श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-59
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उनसठवाँ अध्याय
महाकाली के दिव्य लोक का वर्णन
अथः एकोनषष्टितमोऽध्यायः
श्रीब्रह्ममयीमहाकालीस्थानवर्णनं

श्रीनारदजी बोले — देवदेव! जगन्नाथ! कृपामय ! जगत्प्रभो ! मैं पुनः आपसे भगवती का उत्कृष्ट आख्यान सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥ कैलासपर्वत पर शिवसांनिध्य में भगवती की जो मूर्तियाँ हैं, उनमें भगवती दुर्गा का सूक्ष्मस्वरूप, दिव्यलोक और शारदीय पूजा का विधान आपकी कृपा से आपके मुखारविन्द से [मैंने सुना], अब कृपापूर्वक भगवती काली के सूक्ष्मरूप तथा उनके दिव्यलोक के विषय में मुझे बताइये ॥ २-३ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — [मुने ! ] मैंने आपसे दुर्गा के जिस परम लोक का वर्णन किया था, वह देवता, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर तथा राक्षसों के लिये भी दुर्गम है। उसके पास अत्यन्त गुप्त, अत्यन्त रम्य, अति सुन्दर तथा ब्रह्मा आदि देवेश्वरों के लिये दुर्गम धाम है ॥ ४-५ ॥ वह स्थान चारों ओर से आकर्षक अमृतमय महासागर से घिरा हुआ है, बहुमूल्य रत्न-सम्पदाओं से सुसम्पन्न है तथा अग्नि के समान प्रभावाला है ॥ ६ ॥ उसके मध्य में रत्ननिर्मित चहारदीवारी से युक्त, चारों दिशाओं में चार द्वारों वाला, मोतियों की जालियों से अत्यन्त सुशोभित और चित्रमय ध्वजा – पताकाओं से अत्यन्त अलंकृत एक सुरम्य पुर है। हाथों में विचित्र खट्वाङ्ग धारण किये हुए, लाल नेत्रोंवाले, हजारों भैरव उन द्वारों की सदा रखवाली करते रहते हैं ॥ ७-८ ॥

भगवती दुर्गा की आज्ञा के बिना देवता, राक्षस तथा ब्रह्मा आदि देवेश्वर भी उन द्वारों को लाँघकर भीतर नहीं जा सकते हैं ॥ ९ ॥ उस पुर के मध्य में अनेकविध रत्नों से निर्मित, मणियों के सैकड़ों खम्भों से सुशोभित तथा चारों ओर से स्वर्ण से मढ़ा हुआ एक सुन्दर मन्दिर है। उस मन्दिर के मध्य में दस हजार सिंहों से सुशोभित एक विशाल रत्नसिंहासन है। देवर्षि नारद! उसके ऊपर रखे हुए शव के ऊपर महाविद्यास्वरूपिणी महाकाली महेश्वरी सदा विराजमान रहती हैं ॥ १०-१११/२

सभी प्राणियों के हृदय-कमल में विराजमान रहने वाली, कल्याणकारिणी, मायास्वरूपिणी तथा ब्रह्मरूपा एकमात्र वे महादेवी ही अपनी इच्छा से करोड़ों-करोड़ ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति, पालन तथा संहार करने वाली हैं ॥ १२-१३ ॥ मुने ! विजया आदि चौंसठ योगिनियाँ सावधान होकर परिचारिका के रूप में सदा उस पुर के काम-काज करती रहती हैं ॥ १४ ॥ उन भगवती के दाहिने भाग में महाकाल सदाशिव विराजमान हैं। जिनके साथ प्रसन्न होकर महाकाली सदा विहार करती रहती हैं ॥ १५ ॥ इस प्रकार उन महाकाली का अन्तःपुर बाहर से भैरवों के द्वारा रक्षित, अत्यन्त आश्चर्यमय, सुन्दर तथा ब्रह्मा आदि के लिये भी परम दुर्लभ है ॥ १६ ॥

महामते ! ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश के साथ यहाँ आकर देवाधीश इन्द्र महाकाली के दर्शनमात्र से ब्रह्महत्याजनित घोर पाप से मुक्त हो गये थे। उस समय ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्र ने देवाधिदेव सदाशिव की कृपा से ही वहाँ पर परमदेवता भगवती काली का दर्शन प्राप्त किया था ॥ १७-१८ ॥

वत्स ! मुने ! अब मैं उसके बाहर का वर्णन कर रहा हूँ; आप सावधान होकर सुनिये। रत्ननिर्मित परकोटों से चारों ओर से घिरा हुआ बाहर की ओर एक आँगन है। उसमें रत्न के तोरणों (बन्दनवारों ) – से सुशोभित चारों दिशाओं में चार द्वार हैं। समस्त गणनायक उन द्वारों की निरन्तर रक्षा करते रहते हैं और महामते ! उनके भीतर कामाख्या आदि उपयोगिनियाँ रक्षक के रूप में स्थित रहती हैं ॥ १९-२० ॥ उसके बाहर अनेक ब्रह्माण्डों में निवास करने वाले कई करोड़ ब्रह्मा तथा असंख्य विष्णु भगवती के दर्शन की उत्कट अभिलाषा के साथ उनमें ध्यान-परायण होकर सदा उपस्थित रहते हैं ॥ २११/२

उसके बाहर अनेक प्रकार के रत्नों से विनिर्मित चार द्वार हैं। करोड़ों गण उन द्वारों की सदा रखवाली करते रहते हैं । उन द्वारों के बाहर इन्द्र आदि करोड़ों देवेश्वर केवल एक बार भगवती के दर्शन की आकाङ्क्षा लेकर उनके ध्यान में तत्पर रहते हुए बहुत देर तक प्रतीक्षारत रहते हैं ॥ २२-२४ ॥ इसी प्रकार भगवती की आज्ञा का पालन करने वाले करोड़ों सेवक अनेकविध रत्नों से परिष्कृत अन्य बहुत-से द्वारों की रक्षा करते रहते हैं ॥ २५ ॥ उस पुर के उत्तर में विचित्र भ्रमरों से युक्त तथा खिले हुए पुष्पों से सुशोभित अत्यन्त रमणीय पारिजातवन प्रसिद्ध है। उस वन में सर्वदा वसन्त छाया रहता है और मन्द-मन्द हवा बहती रहती है । वहाँ ब्रह्मा, विष्णु आदि प्रमुख देवता विचित्र पक्षियों का रूप धारण कर महाकाली के चरित का मधुर स्वरों में गान करते रहते हैं ॥ २६-२७१/२

मुनिश्रेष्ठ ! उस पुर के पूर्वभाग में अत्यन्त सुन्दर तथा सुरम्य सरोवर स्थित है। वह सरोवर स्वर्णिम कमल, कह्लार तथा कुमुद के पुष्पों से अत्यन्त शोभित रहता है। गुञ्जार करते हुए भ्रमरसमुदाय के पंखों से प्रवाहित वायु से हिलते हुए चम्पक तथा अशोक- पुष्पों से उस सरोवर का तट अत्यन्त मनोहर प्रतीत होता है । वह सरोवर विविध वर्णों की मणियों से निर्मित सोपानों से चारों ओर से मण्डित है ॥ २८-२९१/२

महामते! इस प्रकार भगवती का वह सुरम्य पुर वर्णन से परे है। इसी प्रकार वहाँ पर अन्य नौ [महा] विद्याओं में प्रत्येक का अलग-अलग सुन्दर पुर है और उनके भी दाहिने भाग में नानाविध रूप धारण किये भगवान् सदाशिव पृथक्-पृथक् विराजमान हैं। उन सदाशिव के साथ वे [महा ] विद्याएँ पृथक्-पृथक् विहार करती रहती हैं ॥ ३०-३२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत ‘श्रीब्रह्ममयीमहाकालीस्थानवर्णन’ नामक उनसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५९ ॥

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