August 31, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-77 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ सतहत्तरवाँ अध्याय श्रीपरशुरामजी के आविर्भाव के प्रसंग में महर्षि जमदग्नि का आख्यान, कार्तवीर्यार्जुन का महर्षि जमदग्नि के आश्रम में आना और महर्षि द्वारा कामधेनु के प्रभाव से ससैन्य राजा का सत्कार करना अथः सप्तसप्ततितमोऽध्यायः सहस्रार्जुनस्य जमदग्नेराश्रममागमनम्, भोजन प्रसङ्गं व्यासजी बोले — [ हे ब्रह्मन्!] अन्य किसके द्वारा इस व्रत को किया गया था, उसे बताइये, इस विषय में मुझे महान् कौतूहल हो रहा है ॥ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — प्राचीनकाल की बात है, महर्षि जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने इस व्रत को किया था, उन्हें भी इस व्रत करने से यश, विजय, ज्ञान तथा दीर्घ आयु की प्राप्ति हुई थी ॥ ११/२ ॥ व्यासजी बोले — हे पितामह ! उन परशुरामजी का आविर्भाव कैसे हुआ था और वे किसके द्वारा किससे उत्पन्न हुए थे? मेरे पूछने पर आप यह सब विस्तारपूर्वक मुझे बतलाइये ॥ २१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — अत्यन्त विख्यात श्वेतद्वीप में महामुनि जमदग्निजी निवास करते थे । वे त्रिकालज्ञ मुनि अपनी मानसिक शक्ति से सृष्टि, संहार, निग्रह तथा अनुग्रह करने में समर्थ थे। इसी कारण देवता भी उनसे भयभीत रहते थे ॥ ३-४ ॥ उनकी पत्नी रेणुका नाम से विख्यात थीं। जिनके गुंजा (घुघुची) – के बराबर लावण्यकी भी तुलना कामदेव की पत्नी रति के लावण्य से नहीं हो सकती ॥ ५ ॥ इसी कारण से वे रेणुका लोकों में ‘रति’ इस नाम से विख्यात थीं। जो अपनी सुन्दरता से सबको मोहित कर देनेवाली थीं; ऐसी उन रेणुका का वर्णन करने में कौन समर्थ है? ॥ ६ ॥ जिनके नेत्रों की शोभा को प्राप्त करने के लिये चकोर पक्षी जल में निवास करते हुए और हरिण स्वच्छन्दतापूर्वक तृणों का भक्षणकर वन में रहते हुए तपस्या करते हैं ॥ ७ ॥ जिनके मुखमण्डल की शोभा को प्राप्त करने के लिये चन्द्रमा भी भगवान् शिव की सेवा करते हैं। वे देवी आदि और अन्त से रहित तथा मूलप्रकृतिरूपा ईश्वरी हैं ॥ ८ ॥ उन्हीं जमदग्नि के द्वारा इन परशुराम का रेणुकादेवी से साक्षात् शिवस्वरूप महाभाग प्रादुर्भाव हुआ, जो साक्षात् योगेश्वर विष्णु के समान हैं ॥ ९ ॥ वे अत्यन्त सुन्दर शरीर वाले तथा साक्षात् कामदेव के मन को भी मथ देनेवाले थे । वे माता-पिता की आज्ञा का पालन करने वाले थे, उनका बल – पराक्रम अत्यन्त विख्यात था। वे देवता, ब्राह्मण, गुरु, विद्वान्, गौ आदि के पूजन में निरत रहते थे। वेदों, वेदांगों (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द तथा ज्योतिष) तथा स्मृतियों का स्वाध्याय वे सदा किया करते थे ॥ १०-११ ॥ वे बोलने में बृहस्पति के समान, क्षमा में पृथ्वी के समान, गाम्भीर्य में समुद्र के समान थे और माता-पिता की आज्ञा का पालन करने में तत्पर रहते थे । अनेक विद्याओं के अध्ययन के लिये अत्यन्त दृढ़मति होकर माता – पिता की आज्ञा लेकर वे नैमिषारण्य में चले आये ॥ १२-१३ ॥ उनके नैमिषारण्य में चले जाने पर उस समय कृतवीर्य के पुत्र महान् बलशाली राजा कार्तवीर्य वहाँ आये। उनके तेज के प्रभाव से समस्त भूमण्डल सदा के लिये उनके वशीभूत हो गया था ॥ १४ ॥ भगवान् विष्णु के अंशावतार तथा सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण करने वाले उन राजा कार्तवीर्य के पास लक्ष्मी स्थिर रूप से निवास करती थी । वे युद्ध में शत्रुओं का विनाश करने वाले पाँच सौ बाणों को एक साथ छोड़ते थे ॥ १५ ॥ उनका बल तथा पौरुष अत्यन्त विख्यात था । इन्द्रादि देवता उनकी सेवामें उपस्थित रहते थे। उनके पास असंख्य हाथी, रथ, घोड़े तथा पैदल सैनिक थे। युद्ध के लिये प्रस्थान करते समय उनकी सेना के द्वारा समस्त पृथ्वीमण्डल उसी प्रकार आच्छादित हो जाता था, जिस प्रकार कि वर्षाकाल में मेघमण्डल की धाराओं द्वारा समस्त नभमण्डल आच्छादित हो जाता है ॥ १६-१७ ॥ उनके शंखनाद का श्रवणकर शत्रु उसी प्रकार दसों दिशाओं में भाग जाते, जैसे कि सिंहनाद को सुनकर करोड़ों मदोन्मत्त हाथी भाग जाते हैं ॥ १८ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! जब वे राजा (अपने हजार हाथों से) स्वेच्छापूर्वक पाँच सौ ताली बजाते, तो उसके निनाद से घोषपूर्ण समस्त ब्रह्माण्ड काँप उठता ॥ १९ ॥ एकबार वे राजा स्वेच्छापूर्वक अपनी चतुरंगिणी सेना लेकर [ वन-विहार को] निकले। उस समय वे नीले रंग के वस्त्र धारण किये हुए थे, उनका छत्र भी नीले रंग का था तथा उनके सैनिक भी उन्हीं की भाँति नीले वस्त्र धारण किये थे । वे वनों, नदियों, पर्वतों को रौंदते हुए, विविध प्रकार के मृगगणों को देखते हुए तथा कुछ का शिकार करते हुए जा रहे थे। तदनन्तर सह्याद्रि के शिखर पर उन्होंने एक श्रेष्ठ आश्रम को देखा । वह आश्रम उसी प्रकार का था, जैसे कि कैलासशिखर पर भगवान् शंकर का आवास-स्थान हो । राजा ने अपने सेवकों से पूछा — ‘यह उत्तम स्थान किसका है ? ‘ ॥ २०-२२१/२ ॥ सेवक बोला — हे महाभाग ! यहाँ प्रसिद्ध जमदग्नि मुनि निवास करते हैं। वे साक्षात् सूर्य के समान [तेजस्वी ] हैं तथा शाप और कृपा करने में समर्थ हैं। उनके दर्शन से करोड़ों पापराशियाँ विनष्ट हो जाती हैं। यदि आपकी इच्छा है तो वहाँ जाना चाहिये, आपको अवश्य दर्शन होंगे। आपकी कृपा से हम सभी का भी कल्याण हो जायगा ॥ २३-२४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — सेवक का इस प्रकार का वचन सुनकर राजा वहाँ जाने के लिये उद्यत हो गये, उन्होंने अपनी सम्पूर्ण सेना को मना कर दिया और [चार] श्रेष्ठजनों को साथ लेकर वे तत्क्षण ही तपोनिधि मुनिश्रेष्ठ जमदग्नि के आश्रम के लिये गये ॥ २५-२६ ॥ राजा ने कुश के आसन पर विराजमान उन मुनि को देखा, जो प्रज्वलित अग्नि की भाँति दिखायी दे रहे थे । राजा ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया तथा साथ में आये सभी सैनिकों आदि ने भी उन्हें प्रणाम किया ॥ २७ ॥ अनेक विशाल पर्णशालाओं, लताकुंजों तथा वृक्षों की छाया में वे सैनिक बैठ गये और राजा मुनि के समक्ष स्थित हो गये। कृतवीर्य के पुत्र महान् पराक्रमी राजा कार्तवीर्य चार [ श्रेष्ठजनों]-से घिरे मुनिवर जमदग्निद्वारा निर्दिष्ट आसन पर बैठ गये ॥ २८-२९ ॥ मुनि जमदग्नि ने पाद्य, अर्घ्य तथा विष्टर (आसन के प्रतीकरूप में कुशमुष्टि) प्रदानकर उन सभी का सत्कार किया और गायें भी प्रदान कीं तथा शिष्यों द्वारा अन्य की सभी सैनिकों का स्वागत-सत्कार करवाया ॥ ३० ॥ तदनन्तर आखेट से परिश्रान्त हुए सभी सैनिकों ने विविध सरोवरों के अत्यन्त रमणीय, शीतल तथा निर्मल जल में डुबकी लगाते हुए स्नान किया ॥ ३१ ॥ मुनि जमदग्नि के शिष्यों द्वारा निनादित की जाती हुई वेदध्वनि, शास्त्रों के बहुत-से शब्दों तथा चारों ओर हो रहे शास्त्रार्थ के वचनों को सुनते हुए कमलनयन राजा ने उन मुनिश्रेष्ठ जमदग्नि से कहा — ‘आज मेरे माता-पिता धन्य हो गये हैं; आज मेरा जन्म लेना सफल हो गया, मेरा ज्ञान धन्य हो गया तथा मेरी तपस्या फलीभूत हो गयी ॥ ३२-३३ ॥ आज [मेरे द्वारा लगाया गया ] पुण्यरूपी वृक्ष फलित हो गया, जो कि मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ । आज मेरी समस्त सम्पदा धन्य हो गयी। मेरा कुल तथा मेरी कीर्ति भी धन्य हो गयी । परब्रह्म परमात्मा जिसे कहा गया है, निश्चय ही आप वही हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। आपका इस प्रकारका आतिथ्य सत्कार देखकर मेरा मन अत्यन्त सन्तुष्ट हो गया है ‘ ॥ ३४-३५ ॥ इस प्रकार की सुसंस्कृत वाणी को सुनकर वे मुनि अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गये और सब कुछ जानते हुए भी मुनिवर मुसकरा उठे और उन्होंने राजा से पूछा — आप कौन हैं ? किसके पुत्र हैं ? आपका क्या नाम है, और किस प्रयोजन से आप यहाँ आये हैं ? ॥ ३६१/२ ॥ राजा बोले — स्वधर्म का पालन करने वाले राजाओं के लिये आप-जैसे महापुरुषों के दर्शन के अतिरिक्त कोई दूसरा महान् प्रयोजन नहीं हो सकता। मैं राजा कृतवीर्य का पुत्र हूँ और कार्तवीर्य इस नाम से विख्यात हूँ। आपकी आज्ञा प्राप्तकर मैं अपने नगर की ओर लौट जाऊँगा ॥ ३७-३८१/२ ॥ मुनि बोले — हे राजश्रेष्ठ ! मैंने आपके महान् यश का श्रवण किया है। मुझे भी आपके दर्शन की इच्छा थी, आज महान् पुण्य से वह सफल भी हो गयी है । मेरी देह, आत्मा, तपस्या, ज्ञान तथा यह मेरा आश्रम आज सफल हो गया है । हे राजन् ! आज आपके आगमन से मेरी समस्त सम्पदाएँ सार्थक हो गयी हैं, आप कुछ भोजन किये बिना कैसे जाने की इच्छा करते हैं ? ॥ ३९-४१ ॥ यद्यपि आपको कोई कमी नहीं है, फिर भी आपके द्वारा भोजन करने से लोक में मेरी कीर्ति होगी । हे विभो ! कुछ भोजन करने के अनन्तर आप जायँ, हे प्रभो ! आज आप मुझे सनाथ बनायें ॥ ४२ ॥ राजा बोले — निश्चित ही यह भोजन करने का समय है, आपकी आज्ञा से कुछ भोजन अवश्य करना चाहिये। श्रोत्रिय ब्राह्मणों के यहाँ यदि अन्न का अभाव हो तो माँगकर भी जल अवश्य पीना चाहिये । तथापि अपने इन असंख्य सैनिकों को छोड़कर मैं जल भी नहीं पी सकता हूँ, फिर भोजन कैसे कर सकता हूँ? ॥ ४३-४४ ॥ हे ब्रह्मन्! मैं अनुमान से यह जानता हूँ कि सभी को भोजन कराने की शक्ति आपमें नहीं है। आपके दर्शनमात्र से मैं कृतकृत्य हो गया हूँ और इस समय जाना चाहता हूँ ॥ ४५ ॥ मुनि बोले — हे राजर्षे! आप चिन्ता न करें, मैं सम्पूर्ण सेनासहित आपको चार प्रकार के व्यंजनों से युक्त (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य तथा चोष्य) भोजन कराऊँगा । तपस्वियों के लिये क्या असाध्य है ? ॥ ४६ ॥ हे प्रभो ! यहाँ के अतिरिक्त घर में भी जो आपकी सेना हो, उसे भी बुला लें । आप क्षणभर इस नदी के अत्यन्त रमणीय शुभ तट पर तबतक विश्राम करें, जबतक कि भोजन पक नहीं जाता, फिर आप आश्चर्य हुआ देखेंगे ॥ ४७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — मुनि जमदग्नि के उन वचनों को सुनकर अपने अन्तर्मन में अत्यन्त आश्चर्यचकित होते हुए कृतवीर्य के पुत्र वे राजा कार्तवीर्य नदी के अत्यन्त सुन्दर तटपर चले गये । इधर जमदग्निजी ने अपनी पत्नी रेणुका को बुलाकर समस्त वृत्तान्त उसे सुनाया ॥ ४८-४९ ॥ उन दोनों ने कामधेनु को बुलाकर क्षणभर उसकी पूजा की और दोनों ने उससे प्रार्थना की कि हे धेनुके ! हमारी लज्जा की रक्षा करना । हे कल्याणि ! हमने असंख्य सेना से समन्वित राजा को भोजन के लिये निमन्त्रित किया है, अतः सेनासहित उस राजा की रुचि के अनुसार भोजन की व्यवस्था होनी चाहिये। आप क्षणभर में ही वैसी व्यवस्था करें। अन्यथा सत्य की मर्यादा नष्ट हो जायगी और संसार में हमारा अपयश भी होगा, अतः आप जैसा ठीक समझें, वैसा करें ॥ ५०-५२ ॥ उन दोनों के द्वारा इस प्रकार प्रार्थित की गयी कामधेनु ने अपने प्रभाव के द्वारा एक महान् नगर की रचना की, जो नाना प्रकार के सुन्दर भवनों से सुसज्जित था । वह विविध प्रकार के रत्नमय खम्भों से सुशोभित था, वहाँ विविध प्रकार के सभागृह बने थे । नाना प्रकार के पुष्पों तथा लताओं से समन्वित सुन्दर वाटिकाओं और उपवनों से वह सुशोभित था ॥ ५३-५४ ॥ वह नगर विविध प्रकार की ध्वजा-पताकाओं से मण्डित था तथा अनेक प्रकार के वाद्यों की ध्वनियों से गुंजित हो रहा था। वह स्वर्ण के पात्रों की विविध पंक्तियों से सुशोभित था । चारों प्रकार के व्यंजनों से युक्त विविध प्रकार की पंक्तियों से सुसज्जित था। वह नगर विशाल तोरण द्वारों से सुशोभित तथा चारों ओर परिखा के घेरे से युक्त था ॥ ५५-५६ ॥ उस नगर के रमणीय चबूतरे अनेक दास-दासियों से समन्वित थे । वहाँ जहाँ-तहाँ स्थित पुरवासी जन आने- जानेवाले लोगों को इधर-उधर हटा रहे थे और कह रहे थे कि मुनि जमदग्नि की आज्ञा है कि इससे आगे कोई न जाय ॥ ५७१/२ ॥ वहाँ चारों ओर असंख्य पात्रों में भोजन परोसा गया था। वे पात्र दीपों के प्रकाश से प्रकाशित हो रहे थे, उनमें विविध प्रकार के व्यंजन परोसे गये थे। पात्रों में सूप, खीर, पक्वान्न तथा पंचामृत रखा हुआ था, वे पात्र खाद्य, लेह्य (चाटने योग्य), चोष्य (चूसने योग्य) तथा विविध प्रकार के पेय पदार्थों की पंक्तियों से सुशोभित थे। सामुद्र लवण से युक्त पका हुआ नीबू, आम, अमृत फल, बिल्व आदि पदार्थ भी उन पात्रों में सजाये गये थे ॥ ५८–६०॥ श्रीकामधेनु के महान् कृपाप्रसाद के प्रभाव से अन्न- पात्रों में पक्वान्नों के परोस दिये जाने पर कृतवीर्य के पुत्र राजा कार्तवीर्य को उसकी सेना के साथ भोजन कराने के लिये मुनि जमदग्निजी ने उस समय अपने शिष्यों को बुलवाया ॥ ६१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘कार्तवीर्योपाख्यान’ नामक सतहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७७ ॥ Content is available only for registered users. 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