श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-82
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
बयासीवाँ अध्याय
परशुरामजी द्वारा पूछे जाने पर माता रेणुका द्वारा उन्हें कार्तवीर्य-विजय का उपाय बतलाना, परशुराम द्वारा महादेवजी की आराधना से उन्हें गणेशजी के षडक्षरमन्त्र का उपदेश प्राप्त होना, मन्त्रजप से गणेशजी का उन्हें दर्शन देना, गणेशजी का उन्हें अपना परशु प्रदान करना और परशुराम नाम की प्रसिद्धि, परशुराम द्वारा कार्तवीर्य का वध तथा इक्कीस बार पृथिवी को क्षत्रियविहीन बनाना
अथः द्वयशीतितमोऽध्यायः
रामेण मयूरेशक्षेत्रे तपः, मयूरेशेदर्शनम्, परशुप्राप्तिः

व्यासजी बोले — [हे ब्रह्मन्!] परशुरामजी ने बालक होते हुए भी हजार हाथों वाले तथा बहुत विशाल सेना वाले कृतवीर्य के पुत्र कार्तवीर्य के साथ अकेले ही कैसे युद्ध किया और उस महापराक्रमशाली पर कैसे विजय प्राप्त की, उसे आप मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइये ॥ ११/२ ॥

ब्रह्माजी बोले — एक दिन की बात है, परशुरामजी ने अपनी माता रेणुका से पूछा — ॥ २ ॥

परशुराम बोले — हे मातः ! जिस कार्तवीर्य के डर से इन्द्र आदि देवता भी भयभीत होकर काँप उठते हैं, जिसके पास असंख्य मात्रा में चतुरंगिणी सेना है, उसपर मैं किस प्रकार विजय प्राप्त कर सकूँगा, आप मुझे वह उपाय विस्तारपूर्वक बतलाइये। मैं किस प्रकार इक्कीस बार इस धरा को क्षत्रियहीन बना सकूँगा, उसे भी बतलाइये। आपके कृपा-प्रसाद से निश्चित ही मेरी विजय होगी और सभी लोकों में मेरी अतुलनीय कीर्ति का विस्तार होगा ॥ ३-५ ॥

माता बोली — हे पुत्र ! तुम्हारी विजय अवश्य होगी, तुम भगवान् शंकर की आराधना करो। उन महादेवजी के सन्तुष्ट हो जाने पर सभी मनोकामनाओं की पूर्ति हो जायगी ॥ ६ ॥

माता के इस प्रकार के वचनों को सुनकर उनके चरणों में प्रणामकर तथा उनका आशीर्वाद ग्रहणकर परशुराम कैलासपर्वत पर चले गये ॥ ७ ॥ वहाँ उन्होंने महादेवजी का दर्शन किया, जो रत्नमय सिंहासन के ऊपर विराजमान थे। परशुरामजी ने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम करके उनकी स्तुति की ॥ ८ ॥

॥ राम उवाच ॥
नमो देवदेवेश गौरीश शम्भो ।
नमो विश्वकर्त्रे नमो विश्वभर्त्रे ।
नमो विश्वहर्त्रे नमो विश्वमूर्ते ।
नमो विश्वधाम्ने नमःश्चन्द्रधाम्ने ॥ ९ ॥
नमो निर्गुणायामल ज्ञानहेतो निराकार साकार नित्याय तेऽस्तु ।
नमो वेदवेदान्तशास्त्रातिगाय नमोऽव्यक्तव्यक्तात्मने सत्स्वरूम ॥ १० ॥
गुणत्रयप्रबोधाय गुणातीताय ते नमः ।
नमः प्रपञ्चविदुषे प्रपञ्चरहिताय ते ॥ ११ ॥

परशुराम बोले —  हे देवदेवेश ! हे गौरीपति ! हे शम्भो! आपको नमस्कार है । विश्व की सृष्टि करने वाले आपको नमस्कार है, विश्व का पालन-पोषण करने वाले आपको नमस्कार है। विश्व का संहार करने वाले आपको नमस्कार है। विश्वमूर्तिरूप आपको नमस्कार है, विश्व के आश्रयरूप आपको नमस्कार है। चन्द्रमा को अपने मस्तक पर धारण करने वाले आपको नमस्कार है ॥ ९ ॥

निर्गुण स्वरूप तथा विशुद्ध ज्ञान के कारणरूप आपको नमस्कार है । निराकार, साकार एवं सनातन रूप आपको नमस्कार है। वेद, वेदान्त आदि शास्त्रों के लिये भी वर्णनातीत आपको नमस्कार है, अव्यक्त व्यक्तात्मा तथा सत्स्वरूप आपको नमस्कार है ॥ १० ॥ सत्त्वादि तीन गुणों के बोधक एवं त्रिगुणातीत आपको नमस्कार है। प्रपंच को जानने वाले तथा प्रपंचरहित आप शिव को नमस्कार है ॥ ११ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार से की गयी स्तुति को सुनकर भगवान् महेश्वर अत्यन्त सन्तुष्ट हो गये और परशुराम को सम्बोधित करके बोले — ‘मैं तुम्हारे वचनरूपी अमृत से संतृप्त हो गया हूँ। तुम अपने मन में जो-जो भी कामना मुझसे रखते हो, उसके लिये मुझसे वर माँगो । हे द्विज! मैं तुम्हें जानता हूँ, तुम महर्षि जमदग्नि और रेणुका के पुत्र हो ॥ १२-१३ ॥

परशुराम बोले — हे प्रभो ! कामधेनु को प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले दुष्ट कार्तवीर्य ने क्रुद्ध होकर बिना अपराध के ही मेरे पिता जमदग्नि को मार डाला, इतना ही नहीं; उसने सेनासहित [अपने को] मेरे पिता के द्वारा भोजन प्राप्त कराये जाने पर भी इक्कीस बाणों के द्वारा मेरी माता रेणुका को चारों ओर से बींध डाला ॥ १४-१५ ॥ माता ने मुझे आज्ञा दी है कि उस दुष्ट राजा का वध कर डालो। मैं आपकी शरण में आया हूँ, उसके वध का उपाय बताने की कृपा करें। ताकि उसी उपाय के द्वारा मैं इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से हीन बना सकूँ ॥ १६१/२

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार परशुरामजी की बातों का रहस्य समझकर भगवान् महादेव उनसे बोले — ॥ १७ ॥

उन्होंने ध्यानपूर्वक देखकर सुखपूर्वक किया जाने वाला विजय का उपाय बताया और गणेशजी को प्रसन्न करने वाले छः अक्षरों वाले मन्त्र का उपदेश उन्हें दिया । साथ ही यह भी कहा कि इस षडक्षर मन्त्र का प्रयत्नपूर्वक एक लाख की संख्या में जप करो। उसके दशांश संख्या से हवन करो ॥ १८-१९ ॥ हवन के दशांश से तर्पण तथा उसके भी दशांश संख्या में (सौ) ब्राह्मणों को भोजन कराओ । ब्राह्मणों की सेवासे गणेशजी तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हो जायँगे और देवदेव गजानन पृथ्वी पर तुम्हारे सभी कार्य पूर्ण कर देंगे ॥ २०१/२

भगवान् शंकर के इन वचनों को सुनकर उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम करके और उनकी आज्ञा प्राप्तकर वे परशुरामजी इस पृथ्वी में इधर-उधर घूमने लगे। उन्होंने कृष्णा नदी के उत्तरी क्षेत्र में एक श्रेष्ठ स्थान को देखा ॥ २१–२२ ॥ वह अनेक प्रकार के वृक्षों एवं लतामण्डपों से सुशोभित हो रहा था और साधना करने वालों को उत्तम सिद्धि प्रदान करने वाला था । उन भगवान् शंकर के द्वारा जैसा कहा गया था, उसीके अनुसार परशुरामजी ने वहाँ अनुष्ठान किया ॥ २३ ॥ उन्होंने अपनी दसों इन्द्रियों तथा मन की वृत्ति को भगवान् गजानन में स्थिर करके पैर के एक अँगूठे में खड़ा रहकर उस (षडक्षर) महामन्त्र का (एक लाख की संख्या में) जप किया। उसके दशांश संख्या में क्रमशः हवन, उसके दशांश संख्या में तर्पण तथा उसके भी दशांश संख्या में ब्राह्मणों को भोजन कराया ॥ २४-२५ ॥

तब प्रसन्न होकर भगवान् गजानन प्रकट हो गये। वे चार भुजावाले थे, उनका शरीर विशाल था, वे महामायावी तथा अत्यन्त सुन्दर थे ॥ २६ ॥ उन्होंने नाग का यज्ञोपवीत धारण किया था, विविध प्रकार के अलंकारों से वे विभूषित थे, उन्होंने मस्तक पर मुकुट तथा कानों में कुण्डल धारण कर रखे थे । उनका सुन्दर गण्डस्थल अत्यन्त देदीप्यमान और मुखमण्डल प्रकाशमान हो रहा था ॥ २७ ॥ मोती तथा मूँगे की मालाओं से उनका वक्षःस्थल सुशोभित हो रहा था। उनकी अत्यन्त विशाल भुजाएँ थीं। वे अपने चारों हाथों में परशु, कमल, दाँत तथा मोदकों को धारण किये हुए थे ॥ २८ ॥ वे स्वामी भगवान् गणेश अपनी सूँड़ में कमल पुष्प को धारण कर स्वेच्छापूर्वक सूँड़ से घुमा रहे थे। वे अपनी आभा से सभी दिशाओं तथा विदिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे। परशुरामजी ने जब सहसा उन्हें देखा तो उनके तेज से अभिभूत होकर अपनी दोनों आँखें बन्द कर लीं। तदुपरान्त उन द्विज परशुराम ने गणेशजी की स्तुति करनी प्रारम्भ की ॥ २९-३० ॥

॥ राम उवाच ॥
सहस्रादित्यसङ्काश नमस्ते जगदीश्वर ।
नमस्ते सर्वविद्येश सर्वसिद्धिप्रदायक ॥ ३१ ॥
विघ्नानां पतये तुभ्यं नमो विघ्ननिवारण ।
सर्वान्तर्यामिणे तुभ्यं नमः सर्वप्रियङ्कर ॥ ३२ ॥
भक्तप्रियाय देवाय नमो ज्ञानस्वरूपिणे ।
नमो विश्वस्य कर्त्रे ते नमस्तत्पालकाय च ॥ ३३ ॥

परशुरामजी बोले — हजारों सूर्यों के समान आभावाले हे जगदीश्वर! आपको नमस्कार है । हे सभी विद्याओं के स्वामी! आप सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ ३१ ॥ विघ्नों के स्वामी तथा विघ्नों का विनाश करने वाले आपको नमस्कार है। आप सर्वान्तर्यामी को नमस्कार है, आप सभी का प्रिय करने वाले हैं, आपको नमस्कार है। भक्तों के प्रिय तथा ज्ञानस्वरूप भगवान् गणेश को नमस्कार है। विश्व की संरचना करने वाले और उसका पालन करने वाले आपको नमस्कार है । मेरी तपस्या के विनाशक महाविघ्न का आप निवारण करें ॥ ३२-३३१/२

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार की स्तुति को सुन करके सौम्य तेजवाले भगवान् गणेश ने अपने उत्कट तेज से व्याकुल हुए उन परशुरामजी से कहा — ॥ ३४१/२

गणेशजी बोले — हे राम ! मेरे षडक्षर मन्त्र का जप करते हुए तुम रात-दिन जिसका ध्यान करते हो, वही मैं वर देने के लिये इस समय प्रस्तुत हुआ हूँ, तुम अपने मन में जिस-जिस मनोरथ की इच्छा करते हो, मुझसे तुम वह वर माँग लो ॥ ३५-३६ ॥ मैं ही अनेक ब्रह्माण्डों की सृष्टि और पालन तथा संहार करने वाला हूँ, सभी ब्रह्मा आदि देवता तथा मुनिगण और राजर्षि मेरे यथार्थ स्वरूप को नहीं जानते हैं, वही आज मैं तुम्हें दृष्टिगोचर हुआ हूँ ॥ ३७१/२

परशुराम बोले — जो अप्रमेय, सम्पूर्ण विश्व के आश्रय एवं सृष्टि तथा संहार करने वाले हैं। जो न तो वेदों के द्वारा, न तपस्या से, न यज्ञों के द्वारा, न व्रतों के अनुष्ठान से, न दान से और न योग-साधना द्वारा लोगों को दिखायी देते हैं, उन्ही आप विघ्नविनाशक का आज मुझे दर्शन हुआ है । हे देव ! अब मुझे दूसरे वर से क्या प्रयोजन ! आप मुझे अपनी दृढ़ भक्ति प्रदान करें ॥ ३८-४० ॥

गणेशजी बोले — हे द्विजश्रेष्ठ राम! मुझमें तुम्हारी दृढ़ भक्ति होगी, मेरे द्वारा वरदानों का प्रलोभन दिये जाने पर भी तुम्हारी बुद्धि किंचित् भी विचलित नहीं हुई। तुम मेरे इस परशु को ग्रहण करो, यह सभी शत्रुओं का विनाश करने वाला है, आज से तीनों लोकों में तुम्हारा ‘परशुराम’ यह नाम ख्याति को प्राप्त करेगा ॥ ४१-४२ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार उन परशुराम को वर प्रदानकर तथा अपना परशु (खड्ग) देकर भगवान् गजानन लोगों के देखते-देखते उसी समय अन्तर्धान हो गये ॥ ४३ ॥

तदनन्तर परशुरामजी ने ब्राह्मणों तथा वेद-वेदांग और शास्त्रों के जाननेवाले विद्वानों के द्वारा अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक भगवान् महागणपति की स्थापना, प्रतिष्ठा की। उन्होंने ब्राह्मणों को भोजन कराया और विविध प्रकार के दान दिये। उन्होंने रत्नों के खम्भों से समन्वित एक दृढ़ मन्दिर बनवाया। उन गजानन की पूजा, परिक्रमा तथा प्रणाम करके वे परशुराम अत्यन्त प्रसन्न मन होकर अपने घर को गये ॥ ४४–४६ ॥

तदनन्तर परशुरामजी ने [कार्तवीर्य के समीप जाकर ] बड़े ही उच्च स्वर में पृथ्वीपति कार्तवीर्य को ललकारा और युद्ध में उस राजा सहस्रबाहु की हजार भुजाओं को काट डाला ॥ ४७ ॥ इक्कीस बार उन्होंने इस धरती को क्षत्रियों से विहीन बना दिया और यज्ञ में दक्षिणासहित सम्पूर्ण पृथ्वी का ब्राह्मणों को दान कर दिया ॥ ४८ ॥ तदनन्तर लोगों ने अन्य सभी देवों से बढ़ा-चढ़ा उनका दृढ़ पराक्रम देखकर उन परशुरामजी को भगवान् विष्णु समझकर उनकी पूजा की ॥ ४९ ॥

[ व्यासजी बोले — ] हे ब्रह्मन्! हे पुत्र ! इस प्रकार से मैंने भगवान् गणेश की विविध महिमा संक्षेप में तुम्हें बतायी। हे मुनीश्वर ! उनकी सम्पूर्ण महिमा का वर्णन करने में सहस्र मुख वाले शेष भी समर्थ नहीं हैं। इस पृथ्वी पर जो इस [गणेशपुराण के] – के उपासनाखण्ड का श्रवण करता है, वह अपने समस्त मनोरथों को प्राप्त कर लेता है और अन्त में गणेशजी के धाम को प्राप्त करता है और वहाँ वह प्रलयपर्यन्त इच्छानुसार आनन्दित होता है ॥ ५०–५२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘परशुरामवरदानप्राप्तिवर्णन ‘ नामक बयासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८२ ॥

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