श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-146
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ छियालीसवाँ अध्याय
सगुणोपासना की श्रेष्ठता; क्षेत्र, ज्ञान तथा ज्ञेय का वर्णन
अथः षट्चत्वारिंशादधिकशततमोऽध्यायः
गणेशगीता – “क्षेत्रक्षेत्रज्ञविवेकयोगो” नाम नवमोऽध्यायः

वरेण्य बोले — [हे भगवन्!] मूर्तिमान् आपकी जो अनन्यभाव से उपासना करते हैं और जो अक्षर एवं परम अव्यक्त आपकी उपासना करते हैं, उनमें श्रेष्ठ कौन है? हे विभो! आप सब जाननेवाले, सबके साक्षी,  भूतभावन ईश्वर हैं, इस कारण मैं आपसे पूछता हूँ, आप कृपाकर कहिये ॥ १-२ ॥

श्रीगणेशजी बोले — जो भक्त मुझमें चित्त लगाकर मूर्तिमान् मेरी भक्तिपूर्वक उपासना करता है, ऐसा वह अनन्य भक्तिमान् मुझे [विशेष ] मान्य है ॥ ३ ॥ सम्पूर्ण इन्द्रियों को अपने वश में करके सब प्राणियों का हित करता हुआ जो अक्षर, अव्यक्त, सर्वव्यापी और कूटस्थ स्थिर ब्रह्म का ध्यान करता है तथा जो जानने में अशक्य मेरी उपासना करता है, वह भी मुझे ही प्राप्त करता है, उसका भी मैं संसारसागर से उद्धार करता हूँ ॥ ४-५ ॥

अव्यक्त ब्रह्म की उपासना करने वाले जनों को अधिक क्लेश भोगना पड़ता है। जो व्यक्त स्वरूप की भक्ति से प्राप्त होता है, वही अव्यक्त की उपासना से भी होता है । थोड़ा जानने वाला भी यदि भक्तिमान् हो तो वह सम्पूर्ण विद्वानों में श्रेष्ठ है। इसमें मुख्य कारण भक्ति ही है ॥ ६-७ ॥ जो भक्तिविहीन होकर भजन करता है, वह चाण्डाल है और जो जन्म से चाण्डाल होकर भी मेरा भक्तिपूर्वक भजन करता है, वह उस ब्राह्मण से श्रेष्ठ है। शुकादि तथा सनकादि ऋषिगण भक्ति से ही मुक्त हुए हैं और भक्ति से ही नारद और चिरंजीवी मार्कण्डेयादि मुझको प्राप्त हुए हैं ॥ ८-९ ॥

इस कारण भक्ति से मन और बुद्धि मुझमें लगानी चाहिये, हे राजन्! भक्तिपूर्वक मेरा यजन करोगे तो मुझको ही प्राप्त होओगे। हे राजन् ! यदि मुझमें अपना मन न लगा सको, तो अभ्यास योग से मुझे प्राप्त करने का यत्न करो ॥ १०-११ ॥ और जो यह भी न हो सके, तो जो कुछ कर्म करो, उसे मुझे अर्पित करो, मेरी कृपा से तुम परम शान्ति को प्राप्त होओगे और यदि यह भी न कर सको तो यत्नपूर्वक तीनों प्रकार के कर्मों के फल का त्याग करो। प्रथमतः मुझमें बुद्धि लगाना श्रेष्ठ है, उससे ध्यान श्रेष्ठ है, उससे सम्पूर्ण कर्मों का त्याग श्रेष्ठ है, इससे अत्यन्त श्रेष्ठ शान्ति है ॥ १२–१४ ॥

जो अहंकार का त्याग करने वाला, ममताबुद्धि से रहित, द्वेष न करने वाला, सबमें करुणा रखने वाला और लाभ – अलाभ, सुख-दुःख, मान-अपमान में एक दृष्टि रखने वाला है, वह मेरा प्रिय है ॥ १५ ॥ जिसको देखकर किसी को भय नहीं होता और जो किसी से भययुक्त नहीं होता है; उद्वेग, भय, क्रोध और हर्ष से जो रहित है, वही मेरा प्रिय है ॥ १६ ॥ शत्रु-मित्र, निन्दा-स्तुति, हर्ष-शोक में जिसका चित्त एक है, जो मौनी, स्थिरचित्त, भक्तिमान् और असंग है, वह मेरा प्रिय है। जो मेरे इस उपदेश का पालन करता है, वह त्रिलोकी में नमस्कार के योग्य है और वह मुक्तात्मा मेरा सदा प्रिय है । जो अनिष्ट की प्राप्ति में द्वेष और इष्ट की प्राप्ति हर्ष नहीं करता है तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को जानता है, वही मेरा सबसे प्रिय है ॥ १७–१९ ॥

वरेण्य बोले — हे गजानन ! क्षेत्र क्या है और उसको जानने वाला कौन है, उसका ज्ञान क्या है ? हे करुणासागर ! मुझ प्रश्न करने वाले को यह सब आप बताइये ॥ २० ॥

श्रीगणेशजी बोले — [पृथ्वी, जल आदि] पाँच महाभूत और उनकी [गन्ध, रस आदि] तन्मात्राएँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, अहंकार, मन, बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, अव्यक्त (मूल प्रकृति), इच्छा, धैर्य, द्वेष, सुख-दुःख और चेतनासहित यह सारा समूह क्षेत्र कहलाता है ॥ २१-२२ ॥ हे राजन्! उसको जानने वाला सर्वान्तर्यामी सर्वव्यापक तुम मुझको जानो। मैं और यह समूह – ये दोनों ज्ञान के विषय हैं ॥ २३ ॥ सरलता, गुरुशुश्रूषा, इन्द्रियों के विषयों से वैराग्य, पवित्रता, सहनशीलता, पाखण्ड का त्याग, जन्ममरणादि में दोषदृष्टि, समदृष्टि, दृढभक्ति, एकान्तता तथा शम-दमसहित जो ज्ञान है, हे राजन् ! उसी को यथार्थ ज्ञान समझो। हे राजन्! इस ज्ञान के विषय को मैं कहता हूँ, तुम श्रवण करो, जिसको जानने से संसारसागर से छूटकर मुक्त हो जाओगे ॥ २४–२६ ॥

जो अनादि, इन्द्रियरहित, सत्त्व-रज-तम आदि गुणों का भोक्ता, किंतु गुणवर्जित, अव्यक्त, सत्-असत् से परे तथा इन्द्रियों के विषयों का प्रकाशक है । जो विश्व को धारण करने वाला, सर्वत्र व्यापक, एक होकर भी अनेक रूप से भासता है, वह बाहर-भीतर से पूर्ण, असंग और अन्धकार से परे है ॥ २७-२८ ॥ अत्यन्त सूक्ष्म होने से वह जाना नहीं जाता, वह ज्योतियों को भी प्रकाशित करने वाला है, इस प्रकार ज्ञान से जानने योग्य पुरातन पुरुष को ज्ञेय ब्रह्म जानो ॥ २९ ॥ यही परब्रह्म ज्ञेय है, यही आत्मा, पर, अव्यय तथा प्रकृति से परे पुरुष कहलाता है । यह प्रकृति से उत्पन्न हुए गुणों को भोगता है। प्रकृति के तीन गुण ही इस पुरुष को देह में बाँधते हैं, जिस समय देह में शान्ति और प्रकाश की वृद्धि हो, तब सत्त्वगुण की अधिकता ज्ञात होती है ॥ ३०-३१ ॥

लोभ, अशान्ति, स्पृहा और कर्मारम्भ- ये रजोगुण के धर्म हैं। मोह, आलस्य, अज्ञान और प्रमाद – इन्हें ही तमोगुण जानना चाहिये ॥ ३२ ॥ सत्त्वगुण अधिक होने से सुख और ज्ञान की, रजोगुण अधिक होने से कर्म की और तमोगुण अधिक होने से सुख से इतर निद्रा और आलस्य की प्राप्ति होती है ॥ ३३ ॥ इन तीनों की वृद्धि में क्रम से मुक्ति, संसार और दुर्गति की प्राप्ति मनुष्यों को होती है, इस कारण हे राजन् ! सत्त्वगुण युक्त होओ ॥ ३४ ॥

हे नरेश्वर ! इसलिये तुम सर्वत्र भलीभाँति विद्यमान मुझ परमात्मा का निश्चल भक्तिपूर्वक सर्वभाव से भजन करो। हे राजन् ! अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, तारागण और विद्वान् ब्राह्मण में जो तेज है, उसे मेरा ही तेज जानो ॥ ३५-३६ ॥ मैं ही सम्पूर्ण संसार को उत्पन्नकर उसका संहार करता हूँ और अपने तेज से औषधि और जगत्‌ को मैं ही पुष्ट करता हूँ । इन्द्रियाधिष्ठातृ देवताओं के रूप में इन्द्रियों को अधिष्ठित करके इन्द्रिय विषयों को और जठराग्नि के रूप में भुक्त-पीत अन्न-जलादि को मैं ही पुण्य-पाप लेशशून्य होकर भोगता हूँ। मैं ही विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा, गौरी और गणपति हूँ, इन्द्रादि देवता तथा लोकपाल मेरे ही अंश से उत्पन्न हुए हैं ॥ ३७–३९ ॥ जिस-जिस रूप से प्राणी मेरी भक्तिपूर्वक उपासना करते हैं, उनकी भक्ति के अनुसार मैं उन्हें वैसा ही रूप दिखाता हूँ। हे राजन्! इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञाता, ज्ञान तथा ज्ञेय का विषय तुमसे मैंने वर्णन किया, जो तुमने पूछा था, वह सब मैंने बता दिया ॥ ४०-४१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘क्षेत्र – ज्ञातृ – ज्ञेय-विवेक’ नामक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४६ ॥

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