श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-08
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
आठवाँ अध्याय
भगवान् शंकर द्वारा सती का दक्ष के घर जाने को अनुचित बताना, देवी सती के विराट रूप को देखकर शंकर का भयभीत होना, सती द्वारा काली, तारा आदि अपने दस स्वरूपों (दस महाविद्याओं) को प्रकट करना, देवी का यज्ञ-भूमि के लिए प्रस्थान
अथ अष्टमोऽध्यायः
श्रीशिवनारदसंवादे कालीरथगमनं

श्रीमहादेव जी बोले — मुनीश्वर नारद का यह वचन सुनकर दक्ष की पुत्री तथा शिव की भार्या सती ने पिता के यज्ञ में जाने का मन बना लिया और उन्होंने शिवजी से कहा — ॥ १ ॥

सती बोली — प्रभो ! देव ! महेश्वर ! मेरे पिता दक्ष-प्रजापति बहुत तैयारी के साथ एक बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे हैं । उस यज्ञ में हम दोनों का जाना मेरे मन में न्यायोचित प्रतीत हो रहा है । हम दोनों के वहाँ उपस्थित हो जाने पर वे निश्चित रूप से सम्मान करेंगे ॥ २-३ ॥

शिवजी बोले — प्रिय सती ! इस प्रकार का विचार अपने मन में भी मत लाओ । बिना बुलाए जाना और मृत्यु — ये दोनों ही एक समान है । । यक्ष विद्याधरों के समक्ष वे अहंकारी दक्ष मेरा तिरस्कार कर रहे हैं । अतः उनके घर कभी नहीं जाना चाहिए । मेरा अपमान करने की इच्छा से ही वे यह महायज्ञ कर रहे हैं । सती ! यदि मैं वहाँ जाऊँगा अथवा तुम वहाँ जाओगी तो तुम्हारे पिता हम दोनों का सम्मान नहीं करेंगे ॥ ४-६१/२

यदि श्वसुर के घर में अपनी प्रतिष्ठा हो, तभी वहाँ जाना चाहिए । यदि वहाँ मेरा अपमान होता हो तब वहाँ का जाना मरने से भी बढ़कर होता है । दामाद श्वसुर के घर में परम आदर की अपेक्षा रखता है । श्वसुर को भी चाहिए कि वह उस दामाद का आदर करके अपने भवन में ले आवे । वरानने ! श्वसुर को अपने दामाद के प्रति अनादर भाव नहीं रखना चाहिए, अन्यथा धर्म की हानि होती है, यह बात पूर्ण रूप से सत्य है । दामाद के प्रति द्वेष भावना रखने से घोर पाप उत्पन्न होता है । अतः बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने दामाद के प्रति द्वेष न रखे । दामाद को भी अपने श्वसुर का किसी तरह का अप्रिय नहीं करना चाहिए । ऐसा करने वाला नरक में जाता है और कई सौ वर्षों तक नरक में पड़ा रहता है । बिना सम्मान के ससुराल कभी नहीं जाना चाहिए । प्रिये ! बिना बुलाए जहाँ-कहीं भी जाना मृत्यु के तुल्य कहा गया है, फिर ससुराल में जाने की बात ही क्या? अतः इस समय मैं श्वसुर के घर नहीं जाऊँगा । वहाँ जाना प्रीतिकारक नहीं होगा, क्योंकि वे दक्ष प्रजापति हैं ॥ ७-१४ ॥

सती ! श्वसुर के स्नेह करने से रूपवृद्धि, प्रजावृद्धि और धर्मवृद्धि भी होती है और प्रिये ! अनादर करने से सर्वथा हानि ही होती है । अतः सुरोत्तमे ! मैं तुम्हारे पिता के इस यज्ञ में नहीं जाऊँगा । वे प्रजापति दक्ष मुझे दिन-रात दरिद्र तथा अत्यन्त दुःखी कहते रहते हैं । बिना बुलाए मेरे जाने पर तो वे विशेष रूप से ऐसा कहेंगे । न बुलाना तथा दुर्वचन — ये बातें श्वसुर के घर में सहनीय नहीं है । श्वसुर को चाहिए कि वह अपनी पुत्री के पति को आते हुए देखते ही उसके पास पहुँचकर यथाशक्ति उसकी पूजा करें, अन्यथा धर्म की हानि होती है । जिस ससुराल में इस-इस प्रकार के सम्मान की बात कही गई है, वहाँ अपमान पाने के लिए भला कौन बुद्धिमान् जाएगा । अतः देवताओं के द्वारा पूजित महेशानि ! मुझे क्षमा करो, बिना निमन्त्रण के तुम्हारे पिता के महायज्ञ में हम दोनों का जाना उचित नहीं है ॥ १५-२०१/२

सती बोली — प्रभो! आपने जो कुछ कहा, वह सत्य ही है । इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है, किंतु हो सकता है कि वहाँ जाने पर वे आपका सम्मान करें ॥ २११/२

शिवजी बोले — तुम्हारे पिता वैसे नहीं हैं, जो कि बिना निमन्त्रण के वहाँ जाने पर वे सभा के मध्य में हम दोनों को सम्मानपूर्वक स्वीकार करें । मेरे नाम के स्मरण मात्र से वे दिन-रात मेरी निन्दा करते रहते हैं । ऐसी स्थिति में वे मेरा सम्मान करेंगे, यह तुम्हारी दुर्बुद्धि है ॥ २२-२३१/२

सती बोली — महादेव ! आप जाएँ अथवा ना जाएँ, आपकी जो इच्छा हो कीजिए । किंतु महेश्वर! मैं वहाँ जाऊँगी । अतः आप मुझे अनुमति दीजिए । पिता के घर में महायज्ञ के महोत्सव का समाचार सुनकर कोई कन्या धैर्य रखकर अपने घर में कैसे रह सकती है? जहाँ असमान्य लोग बुलाए जाते हैं और पूजित होते हैं, तब वहाँ सामान्य व्यक्ति भला इसे सुनकर कैसे धैर्य रख सकता है? महेश्वर! किसी दूसरे स्थान पर जाने के लिए निमन्त्रण की अपेक्षा होती है, अपने पिता के घर जाने के लिए कन्या को आमन्त्रण की कोई अपेक्षा नहीं होती है । अतः मैं पिता के घर अवश्य जाऊँगी, इसके लिए आप अनुमति दीजिए । वहाँ मेरे जाने पर यदि पिताजी मेरा सम्मान करेंगे तो मैं उनसे कहकर आपके लिए भी आहुति दिलवा दूँगी । यदि वे मूढ़बुद्धि दक्ष मेरे सामने आपकी निन्दा करेंगे तो मैं उसी समय उनके महायज्ञ का निःसंदेह विध्वंस कर डालूँगी ॥ २४-३० ॥

शिवजी बोले — सती ! उस यज्ञ में तुम्हारा जाना कभी भी उचित नहीं है । मैं सच कहता हूँ कि वहाँ पर तुम्हारा सम्मान नहीं होगा । तुम्हारे पिता तुम्हारे लिए मेरी असह्य निन्दा करेंगे । उसे सुनकार अपने प्राणों को छोड़ दोगी, उसका तुम क्या कर लोगी ॥ ३१-३२ ॥

सती बोली — महादेव ! मैं आपसे सच-सच कह दे रही हूँ कि अपने पिता के घर अवश्य ही जाऊँगी, इसके लिए आप आज्ञा दें अथवा न दें ॥ ३३ ॥

शिवजी बोले — मेरे वचनों का उल्लंघन कर तुम बार-बार अपने पिता के घर जाने की बात क्यों कह रही हो? वहाँ जाने का प्रयोजन क्या है? इसे सही और स्पष्ट रूप से बता दो, तब मैं उसका उत्तर पुनः दूँगा । जिन दुरात्माओं को अनादर का भय नहीं रहता, वे ही उन स्थानों पर जाते हैं जहाँ अपमान की संभावना रहती है । सती! सम्मान के योग्य व्यक्ति को सम्मान न करने वाले के घर कभी नहीं जाना चाहिए क्योंकि उस अपूजक के द्वारा की गई वह पूजा, पूजा नहीं कही जाती । मेरी निन्दा सुनने में यदि तुम्हें सुख नहीं मिलता, तो मेरे निन्दक के घर जाने की इच्छा तुम क्यों कर रही हो ॥ ३४-३७ ॥

सती बोली — शम्भो ! आपकी निन्दा सुनने में मुझे कोई सुख नहीं है । उस निन्दा की सुनने की मेरी कोई अभिलाषा भी नहीं है, किंतु फिर भी मैं वहाँ जाना चाहती हूँ । महेशान ! जिस समय मेरे पिता ने केवल आपको छोड़ अन्य सभी देवताओं को बुलाकर महायज्ञ आरंभ किया, उसी समय आपका अपमान हो गया और उसे प्रजा देख भी रही है । यदि मेरे पिता दक्ष आपका अनादर करके अभिमानपूर्वक इस महायज्ञ को संपन्न कर लेते हैं तो इस पृथ्वी तल पर कोई भी मनुष्य श्रद्धा से युक्त होकर आपको आहुति नहीं देगा । इसलिए आप आज्ञा दीजिए या न दीजिए मैं वहाँ अवश्य जाऊँगी और वहाँ या तो आपके लिए यज्ञभाग प्राप्त करूँगी अथवा यज्ञ का नाश कर डालूँगी ॥ ३८-४२ ॥

श्रीशिवजी बोले — महादेवी ! मेरे रोकने पर भी तुम मेरी बात नहीं सुन रही हो । दुर्बुद्धि व्यक्ति स्वयं निषिद्धाचरण करके दूसरे पर दोषारोपण करता है । दक्षपुत्री ! अब मैंने जान लिया कि तुम मेरे कहने में नहीं रह गई हो । अतः अपनी रुचि के अनुसार तुम कुछ भी करो, मेरी आज्ञा की प्रतीक्षा क्यों कर रही हो? ॥ ४३-४४ ॥

श्रीमहादेवजी ने कहा — [नारद!] तब महेश्वर के ऐसा कहने पर क्रोध के मारे लाल-लाल आँखों वाली वे दक्षपुत्री सती क्षण भर के लिए सोचने लगीं कि “इन शंकर ने पहले तो मुझे पत्नी रूप में प्राप्त करने हेतु प्रार्थना की थी और फिर मुझे पा लेने के बाद अब ये मेरा अपमान कर रहे हैं इसलिए अब मैं इन्हें अपना प्रभाव दिखाती हूँ ।” तदनन्तर उन भगवान् शिव ने क्रोध से फड़कते हुए ओठों वाली तथा कालाग्नि के समान नेत्रों वाली उन भगवती सती को देखकर अपन नेत्र बंद कर लिए ॥ ४५-४७ ॥

भयानक दाढ़ों से युक्त मुख वाली भगवती ने सहसा उस समय अट्टहास किया, जिसे सुनकर महादेव विमूढ़ के समान भयाक्रान्त हो गए । बड़ी कठिनाई से आँखों को खोलकर उन्होंने भगवती के भयानक रूप को देखा । नारद ! उनके द्वारा इस प्रकार देखी जाने पर उन भगवती ने सहसा अपने स्वर्णिम वस्त्रों का परित्याग करके वृद्धावस्था के समान कान्ति को धारण कर लिया । वे दिगम्बरा थी । उनके केशपाश सुशोभित हो रहे थे, जिह्वा लपलपा रही थी, उनकी चार भुजाएँ थीं । उनके शरीर की ज्योति कालाग्नि के समान सुशोभित हो रही थी, रोमराशि पसीने से व्याप्त थी, अत्यन्त भयंकर स्वरूपवाली वे भयानक शब्द कर रही थीं और उन्होंने मुण्डमाला का आभूषण धारण कर रखा था । उगते हुए करोड़ों सूर्य के समान तेजोमयी उन्होंने अपने मस्तक पर चन्द्र रेखा धारण कर रखी थी । उगते हुए सूर्य के समान आभा वाले किरीट को धारण करने से उनका ललाट देदीप्यमान था ॥ ४८-५२ ॥

इस प्रकार अपने तेज से देदीप्यमान एवं भयानक रूप धारण करके देवी सती घोर गर्जना के साथ अट्टहास करती हुई उन शम्भु के समक्ष उठकर सहसा खड़ी हुईं ॥ ५३ ॥ तब उन सती को इस प्रकार का विचित्र कार्य करती हुई देखकर भगवान् शिव ने चित्त से धैर्य का परित्याग कर भय के मारे भागने का निश्चय किया और वे विमूढ़ की भाँति सभी दिशाओं में इधर-उधर भागने लगे ॥ ५४ ॥ उन शिव को दौड़ते हुए देखकर वे दक्षपुत्री सती उन्हें रोकने के लिए ऊँचे स्वरों में “डरो मत, डरो मत” — इन शब्दों का बार-बार उच्चारण करती हुई अत्यन्त भयानक अट्टहास कर रही थीं ॥ ५५ ॥ उस शब्द को सुनकर वे शिव अत्यधिक डर के मारे वहाँ एक क्षण भी नहीं रुके । वे उस समय भय से व्याकुल होकर दिशाओं में दूर तक पहुँच जाने के लिए बड़ी तेजी से भागे जा रहे थे ॥ ५६ ॥

इस प्रकार अपने स्वामी को भयाक्रान्त देखकर वे दयामयी भगवती सती उन्हें रोकने की इच्छा से क्षण भर में अपने दस श्रेष्ठ विग्रह धारण करके सभी दिशाओं में उनके समक्ष स्थित हो गयीं ॥ ५७ ॥ अत्यन्त वेग से भागते हुए वे शिवजी जिस-जिस दिशा में जाते थे, उस-उस दिशा में उन्हीं भयानक भगवती को देखते थे और फिर भय से व्याकुल होकर अन्य दिशा में भागने लगते थे ॥ ५८ ॥ तब किसी भी दिशा को भयमुक्त न पाकर वे भगवान् शिव अपनी आँखें बंद करके वहीं ठहर गए और इसके बाद जब उन्होंने अपनी आँखें खोली तब कमल के समान सुन्दर मुखवाली, हासयुक्त मुखमण्डलवाली, दो उन्नत उरोजों वाली, दिगम्बर, भयानक तथा विशाल नेत्रों वाली, खुले हुए केशों वाली, करोड़ों सूर्यों के समान तेज धारण करने वाली, चार भुजाओं से युक्त तथा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके स्थित श्यामा भगवती काली को अपने सामने स्थित देखा ॥ ५९-६० ॥ इस प्रकार उन भगवती को देखकर अत्यन्त डरे-डरे से भगवान् शिव बोले — श्यामवर्ण वाली आप कौन हैं और मेरी प्राणप्रिया सती कहाँ चली गई? ॥ ६१ ॥

सती बोलीं — महादेव ! क्या अपने सम्मुख स्थित मुझ सती को आप नहीं देख रहे हैं? काली, तारा, लोकेशी कमला, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, षोडशी, त्रिपुरसुन्दरी, बगलामुखी, धूमावती और मातङ्गी — इन देवियों के ये नाम हैं ॥ ६२-६३ ॥

शिवजी बोले — जगत् का पालन करने वाली देवी ! यदि आप मुझ पर अति प्रसन्न हैं तो किस देवी का क्या नाम है और उनकी क्या विशेषता है — यह सब आप मुझे अलग-अलग बताइए ॥ ६४ ॥

देवी बोलीं — कृष्णवर्णा तथा भयानक नेत्रों वाली ये जो देवी आपके सामने स्थित हैं, वे भगवती “काली” है और जो ये श्यामवर्ण वाली देवी आपके ऊर्ध्वभाग में विराजमान हैं, वे साक्षात् महाकालस्वरुपिणी महाविद्या “तारा” हैं ॥ ६५१/२

महामते ! आपके दाहिनी ओर ये जो भयदायिनी तथा मस्तकविहीन देवी विराजमान हैं, वे महाविद्यास्वरुपिणी भगवती “छिन्नमस्ता” हैं । शम्भो ! आपके बायीं ओर ये जो देवी हैं, वे भगवती “भुवनेश्वरी” हैं । जो देवी आपके पीछे स्थित है, वे शत्रुनाशिनी भगवती “बगला” हैं । विधवा का रूप धारण की हुई ये जो देवी आपके अग्निकोण में विराजमान हैं, वे महाविद्यास्वरुपिणी महेश्वरी “धूमावती” हैं और आपके नैऋत्यकोण में ये जो देवी हैं, वे भगवती “त्रिपुरसुन्दरी” हैं । आपके वायव्यकोण में जो देवी हैं, वे मातंगकन्या महाविद्या “मातङ्गी” हैं और आपके ईशानकोण में जो देवी स्थित हैं, वे महाविद्यास्वरूपिणी महेश्वरी “षोडशी” हैं । मैं तो भयंकर रूपवाली “भैरवी” हूँ । शम्भो ! आप भय मत कीजिए । ये सभी रूप भगवती के अन्य समस्त रूपों से उत्कृष्ट हों ॥ ६६-७१ ॥

महेश्वर ! ये देवियाँ नित्य भक्तिपूर्वक उपासना करने वाले साधक पुरुषों को चारों प्रकार के पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) तथा समस्त वांछित फल प्रदान करती हैं । इन्हीं की कृपा से मारण, उच्चाटन, क्षोभन, मोहन, द्रावण, वशीकरण, स्तम्भन और विद्वेष आदि अन्य प्रकार के वाञ्छित प्रयोग भी सिद्ध होते हैं । ये सभी गोपनीय महाविद्याएँ हैं, इनका प्रकाशन कभी नहीं करना चाहिए ॥ ७२-७३१/२

महेश्वर ! उन देवियों के मन्त्र, यन्त्र, पूजन, हवनविधि, पुरश्चर्याविधान, स्तोत्र तथा कवच और उनके उपासकों के आचार, नियम आदि का वर्णन आप ही करेंगे, क्योंकि विभो ! इस विषय में आपसे बड़ा अन्य कोई वक्ता नहीं है । आपके द्वारा दिया गया उपदेश आगमशास्त्र के नाम से लोक में प्रसिद्ध होगा ॥ ७४-७६ ॥

शंकर ! आगम तथा वेद — ये दोनों ही मेरी दो भुजाएँ हैं । उन्हीं दोनों से मैंने स्थावर-जङ्गममय सम्पूर्ण जगत् को धारण कर रखा है । जो मूर्ख इन दोनों (वेद तथा आगम) — का मोहवश कभी भी उल्लंघन करता है, वह मेरे हाथों से च्युत होकर अधःपतित हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है । वे दोनों ही कल्याण के हेतु हैं तथा अत्यन्त दुरूह, दुर्घट और विद्वानों के द्वारा भी कठिनाई से जाने जाते हैं एवं उनका आद्यन्त भी नहीं है । जो मनुष्य आगम अथवा वेद का उल्लंघन कर अन्यथा आचरण करता है, उसका उद्धार करने में सर्वथा असमर्थ हूँ, यह सत्य है और इसमें कोई भी संशय नहीं है । इन दोनों की एकता पर सम्यक विवेचन करके बुद्धिमान् व्यक्ति को धर्म का आचरण करना चाहिए और कभी भी अज्ञानतावश इन दोनों में भेद नहीं मानना चाहिए ॥ ७७-८१ ॥

इन महाविद्याओं के जो साधक हैं, वे लोक में वैष्णव माने जाते हैं और मुझमें समर्पित अन्तःकरण वाले वे प्रशान्तात्मा हो जाते हैं । स्वयं गुरु के द्वारा दिए गए मन्त्र, यन्त्र तथा कवच को सावधानीपूर्वक गुप्त रखना चाहिए और उसे जहाँ कहीं भी प्रकाशित नहीं करना चाहिए । उसे प्रकाशित करने से सिद्धि की हानि होती है तथा अशुभ होता है । अतः उत्तम साधक को चाहिए कि पूरे प्रयत्न के साथ उसे गोपनीय रखें ॥ ८२-८४ ॥ महादेव ! महामते ! आपके द्वारा यह करणीय कर्म मैंने आपसे कहा, क्योंकि मैं आपकी प्रियतमा हूँ और आप भी मेरे अत्यन्त प्रिय पति हैं । अपने पिता दक्ष प्रजापति के अभिमान के विनाश के लिए मैं आज वहाँ जाऊँगी । अतः देवेश ! यदि आप वहाँ नहीं चल रहे हैं तो मुझे ही जाने की आज्ञा दीजिए । देव ! यही मेरा अभीष्ट है और आपका भी । अतः यदि आप मुझे अनुमति दे दें तो मैं अपने पिता दक्षप्रजापति के यज्ञ के विध्वंस के लिए चली जाऊँ ॥ ८५-८७ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — [नारद!] उन भगवती का यह वचन सुनकर शिव डरे-डरे से खड़े रहे और फिर उन्होंने भयानक नेत्रों वाली उन देवी काली से कहा — ॥ ८८ ॥

शिवजी बोले — मैं आपको पूर्णा, परमेशानी तथा पराप्रकृति के रूप में जान गया हूँ । अतः अज्ञानवश आपको न जानते हुए मैंने जो कुछ कहा है, उसे क्षमा करें । आप आद्या हैं, परा विद्या हैं तथा सभी प्राणियों में विराजमान हैं । आप स्वतन्त्र रहने वाली परमा शक्ति हैं । अतः कोई भी कार्य करने या न करने के लिए आपको आदेश देने वाला कौन है? शिवे ! प्रजापति दक्ष के यज्ञनाश के लिए यदि आप जाएँगी तो मेरी कौन-सी शक्ति आपको रोकने में समर्थ है और मैं भी आपको कैसे रोक सकूँगा । महेशानि ! पतिभाव से मैंने आपको जो भी अप्रिय वचन कहा है, उसे आप क्षमा करें और आपकी जो रुचि हो, वैसा करें ॥ ८९-९२ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — [नारद!] तब महेश के ऐसा कहने पर थोड़ी-सी मुसकान से युक्त मुखमण्डल वाली उन जगदम्बिका ने यह वचन कहा — ॥ ९३ ॥

देव ! महेश्वर ! आप अपने समस्त प्रमथगणों के साथ यहीं रहिए और मैं अपने पिता के घर यज्ञ देखने के लिए इसी समय जा रही हूँ ॥ ९४ ॥ नारद ! महादेव से ऐसा कहकर वे भगवती तथा ऊर्ध्व दिशा में स्थित देवी तारा — ये दोनों अचानक एकरूप हो गयीं । तदनन्तर अन्य आठों मूर्त्तियाँ (देवियाँ) भी सहसा अन्तर्धान हो गयीं ॥ ९५१/२

इसके बाद भगवान् शिव ने उन सुरेश्वरी को जाने की इच्छुक देखकर अपने प्रमथगणों से कहा — दस हजार सिंहों से युक्त तथा रत्नजालों से सुशोभित उत्तम रथ ले आओ ॥ ९६-९७ ॥

उसे सुनते ही स्वयं प्रमथगणों के अधिपति उसी क्षण तेज गति से चलने वाले दस हजार सिंहों से जुते हुए रथ को ले आए ॥ ९८ ॥ प्रथमाधिपति ने रत्नजाल से सुशोभित, पर्वताकार, चारों ओर से अनेक प्रकार की पताकाओं से अलंकृत तथा वायुवेग के समान चलने वाले दस हजार सिंहों से जुते हुए उस रथ पर उन भगवती को स्वयं विराजमान कराया ॥ ९९-१०० ॥ मुनिश्रेष्ठ ! युग के अन्त में प्रलय के समान सम्पूर्ण जगत् को भयभीत करने वाली वे भीमस्वरुपिणी भगवती काली उस रथ में स्थित होकर सुमेरू पर्वत के शिखर पर आरुढ़ उत्तम मेघमाला की भाँति सुशोभित हो रही थीं । तदनन्तर बुद्धिमान् नन्दी उस रथ को बड़ी तेजी से हाँकने लगे और महामते ! इधर वे शिव शोक तथा दुःख से व्याकुल हो रुदन करने लगे ॥ १०१-१०२१/२

कोपाविष्ट काली को देखकर सभी प्राणी भागने लगे, सूर्य भी भयभीत होकर पृथ्वी पर गिरने-से लगे, सागर विक्षुब्ध हो गए, सभी दिशाएँ व्याकुल हो उठीं, महान् वेग से वायु बहने लगी और घोर अमङ्गल का संकेत देने वाले सैकड़ों उल्कापिण्ड सूर्यमण्डल का भेदन कर पृथ्वी तल पर गिरने लगे ॥ १०३-१०५ ॥

इस प्रकार वह रथ आधे क्षण में ही दक्षप्रजापति के घर पहुँच गया । तब उन भगवती सती को देखते ही दक्ष के घर में स्थित सभी लोग भयभीत हो उठे ॥ १०६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “कालीरथागमन” नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥

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