श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-34
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
चौंतीसवाँ अध्याय
इन्द्र द्वारा चिन्तामणि-तीर्थ में चिन्तामणि विनायक की स्थापना
अथः चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
चिन्तामणितीर्थ वर्णनं

नारदजी बोले — हे नरेन्द्र ! वे जम्भासुर के शत्रु इन्द्र कदम्बवृक्ष के नीचे एक श्रेष्ठ आसन में स्थित होकर, मन का नियन्त्रण करके तथा नासिका के अग्रभाग में दृष्टि को जमाकर षडक्षर मन्त्र का जप करने लगे ॥ १ ॥ मरुद्गणों के स्वामी उन इन्द्र के [तपस्या में रत होकर] वायु का भक्षण करते हुए सहस्र वर्ष व्यतीत हो गये। उनके शरीरदेश पर वल्मीकों (दीमक की बाँबियों)- के समूह बन गये, परंतु वे पर्वत की भाँति स्थिर रहे ॥ २ ॥

तदनन्तर जो सर्वत्र गमनशील, सर्वविद्, उग्र तेजवाले, अपने तेज से अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा के तेज का तथा सबके नेत्रों का आच्छादन करने वाले, चार भुजाओं वाले, रत्नजटित किरीट और माला धारण करने वाले, सुन्दर बाजूबन्द धारण करने वाले, कुण्डलों से सुशोभित कपोलों वाले हैं, जो मोतियों की माला, नूपुर और मूल्यवान् कटिसूत्र धारण किये हुए हैं; जो कमल के समान नेत्र वाले, महान् कमलनाल के सदृश विशाल सूँड़ वाले, कमल के फूलों की माला धारण करने वाले हैं — ऐसे सिन्दूरविलेपित विग्रहवाले अखिलदेवमूर्ति भगवान् गणेश प्रसन्न होकर इन्द्र के समक्ष प्रकट हुए ॥ ३–५ ॥

उन्हें देखकर इन्द्र भयभीत हो गये कि ‘यह क्या है ?’, ‘यह कौन आ गया ?’, ‘मात्र अस्थि और प्राण- अवशेष मैं कैसे जीवित बचूँगा ?’ ॥ ६ ॥ ‘न जाने किसने इस महान् विघ्न को बनाया है और आज मेरे सम्मुख उपस्थित कर दिया है ?’ [इसे देखकर] मेरे शरीर से पसीना निकल रहा है और शरीर पीपल के पत्ते की तरह काँप रहा है ॥ ७ ॥

इन्द्र की इस प्रकार की व्याकुलता को सर्वज्ञ भगवान् गणेश जान गये और उन विघ्नविनायक ने मधुर वाणी में महेन्द्र से कहा — ॥ ८ ॥

विनायक बोले — हे देवेन्द्र ! भय न करो। हे देवराज! तुम मुझे कैसे नहीं जानते! जो निर्गुण, निर्विकार, चिदानन्द, सनातन, कारणातीत, अव्यक्त, जगत् के कारण-का-कारण है; जिस परमात्मा का तुम निश्चल होकर इस मन्त्र से [जप करते हुए] सदा ध्यान करते हो, जिसके [दर्शन के] लिये तुम चिरकाल तक श्रान्त रहे हो, वही मैं तुम्हारे समक्ष प्रकट हुआ हूँ, तुम्हारी इस तपस्या से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें वर देने के लिये यहाँ आया हूँ ॥ ९–११ ॥ हे अनघ! अनन्त ब्रह्माण्डों का सृजन, पालन और संहार मेरे द्वारा ही होता है — ऐसा तुम जानो और तुम जो चाहते हो, वह वर मुझसे माँग लो ॥ १२ ॥

नारदजी बोले — उन गणेशजी के मनोहर वचनों को सुनकर बलासुरहन्ता इन्द्र ने विशाल विग्रहवाले देवाधिदेव भगवान् विनायक को पहचान लिया ॥ १३ ॥ तब उन शचीपति इन्द्र ने शीघ्र ही उठकर परम भक्तिपूर्वक उन्हें नमस्कार किया और उन प्रत्यक्ष ब्रह्मस्वरूप गणेशजी से कहा — ॥ १४ ॥

इन्द्र बोले — हे महाबाहो ! सृजन, पालन और संहार करने वाले आपके गुणों को दिक्पालोंसहित ब्रह्मादि देवता भी नहीं जानते हैं। सौ [अश्वमेध ] – यज्ञों के सम्पादन से समुद्भूत पुण्य के फलस्वरूप जो मुझे इन्द्रपद दिया गया है, वह भी कृत्रिम ही है; [क्योंकि सबके वास्तविक स्वामी तो आप ही हैं ।] उसमें भी प्रायः अनेक विघ्न होते ही रहते हैं ॥ १५-१६ ॥ हे गजानन ! मुझे आपकी महिमा कैसे ज्ञात हो सकती है ? हे महेश्वर ! जिसपर आपकी पूर्ण कृपा होगी, उसे ही आपकी महिमा का ज्ञान होगा। हे विघ्नकारण ! उसी के पास आपके गुणों एवं रूपों के वर्णन की शक्ति होगी ॥ १७-१८ ॥ आप स्वयं निराधार होते हुए भी अखिल विश्व के आधार हैं। आप नित्य ज्ञानरूप, अजर और अमर हैं। आप नित्य आनन्दस्वरूप, पूर्णब्रह्म, मायापति, क्षर, अक्षर, परमात्मा, विश्वरूप और अखिलेश्वर हैं । उग्र तपस्या के द्वारा आपके स्वरूप का ज्ञान प्राप्तकर सनकादि मुनि परम शान्ति को प्राप्त हो गये ॥ १९-२० ॥

हे परमेश्वर! षडक्षरमन्त्र के प्रभाव से मुझे आपके दर्शन प्राप्त हुए। पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने कृपा करके मुझे इस मन्त्र का उपदेश दिया था ॥ २१ ॥ उस समय ब्रह्माजी ने मुझसे कहा था कि जब तुम इस मन्त्र का विस्मरण कर दोगे, तभी तुम अपने पद से च्युत हो जाओगे और दुर्दशा को प्राप्त हो जाओगे ॥ २२ ॥ तब (विस्मृत हुए मन्त्रवाले) मुझ अत्यन्त लोलुप ने दुर्भाग्य के वशीभूत होकर उन मुनिपत्नी अहल्या का सतीत्व नष्ट किया, इसलिये मैं दुर्गति को प्राप्त हो गया ॥ २३ ॥ हे देवेश! पुनः बृहस्पतिजी के द्वारा उपदिष्ट उस मन्त्र के जप के प्रभाव से मैं इस समय सहस्र नेत्रोंवाला होकर आपके स्वरूप का दर्शन कर रहा हूँ ॥ २४ ॥ मैं एकं अन्य वर की याचना करता हूँ; क्योंकि आप चिन्तित अर्थ को देने वाले (मनोकामना पूर्ण करने वाले) हैं, इसलिये यह कदम्बनगर ‘चिन्तामणिपुर ‘ – इस नाम से प्रसिद्ध हो जाय ॥ २५ ॥

हे विघ्नराज ! इस समय अनुष्ठान के फलरूप में मैंने आपके चरणकमलों का दर्शन कर लिया। अब मैं जो वर माँग रहा हूँ, उसे मुझे दीजिये। हे देव ! जिससे आपका कभी विस्मरण न हो; हे देव ! वैसा करो। हे विभो ! आपके चरणकमलों में मेरा मन सदैव रमण करता रहे ॥ २६-२७ ॥ हे गजानन! आज से इस लोक में यह [ विशाल ] सरोवर ‘चिन्तामणितीर्थ’ के रूप में प्रसिद्ध हो जाय ॥ २८ ॥ हे जगद्गुरु! इस सरोवर में स्नान करने, यहाँ दान देने से मनुष्यों को आपकी कृपा से धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष-सम्बन्धी सिद्धियाँ प्राप्त हों ॥ २९ ॥

मुनि बोले — इन्द्र के वचनों को सुनकर जगत्पति विघ्नेश्वर गणेशजी मेघसदृश गम्भीर और मधुर स्वर में बोले — ॥ ३० ॥

[ विघ्न ] विनायक श्रीगणेशजी बोले — हे विभो ! जिन-जिन वरदानों के लिये तुमने प्रार्थना की, वे सब तो तुम्हें प्राप्त होंगे ही, एक अन्य वरदान भी मैं तुम्हें देता हूँ कि तुम अपने इन्द्रपद पर सदैव स्थिर रहो ॥ ३१ ॥ हे देवेन्द्र! तुम्हें मेरी निरन्तर अविस्मृति रहे अर्थात् तुम मेरा स्मरण कभी न भूलो। हे वासव ! जब तुमपर कोई संकट आये तो मुझे स्मरण कर लेना ॥ ३२ ॥ मैं सदैव प्रकट होकर तुम्हारे सारे कार्यों को सम्पादित कर दूँगा। यह (कदम्बपुर) पृथ्वी पर चिन्तामणिपुर नाम से प्रसिद्ध होगा और मैं चिन्तामणि विनायक के रूप में इच्छित मनोकामनाओं को प्रदान करूँगा ॥ ३३-३४१/२

नारदजी बोले — तब इस प्रकार वर प्राप्त करके इन्द्र ने स्वर्गस्थित गंगाजी के जल का आनयन किया और उसके द्वारा उन सर्वव्यापक महाभाग गणेशजी का उनके परिवार (पलियों-सिद्धि – बुद्धि और पुत्रों-क्षेम – लाभ) – सहित अभिषेक एवं पूजन किया ॥ ३५-३६ ॥ देवराज इन्द्र द्वारा पूजित होकर वे प्रभु गणेशजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तब शतक्रतु इन्द्र ने भी स्फटिक से निर्मित सर्वांगसुन्दर मंगलमयी दिव्य वैनायकी मूर्ति की वहाँ आदरपूर्वक स्थापना की और सुवर्ण तथा रत्नों से जटित विशाल मन्दिर बनवाया ॥ ३७-३८ ॥ उनकी प्रदक्षिणा और नमस्कार करके शतक्रतु इन्द्र अपने स्थान को चले गये। तबसे इस पृथ्वी पर वह महान् सरोवर चिन्तामणि [तीर्थ] – के नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥ ३९ ॥ आज भी पवित्र जलवाली गंगाजी शतक्रतु इन्द्र के आदेश से उस मूर्ति का नित्य अभिषेक करके सदा अपने धामको चली जाती हैं ॥ ४० ॥

[नारदजी कहते हैं — हे राजन्!] इस प्रकार मैंने तुमसे अद्भुत दर्शन वाले इस क्षेत्र की महिमा कह दी । [यह क्षेत्र] सभी दोषों का हरण करने वाला, ऐश्वर्यसम्पन्न, सम्पूर्ण कामनाओं को प्रदान करनेवाला और मंगलमय है ॥ ४१ ॥ हे पृथ्वीपति! तुम वहाँ जाकर विधिपूर्वक स्नान करो, इससे तुम सभी दोषों से मुक्त हो जाओगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ४२ ॥

ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यास!] तदनन्तर मुनि नारद उन राजा रुक्मांगद को आशीर्वादोंसे  अभिनन्दितकर और आदरपूर्वक उनसे विदा लेकर शीघ्र ही चल दिये ॥ ४३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें ‘चिन्तामणितीर्थवर्णन’ नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥

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