श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-114
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ चौदहवाँ अध्याय
दैत्यराज सिन्धु की सेना का मयूरेश की सेना के साथ भीषण संग्राम और सिन्धुसेना की पराजय
अथः चतुर्दशोत्तरशततमोऽध्यायः
श्रीगणेशसेनाविजयवर्णनं

वीर बोले — [ हे स्वामिन्!] नाना प्रकार के शस्त्रों से युद्ध करने में कुशल वे दोनों मैत्र तथा कौस्तुभ नामक वीर अमात्य मृत्यु को प्राप्त हो गये हैं। उन दोनों ने शत्रु की सेना के असंख्य वीरों को रात-दिन मारा। तदनन्तर शत्रुसेना में से दो दुष्ट वीर आगे उपस्थित हुए, उन दो बलशाली वीरों ने हमारी सेना को मार गिराया और मर्दित कर डाला ॥ १-२ ॥ उन दोनों वीरों के हाथों के प्रहार से वे दोनों – मैत्र और कौस्तुभ यमलोक को प्राप्त हुए हैं। हम लोगों ने अनेक प्रकार की सेनाएँ देखी हैं, किंतु उन दोनों के समान देवता नहीं देखे हैं ॥ ३ ॥

सिन्धु बोला — अरे सैनिको ! जिन दोनों मैत्र और कौस्तुभ को देखकर समस्त प्राणियों के प्राणों का हरण करने वाले यमराज भी डरते हैं, बताओ तो सही, कि वे दोनों हाथों के आघात से कैसे मृत्यु को प्राप्त हुए ? अब इस समय सभी सैनिक मेरे बल-पराक्रम को देख लें। मैं युद्धभूमि में शत्रु के सिर को नचा डालूँगा, इसमें संशय नहीं है। चूँकि मैं चक्रपाणि का पुत्र हूँ, अतः मैं चक्रयुद्ध करूँगा। ऐसा कहकर वह दुष्ट अश्व पर आरूढ़ होकर मयूरेश से युद्ध करने के लिये चल पड़ा ॥ ४–६ ॥ असंख्य करोड़ वीर दैत्य, जो बड़े ही अपराजेय योद्धा थे और महान् बल-पराक्रम से सम्पन्न थे, वे भगवान् शिव के पुत्र देवराज मयूरेश से युद्ध करने की इच्छा से दैत्य सिन्धु के आगे-आगे चलने लगे ॥ ७ ॥

इधर अत्यन्त बलशाली नन्दीश्वर और पुष्पदन्त भी युद्ध करने के लिये गये। भूतराज और विकट दस लाख योद्धाओं के साथ गये। चपल पचास हजार सेना लेकर युद्ध की इच्छा से निकल पड़ा। वीरभद्र और षडानन असंख्य सेना लेकर चल पड़े। वे दोनों विविध प्रकार के शस्त्रों को धारण किये हुए थे और युद्ध करने में अत्यन्त बलवान् थे । देवसेना के सात व्यूहों (नन्दीश्वर, पुष्पदन्त, भूतराज, विकट, चपल, वीरभद्र और षडानन की सेना) – को देखकर दैत्य सैनिकों ने अनेकों व्यूहों की रचना की ॥ ८–१० ॥ दैत्यसेना के व्यूह में गन्धासुर, मदनकान्त, वीर, ध्वज, महाकाय, शार्दूल तथा सातवें धूर्त नामक योद्धाओं के सात व्यूह थे। इन सात व्यूहों को आगे करके दैत्यसेना ने आये हुए उन देवताओं के व्यूहों में स्थित वीरों के साथ युद्ध किया । उन्होंने बाणों की वर्षा करके उस देवसेना को ढक दिया और भालों के अग्रभाग से उन्हें बींध डाला ॥ ११-१२ ॥

किन्हीं पर भिन्दिपालों से आघात किया, जिससे वे पृथ्वी पर गिर पड़े। महान् बली गन्धासुर ने बलपूर्वक कार्तिकेय के साथ युद्ध किया ॥ १३ ॥ मदनकान्त ने युद्धस्थल में वीरभद्र के साथ युद्ध किया । नन्दीश्वर और असुर वीरराज परस्पर युद्ध करने लगे ॥ १४ ॥ ध्वजासुर और पुष्पदन्त में विविध प्रकार के अस्त्र- शस्त्रों तथा बाणसमूहों से आपस में युद्ध होने लगा । इसी प्रकार भूतराज तथा महाकाय ने आपस में युद्ध किया। धूर्त और विकट ने आपस में द्वन्द्व युद्ध किया। चपल ने रोष में भरकर शार्दूल को मारा, जिससे वह भूमि पर गिर पड़ा ॥ १५-१६ ॥ पुनः चैतन्य को प्राप्तकर उस शार्दूल ने अपने खड्ग से चपल पर प्रहार किया, जिस कारण वह चंचल चपल युद्ध में महान् मूर्च्छा को प्राप्त हुआ ॥ १७ ॥

द्वन्द्व युद्ध प्रारम्भ होने पर दोनों देवसेना और असुरसेना परस्पर युद्ध करने लगी। दोनों ओर के सैनिक शस्त्रों समूहों तथा बाणों के जाल से परस्पर युद्ध करने लगे ॥ १८ ॥ उस समय दोनों ओर के वीर युद्ध करते हुए एक- दूसरे से कह रहे थे — ‘लो, मेरे प्रहारको सहन करो, मारो, डरो मत, अगर मर जाओगे तो स्वर्ग प्राप्त करोगे । ‘ शस्त्रों तथा बाणों के समाप्त हो जाने पर पुन: सभी सेनानी, पैरों के प्रहार तथा मुट्ठियों से युद्ध करने लगे और दोनों एक-दूसरे को मारने लगे। कोई सैनिक शत्रुसैनिक के पैरों को पकड़कर उसे पटकने लगा ॥ १९-२० ॥ कोई उछलकर दूसरे पर गिरकर उसे चूर-चूर कर दे रहा था। किसी ने दूसरे का सिर काट लिया तो किसी ने युद्ध में शत्रु की बाहें काट लीं। किसी ने दूसरे के पैर तथा जानुओं को काट डाला, तो किसी ने दूसरे के गुल्फों को काट दिया। कुछ दूसरे सैनिक आपस में बाणों की वर्षा करने लगे ॥ २१-२२ ॥

शस्त्रों से आहत कोई वीर रक्त बहाते हुए भी मृत्युपर्यन्त युद्ध करने लगा। सिर कटे हुए धड़ों ने भी युद्ध किया, वे अपने पक्ष के तथा शत्रुपक्ष के वीरों को मार डाल रहे थे। कुछ दूसरे लोग वक्षःस्थल विदीर्ण हो जाने से सहसा गिर पड़ रहे थे और कुछ उस युद्धभूमि में परस्पर के आघात से आहत होकर मृत्यु को प्राप्त कर रहे थे ॥ २३-२४ ॥ कुछ वीर स्वर्ग प्राप्तकर एक अप्सरा की प्राप्ति के लिये युद्ध कर रहे थे । वहाँ पर रक्त की नदी प्रवाहित हो चली, जो वीरों के केशरूपी सेवार से समन्वित थी, खड्गरूपी मत्स्यों से युक्त थी, ढालरूपी बड़े-बड़े कछुओं से युक्त तथा कठिनता से पार होने वाली थी। वह नदी अत्यन्त भयावह थी, उसमें प्रेतरूपी काष्ठ प्रवाहित हो रहे थे और वह चँवररूपी तृणों से समन्वित थी ॥ २५-२६ ॥ वह नदी वीरों के कवचरूपी मगरमच्छों से अत्यन्त शोभा को प्राप्त हो रही थी, युद्धोचित उपकरणरूप मेढकों वाली वह वीरों को आनन्द प्रदान करने वाली और कायरों के डर को अत्यधिक बढ़ाने वाली थी ॥ २७ ॥ अत्यन्त दुःख से पार की जाने वाली वह नदी वीरों के मेदरूपी जल से तथा मांसरूपी कीचड़ से समन्वित थी । उस समय सूर्य के अस्त हो जाने पर कहीं भी कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था ॥ २८ ॥

तदनन्तर हे देवताओ! ‘हम दैत्यसेना के सैनिक हैं, हमें मत मारो, हे असुरो ! हम देवसेना के सैनिक हैं, हमें मत मारो’ इस प्रकार कोलाहल करते हुए दोनों सेना के वीरों में परस्पर युद्ध होने लगा । युद्धभूमि में विद्यमान हिंसक जन्तु, भूत, राक्षस, सियार, पतंग तथा श्येन आदि (मांसाहारी जीव) [सैनिकों के मांस आदि के भोजन से ] तृप्त होकर पार्वतीपुत्र मयूरेश को अनेक आशीर्वाद देने लगे। इस प्रकार से तीन दिन और तीन रात तक लगातार वह भयंकर युद्ध होता रहा ॥ २९–३१ ॥ दोनों सेनाएँ रात्रि के वाद्यों को बजाकर अपनी- अपनी विजय की जयध्वनि करने लगीं। इस प्रकार गन्धासुर ने सेनानी कार्तिकेय के साथ बहुत विस्तार से युद्ध किया। मद्यपान से मतवाले हुए उस गन्धासुर ने शस्त्रों का परित्याग कर बड़े वेग से अपनी मुष्टिका के प्रहार से सहसा उन कार्तिकेय पर आघात किया ॥ ३२-३३ ॥ फलस्वरूप वे कार्तिकेय भूमि पर उसी प्रकार गिर पड़े, जैसे वज्र के प्रहार से पर्वत गिर पड़ता है । तदनन्तर शीघ्र ही चेतना प्राप्तकर कार्तिकेय उसी प्रकार दौड़ पड़े, मानो पंखों से युक्त कोई पर्वत दौड़ रहा हो। उन्होंने अपने बारह हाथों से छह श्रेष्ठ धनुषों द्वारा बाणों के अनेक समूहों को छोड़ते हुए उस महान् असुर गन्ध को बींध डाला ॥ ३४-३५ ॥

कार्तिकेय के द्वारा छोड़े गये उन बाण समूहों को रोककर गन्धासुर ने अत्यन्त वेगपूर्वक उन अनामय कार्तिकेय को अपने बाणों द्वारा आच्छादित कर दिया ॥ ३६ ॥ कार्तिकेय ने भी उन बाणों को रोककर उस गन्धासुर का पैर पकड़कर अकस्मात् घुमा डाला और फिर जमीन पर पटक दिया। दृढ़ आघात लगने के कारण उस गन्धासुर के प्राण निकल गये और उसके सौ टुकड़े हो गये। उस गन्धासुर के मारे जाने पर उसकी सेना व्याकुल होकर दसों दिशाओं की ओर भाग गयी ॥ ३७-३८ ॥ उस समय उसके पीछे जाते हुए षडानन ने उस सेना की निन्दा की । तदनन्तर सेन, क्रोधन तथा शतघ्न नामक असुर युद्ध के लिये आ पहुँचे ॥ ३९ ॥

उस समय उन असुरों ने महान् शब्द किया, जिससे ऐसा प्रतीत हुआ मानो मेघ गर्जना कर रहे हों। वे कार्तिकेय से बोले —अरे दुष्ट! तुमने हमारी बहुत सारी सेना को विनष्ट कर डाला है। अब इस समय हमारे द्वारा मारे जाने पर तुम सूर्यपुत्र यमराज के भवन को जाओ ॥ ४०१/२

तदनन्तर उन तीनों ने एक साथ ही उन कार्तिकेय को अपने बाणों द्वारा उसी प्रकार आच्छादित कर दिया, जैसे बहुत-से बलवान् कुत्ते सिंह को घेर लेते हैं ॥ ४११/२

तब कार्तिकेय ने अपने छहों धनुषों से छोड़े गये बाणों के द्वारा उनको मारा। उन बाणों के प्रहार से वे मूर्च्छित तो हो गये, लेकिन मुहूर्तभर में ही फिर उठ खड़े हुए। तब उन्होंने कार्तिकेय के गले में पाश डाला और वे तीनों उन्हें पशु के समान बाँधकर खींचते हुए ले गये ॥ ४२-४३ ॥ षण्मुख कार्तिकेय को राक्षसों द्वारा ले जाया गया जानकर हिरण्यगर्भ, बलवान् श्यामल तथा रक्तलोचन नामक तीनों देवगण बड़े ही वेग से पीछे-पीछे दौड़े, किंतु सेन, क्रोधन तथा शतघ्न नामक उन तीन असुरों ने अपनी मुट्ठियों के प्रहार से उन देवगणों को मारा, जिससे वे भूमि पर गिर पड़े। तदनन्तर असुर मदनकान्त ने महाबलवान् वीरभद्र को अपने शस्त्र के आघात से मारा, जिस कारण वे महान् मूर्च्छा को प्राप्त हो गये । तदुपरान्त उन्होंने मूर्च्छा का परित्यागकर अपने दण्ड के आघात से उस मदनकान्त को गिरा दिया ॥ ४४-४६ ॥ उस मदनकान्त को मरा हुआ जानकर महाबलशाली असुर वीरराज उन अत्यन्त बलशाली हिरण्यगर्भ आदि तीनों देवगणों को मारने के लिये निकल पड़ा ॥ ४७ ॥

तदनन्तर नन्दिकेश्वर ने रोष करते हुए अपनी सींगों से उस वीरराज पर आघात किया, जिससे वह अपने मुख से रुधिर की धारा बहाते हुए सौ टुकड़ों में विभक्त होकर भूमि पर जा गिरा। उस वीरराज को मरा हुआ देखकर शीघ्र चार श्रेष्ठ असुर नन्दी को मारने के लिये वहाँ आये, उनके नाम थे – शार्दूल, ध्वजासुर, धूर्त तथा महाकाय । वे युद्ध में सभी देवताओं को जीतने का सामर्थ्य रखते थे। उन असुर वीरों ने विविध प्रकार के शस्त्रों से उन बलवान् नन्दिकेश्वर पर प्रहार किया ॥ ४८–५० ॥ जब नन्दीश्वर गिर पड़े तो पुष्पदन्त, भूतराज, विकट तथा चपल नामक युद्धोन्माद वाले चार देवसेनापति वहाँ आये। उन चारों ने बड़े-बड़े पर्वतों को हाथों में उठाकर उन असुर वीरों के ऊपर फेंका, जिससे सभी के मस्तक फूट गये और कुछ असुर चूर-चूर हो गये ॥ ५१-५२ ॥ पर्वतों की चोट से वे सभी रणभूमि में गिर पड़े। शस्त्रों के आघात से पीड़ित कुछ असुर दैत्यराज सिन्धु के समीप जा पहुँचे। उन्होंने अपनी सेना की पराजय  तथा देवताओं की विजय का समाचार उसे बतलाया। विजयी हुई देवसेना अनेक प्रकार के वाद्यों को बजाने लगी। वे सभी देवता ‘हे मयूरेश ! हे मयूरेश ! आपकी जय हो, आपकी सर्वदा विजय हो’ – इस प्रकार कहते हुए हर्षित हो रहे थे और अत्यन्त आनन्दमग्न हो नृत्य कर रहे थे ॥ ५३-५५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘सिन्धुसेना का पराजय- वर्णन’ नामक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११४ ॥

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