November 21, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-123 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ तेईसवाँ अध्याय देव मयूरेश और दैत्य सिन्धुका भीषण संग्राम, मयूरेश का विराट्स्वरूप धारण करना, पुनः लघुस्वरूप में होकर मन्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित परशु द्वारा सिन्धु का वध करना, शिव-पार्वती तथा देवों का उपस्थित होना और मयूरेश स्तोत्र द्वारा स्तुति करना अथः त्रयोविंशत्युत्तरशततमोऽध्यायः सिन्धुवध ब्रह्माजी बोले — दैत्यराज सिन्धु आ गया है, यह समाचार सुनकर वे मयूरेश आनन्दित हो गये और अपने वाहन मयूर पर आरूढ़ होकर शीघ्र ही युद्ध के लिये निकल पड़े। वे अपने हाथों में धारण किये हुए चार आयुधों से सभी दिशाओं-विदिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे। उन्होंने प्रलयकालीन मेघों की गर्जना के समान गर्जना करते हुए आकाश को निनादित कर डाला ॥ १-२ ॥ उन्होंने देखा कि युद्ध करने के निश्चय से दैत्य सिन्धु आगे खड़ा है, वह दैत्य सिन्धु भी इन्हें युद्ध करने के लिये रणभूमि में उपस्थित देखकर बार-बार उसी प्रकार उन्हें देखने लगा, जैसे हाथी सिंह को देखता है, सर्प गरुड़ को देखता है, मधु और कैटभ दैत्यों ने जैसे भगवान् विष्णु को देखा था, त्रिपुरासुर ने जैसे पार्वतीपति भगवान् शंकर को देखा और जैसे शुम्भ तथा निशुम्भ राक्षसों ने महाबलशालिनी जगदम्बा को देखा था । तदनन्तर विविध प्रकार के शस्त्रों से उन दोनों मयूरेश और दैत्य सिन्धु में परस्पर युद्ध हुआ ॥ ३–५ ॥ उस समय उन दोनों की देह रक्त से सनी होने के कारण जपापुष्प के समान लाल रंग की हो गयी। उन दोनों के शस्त्रों के परस्पर आघात से उत्पन्न अग्नि ने पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी को जला डाला ॥ ६ ॥ उस समय सागर, द्वीपों तथा पर्वतों सहित सारी पृथ्वी काँप उठी। तदनन्तर दैत्य सिन्धु ने एक बाण हाथ में लिया और उसे आग्नेयास्त्र मन्त्र से अभिमन्त्रितकर रणांगण में उपस्थित उन देव मयूरेश को जला डालने के लिये छोड़ा। वह अग्निबाण उस देवसेना को जलाते हुए दसों दिशाओं की ओर चला ॥ ७-८ ॥ तदनन्तर तीनों लोकों को कम्पित करते हुए मयूरेश ने अपने पाश नामक आयुध को मेघास्त्र से संयोजितकर दैत्यसेना पर छोड़ा। उस मेघास्त्र ने जलधाराओं की वर्षा करते हुए आग्नेयास्त्र से उत्पन्न अग्नि को शान्त कर डाला। तब अत्यधिक अन्धकार के द्वारा दसों दिशाएँ व्याप्त हो गयीं ॥ ९-१० ॥ उन वेगशाली जलधाराओं ने पर्वतों को चूर-चूर कर डाला, वृक्षों के समूह के समूह टूट पड़े। क्या यह प्रलय हो गया ? इस प्रकार से वह दैत्यराज सिन्धु सोचने लगा । तब दैत्य सिन्धु ने पवनास्त्र का प्रयोग करके उन जलवृष्टि करने वाले मेघों को तितर-बितर कर दिया । उस वायु ने आकाशमण्डल तथा दसों दिशाओं को कम्पित कर डाला ॥ ११-१२ ॥ तदनन्तर देव मयूरेश ने अपने हाथ में धारण किये हुए कमल को पर्वतास्त्र मन्त्र से अभिमन्त्रित किया और उसे उस महान् दैत्य के ऊपर छोड़ दिया ॥ १३ ॥ उस पर्वतास्त्र ने वृक्षों को उखाड़ डाला और दसों दिशाओं तथा आकाश को उद्भासित कर दिया, फिर वह अस्त्र दैत्यसेना के मध्य में गया और उसने बहुत-से पर्वतों को प्रकट कर डाला । उत्पन्न हुए असंख्य बड़े- बड़े पर्वतों ने सारी पृथ्वी को आच्छादित कर डाला। उस समय न कहीं ठहरने के लिये स्थान रह गया था और न कहीं जाने के लिये ही मार्ग बच गया था ॥ १४-१५ ॥ पवनास्त्र को निष्प्रभाव हुआ देखकर और सभी ओर पर्वतों को व्याप्त देखकर दैत्य सिन्धु ने वज्रास्त्र को प्रेरित किया, जिससे असंख्य वज्र निकल पड़े ॥ १६ ॥ उन असंख्य वज्रों ने पर्वतों को चूर-चूर कर डाला । यह देखकर देव मयूरेश ने अपने आयुध अंकुश को वज्रास्त्र मन्त्र से अभिमन्त्रित किया और उन वज्रों पर उसे चला दिया। तब दोनों ओर से वज्रयुद्ध होने लगा। उन वज्रों के टकराने की ध्वनि से पृथ्वी कम्पित हो उठी और पाताल, सभी दिशाएँ तथा आकाश भी प्रकम्पित हो उठा ॥ १७-१८ ॥ उन वज्रों के आघात से उत्पन्न अग्नि ने गिरकर समस्त लोकों को जला डाला। तदनन्तर पारस्परिक युद्ध से विरत हुए वे वज्र अन्तर्धान हो गये ॥ १९ ॥ तदनन्तर उस महादैत्य सिन्धु ने क्रोध करते हुए अपने मन्त्रियों से कहा — इस प्रकार से अस्त्रों के प्रयोग से क्या होने वाला है, मैं सुखपूर्वक क्षणभर में ही पार्वती का दुग्धपान करने में कुशल इस शिव – बालक को भस्म कर डालूँगा। ऐसा कहकर वह दैत्य उन गुणेश्वर को मारने के लिये दौड़ पड़ा ॥ २०-२१ ॥ उस महान् दैत्य को आता हुआ देखकर मयूरेश ने विराट् रूप धारण कर लिया और अपने ऊँचे उठे सिर से आकाश को भेद डाला, अपने चरणों से पाताल को आक्रान्त कर लिया और अपने कानों से दिशाओं तथा दिशाओं के अन्तराल को व्याप्त कर दिया । हजार पैरों वाले, हजार नेत्रों- वाले तथा हजार सिरों वाले उन मयूरेश्वर को पृथिवी से लेकर आकाशपर्यन्त [ प्रदेश को] व्याप्त करके स्थित हुआ देखकर सिन्धुदैत्य मूर्च्छित हो गया और भूमि पर गिर पड़ा ॥ २२-२३ ॥ अपने एक ही हाथ से सम्पूर्ण आकाश को आच्छादित किये हुए उन सुरेश्वर मयूरेश को देखकर दैत्य सिन्धु ने सावधानमन होकर भगवान् सूर्य द्वारा प्रदत्त वरदान का किंचित् स्मरण किया ॥ २४ ॥ सिन्धु बोला — पूर्वकाल में महान् तेजस्वी सूर्य ने वरदान देते समय मुझसे कहा था — हे असुर ! बहुत समय बीतने के अनन्तर जो कोई भी अपने एक ही हाथ के द्वारा आकाश को आच्छादित कर लेगा, वह तुम्हें निश्चित ही उसी समय मुक्तिपद को प्राप्त करायेगा । अतः अब अधिक युद्ध करने से क्या लाभ! जो होने वाला है, वह अवश्य ही होकर रहेगा ॥ २५-२६ ॥ पुनः जब दैत्य सिन्धु ने उन मयूरेश को देखा तो वे विराट् रूप छोड़कर छोटे-से शरीर वाले हो गये। छह भुजाओं वाले उन मयूरेश को देखकर वह दैत्य सिन्धु अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गया ॥ २७ ॥ तदनन्तर वे देवेश मयूरेश अपने वाहन मोर से उतरे । उन्होंने शुद्ध जल से आचमन किया और वे श्रेष्ठ मन्त्र का जप करने लगे। पार्वतीपुत्र उन मयूरेश ने दिग्दिगन्तर तक व्याप्त तेज वाले अपने आयुध परशु को अभिमन्त्रित किया और शत्रु सिन्धुदैत्य की अमृतमन्त्र से संयोजित नाभि को लक्ष्य बनाकर ज्वालामालाओं से उद्दीप्त उस परशु को छोड़ दिया। उस समय क्रोध से उनकी आँखें रक्तवर्ण की हो गयी थीं। वह परशु इस प्रकार से चला, मानो ब्रह्माण्ड को ही फोड़ डाल रहा हो ॥ २८-३० ॥ देव मयूरेश द्वारा छोड़ा गया वह अभिमन्त्रित परशु दिशाओं तथा विदिशाओं को निनादित करते हुए और पर्वत, वनों तथा खानों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी को अपने तेज से प्रकाशित करते हुए गया ॥ ३१ ॥ दैत्यराज सिन्धु ने साक्षात् काल के समान उस परशु को अपनी ओर आता हुआ देखकर शीघ्र ही अपने भयंकर धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ायी और ज्यों ही वह धनुष पर बाण का संधान करने को उद्यत हुआ, उससे पहले ही उस परशु ने शीघ्रतापूर्वक अमृत से अभिसिंचित उसकी नाभि को भेद डाला ॥ ३२१/२ ॥ नाभि से अमृत के निकल जाने से वह दैत्य एकाएक भूमि पर उसी प्रकार गिर पड़ा, मानो आँधी के द्वारा कोई वृक्ष गिराया गया हो और जैसे वज्र के प्रहार से पर्वत गिर पड़ा हो। उस दैत्य सिन्धु ने अपना मुख फैलाकर रक्त वमन करते हुए अपने प्राणों को छोड़ दिया ॥ ३३-३४ ॥ देव मयूरेश की कृपा से उस दैत्यराज सिन्धु ने अत्यन्त दुर्लभ मुक्तिपद को प्राप्त किया। सभी लोगों के देखते-देखते उनके सामने ही यह अद्भुत घटना हुई थी ॥ ३५ ॥ युद्ध देखने के लिये देवताओं के जो विमान आकाश में स्थित थे, वे नीचे उतर आये । पुष्पों की वर्षा होने लगी, मेघ मन्द मन्द गर्जना करने लगे ॥ ३६ ॥ भूमि से उठने वाली धूल शान्त हो गयी, सुख देने वाली वायु प्रवाहित होने लगी। सभी दिशाएँ प्रसन्न हो उठीं, गन्धर्व मधुर गीतों का गान करने लगे ॥ ३७ ॥ अप्सराओं के समूह-के-समूह नृत्य करने लगे और मुनिगण, देवता तथा कार्तिकेय आदि देवगण अत्यन्त प्रसन्नता के साथ देव मयूरेश की स्तुति करने लगे ॥ ३८ ॥ ॥ देवा कृत मयूरेश स्तुति ॥ ॥ सर्वे ऊचुः ॥ परब्रह्मरूपं चिदानन्दरूपं सदानन्दरूपं सुरेशं परेशम् । गुणाब्धि गुणेशं गुणातीतमीशं मयूरेशमाद्यं नताः स्मो नताः स्मः ॥ ३९ ॥ जगद्वन्द्यमेकं परोङ्कारमेकं गुणानां परं कारणं निर्विकल्पम् । जगत्पालकं हारकं तारकं तं मयूरेशमाद्यं नताः स्मो नताः स्मः ॥ ४० ॥ महादेवसूनुं महादैत्यनाशं महापूरुषं सर्वदा विघ्ननाशम् । सदा भक्तपोषं परं ज्ञानकोशं मयूरेशमाद्यं नताः स्मो नताः स्मः ॥ ४१ ॥ अनादिं गुणादिं सुरादिं शिवाया महातोषदं सर्वदा सर्ववन्द्यम् । सुरार्यन्न्तकं भुक्तिमुक्तिप्रदं तं मयूरेशमाद्यं नताः स्मो नताः स्मः ॥ ४२ ॥ परं मायिनं मायिनामप्यगम्यं मुनिध्येयमाकाशकल्पं जनेशम् । असङ्ख्यावतारं निजाज्ञाननाशं मयूरेशमाद्यं नताः स्मो नताः स्मः ॥ ४३ ॥ अनेकक्रियाकारणं श्रुत्यगम्यं त्रयीबोधितानेककर्मादिबीजम् । क्रिया सिद्धिहेतुं सुरेन्द्रादिसेव्यं मयूरेशमाद्यं नताः स्मो नताः स्मः ॥ ४४ ॥ महाकालरूपं निमेषादिरूपं कलाकल्परूपं सदागम्यरूपम् । जनज्ञानहेतुं नृणां सिद्धिदं तं मयूरेशमाद्यं नताः स्मो नताः स्मः ॥ ४५ ॥ महेशादिदेवैः सदा सेव्यपादं सदा रक्षकं योगिनां चित्स्वरूपम् । सदाकामरूपं कृपाम्भोनिधिं तं मयूरेशमाद्यं नताः स्मो नताः स्मः ॥ ४६ ॥ सदा भक्तानां त्वं प्रसभपरमानन्दसुखदो यतस्त्वं लोकानां परमकरुणामाशु तनुषे । षडूर्मीणां वेगं सुरवर सदा नाशय विभो ततो मुक्तिः श्लाघ्या तव भजनतोऽनन्तसुखदात् ॥ ४७ ॥ किमस्माभिः स्तोत्रं गजवदन ते शक्यमतुलं विधातुं वा रम्यं गुणनिधिरसि प्रेम जगताम् । न चास्माकं शक्तिस्तव गुणगणं वर्णितुमहो त्वदीयोऽयं वारां निधिरिव जगत् सर्जनविधिः ॥ ४८ ॥ सभी बोले — जो परब्रह्मस्वरूप, चिदानन्दमय, सदानन्दरूप, देवेश्वर, परमेश्वर, गुणों के सागर, गुणों के स्वामी तथा गुणों से अतीत हैं, उन आदि ईश्वर मयूरेश्वर को हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ३९ ॥ जो एकमात्र विश्ववन्द्य और एकमात्र परम ओंकारस्वरूप हैं, जो गुणों के परम कारण एवं निर्विकल्प हैं, उन जगत् के पालक, संहारक एवं उद्धारक आदि- मयूरेश्वर को हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं। जो महादेवजी के पुत्र, महान् दैत्यों के नाशक, महापुरुष, सदा विघ्नविनाशक तथा सदैव भक्तों के पोषक हैं, उन परम ज्ञान के कोष आदिमयूरेश्वर को हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४०-४१ ॥ जिनका कोई आदि नहीं है, जो समस्त गुणों के आदिकारण तथा देवताओं के भी आदि-उद्भावक हैं, पार्वतीदेवी को महान् सन्तोष देने वाले तथा सबके द्वारा सदा ही वन्दनीय हैं, उन दैत्यनाशक एवं भोग तथा मोक्ष के प्रदाता आदिमयूरेश्वर को हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४२ ॥ जो परम मायावी (माया के अधिपति) और मायावियों के लिये भी अगम्य हैं, महर्षिगण जिनका सदा ध्यान करते हैं, जो अनादि आकाश के तुल्य सर्वव्यापक हैं, जीवमात्र के स्वामी हैं तथा जिनके असंख्य अवतार हैं, उन आत्मतत्त्वविषयक अज्ञान के नाशक आदिमयूरेश्वर को हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४३ ॥ जो अनेकानेक क्रियाओं के कारण हैं, जिनका स्वरूप श्रुतियों के लिये भी अगम्य है, जो वेदबोधित अनेकानेक कर्मों के आदिबीज हैं, समस्त कार्यों की सिद्धि के हेतु हैं तथा देवेन्द्र आदि जिनकी सदा सेवा करते हैं, उन आदिमयूरेश्वर को हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४४ ॥ जो महाकालस्वरूप हैं, लव-निमेष आदि भी जिनके ही स्वरूप हैं, जो कला और कल्परूप हैं तथा जिनका स्वरूप सदा ही अगम्य है, जो लोगों के ज्ञान के हेतु तथा मनुष्यों को सब प्रकार की सिद्धि प्रदान करने वाले हैं, उन आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं। महेश्वर आदि देवता सदा जिनके चरणों की सेवा करते हैं, जो योगियों के नित्य रक्षक, चित्स्वरूप, निरन्तर इच्छानुसार रूप धारण करने वाले और करुणा के सागर हैं, उन आदिमयूरेश्वर को हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४५-४६ ॥ हे सुरश्रेष्ठ! आप सदा भक्तजनों के लिये हठात् परमानन्दमय सुख देने वाले हैं; क्योंकि आप संसार के जीवों पर शीघ्र परम करुणा का विस्तार करते हैं । हे प्रभो ! काम-क्रोधादि छः प्रकार की ऊर्मियों के वेग को शान्त कीजिये; क्योंकि आपके अनन्त सुखदायक भजन की अपेक्षा मुक्ति भी स्पृहणीय नहीं है। हे गजानन ! क्या हम आपके योग्य कोई उत्तम या सुन्दर स्तवन कर सकते हैं ? आप समस्त गुणों की निधि और सम्पूर्ण जगत् के प्रेमपात्र हैं। आपके गुणसमूहों का वर्णन करने की शक्ति हममें नहीं है। आपका जो यह जगत् की सृष्टि रचना का क्रम है, वह समुद्र के समान अपार है ॥ ४७-४८ ॥ ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार स्तुति करने के अनन्तर /वे सभी बड़े ही आदरपूर्वक उनसे निवेदन करने लगे — हे मयूरेश ! जो आपने कहा था, उस महान् वचन का आपने पालन किया । सभी देवसमूहों के लिये यह महादैत्य सिन्धु अवध्य था, उसे आज आपने मार गिराया है ॥ ४९१/२ ॥ उसी समय वहाँ पार्वती आयीं और वे बड़ी आनन्दित हुईं, उन्होंने उन मयूरेश का आलिंगन किया। भगवान् शिव भी वहाँ आये और उन्होंने मयूरेश का आलिंगनकर उनसे कहा — हे वत्स! तुमने बहुत अच्छा कर्म किया है, अब सम्पूर्ण त्रिलोकी हर्षित हो गयी है ॥ ५०-५१ ॥ सभी देवताओंके लिये भी जो असाध्य था, उस दैत्य सिन्धु का तुमने वध किया है, फिर भी तुम्हें कोई श्रम मालूम नहीं हुआ, तुम महापराक्रमशाली हो, सभी लोगों की रक्षा में निरत रहते हो, चारों वेद भी तुम्हारे यथार्थ स्वरूप का निरूपण कर पाने में असमर्थ हैं और तुम सभी विद्याओं के निधान हो ॥ ५२१/२ ॥ इस प्रकार से कहने के अनन्तर वे सभी सम्मानित होकर अपने स्थानों को चले गये। मयूरेश को प्रणाम करने के अनन्तर जब वे सभी देवता जाने लगे तो देव मयूरेश उनसे बोले — ॥ ५३१/२ ॥ जो इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है ॥ ५४ ॥ इस स्तोत्र का एक हजार बार पाठ करने से कारागृह में बन्द बन्दीजन को वहाँ से मुक्ति प्राप्त होती है। इस स्तोत्र का दस हजार बार पाठ करने से मनुष्य जो असाध्य भी है, उसे तत्क्षण ही सिद्ध कर लेता है। उसे सर्वत्र विजय प्राप्त होती है। वह अत्यन्त दुर्लभ ऐश्वर्य को प्राप्त करता है, पुत्रवान् होता है, धन-सम्पत्ति प्राप्त करता है और सबको अपने वशमें कर लेता है ॥ ५५-५६ ॥ ब्रह्माजी बोले — मयूरेश के द्वारा ऐसा कहे जाने पर देवगणों ने उनके कथन का ‘साधु-साधु’ ऐसा कहकर समर्थन किया और मयूरेश से जाने की आज्ञा प्राप्त करके वे देवता चले गये और देव मयूरेश ने भी अपने गणों के सहित अपने धाम को प्रस्थान किया ॥ ५७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘सिन्धु के वध का वर्णन’ नामक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२३ ॥ Content is available only for 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