November 7, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-098 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अट्ठानबेवाँ अध्याय आठवें वर्ष में गुणेश्वर द्वारा विचित्र दैत्य का वध और विनता के गर्भ से उत्पन्न अण्ड का भेदन, उसमें से मयूर नामक पक्षी का प्राकट्य, विनता द्वारा गुणेश्वर की स्तुति, गुणेश्वर का मयूर को अपना वाहन बनाना और मयूरेश्वर नाम से प्रसिद्ध होना अथः अष्टनवतितमोऽध्यायः शिखण्डिवरप्रदानं ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार से जब गुणेश्वर का सातवाँ वर्ष व्यतीत हुआ और आठवाँ वर्ष प्रारम्भ हुआ, तब वे गुणेश एक दिन उषाकाल में स्नान करने के अनन्तर गायत्रीमन्त्र का जप तथा चारों वेदों का स्वाध्याय कर रहे थे। उन्होंने कस्तूरी का तिलक लगाया हुआ था, अनेक प्रकार के आभूषणों से वे भलीभाँति सुसज्जित थे । उन्होंने दिव्य वस्त्रों को धारण किया हुआ था, वे दिव्य गन्ध तथा दिव्य मालाओं से विभूषित थे ॥ १-२ ॥ उसी समय तपस्वियों के वे बालक उन गुणेश्वर के पास में आये, उन गुणेश्वर की दीप्ति से वे बालक उसी प्रकार कान्तिमान् हो गये, जैसे सूर्य की दीप्ति से बादल प्रकाशित हो उठते हैं। उन मुनिबालकों को देखकर गुणेश्वर में स्वतः ही उन बालकों के साथ अध्ययन करने की बुद्धि उत्पन्न हुई। उस समय विभु गुणेश्वर ने उन सभी के मस्तक पर अपना हाथ रखा ॥ ३-४ ॥ उसके प्रभाव से तीन-चार तथा पाँच वर्ष के उन बालकों को भी वेदमन्त्रों का स्फुरण हो आया । बिना किसी चेतन प्राणी के उन्हें आकाशध्वनि सुनायी पड़ी। तदनन्तर उन सभी ने चारों वेदों का पारायण किया। उस वेदध्वनि को सुनकर उस समय पशुओं ने मुख में रखा हुआ ग्रास भी भक्षण करना बन्द कर दिया ॥ ५-६ ॥ वे वेद का पारायण कर रहे उन बालकों की वेदध्वनि को सुनने में तत्पर थे। ऋग्वेद तथा यजुर्वेद-इन दो वेदों के पारायण के अनन्तर उन्होंने सामवेद का गान प्रारम्भ किया। अनेक हरिण, सिंह, शार्दूल, सर्प तथा पक्षियों की अनेक जातियाँ उस वेदगान के श्रवण में अनुरक्त थीं, उनके नेत्रों से आनन्दाश्रु प्रवाहित होने लगे ॥ ७-८ ॥ उस वेदगान की ध्वनि को श्रवण करने में आसक्त अट्ठासी हजार मुनिगण आनन्दसरोवर में उसी प्रकार निमग्न होकर सो गये, मानो कि वे रात में सोये हों। पार्वती के प्रमथ आदि गण, पार्वतीजी एवं उनकी सखियाँ — ये सभी आनन्दमग्न हो गये थे। उस समय भगवान् शिव के मस्तक में स्थित चन्द्रमा अमृत प्रवाहित करने लगे। उस अमृत का संयोग होने से शिवजी के गले में स्थित रुण्डमाला के रुण्ड जीवित पुरुष हो गये थे । गुणेश के उस वेदगान की ध्वनि के श्रवण से सभी किन्नर तथा गन्धर्व लज्जित हो गये थे ॥ ९–११ ॥ उस समय जो स्त्रियाँ काम के उद्वेग से सन्तप्त थीं, वे शान्त हो गयी थीं और वे गुणेश की आरती करने लगी थीं। उसी समय वहाँ एकाएक एक दैत्य आ पहुँचा, जो बड़ी ही विचित्र आकृति वाला था । उसकी आवाज से उस समय मन्दर आदि पर्वतों की गुफाएँ विदीर्ण हो गयी थीं, वह दैत्य हल के समान दाँतों वाला था, उसके नासाछिद्र वापी के समान थे, वह तडाग के समान नेत्रों वाला था और शत्रुओं का विनाश करने वाला था ॥ १२-१३ ॥ वह दैत्य एक हिंसा करने वाले पशु का स्वरूप बनाकर वहाँ पर जहाँ-तहाँ भ्रमण कर रहा था। उसके पाँच नेत्र थे, चार सींग थे, आठ पैर थे और चार कान थे। वह तीन मुखों वाला था तथा उसकी दो पूँछें थीं । वे गुणेश उसे देखकर बड़े जोर से हँसने लगे और प्रभु गुणेश उन शिशुओं से बोले — अरे बालको ! तुम लोग इस कौतुक को देखो ॥ १४-१५ ॥ तब उन बालकों ने गुणेश्वर से कहा — आज हमने इस अत्यन्त अद्भुत पशु का दर्शन किया है । तदनन्तर वह दैत्य नृत्य करने लगा और [सहसा ] ऊँचा उछलकर वह भूमि पर गिरा ॥ १६ ॥ वह क्षणभर में अदृश्य हो जाता था और अगले ही क्षण सामने स्थित हो जाता था। वह दृश्य एवं अदृश्य स्वरूप धारण करने लगा। विभु गुणेश ने उन बालकों से कहा — ‘ इसे पकड़ लो-पकड़ लो’। ऐसा कहकर वे गुणेश्वर स्वयं ही बड़े वेग के साथ उस दैत्य के समीप में गये। उसी समय वह दैत्य भागने लगा, तो बालकों के साथ वे गुणेश्वर भी उसके पीछे-पीछे दौड़े ॥ १७-१८॥ वे सभी एक ऐसे महान् अरण्य में जा पहुँचे, जहाँ हवा भी नहीं चलती थी, वहाँ सिंह, शार्दूल, हाथी, सूअर तथा वानर अनेक प्रकार की गर्जना कर रहे थे ॥ १९ ॥ उसे पकड़ने के लिये वे गुणेश्वर उसके पास गये, किंतु वह महान् दैत्य उड़कर कहीं दूर देश में चला गया। यह देखकर गुणेश्वर को अत्यन्त खिन्नता हुई ॥ २० ॥ तदनन्तर क्रोध से उनकी आँखें लाल हो गयीं और तब उन्होंने अत्यन्त तीक्ष्ण पाश छोड़ा। उस समय धरती तथा आकाश काँप उठे और बादल घूमने लगे ॥ २१ ॥ ग्रह-नक्षत्र आकाश से पृथ्वी पर गिर पड़े, उसकी ध्वनि से दिशाएँ गूँज उठीं। वह पाश दैत्य पर आक्रमण करके [उसे बाँधे हुए] क्षणभर में ही गुणेश्वर के पास आ गया। पाश के बन्धन से श्वास के रुक जाने के कारण वह दैत्य अपने पैरों, हाथों तथा मुख को पटकता हुआ भूमि पर गिर पड़ा। उन सभी बालकों के देखते-देखते ही उस दैत्य के प्राण नेत्रों के मार्ग से बाहर निकल पड़े ॥ २२-२३ ॥ वह दैत्य अपने यथार्थ रूप को धारणकर चौबीस योजन की भूमि पर गिरा। पाश से समन्वित कण्ठवाले उस दैत्य को कुछ बालक इधर से उधर खींचने लगे ॥ २४ ॥ कुछ बालकों ने [बालचापल्यवश] उसके गुदादेश में काष्ठ प्रविष्ट करा दिया था, और कुछ दूसरे बालक उसके मुख पर धूल फेंकने लगे। कुछ बालकों ने उसके मस्तक पर मल-मूत्र का त्याग कर दिया ॥ २५ ॥ तदनन्तर भूख से व्याकुल होकर वे सभी बालक गुणेश के निकट चले आये। कुछ बालक उस दैत्य के मस्तक पर चढ़कर आम के फलों को खाने लगे ॥ २६ ॥ उस दैत्य के मस्तक पर चढ़कर फल खा रहे कुछ बालक भूमि पर स्थित बालकों पर फल फेंककर चोट पहुँचा रहे थे। आम के गिरे हुए फलों को दूसरे बालक खा रहे थे। उस समय उन्होंने गरुड़माता विनता को देखा। वह अपने गर्भरूपी अण्ड को ढककर बैठी हुई थी। तदनन्तर वह विनता बालकों की ओर दौड़ी। उन सबको भागता हुआ देखकर विनता भी उनके पीछे चलने लगी ॥ २७-२८ ॥ विनता अपने पंखों के आघात से हिंसक पशुओं को तथा वृक्षों को तोड़ती हुई जा रही थी । उसे देखकर गुणेश एक वृक्ष के कोटर में छिप गये ॥ २९ ॥ उन्होंने चन्द्रमण्डल के समान एक अत्यन्त श्वेत अण्डा वहाँ देखा। उस अत्यन्त भारी अण्डे को गुणेश ने सहज ही अपने हाथ में पकड़ लिया। उसी समय वह अण्डा फट गया और उसमें से उन्होंने निकले हुए नीले कण्ठवाले एक पक्षी को देखा। उसके पंख बहुत बड़े थे । उसकी आँखें बड़ी-बड़ी थीं और वह अपने मुख से अग्नि के कणों को बरसा रहा था ॥ ३०-३१ ॥ उसके दोनों पंखों के फड़फड़ाने से सारी पृथ्वी काँप उठी। उसकी शब्दध्वनि से समुद्र अपनी सीमा का अतिक्रमण कर चलायमान हो उठे । सूर्यमण्डल गतिशील हो गया, वे सभी बालक भाग उठे। अपने पंखों के आघात से वह प्रहार करता हुआ उन बालकों के पीछे दौड़ पड़ा ॥ ३२-३३ ॥ उन बालकों की पीड़ा को देखकर युद्ध करने की इच्छा वाले गुणेश्वर ने उस क्रूर पक्षी के पंखों को पकड़ लिया और फिर उन दोनों में युद्ध होने लगा ॥ ३४ ॥ अपने पंखों के आघात से तथा चोंच की मार से उस महान् पक्षी ने गुणेश पर प्रहार किया, तब रक्तवर्ण हुए नेत्रोंवाले उन गुणेश्वर ने भी अपनी मुट्ठी के प्रहार से उसपर आघात किया। उसे अत्यन्त मजबूत देखकर गुणेश ने अपने अंकुश आदि चारों आयुधों से शीघ्र ही उसपर प्रहार किया, किंतु वे आयुध विफल होकर भूमि पर गिर पड़े ॥ ३५-३६ ॥ तदुपरान्त वह नीलकण्ठ शीघ्र ही बालकों को लेकर बड़ी तीव्र गति से उड़कर भाग चला। तब गुणेश्वर ने उन बालकों को उससे छुड़ाया और वे उस अण्डज नीलकण्ठ के ऊपर चढ़ गये। उस अण्डज पक्षी को अपने वश में करके गुणेश्वर उसके ऊपर आरूढ़ हो गये, तदनन्तर सभी बालक उनके समीप में आये और विनता भी वहाँ पहुँची। विनता ने अपनी बुद्धि के अनुसार उन परमात्मा गुणेश की स्तुति करनी प्रारम्भ की ॥ ३७–३८१/२ ॥ विनता बोली — [ हे प्रभो!] आप रजोगुण का आश्रय लेकर सृष्टि करने वाले ब्रह्मा हैं, सत्त्वगुण का आश्रय लेकर आप ही सृष्टि का पालन करने वाले विष्णु हैं और तमोगुण का आश्रय लेकर सृष्टि का संहार करने वाले शंकर भी आप ही हैं। जब आपके सगुण स्वरूप को भी यथार्थ रूप में देवता अथवा ऋषिगण नहीं जान पाते, तो फिर चराचर जगत् के एकमात्र गुरु आपके निर्गुण स्वरूप को कौन जान सकता है? ॥ ३९–४०१/२ ॥ इस प्रकार स्तुति करने के अनन्तर भक्तिपरायण वह विनता उन्हें प्रणाम करते हुए बोली । [ हे देव !] आप मुझे मुनि कश्यप की भार्या विनता समझें, उन महर्षि का पुत्र यह मयूर आपका सेवक होगा ॥ ४१-४२ ॥ मुनि कश्यपजी ने पूर्व में मुझसे कहा था कि जो तुम्हारे गर्भरूप अण्ड का भेदन करेगा, वही इसका स्वामी होगा और वही तुम्हारे पुत्रों को बन्धन से मुक्त करायेगा-इसमें कोई संदेह नहीं है। बहुत समय तक प्रतीक्षा करने के अनन्तर मुझे आपके चरणकमलों का दर्शन हुआ है, कद्रू के पुत्रों के द्वारा मेरे जटायु, बाज तथा सम्पाती नाम के तीन पुत्रों का हरण हुआ है । हे जगन्नाथ ! आप मेरे उन तीनों पुत्रों को बन्धनमुक्त करके मुझे उनका दर्शन शीघ्र कराने की कृपा करें ॥ ४३–४४१/२ ॥ गुणेश बोले — हे माता ! आप चिन्ता न करें, मैं आपको आपके पुत्रों का दर्शन अवश्य कराऊँगा ॥ ४५ ॥ ब्रह्माजी बोले — विनता से इस प्रकार कहने के अनन्तर अत्यन्त हर्ष से समन्वित होकर गुणेश्वर ने मयूर से कहा — तुम मुझसे वर माँगो ॥ ४६ ॥ मयूर बोला — हे सर्वेश्वर ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना चाहते हैं तो मेरा ‘मयूर’ यह नाम आपके नाम के आगे लगकर संसार में प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाय। आप यह वर मुझे प्रदान करें और अपनी दृढ़ भक्ति भी मुझे प्राप्त करायें ॥ ४७१/२ ॥ देव गुणेश बोले — अपने मन में किसी भी प्रकार का लोभ न रखने वाले तुम्हारे द्वारा बहुत ही सुन्दर और अच्छी बातें कही गयी हैं, तुम्हारा मयूर यह नाम मेरे नाम के पूर्व में लगेगा और तब ‘मयूरेश्वर’ मेरा यह नाम तीनों लोकों में विख्यात होगा और मुझमें तुम्हारी दृढ़ भक्ति होगी ॥ ४८-४९ ॥ ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार से वह सब सुनकर विनता अपने आश्रम में चली गयी और मयूर पर आरूढ़ होकर मयूरेश्वर गुणेश भी अपने घर को गये ॥ ५० ॥ ‘मयूरेश, मयूरेश, मयूरेश’ – इस प्रकार से नाम का बार-बार उच्चारण करते हुए उन मुनिबालकों से समन्वित होकर और सभी दिशाओं को सुशोभित करते हुए गुणेश्वर जा रहे थे। उन्होंने माता पार्वती को प्रणामकर शीघ्र ही सम्पूर्ण वृत्तान्त उनको निवेदित कर दिया, इधर मयूरेश की महिमा का गुणगान करते हुए मुनियों के बालक अपने-अपने घरों को गये। इस प्रकार इन गुणेश्वर ने ‘मयूरेश’ यह नाम प्राप्त किया ॥ ५१-५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘शिखण्डिवरप्रदान’ नामक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९८ ॥ Content is available only for registered users. 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