श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -013
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
तेरहवाँ अध्याय
भगवान् सदाशिव के शर्व, भव आदि आठ स्वरूपों तथा उनकी शक्तियों एवं पुत्रों का वर्णन
श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे त्रयोदशोऽध्यायः
शिवाष्टमूर्तिवर्णनं

सनत्कुमार बोले —  हे नन्दिन् ! उमापति परमेष्ठी अष्टमूर्ति महेश्वर शिव की और भी महिमा मुझे बताइये ॥ १ ॥

नन्दिकेश्वर बोले —  मैं जगत् को व्याप्त करके स्थित रहने वाले परमेष्ठी उमापति महेश की अष्टमूर्ति की महिमा आपको बताऊँगा । चराचर प्राणियों को धारण करने वाले उन पृथ्वीरूप शिव को सभी शास्त्रों के पारगामी विद्वान् शर्व — ऐसा कहते हैं ॥ २-३ ॥ उन पृथ्वीरूप परमेष्ठी शर्व की पत्नी विकेशी कही जाती हैं और पुत्र को अंगारक (मंगल) कहा गया है ॥ ४ ॥ वेदवेत्ता लोग जलमूर्ति शिव को भव — ऐसा कहते हैं। विद्वानों के द्वारा लोगों को जीवन प्रदान करने वाले परमात्मा भव की भार्या देवी उमा कही गयी हैं और उनके पुत्र शुक्र कहे गये हैं ॥ ५१/२

सभी लोकों में व्याप्त रहने वाले तथा सभी लोकों के एकमात्र रक्षक अग्निरूप भगवान् शिव को विद्वानों ने पशुपति कहा है। उन परमात्मा पशुपति की प्रिय भार्या स्वाहा कही गयी हैं। विद्वानों के द्वारा भगवान् कार्तिकेय उनके पुत्र कहे गये हैं ॥ ६-७१/२

समस्त भुवनों में व्याप्त रहनेवाले तथा सभी जीवों का भरण-पोषण करने वाले पवनरूप शिव को विद्वानों के द्वारा ईशान – ऐसा कहा जाता है। विद्वानों के द्वारा पवनात्मा जगत्कर्ता भगवान् ईशान की पत्नी भगवती शिवा कही गयी हैं और इनके पुत्र मनोजव कहे गये हैं ॥ ८-९१/२

सभी स्थावर-जंगम प्राणियों की समस्त कामनाएँ पूर्ण करने वाले आकाशरूप भगवान् शिव को विद्वान् भीम – ऐसा कहते हैं । विद्वान् पुरुषों ने दसों दिशाओं को उन महामहिम व्योमात्मा प्रभु भीम की पत्नियाँ तथा सर्ग को उनका पुत्र कहा है ॥ १०-१११/२

सभी को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले सूर्यरूप भगवान् शिव को देवता लोग भुक्तिमुक्तिदाता भगवान् रुद्र कहते हैं। भक्तों को भक्ति प्रदान करने वाले उन सूर्यात्मा रुद्र की भार्या सुवर्चला कही गयी हैं और शनैश्चर इनके पुत्र कहे गये हैं ॥ १२-१३१/२

समस्त सौम्य वस्तुओं की प्रकृति के रूप में प्रसिद्ध सोमरूप शिव को विद्वानों ने महादेव – ऐसा कहा है। मनीषियों ने रोहिणी को उन सोमात्मक प्रभु महादेव की पत्नी और बुध को उनका पुत्र बताया है ॥ १४-१५१/२

हव्यकव्य ग्रहण करने वाले देवताओं तथा पितरों के लिये हव्यकव्य की व्यवस्था करने वाले यजमानरूप प्रभु शिव को विद्वानों ने उग्र – ऐसा कहा है तथा दूसरे श्रेष्ठ जनों ने उन्हें ईशान भी कहा है। विद्वानों ने दीक्षा को उन यजमानरूप उग्र नामक शिव की पत्नी बताया है। उनका पुत्र सन्तान नाम वाला है ॥ १६-१८ ॥ जीवों के शरीरों में कोंकण आदि स्थलों की भाँति जो कठोर पार्थिव भाग है, उसे जिज्ञासुओं को शर्व-तत्त्व समझना चाहिये । प्राणियों के शरीर में जो शाश्वत द्रवरूप वस्तु है, वह उन परमात्मा भव का अंश है — ऐसा सभी वेदार्थों के पारगामी विद्वानों तथा तत्त्वज्ञों को जानना चाहिये ॥ १९-२०१/२

प्राणियों के शरीरों में जो तेजोरूप अग्निभाग है, उसे तत्त्वज्ञान की इच्छावालों को पशुपतिमूर्ति जाननी चाहिये । जीवों के शरीरों में जो प्राण आदि वायुरूप है, उसे विद्वानों को उन परमेश्वर की ईशानमूर्ति समझनी चाहिये; इसमें संशय नहीं है ॥ २१-२२१/२

सभी जीवों के शरीरों में जो छिद्ररूप [आकाश] भाग है, उसे तत्त्वविज्ञान की आकांक्षा रखने वालों को भीम की मूर्ति समझनी चाहिये। सभी प्राणियों के शरीरों में चक्षु आदि में जो सूर्यरूप तेज है, उसे परमार्थ के जिज्ञासुओं को रुद्रमूर्ति जाननी चाहिये ॥ २३-२४१/२

सभी प्राणियों के शरीरों में चन्द्ररूप जो मन है, उसे तत्त्वचिन्तकों को महादेव की मूर्ति जाननी चाहिये। सभी जीवों के शरीरों में यजमान नामक जो आत्मा है, उसे परमात्मज्ञान की कामना वाले लोगों को उग्र नामक मूर्ति जाननी चाहिये ॥ २५-२६१/२

महर्षिगण चौदहों योनियों में उत्पन्न होने वाले समस्त जीवों में अष्टमूर्ति की अभिन्नता बताते हैं और उन्होंने प्राणियों के शरीरों को शिव की सात मूर्तियों से समन्वित कहा है। सभी जीवों के शरीर में स्थित आत्मा उस शिव की आठवीं मूर्ति है ॥ २७-२८१/२

[हे सनत्कुमार!] यदि आप कल्याण प्राप्त करना चाहते हैं तो इन सर्वलोकस्वरूप तथा सर्वव्यापी अष्टमूर्ति भगवान् शिव की सब प्रकार से आराधना कीजिये। जिस किसी भी प्राणी के प्रति जो अनुग्रह किया जाता है, वह अष्टमूर्ति महेश्वर की ही आराधना की गयी होती है। यदि लोक में जिस किसी भी जीव को क्लेश दिया जाता है, तो वह मानो अष्टमूर्ति महेश को ही दिया गया । लोक में यदि जिस किसी भी प्राणी का अनादर किया गया, तो वह मानो सर्वव्यापी अष्टमूर्ति महेश का ही अनादर किया गया है। जिस किसी भी प्राणी को जो अभय प्रदान किया जाता है, उससे मानो अष्टमूर्ति शिव की आराधना कर ली गयी; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २९–३३१/२

सभी का उपकार करना तथा सबको अभय प्रदान करना अष्टमूर्ति शिव की ही आराधना है; इसमें संशय नहीं है। सबका उपकार करना तथा सब पर कृपा करना – इसे मुनीश्वरों ने अष्टमूर्ति की ही परम पूजा बतायी है। अतः [हे सनत्कुमार ! ] शिव की प्रसन्नता की कामना करने वाले आपको अन्य सभी प्राणियों पर अनुग्रह तथा उन्हें सर्वविध अभय प्रदान करना चाहिये ॥ ३४-३७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत उत्तरभाग में ‘शिवाष्टमूर्तिवर्णन’ नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥

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