाला क्रौंचद्वीप है, जो अपने ही समान विस्तार वाले क्षीरसमुद्र से घिरा हुआ सुशोभित होता है । उसमें क्रौंच नामक पर्वत विद्यमान है, उसी के कारण इसका नाम क्रौंचद्वीप पड़ गया ॥ २-३ ॥ पूर्वकाल में स्वामी कार्तिकेय की शक्ति के प्रहार से इसका कटिप्रदेश कट गया था, किंतु क्षीरसमुद्र से सिंचित और वरुणदेव से रक्षित होकर यह पुनः स्थिर हो गया ॥ ४ ॥ इस द्वीप के शासक प्रियव्रतपुत्र घृतपृष्ठ थे । सम्पूर्ण लोक के वन्दनीय उन श्रीमान् ने अपने द्वीप को सात वर्षों में विभक्त करके अपने सात पुत्रों को दे दिया। इस प्रकार पुत्रों के ही नाम वाले वर्षों के अधिपति के रूप में पुत्रों को नियुक्त करके उन्होंने स्वयं भगवान् श्रीहरि का आश्रय ग्रहण कर लिया ॥ ५-६१/२ ॥ आम, मधुरुह, मेघपृष्ठ, सुधामक, भ्राजिष्ठ, लोहितार्ण और वनस्पति — ये उनके सात पुत्र हैं । [उनके वर्षों में] सात पर्वत तथा सात नदियाँ इस सम्पूर्ण भूमण्डल पर प्रसिद्ध हैं । शुक्ल, वर्धमान, भाजन, उपबर्हण, नन्द, नन्दन और सर्वतोभद्र — ये पर्वत कहे गये हैं ॥ ७–९ ॥ अभया, अमृतौघा, आर्यका, तीर्थवती, वृत्तिरूपवती, शुक्ला और पवित्रवतिका — ये सात नदियाँ हैं । इन नदियों का पवित्र जल वहाँ के चार वर्णों के समुदाय द्वारा पीया जाता है । पुरुष, ऋषभ, द्रविण और देवक — ये चार वर्णों के पुरुष वहाँ निवास करते हैं । वहाँ के पुरुष जल से भरी हुई अंजलि के द्वारा विविध क्रियाएँ करते हुए भक्तिपूर्वक जल के स्वामी जलरूप भगवान् वरुणदेव की उपासना इस प्रकार करते हैं — आपः पुरुषवीर्याः स्थ पुनन्तीर्भूर्भुवः स्वरः ॥ १३ ॥ ता नः पुनीतामीवघ्नीः स्पृशतामात्मना भुवः । ‘ हे जलदेवता ! आपको परमात्मा से सामर्थ्य प्राप्त है । आप भूः भुवः और स्वः – इन तीनों लोकोंको पवित्र करते हैं; क्योंकि आप स्वरूप से पापों का नाश करने वाले हैं। हम अपने शरीर से आपका स्पर्श करते हैं, आप हमारे अंगों को पवित्र करें’ — इस मन्त्र जप के पश्चात् वे विविध स्तोत्रों से उनकी स्तुति करते हैं ॥ १०–१४ ॥ इसी प्रकार क्षीरसमुद्र से आगे उसके चारों ओर बत्तीस लाख योजन विस्तार वाला शाकद्वीप फैला हुआ है। यह द्वीप भी अपने ही समान परिमाण वाले दधिमण्डोदक समुद्र से घिरा हुआ है । यह शाकद्वीप एक विशिष्ट द्वीप है, जिसमें ‘शाक’ नामक एक विशाल वृक्ष स्थित है । हे नारद! वही वृक्ष इस क्षेत्र के नाम का कारण है। प्रियव्रतपुत्र मेधातिथि उस द्वीप के अधिपति कहे जाते हैं । वे इस द्वीप को सात वर्षों में विभाजित करके उनमें उन्हीं के समान नाम वाले अपने सात पुत्रों को नियुक्त कर स्वयं योगगति की प्राप्ति के उद्देश्यसे निकल पड़े। पुरोजव, मनोजव, पवमान, धूम्रानीक, चित्ररेफ, बहुरूप और विश्वधृक् — ये उनके सात पुत्र थे ॥ १५–१९ ॥ इसकी मर्यादा (सीमा) निश्चित करने वाले सात प्रसिद्ध पर्वत हैं तथा सात ही नदियाँ हैं । ईशान, उरुशृंग, बलभद्र, शतकेसर, सहस्रस्रोत, देवपाल और महाशन — ये सात पर्वत वहाँ विद्यमान कहे गये हैं । इसी तरह वहाँ की सात नदियों के भी नाम हैं — अनघा, आयुर्दा, उभयस्पृष्टि, अपराजिता, पंचपदी, सहस्र श्रुति और निजधृति — ये सात परम पवित्र नदियाँ बतायी गयी हैं ॥ २०-२२१/२ ॥ उस वर्ष के सभी पुरुष सत्यव्रत, क्रतुव्रत, दानव्रत और अनुव्रत — इन चार वर्णोंवाले कहे गये हैं। वे प्राणायाम के द्वारा अपने रजोगुण तथा तमोगुण को नष्ट करके प्राणवायुरूप परमेश्वर भगवान् श्रीहरि की इस प्रकार उपासना करते हैं — अन्तः प्रविश्य भूतानि यो बिभर्त्यात्मकेतुभिः ॥ २५ ॥ अन्तर्यामीश्वरः साक्षात्पातु नो यद्वशे इदम् । ‘जो प्राणादिवृत्तिरूप अपनी ध्वजाओं के सहित प्राणियों के भीतर प्रवेश करके उनका पालन करते हैं तथा यह सम्पूर्ण जगत् जिनके अधीन है, वे साक्षात् अन्तर्यामी भगवान् वायु हमारी रक्षा करें ॥ २३-२५१/२ ॥ इसी प्रकार उस दधिमण्डोद समुद्र से आगे बहुत विस्तार वाला पुष्कर नामक अन्य द्वीप है, यह शाकद्वीप से दो गुने विस्तार का है । यह अपने समान विस्तार वाले स्वादिष्ट जल के समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है ॥ २६-२७ ॥ अग्नि की शिखा के समान प्रकाशमान विशाल पंखुड़ियों वाला तथा लाखों स्वर्णमय पत्रों वाला एक पुष्कर (कमल) इस द्वीप में विराजमान है । समस्त लोकों की रचना करने की कामना से लोकगुरु श्रीहरि ने भगवान् ब्रह्मा के आसन के रूप में उस कमल की रचना की ॥ २८-२९ ॥ उस द्वीप में उसके पूर्वी तथा पश्चिमी वर्षों की सीमा निश्चित करने वाला मानसोत्तर नामक एक ही पर्वत है। यह दस हजार योजन ऊँचा तथा इतना ही विस्तृत है । इसकी चारों दिशाओं में इन्द्र आदि लोकपालों के चार पुर हैं और इनके ऊपर से होकर सूर्य निकलते हैं और वे सुमेरु की प्रदक्षिणा करते हुए संवत्सरात्मक चक्र के रूप में देवताओं के दिन (उत्तरायण) तथा रात (दक्षिणायन) – के क्रम से घूमते हुए परिक्रमण करते रहते हैं ॥ ३०-३२ ॥ उस द्वीप के अधिपति प्रियव्रत-पुत्र वीतिहोत्र उसे दो वर्षों में बाँटकर वर्षों के ही नाम वाले अपने दो पुत्रों रमण तथा धातकी को उन वर्षों का स्वामी नियुक्त करके स्वयं अपने बड़े भाइयों की भाँति भगवान् श्रीहरि की भक्ति में संलग्न हो गये ॥ ३३-३४१/२ ॥ उन वर्षों में निवास करने वाले शीलसम्पन्न पुरुष ब्रह्मसालोक्यादि की प्राप्ति कराने वाले कर्मयोग के द्वारा ब्रह्मस्वरूप परमेश्वर की इस प्रकार उपासना करते हैं — यत्तत्कर्ममयं लिङ्ग ब्रह्मलिङ्गं जनोऽर्चयेत् । एकान्तमद्वयं शान्तं तस्मै भगवते नमः ॥ ३६ ॥ ‘कर्मफलस्वरूप, ब्रह्मके साक्षात् विग्रह, एकान्तस्वभाव, अद्वैत तथा शान्तस्वरूप जिन परमेश्वर की लोग अर्चना करते हैं, उन भगवान् श्रीहरि को नमस्कार है’ ॥ ३५-३६ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत आठवें स्कन्ध का ‘भुवनकोशवर्णन में क्रौंचशाकपुष्करद्वीपवर्णन’ नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe