November 11, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-106 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ छठवाँ अध्याय मयूरेश द्वारा तेरहवें वर्ष में मंगल दैत्य का वध और शिव के ललाट पर स्थित चन्द्रमा के हरण की लीला, मयूरेश का गणों का स्वामी होना अथः षडधिकशततमोऽध्यायः शिवललाटगतचन्द्रहरणं ब्रह्माजी बोले — मयूरेश के तेरहवें वर्ष की बात है, एक दिन उन मयूरेश ने निद्रा में सोये हुए अच्युत भगवान् महेश्वर को प्रणाम करने के अनन्तर उनके सिर में स्थित चन्द्रमा को ले लिया, उस समय कल्याणकारी भगवान् शिव अपने समस्त अंगों में भस्म का अंगराग लगाने से सुशोभित हो रहे थे, उनके पाँच मुख थे, दस भुजाएँ थीं। उन्होंने गले में रुण्डों की माला धारण की हुई थी और मस्तक पर चन्द्रमा को धारण कर रखा था ॥ १-२ ॥ तदनन्तर वे मयूरेश हँसते, नाचते और परस्पर वार्तालाप करते बालकों से घिरे तथा खेल करते हुए बाहर चले आये। उसी समय की बात है, मंगल नाम वाला एक दैत्य वहाँ आ पहुँचा। उसका मुख अत्यन्त भयंकर था, वह वीरों पर विजय प्राप्त करने वाला और परम अद्भुत था ॥ ३-४ ॥ अत्यन्त पराक्रमी वह वराहरूपी दैत्य अपनी दाढ़ों से वृक्षों को उखाड़ देने वाला था, वह वज्रसार के समान अपने सुदृढ़ बालों से आकाश को और अपने पैरों से धरती को भेद देने वाला था ॥ ५ ॥ वह काजल के पर्वत के समान काले रंग का था, उसकी आँखें अग्निकुण्ड के समान [गहरी एवं दाहक ] थीं और वह वर्षाकालीन मेघों के समान गर्जना करने वाला था, उसे देखकर वे सभी बालक भाग पड़े ॥ ६ ॥ वे बालक आपस में यह कहने लगे कि इस प्रकार का सूकर कहीं देखा नहीं गया। जबतक वह दैत्य बालकों को मारता, उससे पहले ही मयूरेश ने एक हाथ से उस सूकररूप दुष्ट दानव के दाँतों को पकड़ लिया और दूसरे हाथ से उसके नीचे के थूथन को पकड़ लिया ॥ ७-८ ॥ तदनन्तर बालक मयूरेश ने बाँस के टुकड़े के समान उस सूकर को फाड़ डाला। तब वह दैत्य दस योजन विस्तृत अपनी पूर्व देह को धारणकर वृक्षों को चूर-चूर करते हुए और पृथ्वीतल को विदीर्ण करते हुए भूमि पर गिर पड़ा। तब वे बालक मयूरेश को देखकर कहने लगे — पार्वती का पुत्र यह मयूरेश धन्य है ! ॥ ९-१० ॥ इसने क्षणभर में ही इस महान् बलशाली दैत्य को खेल-खेल में ही मार डाला है। इसे देखकर हम तो दसों दिशाओं में भाग खड़े हुए थे । इसने तो गिरते हुए यहाँ अनेक घरों को चूर-चूर कर डाला ॥ १११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर भगवान् शिव ने अपने मस्तक पर चन्द्रमा को नहीं देखा, तो क्रोध से उनके नेत्र लाल हो गये। वे संसार को जलाते हुए-से क्रोध से आविष्ट होकर अपने गणों से कहने लगे — तुम लोग कैसे रक्षा करते हो? मेरे मस्तक पर स्थित निर्मल चन्द्रमा का किस दैत्य के द्वारा हरण कर लिया गया है? ॥ १२–१३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — तब भय से व्याकुल होकर थर- थर काँपते हुए वे सभी गण वहाँ से भाग उठे। कुछ गण धैर्य धारणकर भगवान् शिव से कहने लगे — हे उमापति ! मयूरेश्वर नाम वाले आपके पुत्र जब खेल खेलने बाहर आये तो उनके हाथ में हमने चन्द्रमा को देखा था । परंतु हे प्रभो! वे कब चन्द्रमा को ले गये, यह हम नहीं जानते ॥ १४–१६ ॥ गणों का यह वचन सुनकर रुष्ट हुए महेश्वर बोले — तुम लोग तो भोजन करने में ही तत्पर रहते हो, तुम्हारे द्वारा किस प्रकार से रक्षा की जा रही है ? ॥ १७ ॥ चन्द्रमा को अथवा चन्द्रमा का हरण करने वाले को यदि तुम लोग ले आते हो तो इसी में भलाई है, अन्यथा मैं तुम सभी को यहीं भस्म कर डालूँगा, इसमें सन्देह नहीं है ॥ १८ ॥ तदनन्तर क्षुब्ध मनवाले वे सभी गण जल्दी-जल्दी दौड़ते हुए मयूरेश के पास पहुँचे और रुष्टमन होकर उनसे कहने लगे — अरे तस्कर ! या तो तुम भगवान् शिव के पास चलो या चन्द्रमा को हमें दे दो ॥ १९१/२ ॥ गणों का वचन सुनकर गणनायक मयूरेश क्रुद्ध हो उठे ॥ २० ॥ वे बोले — अरे गणो ! तीनों लोकों की जननी देवी पार्वती के अत्यन्त प्रभावशाली पुत्र मुझ मयूरेश्वर की दृष्टि में तुम्हारी अथवा तुम्हारे स्वामी शिव की कोई गणना नहीं है ॥ २०-२१ ॥ ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर उनकी श्वास से वे उसी प्रकार उड़ गये, जैसे हवा के द्वारा पत्तों को उड़ा दिया जाता है और वे सभी दीन शिवगण शिव की शरण में आकर गिरे। तब अत्यन्त क्रुद्ध होकर महादेव ने प्रमथ आदि गणों से कहा कि उमा के उस छोटे-से दुष्टात्मा बालक को पकड़कर ले आओ ॥ २२-२३ ॥ वे गण अत्यन्त शीघ्रता से वहाँ गये, जहाँ वे बालक मयूरेश क्रीडा कर रहे थे। उन्होंने देखा कि वे अन्य बालकों के साथ निश्चिन्त होकर क्रीडा कर रहे हैं ॥ २४ ॥ अपने को बन्धन में डालकर ले जाने के लिये आये हुए उन गणों को विनायक मयूरेश्वर ने मोह में डाल दिया और स्वयं अन्तर्धान हो गये। वे गण उन्हें चारों दिशाओं में देखने लगे ॥ २५ ॥ उन्होंने घर-घर, जंगल-जंगल ढूँढ़ा, किंतु वे विनायक को कहीं नहीं देख पाये। फिर किसी स्थान पर उनको पाकर वे कहने लगे — हमारे सामने आने के बाद तुम जा कैसे सकते हो, यदि तुम ब्रह्मलोक भी पहुँच जाओ, तो हम वहाँ से भी [ पकड़कर ] तुम्हें उन भगवान् शिव के पास ले चलेंगे। इस प्रकार वे मयूरेश कभी अन्तर्धान हो जाते, तो कभी प्रकट हो जाते। तब शिवगणों को अत्यन्त खिन्न देखकर परमात्मा मयूरेश उनपर कृपा करते हुए उनके समक्ष खड़े हो गये । उन्हें भलीभाँति देखकर वे गण अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गये ॥ २६-२८ ॥ तब उन्होंने पार्वतीपुत्र उन मयूरेश को बाँध लिया और वे उन्हें शंकर के पास ले जाने लगे, किंतु पृथ्वी के समान भार वाले उन बैठे हुए मयूरेश को वे गण उठाने में समर्थ नहीं हो सके, यह देखकर उनके मन में बड़ा आश्चर्य हुआ। वे सभी गण मिलकर भी जब किसी प्रकार भी उन्हें उठाने में समर्थ नहीं हो सके, तब उद्यमहीन हुए वे शिव के पास आकर कहने लगे ॥ २९-३० ॥ हे शंकर! हम सभी मिलकर भी उस एक अकेले मयूरेश को यहाँ लाने में समर्थ नहीं हो पाये हैं । तदनन्तर भगवान् शिव ने अपने समक्ष स्थित नन्दी को आज्ञा देकर कहा — तुम जाओ और शीघ्रता से उस तस्कर मयूरेश को यहाँ ले आओ ॥ ३११/२ ॥ नन्दी बोले — हे महेश्वर! आपकी आज्ञा से तो मैं शेषनाग, सूर्य अथवा चन्द्रमा को भी यहाँ ले आऊँ, फिर उस छोटे-से मयूरेश की मेरे सामने क्या गणना है ! ॥ ३२१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — ऐसा कह करके क्रोध से रक्त नेत्रवाले वे नन्दी तीखी सींगों से वृक्षों तथा पर्वतों को गिराते हुए और आकाश को निगलते हुए-के समान वायु के वेग से चल पड़े और वहाँ पहुँचकर उन मयूरेश से कहने लगे —अरे ! तुम शिव के पास चलो । यदि तुम स्वयं नहीं चलते हो तो मैं तुम्हें ले जाऊँगा, मैं दूसरे गणों के समान नहीं हूँ। ॥ ३३–३४१/२ ॥ उ नके इस प्रकार कहने पर मयूरेश अत्यन्त क्रुद्ध हो गये और उन्होंने अपनी आने-जाने वाली श्वास के चक्र में उन्हें फँसा डाला अर्थात् नासिकामार्ग से अपने भीतर ले गये और फिर अत्यन्त खिन्न हुए उन नन्दी को अपने दृढ़ निःश्वास के बल से शिव के समीप पहुँचा दिया ॥ ३५–३६ ॥ उस समय अपने पौरुष का नाना प्रकार से बखान करने वाले वे नन्दी अपने मुख से रक्त का वमन करते हुए मूर्च्छित होकर दो मुहूर्त तक पृथिवी पर गिरे रहे। शिव ने उन नन्दी के जानुओं के समीप मयूरेश को स्थित हुआ देखा। दिव्य वस्त्राभूषणों से सुसज्जित वे मयूरेश उस समय अत्यन्त देदीप्यमान विग्रह वाले प्रतीत हो रहे थे ॥ ३७-३८ ॥ तदनन्तर गणों ने मस्तक पर विराजमान चन्द्रमा वाले भगवान् शिव को देखकर कहा — हे देव ! आपके मस्तक पर तो चन्द्रमा वैसे ही विराजमान हैं, जैसे पहले थे । हे शिव! आपने व्यर्थ में ही हमें जाने की आज्ञा प्रदान की। तब अपने मस्तक पर चन्द्रमा को स्थित देखकर भगवान् शिव ने मयूरेश से तथा गणों से कहा — ॥ ३९१/२ ॥ शिव बोले — वे गण, तुम मयूरेश तथा नन्दी — तुम सभी मेरी आज्ञा का पालन करने से थक गये हो, मेरे मस्तक पर चन्द्रमा के विद्यमान रहने पर भी तुम सभी में व्यर्थ ही युद्ध हुआ ॥ ४०१/२ ॥ प्रमथगण बोले — हे देवेश शंकर ! आज से लेकर ये मयूरेश हमारे स्वामी बनें ॥ ४१ ॥ ब्रह्माजी बोले — उन गणों से भगवान् शिव ने कहा — ऐसा ही होगा। तब वे मयूरेश गणराज हो गये। तदनन्तर वे सभी गण भगवान् शिव, गणेश एवं गणेशजननी पार्वती को प्रणाम करके और उस प्रकार के प्रभाव से सम्पन्न देवेश मयूरेश की प्रशंसा करके गर्जना करते हुए अत्यन्त प्रसन्नता के साथ अपने-अपने घरों को चले गये ॥ ४२-४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘चन्द्रहरणलीला का वर्णन’ नामक एक सौ छठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०६ ॥ Content is available only for registered users. 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