श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-010
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
दसवाँ अध्याय
बालक गणेश द्वारा विघातादि राक्षसों का उद्धार, बालक गणेश के यज्ञोपवीत-संस्कार का वर्णन, विविध देवों द्वारा उन्हें अनेक नाम तथा विविध उपहार प्रदान करना
अथः दशमोऽध्यायः
नानानामनिरूपणं

ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर धीमान् महर्षि कश्यपजी ने उस बालक गणेश के पाँचवें वर्ष में अपने गृह्यसूत्र में बतायी गयी विधि के अनुसार शुभ मुहूर्त तथा शुभ लग्न में वेद के पारगामी विद्वान् ब्राह्मणों के द्वारा उसका चूडाकरण सहित मंगलमय व्रतबन्ध – संस्कार कराया। महर्षि कश्यपजी के शिष्यों द्वारा आमन्त्रित किये गये देवता, दानव, राक्षस, मुनिगण, यक्ष, नाग और अनेक राजर्षि तथा वैश्य एवं शूद्रगण नाना प्रकार के उपहारों को हाथ में लेकर वहाँ आये ॥ १-३ ॥

उस समय मनुष्यों तथा देवताओं ने विविध प्रकार के वाद्यों को बजाया। महर्षि कश्यप ने गणेश-पूजन किया तथा स्वस्तिवाचन, मण्डप-स्थापन, मातृकापूजन एवं आभ्युदयिक श्राद्ध किया और ब्राह्मणों की पूजा की । मित्र- गणों को यथायोग्य वस्त्रदान किया । अन्य जनों को भी वस्त्र दिये। उन सभी ने भी उन वस्त्रों को पहन लिया ॥ ४–६ ॥ कश्यपजी ने हवन सम्पन्न हो जाने पर पुनः ब्राह्मणों की पूजा की। तदनन्तर शीघ्र ही वेदिका में अन्तःपट लगाकर वेदी में अग्नि की स्थापना की गयी और बालक को वहाँ लाया गया। सुवासिनी स्त्रियों तथा ब्राह्मणों ने उसके ऊपर अक्षतों को बिखेरा ॥ ७-८ ॥

उन ब्राह्मणों के मध्य में ब्राह्मणों का रूप धारण कर पाँच अत्यन्त दुष्ट राक्षस भी बैठे थे। उनके नाम थे — विघात, पिंगाक्ष, विशाल, पिंगल तथा चपल । वे बड़ा- बड़ा तिलक लगाये थे, अक्षमाला से सुशोभित हो रहे थे । उन्होंने अपने-अपने हाथ में जलपात्र धारण किया हुआ था, वे अत्यन्त रमणीय वस्त्रों तथा आभूषणों को धारण किये हुए थे ॥ ९-१० ॥ उन दुष्टों ने उस बालक गणेश के प्राणों का हरण करने की इच्छा से उसपर अस्त्रों से आघात किया। उनके अस्त्रों से उस कुमार का शरीर छिन्न-भिन्न हो गया ॥ ११ ॥

कुमार महोत्कट ने उन्हें दुष्ट जानकर अक्षतों को मन्त्रों से अभिमन्त्रित किया और उन पाँचों राक्षसों पर पाँच अक्षत फेंके ॥ १२ ॥ [जिससे] उसी समय उनके प्राण निकल गये और वे अपने विकराल रूप धारणकर दस योजन विस्तारवाले हो गये एवं छिन्न-भिन्न होकर भूमि पर उसी प्रकार गिर पड़े, जैसे कि इन्द्र के द्वारा किये गये प्रहार से पर्वत गिर पड़े हों। उस समय भारी कोलाहल मच गया और दसों दिशाएँ धूल से आच्छादित हो गयीं ॥ १३-१४ ॥

वहाँ एकत्रित लोग कहने लगे — ‘छद्म रूप धारण करने वाले इन पाँच राक्षसों को उस बालक ने क्षणभर में कैसे मार डाला ? हम सब इस बालक को नहीं जानते हैं। क्या साक्षात् परमेश्वर ने ही इस पृथ्वी के भार को दूर करने के लिये स्वयं अवतार धारण किया है?’ ॥ १५१/२

इस प्रकार का वार्तालाप हो ही रहा था, कि उसी समय अपने-अपने विमानों में बैठे हुए ब्रह्मा आदि देवताओं ने उस आदरणीय बालक पर पुष्पों की वृष्टि की ॥ १६१/२

उन प्रेतों (शवों)-के वहाँ से ले जाये जाने के अनन्तर ब्राह्मणों तथा मुनि कश्यप ने उस उपनीत बालक गणेश को अपनी शाखा में कहे गये मन्त्रों के द्वारा वस्त्र, मेखला, यज्ञोपवीत, मृगचर्म तथा दण्ड धारण कराया ॥ १७-१८ ॥ इसके अनन्तर महर्षि कश्यप ने उसकी अंजलि में जल भरकर उसे भगवान् सूर्य के मण्डल का दर्शन कराया और हवन समाप्त करने के पश्चात् उसे गायत्री मन्त्र का उपदेश दिया ॥ १९ ॥ पहले गायत्री मन्त्र के एक पाद का, तदनन्तर प्रथम पाद एवं द्वितीय पाद का और फिर सम्पूर्ण मन्त्र का उपदेश दिया । सर्वप्रथम माता ने उसे भिक्षा प्रदान की । तदनन्तर वहाँ आये हुए संख्यातीत लोगों ने उसे भिक्षा दी ॥ २० ॥

तदनन्तर बटुक गणेश को महर्षि कश्यप ने शौचाचार- सम्बन्धी अनेक नियमों का उपदेश कर पुनः ब्राह्मणों की पूजा की और उन्हें वस्त्र, सुवर्ण तथा गौएँ प्रदान कीं । बालक के महान् अरिष्ट कट जाने पर महर्षि कश्यप ने ब्राह्मणों को यह सब दान अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिपूर्वक दिया था । तदनन्तर मुनि वसिष्ठजी उस बटुक को सभा के मध्य में स्थित ब्रह्माजी के पास ले गये ॥ २१-२२ ॥ ब्रह्माजी के कमण्डलु में स्थित पवित्र जल को बालक ने ग्रहण किया। तब ब्रह्माजी ने अपने हाथ में स्थित तथा सदा ही खिले रहने वाले कमल को उसे प्रदान किया ॥ २३ ॥ तदनन्तर ब्रह्माजी ने उस बालक गणेश का ‘ब्रह्मणस्पति’ यह नाम रखा। बृहस्पतिजी ने बालक गणेश की पूजाकर उसका ‘भारभूति’ यह नाम रखा ॥ २४ ॥

कुबेर ने अपने कण्ठ में स्थित रहने वाली रत्नों की माला उसे प्रदान की । तदनन्तर उसका पूजनकर कुबेर ने ‘बालक का ‘सुरानन्द’ यह नाम रखा ॥ २५ ॥ जलाधिपति वरुण ने सभी देवताओं के सुनते हुए ‘सर्वप्रिय’ यह नाम रखकर उसे अपना ‘पाश’ प्रदान किया। भगवान् शंकर ने अपना त्रिशूल और डमरु उसे प्रदानकर ‘विरूपाक्ष’ यह नाम उसका रखा। साथ ही उन्होंने उसे चन्द्रमा की कला प्रदानकर ‘भालचन्द्र’ यह नाम भी रखा ॥ २६-२७ ॥ त्रैलोक्यजननी भगवती शिवा ने उसे प्रसन्नतापूर्वक ‘परशु’ नामक अस्त्र प्रदान किया और ‘परशुहस्त’ यह सुन्दर नाम रखा तथा पुनः उसकी पूजा करके अपना श्रेष्ठ वाहन ‘सिंह’ उसे प्रदान किया और ‘सिंहवाहन’ यह सुन्दर नाम रखा और उसे आदेश देते हुए कहा — ‘हे विनायक ! तुम शीघ्र ही दुष्टों का विनाश करो’ ॥ २८-२९१/२

समुद्र ने ब्राह्मणरूप धारणकर वहाँ उपस्थित होकर उसे मुक्ता की माला प्रदान की और उसकी पूजाकर ‘मालाधर’ यह नाम उसका रखा। भगवान् शेष ने गणेशजी के आसन के रूप में स्वयं अपने को समर्पित किया। और बड़ी प्रसन्नतापूर्वक ‘फणिराजासन’ उसका नामकरण किया। अग्निदेव ने उसे दाहशक्ति प्रदान की और ‘धनञ्जय’ यह नाम रखा ॥ ३०-३२ ॥ वायुदेव ने बालक का ‘प्रभंजन’ यह नाम रखा और महान् पराक्रम उसे प्रदान किया। इस प्रकार सभी देवों ने यथाशक्ति उसे कुछ भेंट प्रदानकर उसके विविध नाम रखे। हे मुने! उनके नामों का वर्णन करने में किसी की भी शक्ति नहीं है ॥ ३३१/२

देवराज इन्द्र ने मद से उन्मत्त होकर उसकी पूजा नहीं की और न कोई मंगलमय श्रेष्ठ उपहार ही प्रदान किया ॥ ३४ ॥ इन्द्र सोचते थे, मैं तीनों लोकों के द्वारा पूज्य हूँ, देवताओं का राजा हूँ, वरिष्ठ हूँ, अमृत का पान करने वाला हूँ, गजेन्द्र ऐरावत की सवारी करने वाला हूँ और भगवान् विष्णु तथा शूलपाणि शंकरजी द्वारा भी पूजित हूँ तो मैं कश्यपजी के छोटे बालक उस गणेश को क्यों नमस्कार करूँ? सिंह कभी भी तृण का भक्षण नहीं करता, समुद्र कभी भी छोटे सरोवर से जल की अभिलाषा नहीं करता और सब कुछ प्रदान करने वाला कल्पवृक्ष अन्य किसी दूसरे से कुछ भी नहीं माँगता ॥ ३५-३६ ॥

महर्षि कश्यपजी ने अपने ध्यानयोग से इन्द्र के इस प्रकार के भाव को समझकर उसकी भलाई की कामना से इस प्रकार के धर्मयुक्त वचन कहे — ॥ ३७ ॥

जो अद्भुत कर्मवाला हो और जो गुणों की खान हो, वह पूजा के योग्य तथा प्रणाम करने के योग्य होता है, इसी प्रकार गुणों से रहित ब्राह्मण भी पूज्य एवं नमस्कार्य नहीं होता है ॥ ३८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत क्रीडाखण्ड में ‘नाना नामों का वर्णन’ नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १० ॥

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