May 24, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-16 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-षोडशोऽध्यायः सोलहवाँ अध्याय वेदवती की कथा, इसी प्रसंग में भगवान् श्रीराम के चरित्र के एक अंश का कथन, भगवती सीता तथा द्रौपदी के पूर्वजन्म का वृत्तान्त महालक्षम्या वेदवतीरूपेण राजगृहे जन्मवर्णनम् श्रीनारायण बोले — हे मुने! उन दोनों ने कठिन तपस्या द्वारा भगवती लक्ष्मी की आराधना करके अपना मनोवांछित वर प्राप्त कर लिया ॥ १ ॥ महालक्ष्मी के वरदान से ही वे धर्मध्वज और कुशध्वज महान् पुण्यशाली तथा पुत्रवान् राजा हो गये ॥ २ ॥ कुशध्वज की मालावती नामक साध्वी भार्या थी। उस देवी ने दीर्घकाल बीतने पर यथासमय लक्ष्मी के अंश से सम्पन्न एक साध्वी कन्या को जन्म दिया । उसे जन्म से ही ज्ञान प्राप्त था । वह कन्या स्पष्ट वाणी में वेद-मन्त्रों का उच्चारणकर सूतिकागृह से बाहर निकल आयी । उस कन्या ने जन्म लेते ही वेदध्वनि की थी, इसलिये विद्वान् लोग उसे ‘वेदवती’ कहने लगे ॥ ३-५ ॥ जन्म लेते ही उस कन्या ने विधिवत् स्नान किया और तपस्या के लिये वन को प्रस्थान कर दिया; यद्यपि सभी लोगों ने श्रीहरि के चिन्तन में तत्पर रहने वाली उस कन्या को ऐसा करने से प्रयत्नपूर्वक रोका था ॥ ६ ॥ उस तपस्विनी कन्या ने एक मन्वन्तर तक पुष्कर- क्षेत्र में रहकर लीलापूर्वक अत्यन्त कठोर तप किया, फिर भी वह दुर्बल नहीं हुई; अपितु स्वस्थ और नवयौवन से सम्पन्न बनी रही ॥ ७१/२ ॥ उसने सहसा स्पष्ट शब्दों वाली यह आकाशवाणी सुनी — हे सुन्दरि ! दूसरे जन्म में स्वयं भगवान् श्रीहरि तुम्हारे पति होंगे। ब्रह्मा आदि के द्वारा भी बड़ी कठिनता से प्रसन्न होने वाले भगवान् श्रीहरि को तुम पतिरूप में प्राप्त करोगी ॥ ८-९ ॥ यह आकाशवाणी सुनकर वह कन्या अत्यन्त प्रसन्न हो गयी और गन्धमादन पर्वत पर निर्जन स्थान में पुनः तप करने लगी ॥ १० ॥ वहाँ दीर्घकाल तक तपश्चर्या करती हुई वह निश्चिन्त होकर रहती थी। एक बार उसने अपने समक्ष उपस्थित ढीठ रावण को देखा ॥ ११ ॥ उसे देखकर वेदवती ने अतिथिभक्ति से युक्त होकर उसे पाद्य, परम स्वादिष्ट फल और शीतल जल प्रदान किया। उन्हें ग्रहण करके वह पापी रावण उसके पास बैठ गया और उससे यह प्रश्न करने लगा ‘हे कल्याणि ! तुम कौन हो ? ‘ ॥ १२-१३ ॥ स्थूल नितम्बदेश तथा वक्ष:स्थलवाली, शरऋतु के विकसित कमल की भाँति प्रसन्न मुखवाली, मुसकानयुक्त तथा स्वच्छ दाँतों वाली उस परम साध्वी सुन्दरी को देखकर कामबाण से आहत होकर वह नीच रावण मूर्च्छित हो गया । वह वेदवती को हाथ से खींचकर शृंगारिक चेष्टाएँ करने लगा ॥ १४-१५ ॥ यह देखकर वह साध्वी अत्यन्त क्रोधित हो उठी और उसने [ तपोबल से] उसे स्तम्भित कर दिया । वह हाथों तथा पैरों से निश्चेष्ट हो गया और कुछ भी बोल सकने में समर्थ नहीं रहा ॥ १६ ॥ वह मन-ही-मन उस कमलनयनी देवी की शरण में गया और उसने उसका स्तवन किया। देवी वेदवती उस पर प्रसन्न हो गयी और [परलोक में] उसे स्तुति का फल देना स्वीकार कर लिया। साथ ही उसने यह शाप भी दिया — ‘तुम मेरे ही कारण अपने बान्धवोंसहित विनष्ट हो जाओगे; क्योंकि काम-भावना से तुमने मेरा स्पर्श किया है। अब तुम मेरा बल देख लो ‘ ॥ १७-१८ ॥ ऐसा कहकर उसने योगबल से अपने शरीर का त्याग कर दिया। इसके बाद रावण ने उसे गंगा में छोड़कर अपने घर की ओर प्रस्थान किया — ‘अहो, इस समय मैंने यह कैसा अद्भुत दृश्य देखा है, इस देवी ने इस समय क्या कर डाला’ — ऐसा सोच-सोचकर वह रावण बार-बार विलाप करता रहा ॥ १९-२० ॥ [ हे मुने!] वही साध्वी वेदवती दूसरे जन्म में जनक की पुत्री के रूप में आविर्भूत हुईं और वे देवी ‘सीतादेवी’ – इस नाम से विख्यात हुईं, जिनके कारण रावण मारा गया। पूर्वजन्म की तपस्या के प्रभाव से उस महान् तपस्विनी वेदवती ने परिपूर्णतम भगवान् श्रीराम को पतिरूप में प्राप्त किया । तपस्या के द्वारा उस देवी ने अत्यन्त कठिनता से सन्तुष्ट होने वाले तथा सबके आराध्य जगत्पति श्रीराम को प्राप्त किया था। उस सुन्दरी सीता ने अत्यन्त दीर्घ काल तक भगवान् श्रीराम के साथ विलास किया ॥ २१–२३ ॥ उसे पूर्वजन्म की बातों का स्मरण था, फिर भी पूर्व समय में तपस्या के कष्ट पर उसने ध्यान नहीं दिया । उसने सुखपूर्वक उस क्लेश का त्याग कर दिया था; क्योंकि परिणाम के उत्तम होने पर दुःख भी सुख के रूप में हो जाता है ॥ २४ ॥ उन सुकुमार श्रीराम को प्राप्त करके उस नवयौवना साध्वी ने दीर्घकाल तक नाना प्रकार के ऐश्वर्य को प्राप्त किया। उसने अपनी अभिलाषा के अनुरूप ही गुणवान्, रसिक, शान्त, कमनीय, स्त्रियों के लिये कामदेवतुल्य मनोहर एवं सर्वश्रेष्ठ देव को प्राप्त किया था ॥ २५-२६ ॥ तदनन्तर रघुकुल की वृद्धि करने वाले सत्यसंकल्प श्रीराम बलवान् काल से प्रेरित होकर अपने पिता के वचन को सत्य करने के लिये वन में चले गये ॥ २७ ॥ वे सीता और लक्ष्मण के साथ समुद्र के समीप स्थित थे। उसी समय भगवान् ने विप्ररूपधारी अग्निदेव को वहाँ देखा। तब श्रीराम को दुःखित देखकर अग्नि भी बहुत दुःखी हुए। इसके बाद सत्यपरायण वे अग्निदेव सत्यप्रेमी भगवान् श्रीराम से यह सत्यवचन कहने लगे ॥ २८-२९ ॥ द्विज बोले — हे भगवन्! हे श्रीराम ! सुनिये, यह जो काल आपके समक्ष उपस्थित है, वह सीता- हरण के समय के रूप में ही आया हुआ है । दैव का प्रतिकार अत्यन्त कठिन है, उस दैव से बढ़कर बलवान् अन्य कोई नहीं है । अतः आप इस समय जगज्जननी सीता को मुझमें स्थापित करके छायामयी सीता को अपने साथ रख लीजिये। इनकी परीक्षा का समय आने पर मैं इन सीता को पुनः आपको सौंप दूंगा। मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, अपितु इसी कार्य हेतु देवताओं के द्वारा भेजा गया साक्षात् अग्निदेव हूँ ॥ ३०-३२ ॥ श्रीराम ने उनकी यह बात सुनकर लक्ष्मण को बताये बिना ही अत्यन्त दुःखी मन से वह वचन स्वीकार कर लिया ॥ ३३ ॥ हे नारद! तत्पश्चात् अग्निदेव ने योगबल से सीता के ही समान एक माया-सीता की रचना की । इसके बाद अग्नि ने गुण और स्वरूप में उस सीता के ही तुल्यमाया- सीता को श्रीराम को सौंप दिया ॥ ३४ ॥ श्रीराम इस गुप्त रहस्य को प्रकट करने का निषेध करके माया-सीता को साथ लेकर चल पड़े। लक्ष्मण तक इस रहस्य को नहीं जान पाये तो दूसरे की बात ही क्या ॥ ३५ ॥ इसी बीच श्रीराम ने एक स्वर्णमृग देखा। तब सीता जिस किसी भी यत्न से उसे लाने के लिये श्रीराम को प्रेरित करने लगीं ॥ ३६ ॥ श्रीराम उस वन में सीता की रक्षा के लिये लक्ष्मण को वहीं पर नियुक्त करके स्वयं शीघ्रतापूर्वक मृग की ओर दौड़ पड़े और बाण से उसका वध कर दिया ॥ ३७ ॥ उस मायामृग ने ‘हा लक्ष्मण’ – यह शब्द करके अपने समक्ष भगवान् श्रीहरि का दर्शन प्राप्त करके उनका स्मरण करते हुए सहसा अपने प्राण त्याग दिये ॥ ३८ ॥ मृग का शरीर त्यागकर दिव्य स्वरूप धारण करके वह रत्ननिर्मित विमान से वैकुण्ठ चला गया। वह मारीच पूर्वजन्म में दोनों द्वारपालों के सेवक के रूप में वैकुण्ठ के द्वार पर रहता था। अब द्वारपालों के आदेशानुसार वह फिर वैकुण्ठ के द्वार पर पहुँच गया ॥ ३९-४० ॥ इधर ‘हा लक्ष्मण’– यह आर्तनाद सुनकर सीता ने राम के पास जाने के लिये लक्ष्मण को प्रेरित किया ॥ ४१ ॥ राम के पास लक्ष्मण के चले जाने पर अत्यन्त दुर्धर्ष वह रावण अपनी माया से सीता का हरण करके लंका की ओर चल दिया ॥ ४२ ॥ लक्ष्मण को वन में देखकर श्रीराम विषादग्रस्त हो गये। अपने आश्रम पर तत्काल पहुँचकर जब उन्होंने सीता को नहीं देखा तब वे मूर्च्छित हो गये और पुनः [ चेतना आने पर ] उन्होंने बार-बार बहुत विलाप किया। इसके बाद सीता को खोजते हुए वे बार-बार इधर-उधर भटकने लगे ॥ ४३-४४ ॥ कुछ समय पश्चात् गोदावरीनदी के तट पर सीता का समाचार मिलने पर भगवान् श्रीराम ने वानरों को अपना सहायक बनाकर समुद्र पर पुल बाँधा ॥ ४५ ॥ पुनः समय आने पर लंका जाकर उन रघुश्रेष्ठ राम ने बाण से रावण को मार डाला । इस प्रकार बान्धवोंसहित उस रावण का वध करके श्रीराम ने तत्काल उन सीता की अग्निपरीक्षा करायी । उसी समय अग्निदेव ने वास्तविक सीता श्रीराम को सौंप दी ॥ ४६-४७ ॥ तब छायामयी सीता ने विनम्र होकर अग्निदेव और श्रीराम से कहा — अब मैं क्या करूँ ? मुझे वह उपाय बताइये ॥ ४८ ॥ श्रीराम और अग्निदेव बोले — हे देवि! तुम तपस्या करने के लिये अत्यन्त पुण्यप्रद पुष्करक्षेत्र में जाओ। वहाँ तपस्या करके तुम स्वर्गलक्ष्मी बनोगी । वे यह वचन सुनकर पुष्करक्षेत्र में जाकर दिव्य तीन लाख वर्षों तक कठिन तपस्या करके स्वर्गलक्ष्मी के रूप में प्रतिष्ठित हो गयीं ॥ ४९-५० ॥ कालक्रम से वे ही देवी तपस्या के प्रभाव से यज्ञकुण्ड से उत्पन्न होकर महाराज द्रुपद की पुत्री तथा पाण्डवों की प्रिया द्रौपदी बनीं ॥ ५१ ॥ इस प्रकार सत्ययुग में कुशध्वज की वही कन्या कल्याणमयी वेदवती त्रेतायुग में जनक की पुत्री सीता हुईं और बाद में वे श्रीराम की पत्नी बनीं। पुनः वही छायासीता द्वापर में द्रुपद की पुत्री देवी द्रौपदी के रूप में आविर्भूत हुईं। अतः तीनों युगों में विद्यमान रहने वाली उस देवी को ‘त्रिहायणी’ भी कहा गया है ॥ ५२-५३ ॥ नारदजी बोले — शंकाओं का समाधान करने वाले मुनिश्रेष्ठ ! उस द्रौपदी के पाँच पति कैसे हुए? मेरे मन का यह सन्देह दूर कीजिये ॥ ५४ ॥ श्रीनारायण बोले — हे नारद! जब लंका में वास्तविक सीता भगवान् राम को प्राप्त हो गयीं, तब रूप एवं यौवन से सम्पन्न छायासीता महान् चिन्ता से व्याकुल हो उठी ॥ ५५ ॥ तदनन्तर भगवान् श्रीराम और अग्नि की आज्ञा के अनुसार वह भगवान् शंकर की उपासना में तत्पर हो गयी । कामातुर वह पतिप्राप्ति के लिये व्यग्र होकर बार-बार यही प्रार्थना करने लगी —‘ हे त्रिलोचन ! मुझे पति प्रदान कीजिये ‘। ऐसा उसने पाँच बार कहा था ॥ ५६-५७ ॥ उस प्रार्थना को सुनकर रसिकेश्वर शंकर ने हँसकर यह वर दे दिया — ‘हे प्रिये ! तुम्हारे पाँच पति होंगे’ । [ हे नारद!] इसीलिये वे छायासीता [द्वापरमें] पाँचों पाण्डवों की प्रिय भार्या हुईं। इस प्रकार मैंने आपको यह सब बता दिया, अब वास्तविक प्रसंग सुनिये ॥ ५८-५९ ॥ भगवान् श्रीराम लंका में मनोहारिणी सीता को पा जाने के अनन्तर वह लंका विभीषण को सौंपकर अयोध्या वापस चले गये और भारतवर्ष में ग्यारह हजार वर्षों तक राज्य करके समस्त पुरवासियों- सहित वैकुण्ठ चले गये । लक्ष्मी के अंश से प्रादुर्भूत वह वेदवती लक्ष्मी के विग्रह में समाविष्ट हो गयी ॥ ६०-६११/२ ॥ इस प्रकार मैंने यह पवित्र, पुण्यदायक तथा पापनाशक आख्यान आपसे कह दिया । मूर्तिमान् रूप में चारों वेद उसकी जिह्वा के अग्रभाग पर निरन्तर विराजमान रहते थे, इसीलिये वह वेदवती नाम से प्रसिद्ध थी । अब मैं आपको धर्मध्वज की कन्या का आख्यान बता रहा हूँ; ध्यानपूर्वक सुनिये ॥ ६२–६४ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘महालक्ष्मी का वेदवती के रूप में राजगृह में जन्म-वर्णन’ नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥ Content is available only for registered users. 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