November 29, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-140 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ चालीसवाँ अध्याय गणेशगीता – ज्ञानयोग अथः चत्वारिंशादधिकशततमोऽध्यायः गणेशगीता – ब्रह्मार्पणयोगोनाम तृतीयोऽध्यायः श्रीगणेशजी बोले — पूर्वकाल में, सृष्टिरचना के अवसर पर [ब्रह्म-विष्णु-रुद्रात्मक] तीन स्वरूपों वाले मुझ गणपति ने [ब्रह्मरूप से] त्रिगुणात्मक जगत्प्रपंच का निर्माण करने के अनन्तर [जगत् पालक] विष्णु को इस उत्तम योग का उपदेश किया था ॥ १ ॥ विष्णु ने यही योग सूर्य से कहा । सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा । इसके उपरान्त परम्परा से प्राप्त हुए इस योग को महर्षिगण जान पाये ॥ २ ॥ हे राजन्! कलियुग में यह बहुत काल बीत जाने के बाद विलुप्त हो गया । [ उस समय उन कलियुगीन मनुष्यों के द्वारा] इसे श्रद्धा-विश्वास के अयोग्य तथा निन्दनीय समझा गया। अब फिर तुमने मेरे मुख से इस पुरातन योग को सुना है, यह गुप्त-से-गुप्त, अत्यन्त कल्याणकारक और सम्पूर्ण वेदों का सार है ॥ ३-४ ॥ राजा वरेण्य बोले — हे गजानन ! आप तो इस समय गर्भ से उत्पन्न हुए हैं, फिर आपने विष्णु से यह उत्तम योग किस प्रकार से [और कब] वर्णन किया था ? ॥ ५ ॥ गणेशजी बोले — [हे राजन् ! ] मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत चुके हैं, मैं उन सबको जानता हूँ, परंतु तुम नहीं जानते। हे महाबाहो ! मुझसे ही विष्णु आदि देवता उत्पन्न हुए हैं और युग-युग में प्रलय के समय मुझमें ही लय हो जाते हैं ॥ ६-७ ॥ मैं ही विष्णु तथा ब्रह्मा हूँ, मैं ही महारुद्र हूँ, मैं ही स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण जगत् हूँ ॥ ८ ॥ मैं अजन्मा, अविनाशी तथा सभी जीवों का आत्मा अनादि ईश्वर हूँ और त्रिगुणात्मक माया में स्थित होकर मैं ही अनेक अवतार धारण करता हूँ ॥ ९ ॥ जिस समय अधर्म की वृद्धि और धर्म की हानि होती है, उस समय साधुओं की रक्षा और दुष्टों को मारने के लिये मैं अवतार लेता हूँ। मैं अधर्म के समूह को नष्टकर धर्म का संस्थापन करता हूँ और प्रसन्नतापूर्वक अनेक प्रकार की लीला करता हुआ दुष्टों तथा [धर्महन्ता] दैत्यों का वध करता हूँ ॥ १०-११ ॥ अनेक रूप धारणकर मैं वर्ण, आश्रम, मुनि और साधुओं का पालन करता हूँ, इस प्रकार से जो युग-युग में मेरी दिव्य विभूति को, मेरे उस समय के कर्म, वीर्य और रूप को जानता है तथा अहंकार और ममता बुद्धि का त्याग कर देता है, वह मुक्त हो जाता है ॥ १२-१३ ॥ इच्छारहित, निर्भय, क्रोधहीन, मुझमें ही आश्रित, मेरी ही उपासना करने वाले अनेक जन विज्ञान और तपस्या से शुद्ध होकर मुझको प्राप्त हो गये हैं ॥ १४ ॥ श्रेष्ठजन जिस-जिस भाव से मेरा सेवन करते हैं, मैं अविनश्वर परमात्मा उनको वैसा फल निश्चय ही देता हूँ। हे राजन्! जिस प्रकार से दूसरे लोग भी मेरे अनुयायी हो जायँ, इसी प्रकार का व्यवहार वे (मेरे भक्तजन) अपने तथा दूसरे मनुष्यों में करते हैं ॥ १५-१६ ॥ इस संसार में जो लोग कर्मों के फल प्राप्त होने की इच्छा से देवोपासना करते हैं, उन-उन कर्मों के अनुसार उनको शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होती है । हे पापरहित ! मृत्युलोक में मैंने चारों वर्णों को सत्त्व, रज, तम – इन गुणों से और कर्मों के अंश से उत्पन्न किया है ॥ १७-१८ ॥ यद्यपि मैं इनका कर्ता हूँ, परंतु पण्डितजन मुझे अकर्ता जानते हैं। वे मुझे अनादि, ईश्वर, नित्य और कर्मों के गुणों से अलिप्त मानते हैं । जो मुझे इच्छारहित जानता है, उसको कर्मबन्धन नहीं होता। ऐसा जानकर पूर्व में पुरातन महर्षिजन कर्म करते थे ॥ १९-२० ॥ वासना, जो कि संसार का मूल और दृढ़ कारण है, और वही अज्ञान का बन्धन है, इसे जानकर प्राणी सभी बन्धनों से मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥ क्या कर्म और क्या अकर्म है, यह मैं अब तुमसे कहता हूँ। इसके जानने में बुद्धिमान् ऋषिगण भी मोह को प्राप्त होकर मौन रह गये हैं ॥ २२ ॥ हे प्रिय! कर्म, अकर्म और विकर्म का तत्त्व मुक्ति की इच्छा करने वालों को जानना आवश्यक है, वे तीनों ही कर्म हैं। इनकी गति जानना महाकठिन है ॥ २३ ॥ क्रिया में अक्रिया का ज्ञान और अक्रिया में क्रिया की बुद्धि जिसकी होती है, वही इस लोक में सभी कर्मों का करने वाला होकर भी मुक्त हो जाता है ॥ २४ ॥ तत्त्वज्ञानरूप अग्नि में जो अपनी क्रियाशक्ति को दग्ध कर चुका है तथा कर्मांकुरभूत संकल्प का त्याग करके कर्मानुष्ठान में प्रवृत्त होता है, ऐसे व्यक्ति को ही पण्डितजन ‘बुध’ कहते हैं ॥ २५ ॥ जो फल की इच्छा को छोड़कर साधनहीन होकर भी सदा तृप्त रहते हैं। यदि वे कर्म करने में लगे हों तो भी वे कुछ नहीं करते हैं ॥ २६ ॥ जो इच्छारहित, आत्मजित् एवं सम्पूर्ण परिग्रह का परित्याग किये हैं, ऐसे प्राणी यदि घर में रहकर कर्म भी करें तो उन्हें कुछ पातक नहीं लगता। जो द्वन्द्व और ईर्ष्या से हीन होकर सिद्धि-असिद्धि में समान दृष्टि रखते हुए जो कुछ प्राप्ति हो, उसी में सन्तुष्ट रहते हैं, ऐसे प्राणी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होते ॥ २७-२८ ॥ सम्पूर्ण विषयों से मुक्त और ज्ञान-विज्ञानयुक्त प्राणी के सारे कर्म यज्ञ ही हैं। ऐसे व्यक्ति की सारी क्रियाएँ विलीन हो जाती हैं। अग्नि, होम का द्रव्य, हवन करने वाला और जो आहुति मुझे अर्पण की जाती है, वह सब मैं ही हूँ । ऐसा समझकर वह ब्रह्म को ही प्राप्त होता है; क्योंकि वह ब्रह्म में ही स्थित है ॥ २९-३० ॥ कोई योगी देवयजन को यज्ञ कहते हैं, दूसरे ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ करने को यज्ञ मानते हैं ॥ ३१ ॥ हे राजन्! कोई योगी संयमरूप अग्नि में श्रोत्रादि इन्द्रियों का हवन करते हैं, कोई इन्द्रियरूपी अग्नि में शब्दादि विषयों की आहुति देते हैं ॥ ३२ ॥ कोई दूसरे ज्ञान में जलती हुई वैराग्यरूपी अग्नि में सम्पूर्ण इन्द्रिय, कर्म और प्राणों का हवन करते हैं ॥ ३३ ॥ कोई द्रव्ययज्ञ का अनुष्ठान कर, कोई तपस्या से, कोई स्वाध्याय से, कोई महात्मा तीव्र व्रत से और कोई ज्ञान से मेरा यजन करते हैं। जो पूरक से प्राणवायु में अपान को और रेचक से प्राण का अपान में हवन करते हैं और कुम्भक के अनुष्ठान से प्राणापान की गति को रोक लेते हैं, वे प्राणायाम में परायण होते हैं ॥ ३४-३५ ॥ दूसरे नियताहार होकर पाँचों प्राणों में पाँचों प्राणों की आहुति देते हैं, इस प्रकार से अनेकविध यज्ञों में निरत योगी यज्ञ द्वारा पापों का नाश करते हैं। अन्य दूसरे नित्य ही यज्ञ से बचे अमृत पदार्थ का भोजनकर नित्य ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करने वालों को तो यह लोक भी नहीं मिलता, परलोक कहाँ मिलेगा ? ॥ ३६-३७ ॥ हे राजन्! वेदों में कायिक ( वाचिक, मानसिक) आदि तीन प्रकार के यज्ञों का प्रतिपादन किया गया है, उन्हें पूर्णतया जानकर तुम सारे बन्धनों से मुक्त हो जाओगे । हे राजन्! सब यज्ञों में ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। मोक्षसाधक ज्ञानयज्ञ में समस्त कर्म विलीन हो जाते हैं ॥ ३८-३९ ॥ हे पुरुषश्रेष्ठ! उस ज्ञानयज्ञ को सत्पुरुषों की सेवा, प्रणति और प्रश्न से प्राप्त करो। तत्त्व को जानने वाले ज्ञानीजन तुम्हें उसका उपदेश करेंगे। जो मनुष्य अनेक प्रकार की संगति करता है, पर किसी साधु की एक बार भी संगति नहीं करता, वह संसार में बन्धन को प्राप्त होता है ॥ ४०-४१ ॥ सत्संग से सभी को गुणों की प्राप्ति और आपदाओं का नाश होता है तथा लोक और परलोक में अपना कल्याण प्राप्त होता है ॥ ४२ ॥ हे राजन्! अन्य सब तो सुलभ है, परंतु सत्संग बड़ा दुर्लभ है। जिसके जानने से फिर संसार के बन्धन में नहीं आना होता, उसे जानना आवश्यक है। सत्संग से ज्ञान मिलने पर साधक सभी प्राणियों को अपने में ही देखता है। इस ज्ञानयोग से अतिपापी प्राणी भी मुक्त हो जाता है। जिस प्रकार से प्रचण्ड जलती अग्नि सबको क्षणभर में भस्म कर देती है, इसी प्रकार ज्ञानाग्नि में पाप-पुण्य दोनों प्रकार के कर्म सद्यः नष्ट हो जाते हैं ॥ ४३-४५ ॥ हे राजन्! ज्ञान के समान और कोई वस्तु पवित्र नहीं है, योगसिद्ध महात्मा उस ज्ञान को योगाभ्यास के प्रभाव से यथासमय स्वयं ही प्राप्त करते हैं ॥ ४६ ॥ इन्द्रियों को वश में करने वाला भक्तिमान्, तत्पर पुरुष ही ज्ञान को प्राप्त कर सकता है और ज्ञान प्राप्त होने से थोड़े समय में ही वह मुक्ति को प्राप्त हो जाता है ॥ ४७ ॥ जो भक्तिहीन, श्रद्धारहित और सर्वत्र संदिग्धचित्त है, उसे कल्याण की प्राप्ति नहीं होती, न ज्ञान होता है तथा उसका इहलोक और परलोक नष्ट हो जाता है। हे राजन्! जो आत्मज्ञान में रत हैं, जिन्होंने ज्ञान से सभी सन्देह दूर कर लिये हैं तथा योग में स्थित होने से जिनके कर्म क्षीण हो गये हैं, वे बन्धन में नहीं पड़ते ॥ ४८-४९ ॥ अतएव ज्ञानरूपी खड्ग से मन के अज्ञानजन्य संशय को बलपूर्वक काटकर मनुष्य को योग का आश्रय लेना उचित है ॥ ५० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘ज्ञानयोग’ नामक एक सौ चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४० ॥ श्रीगणेशपुराणे क्रीडाखण्डे चत्वारिंशादधिकशततमोऽध्यायः Content is available only for registered users. 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