May 23, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-11 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-एकादशोऽध्यायः ग्यारहवाँ अध्याय गंगा की उत्पत्ति एवं उनका माहात्म्य गङ्गोपाख्यानवर्णनम् नारदजी बोले — हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ ! पृथ्वी का यह परम मनोहर उपाख्यान मैं सुन चुका; अब आप गंगा का उपाख्यान कहिये । सुरेश्वरी, विष्णुस्वरूपा और स्वयं विष्णुपदी — इस नाम से विख्यात वे श्रेष्ठ गंगा प्राचीनकाल में सरस्वती के शाप से भारतवर्ष में किस प्रकार, किस युग में तथा किसके द्वारा प्रार्थित और प्रेरित होकर गयीं। मैं इस पापनाशक, पुण्यप्रद तथा मंगलकारी प्रसंग को क्रम से सुनना चाहता हूँ ॥ १-३ ॥ श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] राजराजेश्वर श्रीमान् सगर सूर्यवंशी राजा हो चुके हैं । वैदर्भी तथा शैव्या नामों वाली उनकी दो मनोहर भार्याएँ थीं । उनकी शैव्या नामक पत्नी से अत्यन्त सुन्दर तथा कुल की वृद्धि करने वाला एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो असमंज -इस नाम से विख्यात हुआ ॥ ४-५ ॥ उनकी दूसरी पत्नी वैदर्भी ने पुत्र की कामना से भगवान् शंकर की आराधना की और शिवजी के वरदान से उसने गर्भ धारण किया ॥ ६ ॥ पूरे सौ वर्ष व्यतीत हो जाने पर उसने एक मांस- पिण्ड को जन्म दिया । उसे देखकर तथा शिव का ध्यान करके वह बार-बार ऊँचे स्वर में विलाप करने लगी ॥ ७ ॥ तब भगवान् शंकर ब्राह्मण का रूप धारणकर उसके पास गये और उन्होंने उस मांसपिण्ड को बराबर- बराबर साठ हजार भागों में विभक्त कर दिया ॥ ८ ॥ वे सभी टुकड़े पुत्ररूप में हो गये। वे महान् बल तथा पराक्रम से सम्पन्न थे। उनके शरीर की कान्ति ग्रीष्मऋतु मध्याह्नकालीन सूर्य की प्रभा को भी तिरस्कृत कर देने वाली थी ॥ ९ ॥ कपिल मुनि के शाप से वे सभी जलकर भस्म हो गये। यह समाचार सुनकर राजा सगर बहुत रोये और वे घोर जंगल में चले गये ॥ १० ॥ तदनन्तर उनके पुत्र असमंज गंगा को लाने के निमित्त तपस्या करने लगे। इस प्रकार एक लाख वर्ष तक तप करने के पश्चात् वे कालयोग से मर गये ॥ ११ ॥ उन असमंज के पुत्र अंशुमान् भी गंगा को पृथ्वी पर ले आने के उद्देश्य से एक लाख वर्ष तक तप करने के उपरान्त कालयोग से मृत्यु को प्राप्त हो गये ॥ १२ ॥ अंशुमान् के पुत्र भगीरथ थे। वे भगवान् के परम भक्त, विद्वान्, विष्णु के भक्त, गुणवान्, अजर-अमर तथा वैष्णव थे । उन्होंने गंगा को ले आने के लिये एक लाख वर्ष तक तप करके भगवान् श्रीकृष्ण का साक्षात् दर्शन किया। वे ग्रीष्मकालीन करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा से सम्पन्न थे, उनकी दो भुजाएँ थीं, वे हाथ में मुरली धारण किये हुए थे, उनकी किशोर अवस्था थी, वे गोपवेष में थे और कभी गोपालसुन्दरी के रूप में हो जाते थे, भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये ही उन्होंने यह रूप धारण किया था, उस समय ब्रह्मा- विष्णु-महेश आदि देवता अपनी इच्छा के अधीन उन परिपूर्णतम परब्रह्मस्वरूप प्रभु श्रीकृष्ण का स्तवन कर रहे थे, मुनियों ने उनके समक्ष अपने मस्तक झुका रखे थे, सदा निर्लिप्त, सबके साक्षी, निर्गुण, प्रकृति से परे तथा भक्तों पर कृपा करने वाले उन श्रीकृष्ण का मुखमण्डल मन्द मुसकानयुक्त तथा प्रसन्नता से भरा हुआ था; वे अग्नि के समान विशुद्ध वस्त्र धारण किये हुए थे और रत्नमय आभूषणों से सुशोभित हो रहे थे- ऐसे स्वरूपवाले भगवान् कृष्ण को देखकर राजा भगीरथ बार-बार प्रणामकर उनकी स्तुति करने लगे। उन्होंने लीलापूर्वक श्रीकृष्ण से अपने पूर्वजों को तारने वाला अभीष्ट वर प्राप्त कर लिया । उस समय भगवान् की स्तुति करने से उनका रोम-रोम पुलकित हो गया था ॥ १३–१९ ॥ श्रीभगवान् बोले — हे सुरेश्वरि ! सरस्वती के शाप के प्रभाव से आप शीघ्र ही भारतवर्ष में जाइये और मेरी आज्ञा से राजा सगर के सभी पुत्रों को पवित्र कीजिये ॥ २० ॥ आपसे स्पर्शित वायु का संयोग पाकर वे सब पवित्र हो जायँगे और मेरा स्वरूप धारण करके दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर मेरे लोक को प्राप्त होंगे। वे जन्म-जन्मान्तर में किये गये कर्मों के फलों का समूल उच्छेद करके सर्वथा निर्विकार भाव से युक्त होकर मेरे पार्षद के रूप में प्रतिष्ठित होंगे ॥ २१-२२ ॥ श्रुति में ऐसा कहा गया है कि भारतवर्ष में मनुष्यों के द्वारा करोड़ों जन्मों में किये गये दुष्कर्म के परिणामस्वरूप जो भी पाप संचित रहता है, वह गंगा की वायु के स्पर्शमात्र से नष्ट हो जाता है ॥ २३ ॥ गंगाजी के स्पर्श और दर्शन की अपेक्षा दस गुना पुण्य गंगा में मौसल [^1] स्नान करने से प्राप्त होता है । सामान्य दिनों में भी स्नान करने से मनुष्यों के सैकड़ों जन्मों के पाप विनष्ट हो जाते हैं — ऐसा श्रुति कहती है । इच्छापूर्वक इस जन्म में किये गये तथा अनेक पूर्वजन्मों के संचित जो कुछ भी मनुष्यों के ब्रह्महत्या आदि पाप हैं, वे सब मौसलस्नान करने मात्र से नष्ट हो जाते हैं ॥ २४-२६ ॥ हे विप्र [नारद]! पुण्यप्रद दिनों में गंगास्नान से होने वाले पुण्य का वर्णन तो वेद भी नहीं कर सकते । आगमशास्त्र के जो विद्वान् हैं, वे आगमों में प्रतिपादित कुछ-कुछ फल बताते हैं । ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवता भी पुण्यप्रद दिनों के स्नान का सम्पूर्ण फल नहीं बता सकते । हे सुन्दरि ! अब सामान्य दिवसों में संकल्पपूर्वक किये गये स्नान का फल सुनो। साधारण दिवस संकल्पपूर्वक स्नान का पुण्य मौसलस्नान से दस गुना अधिक होता है। उससे भी तीस गुना पुण्य सूर्य-संक्रान्ति के दिन स्नान करने से होता है ॥ २७–२९ ॥ अमावस्यातिथि को भी स्नान करने से उसी सूर्यसंक्रान्ति के स्नान के समान पुण्य होता है। किंतु दक्षिणायन में गंगा-स्नान करने से उसका दूना और उत्तरायण में गंगा-स्नान करने से मनुष्यों को उससे दस गुना पुण्य प्राप्त होता है । चातुर्मास तथा पूर्णिमा के अवसर पर स्नान करने से अनन्त पुण्य प्राप्त होता है, अक्षय तृतीया के दिन स्नान करने से भी उसी के समान पुण्य होता है — ऐसा वेद में कहा गया है ॥ ३०-३१ ॥ इन विशेष पर्वों पर किये गये स्नान तथा दान असंख्य पुण्य-फल प्रदान करते हैं। इन पर्वों पर किये गये स्नान-दान का फल सामान्य दिवसों में किये गये स्नान तथा दान की अपेक्षा सौ गुना अधिक होता है ॥ ३२ ॥ मन्वन्तरादि[^2] तथा युगादि[^3] तिथियों, माघ शुक्ल सप्तमी, भीष्माष्टमी, अशोकाष्टमी, रामनवमी तथा नन्दा तिथि को दुर्लभ गंगा – स्नान करने पर उससे भी दूना फल मिलता है ॥ ३३-३४ ॥ गंगादशहरा की दशमीतिथि को स्नान करने से युगादि तिथियों के तुल्य और वारुणीपर्व पर स्नान करने से नन्दा तिथि के तुल्य फल प्राप्त होता है । महावारुणी आदि पर्वों पर स्नान करने से उससे चार गुना पुण्य प्राप्त होता है । महामहावारुणी-पर्व पर स्नान करने से उससे भी चार गुना और सामान्य स्नान की अपेक्षा करोड़ गुना पुण्य प्राप्त होता है । चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहण के अवसर पर स्नान करनेसे उससे भी दस गुना पुण्य मिलता है और अर्धोदयकाल में स्नान करने से उससे भी सौ गुना फल प्राप्त होता है ॥ ३५-३७ ॥ गंगा और भगीरथ के समक्ष ऐसा कहकर देवेश्वर श्रीहरि चुप हो गये । तब गंगा भक्तिभाव से अपना मस्तक झुकाकर कहने लगीं ॥ ३८ ॥ गंगा बोलीं — हे नाथ! हे राजेन्द्र ! भारती के पूर्व शाप और साथ ही आपकी आज्ञा तथा भगीरथ की तपस्या के कारण मैं इस समय भारतवर्ष में जा रही हूँ । किंतु हे प्रभो! वहाँ जाने पर पापी लोग मुझमें स्नान करके अपने जो कुछ पाप मुझे दे देंगे, वे मेरे पाप किस प्रकार नष्ट होंगे; इसका उपाय मुझे बताइये ॥ ३९-४० ॥ हे देवेश ! मुझे भारतवर्ष में कितने समय तक रहना होगा और पुनः भगवान् विष्णु के परम धाम को मैं कब प्राप्त होऊँगी ? ॥ ४१ ॥ हे सर्ववित् ! हे सर्वान्तरात्मन्! हे सर्वज्ञ ! मेरा अन्य जो कुछ भी अभिलषित है, वह सब आप जानते ही हैं। अत: हे प्रभो ! मेरे उन अभीष्टों के पूर्ण होने का उपाय बतला दीजिये ॥ ४२ ॥ श्रीभगवान् बोले — हे गंगे ! हे सुरेश्वरि ! मैं तुम्हारी समस्त इच्छाओं को जानता हूँ। वहाँ भारतवर्ष में लवणसमुद्र नदीस्वरूपिणी तुम्हारे पति होंगे। वे मेरे ही अंशस्वरूप हैं और तुम साक्षात् लक्ष्मीस्वरूपिणी हो । इस प्रकार पृथ्वी पर एक गुणवान् पुरुष के साथ एक गुणवती स्त्री का मेल बड़ा ही उत्तम होगा ॥ ४३-४४ ॥ भारतवर्ष में सरस्वती आदि जो भी नदियाँ हैं, उन सबमें क्रीडा की दृष्टि से लवणसमुद्र के लिये तुम्ही सर्वाधिक सौभाग्यवती होओगी ॥ ४५ ॥ हे देवेशि! इस समय से कलियुग के पाँच हजार वर्षों तक तुम्हें सरस्वती के शाप से भारतभूमि पर रहना होगा ॥ ४६ ॥ हे देवि ! रसिकास्वरूपिणी तुम रसिकराज लवणसमुद्र से संयुक्त होकर उनके साथ एकान्त में सदा विहार करोगी ॥ ४७ ॥ भारतवर्ष में रहने वाले सभी लोग भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करेंगे और भगीरथ के द्वारा रचित स्तोत्र से तुम्हारी स्तुति करेंगे ॥ ४८ ॥ जो कण्वशाखा में बतायी गयी ध्यान-विधि से तुम्हारा ध्यान करके तुम्हारी पूजा तथा स्तुति और तुम्हें नित्य प्रणाम करेगा, उसे अश्वमेधयज्ञ का फल प्राप्त होगा ॥ ४९ ॥ जो मनुष्य सौ योजन दूर से भी ‘गंगा, गंगा’- इस प्रकार उच्चारण करता है, वह सारे पापों से मुक्त हो जाता है तथा विष्णुलोक को प्राप्त करता है ॥ ५० ॥ हजारों पापी व्यक्तियों के स्नान से जो पाप तुम्हें प्राप्त होगा, वह मूलप्रकृति देवी भुवनेश्वरी के भक्तों के स्पर्शमात्र से विनष्ट हो जायगा ॥ ५१ ॥ हजारों पापी प्राणियों के शव के स्पर्श से जो पाप तुम्हें लगेगा, वह भगवती के मन्त्रों की उपासना करने वाले पुण्यात्मा भक्तों के स्नान से नष्ट हो जायगा ॥ ५२ ॥ हे शुभे ! तुम सरस्वती आदि श्रेष्ठ नदियों के साथ भारतवर्ष में निवास करोगी और वहाँ प्राणियों को पाप से मुक्त करती रहोगी ॥ ५३ ॥ जहाँ तुम्हारे गुणों का कीर्तन होगा, वह स्थान तत्काल तीर्थ बन जायगा । तुम्हारे रजः कण का स्पर्शमात्र हो जाने से पापी भी पवित्र हो जायगा और उन रजःकणों की जितनी संख्या होगी, उतने वर्षों तक वह निश्चितरूप से देवीलोक में निवास करेगा ॥ ५४१/२ ॥ जो मनुष्य ज्ञान तथा भक्ति से युक्त होकर मेरे नाम का स्मरण करते हुए तुम्हारे जल में अपने प्राणों का त्याग करेंगे, वे श्रीहरि के लोक में जायँगे और वहाँ पर दीर्घ-काल तक उनके श्रेष्ठ पार्षदों के रूप में प्रतिष्ठित होंगे और वे असंख्य प्राकृतिक प्रलय देखेंगे ॥ ५५-५६१/२ ॥ महान् पुण्य से किसी मृत प्राणी का शव तुम्हारे में आ सकता है । जितने दिनों तक उसकी स्थिति तुम्हारे में रहती है, उतने समय तक वह वैकुण्ठ में वास करता है। तदनन्तर जब वह अनेक शरीर धारण करके अपने कर्मों का फल भोग चुकता है, तब मैं उसे सारूप्य मुक्ति दे देता हूँ और उसे अपना पार्षद बना लेता हूँ ॥ ५७-५८१/२ ॥ यदि कोई अज्ञानी मनुष्य भी तुम्हारे जल का स्पर्श करके प्राणों का त्याग करता है, तो मैं उसे सालोक्य मुक्ति प्रदान कर देता हूँ और उसे अपना पार्षद बना लेता हूँ । अथवा तुम्हारे नाम का स्मरण करके कोई व्यक्ति अन्यत्र कहीं भी यदि प्राणत्याग करता है, तो मैं उसे सालोक्य मुक्ति प्रदान करता हूँ और वह ब्रह्मा की आयुपर्यन्त मेरे लोक में निवास करता है ॥ ५९-६०१/२ ॥ इसी प्रकार यदि कोई मनुष्य तुम्हारे नाम का स्मरण करके अन्यत्र किसी भी स्थान पर प्राणत्याग करता है, तो मैं उसे सारूप्य मुक्ति प्रदान करता हूँ और वह असंख्य प्राकृतिक प्रलय देखता है । तदनन्तर बहुमूल्य रत्नों से निर्मित विमान में बैठकर वह मेरे पार्षदों के साथ गोलोक में जा पहुँचता है और निश्चय ही मेरे तुल्य हो जाता है ॥ ६१-६२१/२ ॥ प्रतिदिन मेरे मन्त्र की उपासना तथा मेरा नैवेद्य ग्रहण करने वाले भक्तों के लिये तीर्थ अथवा अतीर्थ में मृत्यु को प्राप्त होने में कुछ भी अन्तर नहीं है । मेरा ऐसा भक्त तीनों लोकों को सहजतापूर्वक पवित्र करने में समर्थ है । अन्त में मेरे वे भक्त बहुमूल्य रत्नों से निर्मित विमान पर आरूढ़ होकर गोलोक जाते हैं। साथ ही, मेरे भक्त जिनके बान्धव हैं; वे तथा उनके पशु आदि भी रत्ननिर्मित विमान से अत्यन्त दुर्लभ गोलोक में चले जाते हैं । हे सती ! जो ज्ञानीजन चाहे जहाँ भी ज्ञानपूर्वक मेरा स्मरण करते हैं, वे मेरी भक्ति के प्रभाव से जीवन्मुक्त और पवित्र हो जाते हैं ॥ ६३-६६१/२ ॥ [ हे नारद!] गंगा से ऐसा कहकर भगवान् श्रीहरि ने उन भगीरथ से कहा — अब आप भक्तिपूर्वक इन गंगा की स्तुति तथा पूजा कीजिये ॥ ६७१/२ ॥ तदनन्तर भगीरथ ने कौथुमशाखा में बताये गये ध्यान तथा स्तोत्र के द्वारा भक्तिपूर्वक उन गंगा की बार-बार स्तुति तथा पूजा की। इसके बाद भगीरथ तथा गंगा ने परमेश्वर श्रीकृष्ण को प्रणाम किया तथा वे प्रभु अन्तर्धान हो गये ॥ ६८-६९१/२ ॥ नारदजी बोले — हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ ! राजा भगीरथ ने किस ध्यान, स्तोत्र तथा पूजाविधि से गंगा का पूजन किया, यह मुझे बतलाइये ॥ ७० ॥ श्रीनारायण बोले — राजा भगीरथ ने नित्य-क्रिया तथा स्नान करके दो स्वच्छ वस्त्र धारणकर इन्द्रियों को नियन्त्रित करके भक्तिपूर्वक गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और भगवती शिवा — इन छः देवताओं की विधिवत् पूजा की। इन छः देवताओं की सम्यक् पूजा करके वे गंगापूजन अधिकारी हुए ॥ ७१-७२१/२ ॥ मनुष्य को चाहिये कि विघ्न दूर करने के लिये गणेश की, आरोग्य के लिये सूर्य की, पवित्रता के लिये अग्नि की, लक्ष्मी प्राप्ति के लिये विष्णु की, ज्ञान के लिये ज्ञानेश्वर शिव की तथा मुक्ति प्राप्त करने के लिये भगवती शिवा की पूजा करे। इन देवताओं की पूजा कर लेने के बाद ही विद्वान् पुरुष अन्य पूजा में सफलता प्राप्त कर सकता है, अन्यथा इसके विपरीत परिणाम होता है । हे नारद! जिस ध्यान के द्वारा भगीरथ ने गंगा का ध्यान किया था, उस ध्यान को सुनिये ॥ ७३–७५ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘गंगोपाख्यानवर्णन’ नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥ [^1]: गंगाको प्रणाम करके प्रवेश करे और निश्चेष्ट होकर अर्थात् बिना हाथ-पैर हिलाये शान्तभावसे स्नान कर ले। इसे मौसलस्नान कहते हैं । [^2]: आश्विन शुक्ल नवमी, कार्तिक शुक्ल द्वादशी, चैत्र शुक्ल तृतीया, भाद्र शुक्ल तृतीया, फाल्गुन अमावास्या, पौष शुक्ल एकादशी, आषाढ़ शुक्ल दशमी, माघ शुक्ल सप्तमी, श्रावण कृष्ण अष्टमी, आषाढ़ पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा, फाल्गुन पूर्णिमा, चैत्र पूर्णिमा और ज्येष्ठ पूर्णिमा – ये स्वायम्भुव आदि मन्वन्तरों की आरम्भिक तिथियाँ हैं । (मत्स्यपुराण १७ । ६–८) [^3]: सत्ययुग – वैशाख शुक्ल तृतीया, त्रेतायुग – कार्तिक शुक्ल नवमी, द्वापर – माघ पूर्णिमा एवं कलियुग – भाद्र शुक्ल त्रयोदशी—ये सत्ययुग आदि चारों युगों की आरम्भिक तिथियाँ हैं ( मत्स्यपुराण १७ । ४) । Content is available only for registered users. 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