श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-013
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
तेरहवाँ अध्याय
दूतों का अपने राजा नरान्तक से बालक विनायक के पराक्रम का वर्णन करना, काशिराजसहित बालक विनायक का काशीनगरी में प्रवेश, काशिवासियों को विविध रूपों में विनायक का दर्शन, बालक विनायक के वध की दृष्टि से वहाँ आये विघण्ट तथा दन्तुर आदि अनेक राक्षसों का वध, काशिराज द्वारा विनायक का पूजन तथा सत्कार
अथः त्रयोदशोऽध्यायः
बालचरितं

दूत बोले — [हे स्वामिन्!] आपकी आज्ञा प्राप्त करके हम लोग रथ में स्थित उस विनायक के समीप गये। हम सभी को वह यमराज के समान दिखायी दिया ॥ १ ॥ हे स्वामिन्! हे अनघ! उसके भय से सभी निशाचर मृत्यु को प्राप्त हो गये, आपकी कृपा से हम जीवित रह गये और आपके पास आये हैं ॥ २ ॥ जैसे सिंहों के समूह से हाथियों की रक्षा होती है, वैसे ही ईश्वर की ही कृपा से हम लोग जीवित बच गये। तीनों लोकों में ऐसा कोई पुरुष नहीं है, जो उस बालक के साथ युद्ध कर सके ॥ ३ ॥

ब्रह्माजी बोले — दूतों का यह वचन सुनकर नरान्तक बोला — ‘तुम लोग मूर्खतावश क्या बोल रहे हो, कहाँ वह बालक और कहाँ मैं नरान्तक ! प्रलयकालीन अग्नि के सम्मुख एक पतिंगा क्या कर सकता है ? क्या चूहे के खोदने से मेरुपर्वत गिर सकता है ? ‘ ॥ ४-५ ॥

तदनन्तर नरान्तक ने अपने दूतों को आज्ञा देते हुए कहा कि काशिराज की नगरी को लूट डालो और वहाँ कुछ ऐसा करो, जिससे कि वह राजा उद्विग्न हो उठे । उसके व्याकुल हो जाने पर वह कश्यप का पुत्र भी व्यग्र हो उठेगा अथवा सभी प्रकार के प्रयत्नों के द्वारा उन दोनों का वध कर डालना ॥ ६-७ ॥

इसके पश्चात् नरान्तक ने अपने उन निशाचर दूतों को अत्यन्त मूल्यवान् अनेकों रत्न, विशिष्ट वस्त्र तथा विविध अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये। तब वे सभी निशाचर नरान्तक को प्रणाम करके काशीपुरी को चल पड़े। अपनी सेना के द्वारा दिशा-विदिशाओं को व्याप्त करके वे परस्पर वार्तालाप भी कर रहे थे ॥ ८-९ ॥ उनका जो महान् सेनापति था, वह निशाचरों को यह आदेश दे रहा था कि हे दैत्यो! जिसे भी वह बालक दिखायी पड़े, वह उसे मार डाले ॥ १० ॥ अगर ऐसा नहीं होगा तो वह मेरे लिये दण्डनीय होगा, उसके लिये मैं ही प्राणों को विनष्ट करने वाला बन जाऊँगा। इस प्रकार का आदेश प्राप्त करने वाले वे दैत्य दसों दिशाओं में फैल गये ॥ ११ ॥

रथ में बैठे हुए उस काशिनरेश के साथ वह विनायक काशीपुरी में गया। वह काशीनगरी नाना प्रकार के ध्वज तथा पताकाओं और अल्पनाओं से सजी हुई थी ॥ १२ ॥ तदनन्तर मन्त्रीगण तथा काशीनगरी के नागरिकजन विविध वाद्यों एवं दुन्दुभियों की ध्वनि करते हुए और अनेक प्रकार के पूजा के उपचारों को लेकर बालक विनायक के समीपमें गये। उन सभी ने सोलह उपचारों के द्वारा बड़े श्रद्धा-भक्तिपूर्वक विनायक का पूजन किया और राजा का भी पूजन किया, तदनन्तर वे सभी नगरी के अन्दर प्रविष्ट हुए ॥ १३-१४ ॥

बालक विनायक के नगरी में प्रवेश करते ही उनको देखने की इच्छुक नगर की सभी स्त्रियाँ भवनों के ऊपर चढ़ गयीं; कोई उनके दर्शन के लिये आभूषणों तथा वस्त्रों की अस्त-व्यस्त स्थिति में घर से बाहर निकल पड़ीं। कुछ स्त्रियाँ पिता, भाई, पति, माता तथा सखियों की अवहेलनाकर तथा कोई भोजनपात्र का भोजन छोड़कर तथा कोई भोजन करते हुए पति को छोड़कर बाहर चली आयीं ॥ १५-१६ ॥ एक स्त्री को जब कुटुम्बीजनों ने बाहर जाने से रोक दिया तो उसने आँखें बन्दकर वहीं भगवान् विनायक का भक्तिपूर्वक ध्यान करते हुए अपने प्राणों का परित्याग कर दिया, यह अद्भुत घटना हुई ! ॥ १७ ॥

कुमारी कन्याओं ने बालक विनायक के ऊपर लाजा तथा पुष्पों की वर्षा की। विमान पर आरूढ़ होकर देवता उस महोत्सव को देख रहे थे ॥ १८ ॥ ब्राह्मणों ने उन विनायक को परब्रह्म परमात्मा के रूप में देखा । क्षत्रियों ने उन्हें युद्ध के लिये उद्यत एक महान् पराक्रमी वीर योद्धा के रूप में देखा। सभी वैश्यों को वे संहार करने वाले रुद्र के रूप में दिखायी दिये। शूद्रों ने उन्हें भगवान् विष्णु के रूप में तथा राजा के रूप में देखा ॥ १९-२० ॥ जिस-जिस व्यक्ति की जैसी भावना थी, उसने उन्हें उसी रूप में उसी प्रकार देखा, जैसे कि लाल, श्वेत तथा पीत वस्त्रादि पर रखा श्वेत वर्ण का स्फटिक वैसा ही लाल, श्वेत तथा पीत रंग का दिखायी देता है। एक ही पुरुष जैसे किसी का पिता होता है, किसी का भाई होता है तथा किसी का साला होता है, उसी प्रकार सभी ने विनायक को अपनी भावना के अनुसार देखा ॥ २११/२

तदनन्तर बालक विनायक ने उस पुरी के अन्दर स्थित उन दोनों विघण्ट तथा दन्तुर नामक महान् असुरों को देखा और उन्हें बालक्रीड़ा करने के लिये आदरपूर्वक बुलाया। उन दोनों दैत्यों का मनोभाव अत्यन्त दूषित था, वे बालकों के साथ (बालक बनकर आये थे ॥ २२-२३ ॥ वे दोनों बालकवेशधारी दैत्य जब बालक विनायक का आलिंगन करने का प्रयत्न करने लगे तो विनायक ने उन दोनों का दुष्ट मनोभाव जान लिया। फिर तो उन्होंने उन दोनों का आलिंगनकर उन्हें मसलकर वैसे ही चूर-चूर कर दिया, जैसे हाथ में स्थित फूल चूर-चूर कर दिया जाता है। तदनन्तर उन्होंने उन्हें भूमि पर छोड़ दिया, उन राक्षसों ने दस योजन तक की भूमि को ढक लिया । काशिराज तथा अन्य लोग भी यह दृश्य देखकर दंग रह गये ॥ २४-२५ ॥ आकाश में स्थित देवताओं ने उस बालक पर पुष्पों की वर्षा की। कुछ लोग ‘साधु-साधु, जय हो जय हो’ आदि ध्वनि करने लगे ॥ २६ ॥

मुनियों तथा देवताओं ने अपनी माया से मनुष्यरूप धारणकर बाललीला प्रदर्शित करने वाले उन विनायक की स्तुति की। वे कहने लगे, जो दोनों असुर इन्द्र आदि देवताओं के लिये भी अजेय थे, उन दोनों को इन बालक विनायक ने चूर्ण-चूर्ण कर डाला ॥ २७१/२

असुरों का वध करने के अनन्तर गलियों को पार करता हुआ काशिराज का रथ आगे-आगे बढ़ने लगा ॥ २८ ॥ इसके पश्चात् पतंग तथा विधुल नामक दो महान् बलशाली दुष्ट दैत्य वेगशाली आँधी के रूप में बालक विनायक को मार डालने की इच्छा से रथ के समीप में आये । उस धूलभरी आँधी से भूमि के ढक दिये जाने के कारण सभी लोग अत्यन्त व्याकुल हो उठे। बड़े-बड़े भवन तथा वृक्षों के समूह टूटकर जमीन पर गिर पड़े ॥ २९-३० ॥ लोगों के उत्तरीय वस्त्रों के आकाश में उड़ा दिये जाने से वे वस्त्र आकाश में स्थित पक्षियों के भाँति दिखायी दे रहे थे। किसी-किसी के सिर से पगड़ी उड़-उड़कर दसों दिशाओं में गिर रही थी ॥ ३१ ॥ उस समय महान् कोलाहल व्याप्त हो गया। कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था । प्रचण्ड आँधी से काशिराज का रथ भी जब आकाश में उड़ने जैसा हो उठा तो बालक विनायक ने उसे स्तम्भित कर भूमि पर ही रोक दिया। उस वात्याचक्र ( बवंडर) – के कारण शक्तिहीन- से हुए लोग वैसे ही भूतल पर गिरने लगे, जैसे सद्योजात शिशु गिर पड़ता है ॥ ३२१/२

तदनन्तर उन राक्षसों को अत्यन्त बलवान् जानकर बालक विनायक ने अपनी एक ही मुट्ठी से दोनों की शिखाओं के बालों को पकड़कर बलपूर्वक उन्हें आकाश में देर तक घुमाया और फिर जमीन पर पटक दिया, तब लोगों ने देखा कि उन दोनों के प्राण निकल गये हैं । तब वहाँ उपस्थित लोग आपस में यह कहने लगे कि कश्यपजी का यह पुत्र निश्चित ही कोई बलशाली देवता है; क्योंकि इसने योजनभर विस्तार वाले इन दोनों असुरों को मार गिराया है ॥ ३३-३५ ॥ इतनी छोटी-सी अवस्था में इतना पराक्रम किसी में भी नहीं देखा जाता है। उनका वह महान् सामर्थ्य देखकर काशिराज ने भी प्रसन्नता व्यक्त की ॥ ३६ ॥

उन्होंने अपने रथ से उतरकर उन विनायक को प्रणाम किया और वे बोले — हे महायोगिन् ! बालक होने पर भी आपके कृत्यों के रहस्य को ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जान सकते हैं, तो चर्म चक्षुवाले हम मनुष्यों को आपकी महिमा का ज्ञान कहाँ से हो सकता ? आप इस जगत् की सृष्टि करने वाले हैं और इस जगत् के पालन एवं उसकी रक्षा के लिये आप अनेक रूप धारण करते हैं। हे स्वामिन्! हे विभो! आपके अवतारों की कोई गणना नहीं है ॥ ३७–३९१/२

तदनन्तर रथ काशिराज के भवन के लिये आगे चल पड़ा। तभी बालक विनायक ने अपने समक्ष एक पाषाणरूपधारी [कूट नामक] दैत्य को देखा। उन्होंने अपने अस्त्र परशु से उस पर आघात किया, जिससे वह पाषाणरूप दैत्य सौ टुकड़ों में विभक्त हो गया ॥ ४० ॥ उसमें से एक भयंकर महान् असुर प्रकट हुआ, जो चमकते हुए दाँतों और दाढ़ोंवाला तथा दाढ़ी से युक्त था, वह विशाल काया वाला पुरुष पिंगल वर्ण का था ॥ ४१ ॥ उसे देखकर सभी बालक तथा अन्य लोग भी भाग चले । बालक विनायक ने अपनी मुट्ठी के आघात से उसे भी मार डाला और तब वह भूमिपर गिर पड़ा ॥ ४२ ॥

तब लोगों ने उस बालक को भगवान्‌ का साकार रूप माना । अत्यन्त प्रसन्नचित्त काशिराज ने उस बालक विनायक को अपने रथ से नीचे उतारा और शीघ्रतापूर्वक स्वयं उसे लेकर अपने भवन के अन्दर प्रवेश कराया, वहाँ उन्होंने स्वर्ण से निर्मित रत्नजटित अपने सिंहासन पर उन्हें बिठाया। यथाविधि सोलह उपचारों, अत्यन्त मूल्यवान् वस्त्रों, आभूषणों तथा दिव्य सुगन्धित द्रव्यों द्वारा उनकी पूजा की ॥ ४३–४५ ॥ राजा अत्यन्त आनन्द में निमग्न हो गये। उन्होंने उनकी स्तुति की और उन्हें प्रणाम किया । तदनन्तर उन्होंने अपने मित्रगणों के साथ मधुरादि छहों रसों से युक्त भोज्य पदार्थों तथा व्यंजनों से समन्वित नाना प्रकार के पक्वान्नों और विविध प्रकार की खीर का उन्हें भोजन कराया। इसके अनन्तर शीघ्र ही राजा ने बहुत प्रकार के फल उन्हें समर्पित किये एवं अष्टांग प्रणाम किया और रत्नमय सुवर्णपात्र में ताम्बूल प्रदान किया। इसके पश्चात् बालकों के मध्य में बैठे हुए राजा ने भी शीघ्र भोजन किया ॥ ४६–४८ ॥

तदनन्तर काशिराज ने सन्ध्योपासना कर चुके उन बालक विनायक को दीपों तथा चँदोवा से सुशोभित और मन को अच्छे लगने वाले पलंग पर सुलाया ॥ ४९ ॥ राजा ने उस पलंग के पास बालक की रक्षा करने के लिये जागरण करने वाले चार अत्यन्त विश्वसनीय पुरुषों को नियुक्त किया और स्वयं भी उन्होंने बालक विनायक की अनुमति प्राप्तकर अपनी भार्या के साथ शयन किया ॥ ५० ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में बालचरित के अन्तर्गत ‘विनायक द्वारा किये गये विघण्ट आदि दैत्यों के वध का वर्णन’ नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥

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