August 12, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-77 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ सतहत्तरवाँ अध्याय कामरूपतीर्थ में प्रतिष्ठित दस महाविद्याओं का वर्णन तथा कामाख्या कवच अथः सप्तसप्ततितमोऽध्यायः श्रीमहादेवनारदसंवादे श्रीमहाकामाख्याकवचवर्णनं श्रीनारदजी बोले — महेश्वर ! कामरूप महाक्षेत्र में दस महाविद्याओं की अधिष्ठात्री देवी महेश्वरी कौन हैं ? उनके विषय में हमें बताइये ॥ १ ॥ श्रीमहादेवजी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! साधकों के हितसम्पादन के लिये जप और पूजा का फल प्रदान करने वाली ये दसों महाविद्याएँ इस शक्तिपीठ में स्थित हैं ॥ २ ॥ महामते ! भगवती कामाख्या ही स्वयं आदिशक्ति सनातनी देवी कालिका हैं। उनके बगल में अन्य नौ महाविद्याएँ प्रतिष्ठित हैं ॥ ३ ॥ सर्वविद्यात्मिका काली ही कामाख्यारूपिणी हैं । उस शक्तिपीठ में उनकी तथा अपने इष्टदेवता की पूजा करके भक्तिपूर्वक जो इष्ट मन्त्र का जप करता है, उसका मन्त्र सिद्ध हो जाता है ॥ ४ ॥ ध्यायतां परमेशानीं कामाख्यां कालिकां पराम् । रक्तवस्त्रपरीधानां घोरनेत्रत्रयोज्ज्वलाम् ॥ चतुर्भुजां भीमदंष्ट्रां युगान्तजलदद्युतिम् । मणिसिंहासने न्यस्तां सिंहप्रेताम्बुजस्थिताम् ॥ हरिः सिंहः शवः शम्भुर्ब्रह्मा कमलरूपधृक् । ललज्जिह्वां महाघोरां किरीटकनकोज्ज्वलाम् ॥ अनर्घ्य मणिमाणिक्यघटितैर्भुषणोत्तमः । अलङ्कृतां जगद्धात्रीं सृष्टिस्थित्यन्तकारिणीम् ॥ जो रक्तवस्त्र धारण करने वाली, तीन भयंकर नेत्रों से सुशोभित, चार भुजाओं और विकराल दन्तावली तथा प्रलयकालीन मेघों की आभा से सुशोभित हैं; जो मणिसिंहासन पर विराजमान हैं और सिंह, प्रेत तथा कमल पर आसीन हैं — ऐसी परमेश्वरी महाकालिका भगवती कामाख्या का ध्यान करने वाले भक्तों के लिये भगवती का वाहन सिंह विष्णुस्वरूप, शव शिवस्वरूप तथा कमल ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। लपलपाती जिह्वावाली, अत्यन्त घोरस्वरूपिणी, स्वर्णकिरीट से प्रकाशित, बहुमूल्य मणि- माणिक्य से जटित उत्तम आभूषणों से अलंकृत तथा सृष्टि- पालन-संहार करने वाली जगद्धात्री कामाख्या की सदा उपासना करनी चाहिये ॥ ५–८ ॥ नारद! इस महापीठ के वामभाग में भगवती तारा, दक्षिणभाग में भुवनेश्वरी, अग्निकोण में षोडशीविद्या, नैर्ऋत्यकोण में स्वयं भैरवी, वायव्यकोण में छिन्नमस्ता, पृष्ठभाग में बगलामुखी, ईशानकोण में सुन्दरी विद्या, ऊर्ध्व भाग में मातङ्गनायिका तथा दक्षिणभाग में धूमावती विद्या प्रतिष्ठित हैं। नीचे के भाग में भस्माचलस्वरूप स्वयं भगवान् शंकर विराजमान हैं ॥ ९-११ ॥ पितामह ब्रह्मा तथा भगवान् विष्णु और जो अन्य प्रमुख देवता हैं, वे सभी शक्ति से समन्वित होकर भगवती कामाख्या के लोकदुर्लभ शक्तिपीठ में निरन्तर प्रतिष्ठित रहते हैं ॥ १२ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! भगवती को परम प्रसन्न करने की इच्छा वाला जो जितेन्द्रिय व्यक्ति भक्तिपूर्वक अपनी शक्ति के अनुसार प्राप्त वैभव के अनुकूल विविध उपचारों से शक्तिपीठ में परिकरसहित भगवती की पूजा करता है, उसको पुनर्जन्म की आशंका नहीं रहती ॥ १३-१४ ॥ जो व्यक्ति भक्तिभाव से महादेवी भगवती को बिल्वपत्र अर्पित करता है, उसे साक्षात् सर्वलोकेश्वरेश्वर शंकर ही जानना चाहिये ॥ १५ ॥ तीन पत्ते वाला बिल्वपत्र ब्रह्मा, विष्णु और शिवात्मक है। यह जड़-चेतनरूप समस्त संसार उससे व्याप्त है ॥ १६ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! जो व्यक्ति उस बिल्वपत्र को पूर्णा भगवती देवी को अर्पण करता है, उसे सम्पूर्ण संसार का दान करने का फल प्राप्त होता है। वह उत्तम मनुष्य पूर्णकाम होकर पृथ्वी पर विचरण करता है । उसका यह जन्म कृतार्थ हो जाता है तथा कहीं पुनर्जन्म नहीं होता ॥ १७-१८ ॥ महामते ! भगवती के उस शक्तिपीठ में शरीर में भस्म लगाकर भक्तिपूर्वक जो व्यक्ति भस्माचलस्वरूप भगवान् शंकर की पूजा करता है, वह मनचाहा भोग प्राप्त कर परम मोक्ष को प्राप्त कर लेता है ॥ १९ ॥ शैव, शाक्त तथा वैष्णव को सर्वदा रुद्राक्ष धारण किये रहना चाहिये। रुद्राक्ष से युक्त होकर जो व्यक्ति कर्म करता है, वह महापुण्य प्राप्त करता है ॥ २० ॥ भगवती कामाख्या शक्तिपीठ में रुद्राक्ष धारण किया हुआ व्यक्ति संहारकारक भगवान् रुद्र की पूजाकर रुद्रत्व को प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ २१ ॥ भगवती कामाख्या के शक्तिपीठ में अमावास्या, चतुर्दशी, अष्टमी अथवा तिथिक्षय होने पर या नवमी तिथि की रात्रि में भगवती भैरवी का साहसपूर्वक जो जितेन्द्रिय व्यक्ति निर्भय होकर मन्त्र जपता है, उसे निश्चित ही भगवती का प्रत्यक्ष दर्शन होता है ॥ २२-२३ ॥ आत्मसंरक्षा तथा मन्त्रसिद्धि के लिये जो व्यक्ति देवी भगवती के कवच का पाठ करता है उस व्यक्ति को कभी भय नहीं होता ॥ २४ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! इसलिये पूर्व में मनुष्य को रक्षाविधान करके निर्भीक होकर सावधानीपूर्वक अपने इष्ट मन्त्र का जप करना चाहिये ॥ २५ ॥ नारदजी बोले — महेश्वर! महाभय को दूर करने वाला भगवती कामाख्या का कवच कैसा है, वह अब हमें बतायें ॥ २६ ॥ श्रीमहादेवजी बोले — सुरश्रेष्ठ ! भगवती कामाख्या का परम गोपनीय, महाभय को दूर करने वाला तथा सर्वमङ्गलदायक वह कवच सुनिये, जिसकी कृपा तथा स्मरणमात्र से सभी योगिनी – डाकिनीगण, विघ्नकारी राक्षसियाँ तथा बाधा उत्पन्न करने वाले अन्य उपद्रव, भूख, प्यास, निद्रा तथा अन्य विघ्नदायक दूर से ही पलायन कर जाते हैं ॥ २७–२९ ॥ [इस कवच के प्रभाव से] मनुष्य भयरहित, तेजस्वी तथा भैरवतुल्य हो जाता है। जप, होम आदि कर्मों में समासक्त मनवाले भक्त की मन्त्र-तन्त्रों में सिद्धि निर्विघ्न हो जाती है ॥ ३० ॥ ॥ श्रीमहादेव उवाच ॥ शृणुष्व परमं गुह्यं महाभयनिवर्तकम् । कामाख्यायाः सुरश्रेष्ठ कवचं सर्वमङ्गलम् ॥ २७ ॥ यस्य स्मरणमात्रेण योगिनीडाकिनीगणाः । राक्षस्यो विघ्नकारिण्यो याश्चान्या विघ्नकारिकाः ॥ २८ ॥ क्षुत्पिपासा तथा निद्रा तथान्ये ये च विघ्नदाः । दूरादपि पलायन्ते कवचस्य प्रसादतः ॥ २९ ॥ निर्भयो जायते मर्त्यस्तेजस्वी भैरवोपमः । समासक्तमनाश्चापि जपहोमादिकर्मपुसु। भवेच्च मन्त्रतन्त्राणां निर्विघ्नेन सुसिद्धये ॥ ३० ॥ ॥ अथ कामाख्या कवचम् ॥ ॐ प्राच्यां रक्षतु मे तारा कामरूपनिवासिनी । आग्नेय्यां षोडशी पातु याम्यां धूमावती स्वयम् ॥ ३१ ॥ नैर्ऋत्यां भैरवी पातु वारुण्यां भुवनेश्वरी । वायव्यां सततं पातु छिन्नमस्ता महेश्वरी ॥ ३२ ॥ कौबेर्यां पातु मे देवी श्रीविद्या बगलामुखी । ऐशान्यां पातु मे नित्यं महात्रिपुरसुन्दरी ॥ ३३ ॥ ऊर्ध्वं रक्षतु मे विद्या मातङ्गी पीठवासिनी । सर्वतः पातु मे नित्यं कामाख्या कालिका स्वयम् ॥ ३४ ॥ ब्रह्मरूपा महाविद्या सर्वविद्यामयी स्वयम् । शीर्षे रक्षतु मे दुर्गा भालं श्रीभवगेहिनी ॥ ३५ ॥ त्रिपुरा भ्रूयुगे पातु शर्वाणी पातु नासिकाम् । चक्षुषी चण्डिका पातु श्रोत्रे नीलसरस्वती ॥ ३६ ॥ मुखं सौम्यमुखी पातु ग्रीवां रक्षतु पार्वती । जिह्वां रक्षतु मे देवी जिह्वाललनभीषणा ॥ ३७ ॥ वाग्देवी वदनं पातु वक्षः पातु महेश्वरी । बाहू महाभुजा पातु कराङ्गुलीः सुरेश्वरी ॥ ३८ ॥ पृष्ठतः पातु भीमास्या कट्यां देवी दिगम्बरी । उदरं पातु मे नित्यं महाविद्या महोदरी ॥ ३९ ॥ उग्रतारा महादेवी जङ्घोरू परिरक्षतु । गुदं मुष्कं च मेढ्रं च नाभिं च सुरसुन्दरी ॥ ४० ॥ पदाङ्गुलीः सदा पातु भवानी त्रिदशेश्वरी । रक्तमांसास्थिमज्जादीन्पातु देवी शवासना ॥ ४१ ॥ महाभयेषु घोरेषु महाभयनिवारिणी । पातु देवी महामाया कामाख्या पीठवासिनी ॥ ४२ ॥ भस्माचलगता दिव्यसिंहासन कृताश्रया । पातु श्रीकालिकादेवी सर्वोत्पातेषु सर्वदा ॥ ४३ ॥ रक्षाहीनं तु यत्स्थानं कवचेनापि वर्जितम् । तत्सर्वं सर्वदा पातु सर्वरक्षरणकारिणी ॥ ४४ ॥ इदं तु परमं गुह्यं कवचं मुनिसत्तम । कामाख्याया मयोक्तं ते सर्वरक्षाकरं परम् ॥ ४५ ॥ अनेन कृत्वा रक्षां तु निर्भयः साधको भवेत् । न तं स्पृशेद्भयं घोरं मन्त्रसिद्धिविरोधकम् ॥ ४६ ॥ जायते च मनःसिद्धिर्निर्विघ्नेन महामते । इदं यो धारयेत्कण्ठे बाहौ वा कवचं महत् ॥ ४७ ॥ अव्याहताज्ञः स भवेत्सर्वविद्याविशारदः । सर्वत्र लभते सौख्यं मङ्गलं तु दिने दिने ॥ ४८ ॥ यः पठेत्प्रयतो भूत्वा कवचं चेदमद्भुतम् । स देव्याः पदवीं याति सत्यं सत्यं न संशयः ॥ ४९ ॥ [ कामाख्या -कवच ] कामरूप में निवास करने वाली भगवती तारा पूर्व दिशा में, षोडशीदेवी अग्निकोण में तथा स्वयं धूमावती दक्षिण दिशा में रक्षा करें ॥ ३१ ॥ नैर्ऋत्यकोण में भैरवी, पश्चिम दिशा में भुवनेश्वरी और वायव्यकोण में भगवती महेश्वरी छिन्नमस्ता निरन्तर मेरी रक्षा करें ॥ ३२ ॥ उत्तर दिशा में श्रीविद्या देवी बगलामुखी तथा ईशानकोण में महात्रिपुरसुन्दरी सदा मेरी रक्षा करें ॥ ३३ ॥ भगवती कामाख्या के शक्तिपीठ में निवास करने वाली मातङ्गी विद्या ऊर्ध्वभाग में और भगवती कालिका कामाख्या स्वयं सर्वत्र मेरी नित्य रक्षा करें ॥ ३४ ॥ ब्रह्मरूपा महाविद्या सर्वविद्यामयी स्वयं दुर्गा सिर की रक्षा करें और भगवती श्रीभवगेहिनी मेरे ललाट की रक्षा करें ॥ ३५ ॥ त्रिपुरा दोनों भौंहों की, शर्वाणी नासिका की, देवी चण्डिका आँखों की तथा नीलसरस्वती दोनों कानों की रक्षा करें ॥ ३६ ॥ भगवती सौम्यमुखी मुख की, देवी पार्वती ग्रीवा की और जिह्वाललनभीषणा देवी मेरी जिह्वा की रक्षा करें ॥ ३७ ॥ वाग्देवी वदन की, भगवती महेश्वरी वक्ष:स्थल की, महाभुजा दोनों बाहु की तथा सुरेश्वरी हाथ की अङ्गुलियों की रक्षा करें ॥ ३८ ॥ भीमास्या पृष्ठभाग की, भगवती दिगम्बरी कटिप्रदेश की और महाविद्या महोदरी सर्वदा मेरे उदर की रक्षा करें ॥ ३९ ॥ महादेवी उग्रतारा जङ्घा और ऊरुओं की एवं सुरसुन्दरी गुदा, अण्डकोश, लिङ्ग तथा नाभि की रक्षा करें ॥ ४० ॥ भवानी त्रिदशेश्वरी सदा पैर की अङ्गुलियों की रक्षा करें और देवी शवासना रक्त, मांस, अस्थि, मज्जा आदि की रक्षा करें ॥ ४१ ॥ भगवती कामाख्या के शक्तिपीठ में निवास करने वाली, महाभय का निवारण करने वाली देवी महामाया भयंकर महाभय से रक्षा करें ॥ ४२ ॥ भस्माचल पर स्थित दिव्य सिंहासन पर विराजमान रहने वाली श्रीकालिकादेवी सदा सभी प्रकार के विघ्नों से रक्षा करें ॥ ४३ ॥ जो स्थान कवच में नहीं कहा गया है, अतएव रक्षा से रहित है उन सबकी रक्षा सर्वदा भगवती सर्वरक्षणकारिणी करें ॥ ४४ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! मेरे द्वारा आपसे कहा गया सभी प्रकार की रक्षा करने वाला भगवती कामाख्या का जो यह उत्तम कवच है, वह अत्यन्त गोपनीय एवं श्रेष्ठ है ॥ ४५ ॥ इस कवच से रक्षित होकर साधक निर्भय हो जाता है । मन्त्रसिद्धि का विरोध करने वाले भयंकर भय उसका कभी स्पर्श तक नहीं करते हैं ॥ ४६ ॥ महामते ! जो व्यक्ति इस महान् कवच को कण्ठ में अथवा बाहु में धारण करता है, उसे निर्विघ्न मनोवाञ्छित सिद्धि मिलती है ॥ ४७ ॥ वह अमोघ आज्ञा वाला होकर सभी विद्याओं में प्रवीण हो जाता है तथा सभी जगह दिनानुदिन मङ्गल और सुख प्राप्त करता है ॥ ४८ ॥ जो जितेन्द्रिय व्यक्ति इस अद्भुत कवच का पाठ करता है, वह भगवती के दिव्य धाम को जाता है, यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४९ ॥ ॥ इस प्रकार महाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘श्रीमहाकामाख्याकवचवर्णन’ नामक सतहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७७ ॥ Content is available only for registered users. 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